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कहानी उस लोकसभा सीट की, जहां से तीन बार सांसद रहा शख्स साढ़े पांच साल जेल में रहा

अररिया की लोकसभा सीट आरजेडी से सांसद रहे तस्लीमुद्दीन के निधन से खाली हुई थी. वहां पर तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आरजेडी से उम्मीदवार हैं. वहीं बीजेपी ने पूर्व सांसद प्रदीप सिंह को मैदान में उतारा है. क्षेत्र में लड़ाई भले ही सरफराज और प्रदीप सिंह के बीच दिखती हो, लेकिन असली लड़ाई तो नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के बीच है.

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बात पिछले साल की है. अगस्त का महीना था. एक तरफ यूपी में अगस्त में बच्चे मर रहे थे, वहीं दूसरी ओर बिहार में बाढ़ ने तबाही मचा रखी थी. ये तबाही नेपाल के पानी छोड़े जाने की वजह से हुई थी. अचानक से पांच लाख क्यूसेक पानी आ जाने की वजह से बिहार में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 514 लोगों की मौत हो गई थी. इसके अलावा करीब 9 लाख लोग बेघर हो गए थे. इस बर्बादी के सबसे ज्यदा निशान अररिया जिले ने देखे हैं. अकेले इस जिले में 100 लोगों की मौत हुई थी और दो लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए थे.

अररिया में 2017 में आई बाढ़ में 95 लोगों की मौत हो गई थी.
अररिया में 2017 में आई बाढ़ में 95 लोगों की मौत हो गई थी.

ये अररिया पहले उसी पूर्णिया जिले का हिस्सा रहा है, जिसके बारे में फणीश्वर नाथ रेणु ने एक पूरा उपन्यास लिखा है मैला आंचल. रेणु का यह प्रतिनिधि उपन्यास 1954 में छपा था. उपन्यास की आंचलिकता ऐसी कि 60-65 साल बाद भी ऐसा उपन्यास फिर से नहीं लिखा जा सका. 1990 में जब पूर्णिया से अलग होकर अररिया जिला बना, तो फणीश्वरनाथ रेणु की कर्मभूमि भी पूर्णिया से बदलकर अररिया हो गई. और इस अररिया के औराई गांव में सिसायत करने वाला कोई भी ऐसा शख्स नहीं है, जो वहां जाकर हाजिरी न लगाता हो. नीतीश कुमार से लेकर लालू यादव तक रेणु के घर जाते रहे हैं और उनकी पत्नी प्द्मा रेणु से आशीर्वाद लेते रहे हैं. अररिया की सियासत पर नजर रखने वाले वहां के स्थानीय पत्रकार अमरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि नीतीश कुमार रेणु की पत्नी पद्मा रेणु को मां की तरह मानते हैं. एक बार पद्मा रेणु से मिलने के लिए जब नीतीश उनके घर गए, तो पद्मा ने कहा कि वो उनके बेटे पद्मपराग राव वेणु को भी अपने साथ ले जाएं. नीतीश उन्हें साथ ले गए और 2010 में बीजेपी से टिकट दिलवाकर विधानसभा पहुंचा दिया. हालांकि उसके बाद जब नीतीश और बीजेपी के रिश्ते खराब हुए तो पद्मपराग राय वेणु को भी खामियाजा उठाना पड़ा और उन्हें दोबारा टिकट नहीं मिला. इससे नाराज वेणु जदयू में शामिल हो गए.

पूर्णिया से अलग होकर जिला बने अररिया की एक पहचान फणीश्वर नाथ रेणु से भी है.
पूर्णिया से अलग होकर जिला बने अररिया की एक पहचान फणीश्वर नाथ रेणु से भी है.

ये अररिया की कहानी हम आपको क्यों सुना रहे हैं. क्योंकि यहां पर लोकसभा का चुनाव है. और ये उपचुनाव है. वजह ये है कि यहां राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर सांसद चुने गए मोहम्मद तस्लीमुद्दीन की 17 सितंबर 2017 को मौत हो गई थी. उसके बाद ये सीट खाली थी, जिससे यहां पर उपचुनाव करवाना पड़ा है.

