Submit your post

Follow Us

कहीं चिंदी-चिंदी हो बिखर न जाए हिंदी, इसलिए लड़ रहे हैं ये लोग

565
शेयर्स

देश-दुनिया के तमाम हिंदीप्रेमी कल नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले के आखिरी दिन मेलार्थी होने का सुख ले रहे थे.

कल ही प्रगति मैदान से महज चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित जंतर मंतर पर हिंदी कहीं चिंदी-चिंदी न हो जाए, इसलिए कुछ हिंदीप्रेमी धरना दे रहे थे.

यह धरना ‘अपनी भाषा’ और ‘हिंदी बचाओ मंच’ के माध्यम से आयोजित हुआ. दरअसल सांसद मनोज तिवारी, संजय निरुपम, जीतन राम मांझी आदि द्वारा भोजपुरी, राजस्थानी, मगही आदि को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के बयान सामने आने के बाद हिंदी के चिंतकों और लेखकों में इसे लेकर गंभीर असहमति है.

इस असहमति की परिणति कल जंतर मंतर पर धरने के रूप में हुई. इस धरना प्रदर्शन में वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने स्पष्ट शब्दों में कहा :

‘‘भोजपुरी और राजस्थानी समेत हिंदी की किसी भी बोली को आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और हिंदी को टूटने से बचाएं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब हिंदी का संघर्ष अंग्रेजी के वर्चस्व की मानसिकता के खिलाफ मजबूत हो रहा है ठीक उसी समय हिंदी की बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के नाम पर अंदरूनी कलह को जन्म दिया जा रहा है. इससे हिंदी कमजोर होगी.’’

जानी-मानी साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने कहा कि भोजपुरी हिंदी का अभिन्न हिस्सा है, इसे अलग कर देने से हिंदी तो कमजोर होगी ही भोजपुरी की डगर और भी कठिन हो जाएगी.

हिंदीसेवी श्याम रूद्र पाठक के मुताबिक : ‘‘भोजपुरी के अलग होने से हिंदी के समक्ष वही संकट पैदा होता है जो कश्मीर के संदर्भ में भारत के समक्ष है.’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अमरनाथ ने बहुत असरदार तथ्यों और तर्कों के माध्यम से हिंदी और उसकी बोलियों विशेषतः भोजपुरी के संदर्भ में उपजी जटिल समस्या को स्पष्ट किया और हिंदी की वर्तमान स्थिति को यथावत बनाए रखने का आग्रह किया.

इस धरने में युवा बड़ी संख्या में मौजूद रहे. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र रोहित मिश्र ने इस मौके पर ओजस्वी कविता-पाठ भी किया. प्रो. अमरनाथ के नेतृत्व में आयोजित इस धरना-प्रदर्शन का समापन गृह मंत्री राजनाथ सिंह को ज्ञापन सौंप कर हुआ.

क्या है आठवीं अनुसूची

आठवीं अनुसूची में संविधान द्वारा मान्यताप्राप्त 22 प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है. इस अनुसूची में आरंभ में 14 भाषाएं (असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, उर्दू) थीं. बाद में सिंधी और उसके बाद कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली को भी इसमें शामिल किया गया. इससे इसकी संख्या 18 हो गई. फिर इसमें बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी शामिल किया गया. इस प्रकार इस अनुसूची में अब 22 भाषाएं हैं. मनोज तिवारी, संजय निरुपम, जीतन राम मांझी आदि अब इस अनुसूची में भोजपुरी, राजस्थानी, मगही को भी शामिल करने की मांग कर रहे हैं. मौजूदा विरोध इस बात को लेकर ही है.

इस विरोध के मुख्य सूत्रधार कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर, और हिंदी बचाओ मंच के संयोजक अमरनाथ हैं. वह इस तरह की मांग को हिंदी के अस्तित्व पर संकट की तरह देख रहे हैं. इससे बचाव के लिए उन्होंने देश-दुनिया के हिंदी-लेखकों का भारत के प्रधान मंत्री के नाम एक खुला पत्र भी साझा किया है. यह पत्र पढ़ कर इस पूरे मामले की गंभीरता और औचित्य को समझा जा सकता है. इस पत्र के आखिर में उन 113 लेखकों के नाम भी हैं जो इस मुहिम में उनके साथ हैं.  इस पत्र को अविकल हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :

सेवा में,
श्री नरेंद्र मोदी जी
माननीय प्रधानमंत्री,
भारत सरकार

विषय : भोजपुरी या हिंदी की किसी भी अन्य बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न किया जाए.

