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रमन राघव तो मेरी सबसे खतरनाक लव स्टोरी है: कश्यप

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बहुत ताम-झाम था. अनुराग कश्यप आये थे अपनी नई फिल्म के साथ. ‘रमन राघव 2.0’. हमने घेर लिया. कश्यप भी खुशी से घिर गए. बोले, यार तुम्हारी ‘दी लल्लनटॉप’ तो बड़ी सही है. मैं खूब पढ़ता हूं. बढ़िया कर रहे हो. हमने पूछा कि आगे क्या बना रहे हैं, तो बताया कि ‘भोजपुरी स्पोर्ट्स’ फिल्म बनाऊंगा. हमने कहा चलिए देख भी लीजिए हमारा अड्डा. बोले, चलो कहां चलना है. अौर हम लिवा लाए. अौर क्या बातें हुईं, यहां देखिए अौर पढ़िये तसल्ली से −

लगता है जैसे अनुराग कश्यप पूरे सिस्टम के खिलाफ हथौड़ा लेकर खड़ा है? क्या वो सिनेमा का केजरीवाल है?

नहीं ऐसा नहीं है. मैं तो शुरु से बस अपनी ही लड़ाई लड़ता आया हूं. जिसमें विश्वास करता हूं उसके लिए खड़ा रहता हूं. हां, अब मुझे सिस्टम समझ में आ गया है. अब मुझे मालूम है कि एक तरीका है सेंसर से डील करने का. चार स्टेप होते हैं उनको मैं समझ गया हूं. इन्हीं तीन-चार स्टेप में हमारी तो सारी फिल्में निकल जाती हैं इसीलिए.

लेकिन जिनके पास अनुराग कश्यप नहीं हैं वो क्या करें?

वो लोग खड़े हों अपने लिए. मैंने सबकी लड़ाई लड़ने का ठेका नहीं ले रखा है. मैं तो पहले भी अपनी लड़ाई लड़ता था. जब कोई नहीं आता था मेरे साथ, तब भी लड़ता था. आज भी लड़ रहा हूं. पहली लड़ाई जब लड़ी थी तब वो अनुराग कश्यप थोड़े था जो आज लोगों ने बना दिया है. आज तो ऐसा लगता है कि अनुराग कश्यप कोई अजीब सी चीज़ है. वो मैं नहीं हूं.

अपनी लड़ाई सबको खुद लड़नी पड़ती है. अपने सच के लिए लड़ाई. हां, ये समय ऐसा हो गया है कि आप सच के लिए खड़े हो तो वही जान पे खेलने के बराबर हो गया है. समय ऐसा आ गया है ये अौर ये गलत है. पर ये राइट है आपका संविधान में, सबको लड़ना चाहिए. लेकिन लोग दब जाते हैं. रास्ता है. रास्ता है तभी तो हमने लिया. जो लोग दब जाते हैं उनकी फिल्म अटक जाती है. आज ये हाई कोर्ट का जजमेंट है आपके साथ. लोगों को ये मालूम होना चाहिए कि सेंसर को कोई हक नहीं है आपकी फिल्म काटने का.

एक्टिविस्ट अनुराग की छाया में राइटर अनुराग कहां खो गया?

वो अपने आप से लड़ रहा है. सब पात्र, कहानियां हैं यहीं भीतर. लेकिन अब मैं उल्टा भी सोचने लगा हूं. मैं ऐसी चीज़ें करना चाहता हूं जो कम खर्चे में बनें. फिल्म के बनने से पहले ही सब उसमें ना घुस जाएं.

बॉम्बे वेल्वेट के बाद लोगों ने कहा कि अनुराग ज़्यादा बजट हैंडल ही नहीं कर सकता?

ज़्यादा बजट प्रॉब्लम नहीं है. बड़े बजट में प्रॉब्लम ये हो जाती है कि पूरी टीम निगरानी में आ जाती है. जब आप छोटी फिल्म बनाते हैं, आप एडिट रूम में बैठे हैं अौर आप अकेले बैठे हैं. जब पिक्चर पूरी हो जाती है तब आप लोगों को आकर बोलते हैं कि देख लो. अौर लोग आते हैं देखने. बड़ी फिल्म में फिल्म खत्म होने से पहले लोग देखने को तैयार हैं. घुस घुस के देखते रहते हैं. इससे आप बैकफुट पर आ जाते हो. लगातार एनालिसिस होने लगता है. पिक्चर बनाने निकले थे किसी अौर कारण से, मीडिया ने लिखना चालू कर दिया, प्रेशर चालू हो गया. दुनिया बोलने लग गई कि पिक्चर में कुछ गड़बड़ है. आपकी लड़ाई पिक्चर को छोड़के उनको गलत साबित करने में लग जाती है. सारी दुनिया कूद जाती है अौर रायता फैल जाता है. आप प्रेशर में आकर बैकफुट पर आ जाते हो अौर फिर आपकी सारी जद्दोजहद हो जाती है अोपनिंग लेने के लिए. सब गलत हो जाता है. मेरे को उधर फंसना ही नहीं है.