नेपाल के तराई इलाके से सटा हुआ अररिया बिहार के नक्शे में पूर्वी और उत्तरी छोर पर बसा हुआ है. 2830 वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैले हुए इस अररिया जिले से हिमालय रेंज की कंजनजंगा चोटी साफ तौर पर दिखती है. इस अररिया के नाम की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. जब अंग्रेज भारत में आए, तो उन्हें अपने पैर जमाने के लिए फ्रांसीसियों के पैर उखाड़ने पड़े थे. 1754 में ब्रिटिश और फ्रांसीसि सैनिकों के बीच लड़ाई हुई थी. अंग्रेजों की ओर से इस लड़ाई का नेतृत्व जॉन फार्बिस ने किया था. जहां पर जॉन फार्बिस का बंगला था, उसे रेजिडेंशियल एरिया कहा जाता था. बाद में लोग इसे आर एरिया कहने लगे जो धीरे-धीरे बदलते हुए अररिया हो गया.

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अब बात इस जिले के सियासत की. 41 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस जिले की सियासत इतनी पेचीदी है कि पार्टी कोई भी हो, वो ये दावा नहीं कर सकती कि उसकी जीत हो रही है. इसकी वजह इस सीट का इतिहास है.

1962 में लोकसभा की एक सीट थी सोनबरसा. ये एक सुरक्षित सीट थी, जिसपर कांग्रेस ने तुलमोहन राम को उम्मीदवार बनाया था. उनके सामने सीपीआई के ऋषिदेव केशवा मैदान में थे. तुलमोहन राम ने करीब 58 हजार वोटों से ये चुनाव जीत लिया था. 1967 में परिसीमन हुआ, तो सोनबरसा सुरक्षित सीट खत्म हो गई और एक नई सीट सामने आई अररिया. ये सीट भी सुरक्षित ही थी. कांग्रेस ने एक बार फिर से इस सीट से तुलमोहन राम को ही उम्मीदवार बनाया. जीत तुलमोहन के खाते में ही गई और उनके सामने जनसंघ के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे जे राम करीब 50 हजार वोटों से हार गए. लगातार दो जीतों से उत्साहित कांग्रेस में फूट पड़ चुकी थी. इंदिरा गांधी से अलग होकर कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन बन चुकी थी. लेकिन तुलमोहन राम ने इंदिरा की पार्टी का दामन थाम लिया. चुनाव हुए तो तुलमोहन ने और भी बड़ी जीत हासिल की. इस बार दूसरे नंबर पर कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन के डुमर लाल बैठा रहे. पिछले चुनाव में जो जनसंघ दूसरे नंबर पर रहा था, उसे मात्र 1508 वोट मिले. लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर तुलमोहन राम संसद भवन पहुंच चुके थे.

तुलमोहन राम पहले ऐसे सांसद थे, जिनकी वजह से विपक्ष ने लोकसभा में काम का बहिष्कार कर दिया था.

तीसरी बार संसद भवन पहुंचे तुलमोहन अपने तीन साल पूरे करने वाले थे. इसी दौरान 30 मार्च 1974 को उस समय निकलने वाले साप्ताहिक अखबार ब्लिट्ज में एक खबर छपी. खबर में लिखा था कि कुछ सांसदों ने पांडिचेरी के व्यापारियों को आयात लाइसेंस की मंजूरी देने के लिए 23 नवंबर 1972 को वाणिज्य मंत्रालय को एक ज्ञापन दिया था. घोटाले की बात उठी तो संसद में चर्चा भी हुई. इस घोटाले की चर्चा करते हुए मधु लिमये ने कहा कि लोकसभा में लाइसेंस 400 फीसदी प्रीमियम पर बेचे जा रहे थे. चर्चा हुई तो कहा गया कि किसी ने सिफारिशी पत्र पर सांसदों के जाली दस्तखत कर दिए थे. और सांसद तो मुकर गए, लेकिन तुलाराम ने मान लिया कि सिग्नेचर उन्होंने किया था. जब जांच सीबीआई को सौंपी गई तो सीबीआई ने 9 नवंबर 1974 को आरोपपत्र दाखिल कर दिया, जिसमें तुलाराम को दोषी पाया गया. उन्हें साढ़े पांच साल की सजा हुई. उन्होंने सजा पूरी की और फिर जेल से निकलकर राजनीति से संन्यास ले लिया.