महोदय,

हमारी हिंदी आज टूटने के कगार पर है. निजी स्वार्थ के लिए कुछ लोगों ने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज कर दी है. भोजपुरी के कलाकार और दिल्ली से भाजपा के सांसद श्री मनोज तिवारी ने संसद और उसके बाहर भी यह मांग दुहराई है.

जन भोजपुरी मंच नामक संगठन ने अपनी मांग के पक्ष में जिन नौ आधारों का उल्लेख किया है उनमें से सभी आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, अतार्किक और भ्रामक हैं. हिंदी बचाओ मंच ने उनकी व्यापक छानबीन की है और उन सभी आधारों पर क्रमश: अपना पक्ष प्रस्तुत करता है.

1. भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजी, अवधी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, कुमायूंनी-गढ़वाली, मगही, अंगिका आदि हिंदी की अन्य बोलियां. क्या उन सबको आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना संभव है?

2. भोजपुरी भाषियों की संख्या 20 करोड़ बताई गई है. यह कथन मिथ्या है. हिंदी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है. हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिंदी भी. लिखने-पढ़ने का सारा काम हम लोग हिंदी में करते है? इसीलिए राजभाषा अधिनियम 1976 के अनुसार हमें ‘क’ श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बंटने के बावजूद हमें ‘हिंदी भाषी’ कहा गया है. वैसे 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार भोजपुरी बोलने वालों की संख्या लगभग 3,30,99497 ही है.

3. स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले सिर्फ हम भोजपुरी भाषी ही नहीं थे. देश भर के लोगों ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया था. वैसे स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वाले अब संयोग से बचे नहीं हैं. वर्ना, वे अपने उत्तराधिकारियों की मांग से कतई सहमत नहीं होते. उन्होंने तो अंग्रेजों की गुलामी से पूरे देश की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जबकि ज.भो.मं. के लोग अपना घर बांटने के लिए लड़ रहे हैं.

4. ज.भो.मं. के अनुसार भोजपुरी देशी भाषा है तो क्या हिंदी देशी भाषा नहीं है? क्या वह किसी अन्य देश से आई है?

5. ज.भो.मं. ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय सहित देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भोजपुरी के पठन-पाठन का जिक्र किया है. यह सूचना भ्रामक है. भोजपुरी हिंदी का अभिन्न अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रज आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी-पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं. हिंदी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है. हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं. हिंदी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं. इनकी समृद्धि और विकास के लिए और भी प्रयास किए जाने चाहिए.

6. ज.भो.मं. ने मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने का तर्क दिया है. मारीशस में भोजपुरी को सम्मान मिलने से हिंदी भी गौरवान्वित हो रही है. इससे अपने देश में भोजपुरी को मान नहीं मिल रहा – यह कैसे प्रमाणित हो सकता है? क्या घर बांट लेना ही मान मिलना होता है? वैसे 2011 की जनगणना की रिपोर्ट अनुसार मारीशस की कुल आबादी 12,36,000 है जिसमें से सिर्फ 5.3 प्रतिशत लोग भोजपुरी भाषी है. यानी, किसी भी तरह यह संख्या एक लाख नहीं होगी.

7. क्या ज.भो.मं., मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई भोजपुरी में करा पाएगा? तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक हम इन विषयों की पढ़ाई हिंदी में करा पाने में सफल नहीं हो सके. ऐसी मांग करने वाले लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं, खुद हिंदी की रोटी खाते हैं और मातृभाषा के नाम पर भोजपुरी को पढ़ाई का माध्यम बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके आस-पास की जनता गंवार ही बनी रहे और उनकी पुरोहिती चलती रहे.

8. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से करोड़ों भोजपुरी भाषियों में आत्मगौरव नहीं, आत्महीनताबोध पैदा होगा. घर बंटने से हिंदी भी कमजोर होगी और भोजपुरी भी.

9. ज.भो.मं. का कहना है कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदी को कोई क्षति नहीं होगी. हिंदी को होने वाली क्षति का बिंदुवार विवरण हम यहां दे रहे हैं :

संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल होने से हिंदी को होने वाली क्षति

1. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से हिंदीभाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरी भाषियों की जनसंख्या (ज.भो.मं. के अनुसार 20 करोड़) घट जाएगी. मैथिली की संख्या हिंदी में से घट चुकी है. स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिंदी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है. यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिंदी से छिनते देर नहीं लगेगी. भोजपुरी के अलग होते ही ब्रज, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी. उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है. ‘रामचरितमानस’, ‘पद्मावत’, या ‘सूरसागर’ जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं हैं.

2. ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकीपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया की सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिंदी को चौथे स्थान पर रखा है. इसके पहले हिंदी का स्थान दूसरा रहता था. हिंदी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है. साम्राज्यवादियों द्वारा हिंदी की एकता को खंडित करने के षड़्यंत्र का यह ताजा उदाहरण है और इसमें विदेशियों के साथ कुछ स्वार्थांध देशी जन भी शामिल हैं.

3. हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है. अंग्रेजी हमारे देश की सभी भाषाओं को धीरे-धीरे लीलती जा रही है. उससे लड़ने के लिए हमारी एकजुटता बहुत जरूरी है. उसके सामने हिंदी ही तनकर खड़ी हो सकती है, क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से वह आज भी देश की सबसे बड़ी भाषा है और यह संख्या-बल बोलियों के जुड़े रहने के नाते है. ऐसी दशा में यदि हम बिखर गए और आपस में ही लड़ने लगे तो अंग्रेजी की गुलामी से हम कैसे लड़ सकेंगे?

4. भोजपुरी की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा जब दोनों साथ रहेंगी. आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांट लेना है. भोजपुरी तब हिंदी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू आदि. आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिंदी के कोर्स में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? क्योंकि तब कबीर हिंदी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे. क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

5. भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है. उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण. उसके पास मानक गद्य तक नहीं है. किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की?

6. कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है. घर बंटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं. भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिंदी भी. इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी और हिंदी का इससे बहुत अहित होगा. मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है.

7. संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने की मांग आज भी लंबित है. यदि हिंदी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा?

8. स्वतंत्रता के बाद हिंदी की व्याप्ति हिंदीतर भाषी प्रदेशों में भी हुई है. हिंदी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिंदीभाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिंदीतर भाषी राज्य भी हैं. अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिंदी का संख्या-बल घटा तो वहां की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहां हिंदी के पाठ्यक्रम जारी रखे जाएं या नहीं. इतना ही नहीं, राजभाषा विभाग सहित केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय अथवा विश्व हिंदी सम्मेलन जैसी संस्थाओं के औचित्य पर भी सवाल उठ सकता है.

मान्यवर, भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भयंकर आत्मघाती है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे किंतु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया. आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है.

अत: ‘हिंदी बचाओ मंच’ के हम सभी सदस्य आपसे से विनम्र अनुरोध करते हैं कि कृपया हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करें और इस विषय में यथास्थिति बनाए रखें.

सधन्यवाद,
निवेदक : भारत के हम हिंदी -लेखक :

