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खाने के तेल के पैकेट पर एक लीटर लिखा है, लेकिन आपको असल में मिल कितना रहा है?

खाने के तेल (Edible Oil) के बढ़ते दामों से हम सब परेशान हैं. पिछले कुछ महीनों में इनमें काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. लेकिन तेल ख़रीदते समय क्या कभी इस बात पर गौर किया है कि आपको 1 लीटर में कितने ग्राम तेल मिल रहा है? हम जो भी तेल ख़रीदते हैं उसके पैकेट या डिब्बे में उसकी क्वांटिटी लीटर के अलावा ग्राम में भी लिखी होती है.

सवाल इसलिए किया क्योंकि पिछले क़रीब एक साल में खाने का तेल बेचने वाली कई कंपनियों ने अपनी पैकेजिंग में बदलाव किए हैं. इससे पैकेट या डिब्बे का रंग ही नहीं बदला है, बल्कि 1 लीटर में कितना ग्राम तेल मिल रहा है उसमें भी बदलाव हुआ है. समझने की कोशिश करेंगे कि इस बदलाव से कस्टमर्स को कोई नुक़सान हो रहा है या नहीं.

नेट वेट और पैकिंग के नियम

खाने के तेल और फ़ैट (जैसे वनस्पति घी, पॉम ऑयल, बटर या घी) की लेबलिंग के लिए क़ानून है. लीगल मेट्रोलॉज़ी ऐक्ट, 2009 और पैकेज एंड कमोडिटीज़ ऐक्ट (PCR), 2011 के नियम का पालन करना ज़रूरी है. इसके अलावा खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के भी कुछ क़ानून इसमें लागू होते हैं.

इन नियमों के मुताबिक़ पैकेट पर नेट वेट लिखना ज़रूरी है. खाने के तेल, वनस्पति, घी, मक्खन के पैकेट पर नेट वेट को मास या वॉल्यूम में लिखा जा सकता है. मास यानी ग्राम या किलोग्राम. वॉल्यूम यानी लीटर. ये मास या वॉल्यूम एक तय टेंप्रेचर पर मापा जाता है. इसको आसान शब्दों में ऐसे समझ सकते हैं कि जब तेल की पैकिंग की जाती है तो उसे 30, 40 या 50 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किया जाता है. उसका नेट वेट माप कर फिर उसे पैक किया जाता है. इसके अलावा PCR ऐक्ट, 2011 में ये साफ़ लिखा है कि अगर नेट वेट वॉल्यूम में लिखा है तो पैकेट पर मास लिखना भी ज़रूरी है.

BIS ने नेट वेट मापने का तरीक़ा तय किया है

मास और वॉल्यूम मापने का एक तय तरीक़ा है. ये तरीक़ा भारत सरकार की एक संस्था ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्ज़ (BIS) ने तय किया है. BIS के दस्तावेज “मेथड्स ऑफ़ सैंपलिंग एंड टेस्ट फ़ॉर ऑयल एंड फ़ैट्स” में इस बारे में साफ़-साफ़ बताया गया है. इसके पेज नंबर 39 में लिखा है की कुकिंग ऑयल की स्पेसिफ़िक ग्रैविटी कुछ चीजों की मदद से मापी जाती है. जैसे वेस्टफल हाइड्रोस्टैटिक बैलेन्स या स्पेसिफ़िक ग्रैविटी बॉटल या फिर पायनोमीटर की मदद से. लेकिन, इसमें एक बात लिखी गई है कि मापते वक़्त तापमान 30 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का इंटरनेशनल फ़ूड स्टैंडर्ड्ज़ पर जारी किया गया एक दस्तावेज है, CODEX ALIMENTARIUS. इस दस्तावेज में अलग-अलग तेल और फ़ैट के लिए पैकेजिंग के टेंप्रेचर के बारे में बताया गया है. पेज नंबर 7 कहता है कि तेल या फ़ैट को पैक करते वक़्त तापमान 30 से 39 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा नहीं होना चाहिए.