इस बारे में बिहार की सियासत पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर लिखते हैं-

‘अस्सी के दशक में वे मुझे बिहार विधानसभा के स्पीकर के चेंबर में मिले थे. वे साधु की पोशाक में थे. कुरेदने पर उन्होंने मुझसे अपनी पीड़ा बताई थी. वे दुखी इस बात से नहीं थे कि उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में सजा हुई. बल्कि दुखी इस बात से थे कि उन बड़े नेताओं और अफसरों को सजा नहीं मिली जो घोटाले के लिए अधिक जिम्मेदार थे. आज भी जब बड़े-बड़े घोटालों में ताकतवर लोगों को बचा लेने की काशिश होती है, कई लोग बचा भी लिए जाते हैं तो बरबस तुलमोहन राम का चेहरा याद आ जाता है.’

आज भले ही संसद में हर वक्त काम ठप रहने जैसी चीज आम हो गई है, लेकिन इसकी परंपरा 1974 में ही शुरू हुई थी. तुलमोहन का मुद्दा वो पहला मुद्दा था, जिस पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया जताई थी और संसद का काम ठप कर दिया था. खैर ये हश्र उस नेता का हुआ, जो अररिया सीट से लगातार तीन बार बड़े अंतर से जीतकर संसद भवन में पहुंचा था. एक घोटाले ने उसका करियर खत्म कर दिया, लेकिन चुनाव तो होने ही थे. सो वो जारी रहे. लेकिन इस बीच बिहार की सियासत एक नई करवट ले रही थी. जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार के छात्र आंदोलन करने निकल पड़े थे. छात्र आंदोलन, इंदिरा गांधी के निर्वाचन पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और फिर देश में लगे आपातकाल के बाद फिर से 1977 में चुनाव हुए. इंदिरा के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा अररिया सीट पर भी था.

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नतीजा ये हुआ कि भारतीय लोक दल के महेंद्र नारायण सरदार ने बड़ी जीत हासिल की. उनके खिलाफ कांग्रेस की सीट से उतरे डुमर लाल बैठा एक लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव हार गए थे. केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन 1980 आते-आते जनता पार्टी बिखर गई. 1980 में फिर से चुनाव हुए. इस दौरान डुमर लाल बैठा कांग्रेस के उम्मीदवार बने रहे, जबकि महेंद्र नारायण सरदार जनता पार्टी के उम्मीदवार बन गए. नतीजे आए तो डुमर लाल बैठा ने जीत दर्ज की और ये जीत एक लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की. डुमर लाल बैठा 1984 के चुनाव में भी जीत गए. राजीव गांधी की सरकार तो बनी, लेकिन सरकार पर दाग लगने शुरू हो गए थे. बोफोर्स का घोटाला पूरे देश का मुद्दा बन गया था.

रामजीदास ऋषिदेव (दाहिने) बिहार सरकार में पर्यावरण मंत्री हैं. अररिया लोकसभा सीट पर बीजेपी का खाता उन्हीं ने खोला था.
रामजीदास ऋषिदेव (दाहिने) बिहार सरकार में पर्यावरण मंत्री हैं. अररिया लोकसभा सीट पर बीजेपी का खाता उन्हीं ने खोला था.