1. डॉ. अमरनाथ, प्रोफेसर, क. वि. वि. तथा संयोजक, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
2. प्रो. अच्युतानंद मिश्र, पूर्व कुलपति, मा. च. पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल.
3. डॉ. अभिजीत सिंह, आलोचक एवं संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, सिलीगुड़ी.
4. प्रो. अनंतराम त्रिपाठी, प्रधानमंत्री, राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, वर्धा.
5. प्रो. अरुण होता, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, प.बं.रा.विश्वविद्यालय, बारासात.
6. प्रो. अच्युतन, पूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, कालीकट विश्वविद्यालय, कालीकट.
7. प्रो. आलोक पांडेय, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद.
8. प्रो. आलोक गुप्ता, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर.
9. डॉ. आशुतोष, लेखक व संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
10. ओमप्रकाश पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक, ‘नया परिदृश्य’, सिलीगुड़ी.
11. कविता वाचक्नवी, प्रख्यात लेखिका व महासचिव, ‘विश्वंभरा’, हॉस्टन, टैक्सास.
12. प्रो. कमलकिशोर गोयनका, प्रख्यात लेखक व उपाध्यक्ष, के.हि.सं., आगरा.
13. कनक तिवारी, प्रख्यात लेखक, सामाजसेवी व वरिष्ठ अधिवक्ता, हाई कोर्ट, बिलासपुर.
14. प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय.
15. डॉ. करुणा पांडेय, प्रतिष्ठित लेखिका, कोलकाता.
16. प्रो. काशीनाथ सिंह, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक, वाराणसी.
17. प्रो. कृष्णकुमार गोस्वामी, प्रख्यात भाषावैज्ञानिक व लेखक, दिल्ली.
18. डॉ. कैलाशचंद्र पंत, प्रतिष्ठित लेखक व मंत्री, म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल.
19. प्रो. गंगाप्रसाद विमल, प्रख्यात साहित्यकार व पूर्व प्रोफेसर, जे.एन.यू. नई दिल्ली.
20. चित्रा मुद्गल, व्यास सम्मान से सम्मानित कथाकार, दिल्ली.
21. प्रो. चौथीराम यादव, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसर, बी.एच.यू., वाराणसी.
22. ज्योतिष जोशी, प्रख्यात लेखक व संपादक, ललित कला अकादमी, दिल्ली.
23. प्रो. जवरीमल्ल पारख, प्रख्यात मीडिया समीक्षक व प्रोफेसर, इग्नू, नई दिल्ली.
24. डॉ. जवाहर कर्णावट, प्रतिष्ठित लेखक व सहायक महाप्रबंधक (राजभाषा), मुंबई.
25. प्रो. जयप्रकाश, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसर, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय.
26. जय प्रकाश धूमकेतु, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘अभिनव कदम’, मऊनाथ भंजन.
27. जाबिर हुसेन, बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात लेखक, पटना.
28. प्रो. जी. गोपीनाथन, पूर्व कुलपति, म.गां.अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा.
29. जीवन सिंह, सह सचिव ‘अपनी भाषा’ एवं संस्थापक सदस्य ‘हिंदी बचाओ मंच’, कोलकाता.
30. प्रो. तंकमणि अम्मा, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, केरल विश्वविद्यालय, तिरुवनंतपुरम.
31. डॉ. दामोदर खड़से, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक, मुंबई.
32. प्रो. देवराज, प्रख्यात लेखक तथा डीन, म.गां.अं.हि.वि.विश्वविद्यालय, वर्धा.
33. डॉ. देवेंद्र गुप्त, प्रसिद्ध लेखक व संपादक, ‘सेतु’ एवं ‘विपाशा’, शिमला.
34. डॉ. देवसिंह पोखरिया, प्रख्यात आलोचक एवं प्रोफेसर, कुमायूं विश्वविद्यालय, नैनीताल.
35. प्रो. नंदकिशोर पांडेय, निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा.
36. डॉ. नरेश मिश्र, प्रोफेसर, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़.
37. डॉ. निर्मल कुमार पाटोदी, लेखक व पूर्व निदेशक राजभाषा, मुंबई.
38. नीरज कुमार चौधरी, शोधछात्र, क.वि.वि. एवं संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
39. पंकज बिष्ट, प्रख्यात लेखक व संपादक ‘समयांतर’, दिल्ली.
40. डॉ. परमानंद पांचाल, प्रसिद्ध लेखक व मंत्री, नागरी लिपि परिषद, दिल्ली.
41. पुष्पा भारती, प्रख्यात लेखिका, फ्लैट नं.-5, शाकुंतल साहित्य सहवास, मुंबई.
42. डॉ. प्रकाशचंद्र गिरि, प्रतिष्ठित कवि व एसो. प्रोफेसर, एम.एल.के.कॉलेज, बलरामपुर, उ.प्र.
43. प्रो. प्रमोद कुमार शर्मा, अधिष्ठाता, कला संकाय, नागपुर विश्वविद्यालय.
44. प्रेमपाल शर्मा, प्रख्यात भाषाविद्, लेखक तथा पूर्व संयुक्त सचिव, रेलवे बोर्ड, दिल्ली.
45. प्रभु जोशी, प्रख्यात लेखक व चित्रकार, इंदौर.
46. प्रो. पुष्पिता अवस्थी, सुप्रसिद्ध लेखिका व कवयित्री, नीदरलैंड.
47. बलदेव बंशी, प्रख्यात कवि-आलोचक, फरीदाबाद.
48. बीना बुदकी, मंत्री, हिंदी कश्मीरी संगम, दिल्ली.
49. डॉ. बीरेंद्र सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, स्काटिश चर्च कॉलेज व सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
50. बिजय कुमार जैन, प्रख्यात पत्रकार व संयोजक, हिंदी वेलफेयर ट्रस्ट, मुंबई.
51. प्रो. बी.वै.ललिताम्बा, प्रख्यात लेखिका, हिंदी सेवी व पूर्व प्रोफेसर, बंगलौर.
52. भारतेंदु मिश्र, प्रतिष्ठित लेखक व शिक्षाविद्, दिल्ली.
53. प्रो. महावीर सरन जैन, भाषाविद् व पूर्व निदेशक, के.हि.सं. आगरा.
54. डॉ. महेश दिवाकर, अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद.
55. महेश जायसवाल, प्रख्यात नाटककार व संस्कृतिकर्मी, कोलकाता.
56. महेश चंद्र गुप्त, प्रख्यात हिंदी सेवी व पूर्व निदेशक (राजभाषा), दिल्ली.