FSSAI के नियम

इसके अलावा इस मामले में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI के भी कुछ नियम हैं. ये बताते हैं कि पैकेजिंग के वक़्त टेंप्रेचर कितना होना चाहिए. उदाहरण के लिए सनफ्लॉवर ऑयल की बात करें तो FSSAI नियमों के मुताबिक़ टेंप्रेचर 25 डिग्री होना चाहिए. लेकिन ये हर तेल या फ़ैट के लिए समान नहीं है. FSSAI के नियम कहते हैं कि पाम ऑयल के लिए टेंप्रेचर 50 डिग्री हो तो राइस ब्रैन ऑयल के लिए 40 डिग्री.

लेकिन, क्या इन नियमों का पालन हो रहा है?

जवाब है नहीं. क्योंकि बाज़ार में खाने का तेल बेचने वाले ज़्यादातर ब्रांड 30 डिग्री से लेकर 50 डिग्री टेंप्रेचर तक तेल या फ़ैट का पैकेजिंग कर रहे हैं. इससे तेल ख़रीदने वाले को क्या नुक़सान है? क्या इससे तेल की क्वालिटी में कुछ असर पड़ता है? और क्या तेल को अलग-अलग टेंप्रेचर में गरम करके पैक करने से नेट वेट में कोई फ़र्क़ आता है?

पहले सवाल के जवाब के लिए तेल को रीफ़ाइन करने के तरीक़े को शॉर्ट में समझेंगे. रीफ़ाइन करने का मतलब है तेल या फ़ैट से गंदगी और हानिकारक चीजों को हटाना. इसके प्रॉसेस में 5 स्टेप होते हैं. हम केवल आखिरी स्टेप पर बात करेंगे. जिसे डीओडराइजेशन कहते हैं. इसमें तेल या फ़ैट से गंदी बदबू और ख़राब स्वाद हटाने के लिए उसे बहुत ज़्यादा तापमान पर गरम किया जाता है. उदाहरण के लिए सोयाबीन या सन्फ़्लॉवर ऑयल को 240 डिग्री सेल्सियस पर गरम किया जाता है. वहीं पॉम ऑयल के लिए ये टेंप्रेचर और भी ज़्यादा 270 डिग्री सेल्सियस तक होता है.

इस बारे में एक एक्सपर्ट ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर हमें बताया,

एक बात साफ़ है कि 40 या 50 डिग्री तापमान पर पैकिंग करने से खाने के तेल की क्वालिटी में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है और इससे सेहत को कोई नुक़सान नहीं है.

अब दूसरा सवाल, कि क्या पैकिंग के वक़्त टेंप्रेचर बढ़ाने से 1 लीटर या किसी भी वॉल्यूम के पैकेट के नेट वेट में कमी आती है. जवाब है हां. आगे बढ़ने से पहले नीचे दी गई तस्वीरें देखें.

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इन तस्वीरों और ऊपर की जानकारी से दो बातें निकल कर आती हैं. पहला कि फ़ैट यानी सभी वनस्पति, पामोलिन तेल, घी जैसे प्रॉडक्ट्स 40 से 50 डिग्री पर पैक किए जाते हैं. वहीं तेल 25 से 40 डिग्री तक पैक किए जाते हैं.

टेंप्रेचर बढ़ने से आपको क्या नुक़सान?

खाने का तेल बनाने वाले कुछ ब्रांड, जैसे इमामी और रुचि ने अपनी पुरानी पैकेजिंग को बदला है. इससे तेल के नेट वेट में फ़र्क़ आया है. उदाहरण के लिए सितंबर, 2021 में इमामी कंपनी ने सोयाबीन तेल के एक प्रॉडक्ट की लेबलिंग में 50 डिग्री सेल्सियस लिखा है. इस वजह से नेट वेट 905 ग्राम से घटकर 900 ग्राम हो गया है. जबकि पुरानी पैकेजिंग में ये 30 डिग्री सेल्सियस पर 910 ग्राम हुआ करता था.