1989 में जब चुनाव हुए, तो बोफोर्स घोटाले का प्रभाव चुनावों में साफ तौर पर दिखा. अररिया भी अछूता नहीं रहा था. जनता दल के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे शुकदेव पासवान ने 72 हजार से अधिक वोटों से कांग्रेस के डुमर लाल बैठा को मात दी थी. 1991 और 1996 के चुनाव में भी शुकदेव पासवान जनता दल के टिकट पर इस सीट से जीतते रहे. 1998 में जब चुनाव हुए, तो पहली बार बीजेपी ने भी यहां पर खाता खोल लिया. रामजी दास ऋषिदेव ने इस सीट से जीत हासिल की और शुकदेव पासवान इस चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे. दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय जनता दल की गीता देवी थीं. लेकिन अगले ही साल 1999 में फिर से लोकसभा चुनाव हुए. उस वक्त तक शुकदेव पासवान राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो चुके थे. चुनाव के नतीजे आए, तो शुकदेव पासवान ने ये सीट बीजेपी से छीन ली थी. शुकदेव ने बीजेपी के परमानंद ऋषिदेव को 11000 वोटों को मात दे दी थी.

शुकदेव पासवान नौ बार पार्टी बदल चुके हैं.
शुकदेव पासवान नौ बार पार्टी बदल चुके हैं. फिलहाल 2016 से वो जदयू के साथ हैं.

लेकिन बीजेपी के बढ़ते हुए वोटों की ताकत को शुकदेव पासवान भांप गए थे. लिहाजा जब 2004 में चुनाव होने थे, तो उन्होंने पाला बदल लिया और बीजेपी में शामिल हो गए. वहीं जो रामजी दास ऋषिदेव 1999 में बीजेपी से जीते थे, पाला बदलकर सपा में चले गए. जब नतीजे आए तो शुकदेव पासवान ने रामजीदास ऋषिदेव को करीब 18 हजार वोटों से मात दे दी थी. 2009 में जब परिसीमन हुआ, तो जो अररिया सुरक्षित सीट थी, वो सामान्य सीट में तब्दील हो गई. इसकी वजह से पूरा सियासी गणित बिगड़ गया, जिसका सीधा फायदा बीजेपी ने उठाया. सामान्य सीट होने के बाद भी यहां से बीजेपी ने एक पिछड़ी जाति के प्रदीप कुमार सिंह को मैदान में उतार दिया. प्रदीप सिंह ने करीब 28 हजार वोटों से जाकिर हुसैन खान को मात दी. लेकिन 2014 में जब पूरा देश मोदी लहर पर सवार था, अररिया सीट ने फिर से बीजेपी को धोखा दे दिया. इस सीट पर राष्ट्रीय जनता दल के तस्लीमुद्दीन ने बड़ी जीत दर्ज की. बीजेपी के सिटिंग सांसद प्रदीप कुमार सिंह दूसरे नंबर पर चले गए और उन्हें करीब 1 लाख 46 हजार वोटों से मात मिली.

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तीन बार सांसद रहे तसलीमुद्दीन को पूर्णिया-अररिया के लोग सीमांत गांधी कहते थे.

इतनी बड़ी जीत दर्ज करने वाले सांसद तस्लीमुद्दीन एक बार पूर्णिया और एक बार किशनगंज से सांसद रह चुके थे. तीसरी बार वो अररिया से लोकसभा पहुंचे, लेकिन 17 सितंबर 2017 को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. जब उपचुनाव हुए तो स्थितियां बदली हुई थीं. इस लोकसभा में कुल छह विधानसभा की सीटें हैं, जिनमें आरजेडी के पास 1, जदयू के पास 2, बीजेपी के पास 2 और कांग्रेस के पास एक सीट है. ये तब की स्थिति है जब 2015 में राजद, जदयू और कांग्रेस ने मिलकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. जदयू के राजद-कांग्रेस से अलग होकर बीजेपी के साथ जाने के बाद स्थितियां बदल गई हैं. अब बीजेपी-जदयू गठबंधन के पास चार सीटें हैं, जबकि राजद-कांग्रेस के पास दो सीटे हैं. स्थितियां इसलिए और भी बदली हुई हैं, क्योंकि चारा घोटाले में दोषी पाए गए लालू यादव जेल में हैं और राजद की ओर से प्रचार की कमान तेजस्वी यादव ने संभाल रखी है. लालू के सियासत में आने के बाद बिहार का ये पहला चुनाव है, जो बिना लालू यादव के प्रचार के लड़ा गया है.