57. डॉ. एम. एल. गुप्ता आदित्य, संयोजक, वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई.
58. प्रो.एम. बेंकटेश्वर, समीक्षक व पूर्व प्रोफेसर, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद.
59. प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ.
60. प्रो. रंजना अरगड़े, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद.
61. रंजीत संकल्प, सचिव, बंगीय हिंदी परिषद एव संस्थापक सदस्य ‘हिंदी बचाओ मंच’, कोलकाता.
62. प्रो. रमेश दवे, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व प्रोफेसर, भोपाल.
63. रमेश जोशी, प्रतिष्ठित लेखक व प्रधान संपादक ‘विश्वा’, ओहायो.
64. पद्मश्री रमेशचंद्र शाह, व्यास सम्मान से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार, भोपाल.
65. प्रो. रविभूषण, प्रख्यात लेखक व पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, रांची विश्वविद्यालय, रांची.
66. प्रो. रवि श्रीवास्तव, प्रख्यात आलोचक व पूर्व प्रोफेसर, हिंदी, राजस्थान वि.वि. जयपुर.
67. रविप्रताप सिंह, प्रतिष्ठित कवि व अध्यक्ष, ‘शब्दाक्षर’, कोलकाता.
68. डॉ. राजेंद्रनाथ त्रिपाठी, मंत्री, बंगीय हिंदी परिषद्, कोलकाता.
69. राजेंद्र प्रसाद पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक, वाराणसी.
70. डॉ. राजेंद्र कुमार, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रोफेसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद.
71. प्रो. राजश्री शुक्ला, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता.
72. राजकिशोर, प्रख्यात लेखक-पत्रकार एवं संपादक, ‘रविवार’, इंदौर.
73. डॉ. राजेंद्र, आलोचक व संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
74. राकेश पांडेय, संपादक, ‘प्रवासी संसार’, नई दिल्ली.
75. राहुल देव, प्रख्यात पत्रकार, दिल्ली.
76. डॉ. राधेश्याम शुक्ल, संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
77. प्रो. रूपा गुप्ता, प्रसिद्ध लेखिका व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, बर्दवान विश्वविद्यालय.
78. प्रो. रोहिणी अग्रवाल, लेखिका व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, म.द.विश्वविद्यालय, रोहतक.
79. डॉ. ऋषिकेश राय, प्रतिष्ठित कवि-आलोचक व उपनिदेशक (राजभाषा), टी.बोर्ड, कोलकाता.
80. प्रो.ऋषभदेव शर्मा, प्रतिष्ठित लेखक व संयुक्त संपादक, ‘भास्वर भारत’, हैदराबाद.
81. विश्वनाथ सचदेव, प्रख्यात पत्रकार, संपादक ‘नवनीत’ मुंबई.
82. विभूतिनारायण राय, प्रख्यात लेखक व पूर्व कुलपति, म.गां.अं.हि.विश्वविद्यालय, वर्धा.
83. प्रो.विजयकुमार मल्होत्रा, प्रख्यात लेखक व भाषाविद्, दिल्ली.
84. डॉ. विजयबहादुर सिंह, प्रख्यात आलोचक एवं पूर्व संपादक ‘वागर्थ’, भोपाल.
85. विजय गुप्त, प्रसिद्ध लेखक व संपादक ‘साम्य’, अम्बिकापुर, जिला- सरगुजा, छ.ग.
86. डॉ. विमलेश कांति वर्मा, प्रख्यात भाषाविद्, व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय.
87. डॉ. विद्या बिंदु सिंह, प्रतिष्ठित लेखिका व पू.सं.नि. उ.प्र.हिं.सं. लखनऊ.
88. डॉ. वेदप्रताप वैदिक, प्रख्यात पत्रकार, दिल्ली.
89. डॉ. वेद प्रकाश पांडेय, प्रतिष्ठित लेखक व अवकाशप्राप्त प्राचार्य, गोरखपुर.
90. डॉ.शंकरलाल पुरोहित, प्रख्यात लेखक व अनुवादक, भुवनेश्वर.
91. शकुंतला बहादुर, प्रतिष्ठित लेखिका, कैलीफोर्निया.
92. शकुन त्रिवेदी, संपादक, ‘द वेक’, कोलकाता.
93. शची मिश्रा, भोजपुरी की प्रतिष्ठित लेखिका, पुणे.
94. प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन.
95. श्रीमती शांता बाई, सचिव, कर्णाटक महिला हिंदी सेवा समिति, बंगलौर.
96. श्रीधर बर्वे, प्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्राचार्य, इंदौर.
97. प्रो. श्रीभगवान सिंह, प्रख्यात लेखक व प्रोफेसर, भागलपुर विश्वविद्यालय.
98. डॉ. श्रीनिवास शर्मा, प्रख्यात आलोचक संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
99. प्रो. एस.एम. इकबाल, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हिंदी लेखक, विशाखापत्तनम्
100. प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय, प्रतिष्ठित लेखिका एवं कुलसचिव, कलकत्ता विश्वविद्यालय.
101. प्रो. संजीव कुमार दुबे, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर.
102. प्रो. एस. शेषारत्नम् पूर्व प्रोफेसर, आंध्रा विश्वविद्यालय, विशाखापत्तनम्.
103. प्रो.सुधीश पचौरी, प्रख्यात लेखक व पूर्व प्रतिकुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय.
104. प्रो. सदानंद गुप्त, प्रतिष्ठित लेखक व पूर्व प्रोफेसर, गोरखपुर विश्वविद्यालय.
105. डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी, संस्थापक सदस्य, हिंदी बचाओ मंच, कोलकाता.
106. प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, संयोजक हिंदी, साहित्य अकादेमी, दिल्ली.
107. प्रो. सुरेंद्र दुबे, प्रतिष्ठित लेखक व कुलपति, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी.
108. स्नेह ठाकुर, प्रतिष्ठित लेखिका व संपादक ‘वसुधा’, टोरंटो, कनाडा.
109. सुरेशचंद्र शुक्ल, प्रतिष्ठित लेखक व संपादक ‘Speil दर्पण’, नार्वे.
110. सुशील कुमार शर्मा, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय.
111. प्रो. हरिमोहन, कुलपति, जे. एस. विश्वविद्यालय, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद.
112. प्रो. हरिमोहन बुधौलिया, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, विक्रम वि.वि., उज्जैन.
113. क्षमा शर्मा, प्रतिष्ठित लेखिका, दिल्ली.