लोग बुरा कहते हैं तो बुरा तो लगता है. लेकिन उनके बारे में सोचकर गुस्से में मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी थोड़े ना निकाल सकता हूं. आप सोचकर बैठ गए कि ‘मैं दिखाता हूं सबको’.. ऐसे काम नहीं होता.

लेकिन आप तो गुस्से में चले गए थे?

नहीं मैं कहीं नहीं गया था. मैं वुल्वरीन हो जाता हूं. सेल्फ हील करता हूं.

दी लल्लनटॉप लोगों के साथ प्रसन्न मुद्रा में अनुराग कश्यप
दी लल्लनटॉप लोगों के साथ प्रसन्न मुद्रा में अनुराग कश्यप

रमन राघव तो पता ही नहीं चला कि कब लिखी, कब बन गई..

रमन राघव मेरे पास सात साल से लिखी हुई पड़ी थी बायोपिक. लेकिन वो फिल्म मैं नहीं बना पाया. जब वो नहीं बना पाया तो गुस्से में मैंने कहा कि अगर रमन राघव नहीं बना सकता हूं तो रमन राघव 2.0 तो बना सकता हूं. ये वही रमन राघव 2.0 है.

क्राइम तो अनुराग बनाता ही है. लेकिन वो ‘देव डी’ स्टाइल वाली प्रेम कहानियां कहां गईं?

अरे ‘रमन राघव 2.0’ लव स्टोरी है. पहली बात तो ये कि रमन राघव से खतरनाक लव स्टोरी तो मैंने अभी तक बनाई ही नहीं है. दूसरी, खास तौर पर हिन्दी भाषी लोगों को ये बहुत पसन्द आएगी. देखो तो सही पहले. हमने इस बारे में ज़्यादा बात भी नहीं की है. तुम पहले देखो, उसके बाद हम बात करेंगे. आजकल आप कुछ भी करते हो वो न्यूज़ में आ जाता है. अौर फिर हल्ला-गुल्ला. हम तो बता देते हैं अौर फिर गायब हो जाते हैं.

‘गैंग्स अॉफ वासेपुर’ वाली डायनामाइट स्नेहा कहां गईं?

काम कर रही हैं वो. वासेपुर में तीन साल लगे थे उन्हें म्यूज़िक करने में. अभी डेढ़-दो साल वो अौर काम करेंगी. फिर नया धमाका आएगा. हमको बस चुपचाप काम करने दो. काम के बारे में पहले से बात करते हैं तो लोग कूद पड़ते हैं उसमें. वो प्रेशर नहीं आना चाहिए.

क्या आप फिर बड़े सितारों के साथ फिल्म करेंगे?

मेरी कोशिश ये रहेगी कि मैं कम से कम बजट में काम करुंगा. इतना मैं समझ गया हूं कि अब स्टार के साथ मुझे काम करना भी पड़ा तो मैं उसके अनुसार नहीं बदलूंगा. उसको मेरे सिस्टम के अनुसार काम करना होगा. हमारे वर्किंग स्टाइल में काम करना पड़ेगा. सबजेक्ट अौर कैरेक्टर पर डिपैंड करता है सब. एक टाइम था कि सब बोलते थे कि इसके साथ काम करो, उसके साथ काम करो.. वो बड़ा अच्छा आदमी है. अब अच्छा आदमी तो मेरा ड्राइवर भी है. मेरा पड़ोसी भी है. वो क्वॉलिटी नहीं है. कैरेक्टर अौर एक्टर का तालमेल होना चाहिए. वो ज़रूरी है. किरदार में एक्टर फिट होना चाहिए. ऐसा नहीं होता तो मैं हर फिल्म नवाजुद्दीन के साथ, मनोज के साथ क्यों नहीं बनाता. कास्टिंग बहुत ख़ास चीज़ होती है.

आप कास्टिंग में कितना इंवॉल्व रहते हैं?

अपनी फिल्म की कास्टिंग में मैं खुद मुकेश (मुकेश छाबड़ा) के साथ इंवॉल्व रहता हूं. मुकेश अॉप्शन पिक कर देता है, मैं उसमें से पकड़ता रहता हूं.

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