नीतीश कुमार और सुशील मोदी के गठबंधन के खिलाफ तेजस्वी, जीतन मांझी और शरद यादव ने प्रचार की कमान संभाल रखी थी.

गठबंधन के टूटने के बाद ये पहला चुनाव है, तो ये सीट भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई में तब्दील हो गई है. राष्ट्रीय जनता दल की ओर से मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम चुनावी मैदान में हैं, तो बीजेपी ने पूर्व सांसद प्रदीप सिंह मैदान में हैं. 2009 में जीते हुए प्रदीप मोदी लहर में 2014 में हार गए थे. कहने को तो यहां पर जदयू का प्रत्याशी नहीं है, लेकिन राजद और नीतीश के बीच इतनी खींचतान है कि नीतीश कुमार ने खुद इस सीट के लिए प्रचार किया है. वहीं बीजेपी की ओर से सुशील मोदी ने पूरे प्रचार की कमान संभाल रखी थी. विपक्ष भी बीजेपी को हर हाल में हराना चाहता था. जीतन राम मांझी भी विपक्ष के नए झंडाबरदार हो गए थे. शरद यादव नीतीश का साथ छोड़ ही चुके हैं. ऐसे में शरद यादव, तेजस्वी यादव और जीतन राम मांझी के साथ ही विपक्ष के सारे बड़े नेता एक जुट होकर सरफराज आलम के लिए वोट मांगने निकले थे.

जदयू से विधायक रहे सरफराज तसलीमुद्दीन के बेटे हैं. जदयू से निकाले जाने के बाद वो राजद में शामिल हो गए.

सरफराज इससे पहले जदयू में रह चुके हैं. जदयू में रहते हुए वो विधानसभा का चुनाव जीते और अररिया की जोकिहाट सीट से विधायक बने. जनवरी 2016 में जब सरफराज का नाम चलती ट्रेन में एक महिला के साथ छेड़छाड़ के मामले में आया और उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, तो जदयू ने उन्हें निलंबित कर दिया. इसके बाद उन्होंने जनवरी 2018 में राजद का दामन थाम लिया था. मुस्लिम बहुल सीट पर उतरे सरफराज को सबसे ज्यादा फायदा तो सहानुभूति का मिल सकता है, क्योंकि ये सीट उनके पिता के निधन के बाद खाली हुई है. दूसरा जो सबसे बड़ा फायदा है, वो उनके पिता की बनाई हुई विरासत है, जिसकी बदौलत उन्हें सीमांचल का गांधी कहा जाता था. ये उपनाम उन्हें इसलिए दिया गया था, क्योंकि मुस्लिम बहुल इलाका होने के बाद भी हिंदुओं में उनकी अच्छी पकड़ थी. वो हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता की पैरोकारी करते रहे थे, जिसकी वजह से स्थानीय लोगों ने उन्हें ये नाम दिया था. लेकिन इसी शख्स का बेटा सरफराज जब अपनी पिता की विरासत को बचाने के लिए मैदान में उतरा तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा-

‘अगर राजद के प्रत्याशी सरफराज इस चुनाव में जीत जाते हैं तो अररिया आईएसआईएस के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन जाएगा. वहीं अगर बीजेपी उम्मीदवार प्रदीप सिंह जीतते हैं, तो इससे देशभक्ति की भावना बढ़ेगी.’

हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार रहे तस्लीमुद्दीन के बेटे को आईएसआईएस की सुरक्षित पनाहगाह बताने वाली बीजेपी ने चुनाव में ध्रुवीकरण का अपना अंतिम दाव भी चल दिया था. अब सीमांचल गांधी के बेटे अपने पिता की विरासत बचा पाते हैं या फिर मुस्लिम बहुल इलाके में बीजेपी जीत दर्ज कर पाती है, इसका फैसला ईवीएम ही करेगी.


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