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घोड़े पर बैठकर शहर नापने वाले अजीत जोगी शेर का शिकार क्यों नहीं कर पाए?

2014. छत्तीसगढ़ राज्योत्सव की तैयारी चल रही थी. भास्कर डिजिटल में मैं और राकेश मालवीय (तब मेरे इंचार्ज और अब सामाजिक कार्यकर्ता) भी चप्पा-चप्पा छानने में लगे थे. कि कहां से पीवी (पेज व्यू) बटोर लें. छत्तीसगढ़ का खजुराहो, छत्तीसगढ़ का स्विटज़रलैंड और घोटुल के किस्से बता-बताकर हम चट चुके थे. प्लान बना, दो ही तो सीएम हुए हैं, दोनों का नॉन-पलिटिकल इंटरव्यू कर लेते हैं. बहुत जुगाड़ के बाद अजीत जोगी का समय मिला. 20 मिनट का. हम पहुंचे सागौन बंगला. रिकॉर्डर चलाया और कहा- सर आप तो IAS थे, नेता कैसे बन गए? बस इतना बता दीजिए फिर हम राजनीति पर बात ही नहीं करेंगे.

इसके बाद उन्होंने वो किस्सा सुनाया जो अब सभी जानते हैं कि कैसे कलेक्टरी और नेतागिरी में से एक को चुनने के लिए उन्हें केवल ढाई घंटे का वक्त मिला था.

इसके बाद उन्होंने बताये अपने बचपन के, कलेक्टरी के दौर के मज़ेदार किस्से. वो करीब डेढ़ घंटा कहानी सुनाते रहे. बिना रुके. हम सुनते रहे. मैंने भास्कर की लिंक खोजने की कोशिश की, पर पुराने लिंक्स उनके सर्वर से मिटाए जा चुके हैं. जीमेल के ड्राफ्ट में उस इंटरव्यू के कुछ हिस्से बचे रह गए थे. थोड़ा काट-छांट भी कर दिया है. पढ़ियेः

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जंगल से घिरे इलाके में बचपन बीता. उनके गांव में एक बैगा रहता था. सब उन्हें भैरा (बहरा) बैगा कहते थे. बैगा रोज़ जंगल जाता, छोटे अजीत भी उनके पीछे-पीछे जंगल चले जाते. तब बैगा अपनी जवानी के दौर में था. हट्टा-कट्टा. कसा हुआ शरीर. जड़ी-बूटी की बेमिसाल जानकारी. जोगी उसे देखते तो उसकी तरह बनने का सोचते. लाइफ का पहला रोल मॉडल. जो निडर था और जिसकी विलपावर गज़ब थी. सीएम बनने के बाद जब जोगी अपने गांव गए, तो लोगों ने भैरा बैगा बुलाया. वो बूढ़ा हो चुका था. याददाश्त जा चुकी थी. उसने जोगी को नहीं पहचाना.

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गांव के जमींदार के बेटे का नाम भी अजीत था. उसी के नाम पर जोगी का नाम अजीत पड़ा. वो अजीत बड़ा था पर पढ़ाई में फिसड्डी. फेल हो-होकर वो जोगी की क्लास में आ गया. जोगी पढ़ाई में तेज़ थे. बचपन से ही. नाम एक होने की वजह से परीक्षा में दोनों आगे पीछे बैठते. जोगी उन्हें नकल करवाते, लेकिन वो अजीत इतने ईमानदार कि जब उन्हें लगता कि उन्होंने पास होने लायक लिख लिया है तो वो कॉपी करना बंद कर देते. इसी चक्कर में दोनों अजीत पक्के दोस्त बन गए.

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जिस इलाके में जोगी रहते थे वहां कई लोगों ने घर में घोड़े रखे हुए थे. किसी का घोड़ा छूट जाता तो वो उसे पकड़ कर उसकी सवारी करते. नैचुरल राइडर. जो IAS की ट्रेनिंग के दौरान बेस्ट राइडर बने. रायपुर में कलेक्टर रहने के दौरान जोगी पुलिस लाइन से घोड़े मंगवाते और रोज सुबह घोड़े पर बैठकर पूरे शहर का राउंड लगाते थे.

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हालांकि जोगी को एक मलाल रहा. शिकार के शौकीन थे लेकिन बहुत मौके मिले पर वो कभी शेर (उन्होंने शेर ही कहा था पर छत्तीसगढ़ में बाघ, तेंदुए पाए जाते हैं.) का शिकार नहीं कर पाए. उनके पिता इलाके के फेमस शिकारी थे. जब कोई शेर आदमखोर हो जाता तो कलेक्टर उनके पिता को शिकार का आदेश देते. जोगी या तो अपने पिता के साथ या फिर बड़े भाई के साथ शिकार करने जाते थे. उनके यहां परंपरा थी कि शेर का शिकार बड़ा सदस्य ही करेगा. ऐसे में पिता और बड़े भाई के साथ रहने के चलते वे कभी शेर का शिकार नहीं कर पाए.

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी नहीं रहे. 29 मई, 2020 को रायपुर के नारायणा अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. छत्तीसगढ़ के सीएम बनने से पहले जोगी राज्यसभा सांसद, IAS, IPS और कॉलेज में लेक्चरर (बाद से पहले के क्रम में) भी रहे. लंबे वक्त तक कांग्रेस से जुड़े रहे. 2016 में अपनी अलग पार्टी बनाई. नाम रखा छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस. जोगी अपने पीछे पत्नी रेणु जोगी, बेटे अमित जोगी और बहू ऐश्वर्या जोगी को छोड़ गए हैं.


वीडियो- कलेक्टर से सूबे के पहले आदिवासी CM तक, अजीत जोगी की कहानी

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