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

इंग्लैंड के सबसे बड़े पादरी ने कहा वो शर्मिंदा हैं. जलियांवाला बाग कांड के बारे में अपनी जानकारी आप भी चेक कर लीजिए.

KBC क्विज़: इन 15 सवालों का जवाब देकर बना था पहला करोड़पति, तुम भी खेलकर देखो

आज से KBC ग्यारहवां सीज़न शुरू हो रहा है. अगर इन सारे सवालों के जवाब सही दिए तो खुद को करोड़पति मान सकते हो बिंदास!

क्विज: अरविंद केजरीवाल के बारे में कितना जानते हैं आप?

अरविंद केजरीवाल के बारे में जानते हो, तो ये क्विज खेलो.

क्विज: कौन था वह इकलौता पाकिस्तानी जिसे भारत रत्न मिला?

प्रणब मुखर्जी को मिला भारत रत्न, ये क्विज जीत गए तो आपके क्विज रत्न बन जाने की गारंटी है.

ये क्विज़ बताएगा कि संसद में जो भी होता है, उसके कितने जानकार हैं आप?

लोकसभा और राज्यसभा के बारे में अपनी जानकारी चेक कर लीजिए.

संजय दत्त के बारे में पता न हो, तो इस क्विज पर क्लिक न करना

बाबा के न सही मुन्ना भाई के तो फैन जरूर होगे. क्विज खेलो और स्कोर करो.

बजट के ऊपर ज्ञान बघारने का इससे चौंचक मौका और कहीं न मिलेगा!

Quiz खेलो, यहां बजट की स्पेलिंग में 'J' आता है या 'Z' जैसे सवाल नहीं हैं.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.

परफेक्शनिस्ट आमिर पर क्विज़ खेलो और साबित करो कितने जाबड़ फैन हो

आज आमिर खान का हैप्पी बड्डे है. कित्ता मालूम है उनके बारे में?