Emami Oils
पैकिंग के वक़्त तापमान में फ़र्क़ से नेट वेट में 5 ग्राम का फ़र्क़ देखा जा सकता है.
Emami Oil
पुराने पैकिंग से नए में कुल 10 ग्राम का फ़र्क़ देखा जा सकता है.

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पॉम ऑयल की पैकिंग 50 डिग्री टेम्प्रेचर पर होने से महज़ 893 ग्राम तेल कस्टमर को मिलता है.

इसका मतलब जितना टेंप्रेचर बढ़ेगा उतना नेट वेट कम होगा. इससे घाटा तो सिर्फ़ उस कस्टमर को है जो तेल ख़रीद रहा है. तो फिर ये सवाल उठता है कि सरकारी एजेंसियां इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रही हैं? क्योंकि नियम तो सरकार ने बना दिए हैं लेकिन इनको लागू करने और इनकी रोक-थाम पर कोई क़ानून नहीं है. खाने के तेल या फ़ैट को ज़्यादा से ज़्यादा कितने टेंप्रेचर पर पैक कर सकते हैं इस पर कोई क़ानून मौजूद नहीं है. इस वजह से कई कंपनियां इसका फ़ायदा उठा रही हैं.

कुछ समय पहले देश के कुछ हिस्सों से सरकारी एजेंसियों ने इमामी कंपनी के खाने के तेल के कुछ पैकेट की ज़ब्ती की थी. लेकिन कोई क़ानून न होने की वजह से कलकत्ता के एक कोर्ट से कंपनी को राहत मिल गई.

इमामी का जवाब

इस पूरे मामले पर दी लल्लनटॉप ने इमामी कंपनी से बात की. उसके प्रवक्ता ने हमें बताया कि इमामी कोई भी ग़ैर क़ानूनी काम में शामिल नहीं है. हालांकि कंपनी ने पैकिंग के टेंप्रेचर में हुए बदलाव पर कोई टिप्पणी नहीं की. इमामी ने दी लल्लनटॉप के सवालों का जवाब देते हुए लिखा,

“हम ये बताना चाहेंगे कि इमामी एग्रोटेक (ईएएल) एक नैतिक और कानून का पालन करने वाली कंपनी है. पैकेजिंग में हुए बदलाव से किसी भी तरह से कस्टमर के अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है. हमारे खाने के तेल की पैकेजिंग कानून और इंडस्ट्री प्रैक्टिस के मुताबिक़ है, जिसका पालन अदानी विल्मर, रुचि सोया और कई अन्य प्रमुख ब्रांड करते हैं. खाने के तेल और फ़ैट को पैक करते वक़्त तापमान 30 और 50 डिग्री सेल्सियस होता है. ये इंडस्ट्री प्रैक्टिस के मुताबिक़ है और पैकेज पर लिखा जाता है.”

इमामी ने आगे अपने जवाब में लिखा,

“ज्यादातर खाने के तेल वॉल्यूम के हिसाब से बेचे जाते हैं. इसलिए हमारे पैकेट पर 1 लीटर लिखा होता है. हालांकि, लीगल मेट्रोलॉजी ऐक्ट और अन्य नियमों के मुताबिक़ खाने के तेल का नेट वेट भी इसके पैक पर होना चाहिए. जिसका हम पालन करते हैं. घोषित नेट वेट पैकेट में होता है.”

इमामी के प्रवक्ता ने कोर्ट से मिली राहत का भी हवाला दिया. कहा कि कंपनी को लीगल मेट्रोलोजी डिपार्टमेंट से मिले नोटिस पर स्टे ऑर्डर कोर्ट से मिला है. साथ ही अलीपूर के सिविल कोर्ट ने 7 अक्टूबर, 2021 को कंपनी के पक्ष में आदेश पारित किया है.


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