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वो डायरेक्टर जिसने अपनी कहानी पर्दे पर दिखाई और बर्बाद हो गया

गुरु दत्त नेे साल 1959 में फिल्म बनाई थी 'कागज़ के फूल'. कहा गया कि ये फिल्म गुरु दत्त की अपनी लाइफ पर बेस्ड थी. ये आखिरी फिल्म थी, जो गुरु दत्त ने डायरेक्ट की थी.

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मशहूर डायरेक्टर वी. शांताराम और उनके दोस्तों ने मिलकर प्रभात फिल्म कंपनी नाम का एक प्रोडक्शन हाऊस खोला था. कुछ फिल्में बनीं और फिर शांताराम वो कंपनी छोड़कर चले गए. उसी प्रभात स्टूडियो में साल 1946 में एक फिल्म बन रही थी ‘हम एक हैं’. ये फिल्म हिंदू-मुस्लिम एकता पर बेस्ड थी. फिल्म में देव आनंद के साथ कमला कोटनिस काम कर रही थीं. इसी फिल्म में एक नया आदमी रखा गया. काम- कोरियोग्रफी और असिस्टेंट डायरेक्शन. एकदम छौना था. कलकत्ते से आया था. टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी छोड़कर. उसकी देव आनंद से गहरी दोस्ती हो गई. देव आनंद भी तब नए थे. शाम को दोनों ड्रिंक्स पर बैठे थे. दोनों ने एक डील की. कि अगर दोनों में से कोई भी सफल हुआ, तो वो दूसरे की मदद करेगा. अगर देव आनंद कोई फिल्म प्रोड्यूस करेंगे तो उस लड़के को बतौर डायरेक्टर लेंगे. अगर वो लड़का कोई फिल्म डायरेक्ट करता है, तो उसके हीरो देव होंगे.

प्रभात फिल्म में तीन साल का कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया और वो लड़का चला गया. बेरोज़गारी की आगोश में. अगले 10 महीने के लिए.

देव ने 1949 में अपना प्रोडक्शन हाऊस खोला. नवकेतन फिल्म्स. इस बैनर के तले पहली फिल्म बनी और फ्लॉप हो गई. इसके बाद देव पहुंचे उसी लड़के के पास. अपना वादा पूरा करने. कहा, मेरी फिल्म डायरेक्ट करोगे? पूरे 10 महीनों तक यहां वहां ठोकरें खाकर गुज़ारा करने वाले उस लड़के को उसकी पहली फिल्म इस तरह मिली. फिल्म बनी और हिट हो गई.

इस फिल्म का नाम था ‘बाज़ी’ (1951). और इस लड़के का नाम था वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण. वो वसंत, जिसे दुनिया ने जाना गुरु दत्त के नाम से. वो वसंत, जो अपने जीवन के 40 वसंत भी नहीं देख पाया. 10 अक्टूबर, 1964 को 39 साल की उम्र में शराब और नींद की गोलियों का एक्जॉटिक (पढ़ें घातक) कॉकटेल लेकर चल बसा. और पीछे छोड़ गया अपनी ऐतिहासिक विरासत, जिसे दुनिया ऑल टाइम क्लासिक्स में गिनती है. मरा था, तो पैदा भी हुआ होगा. वो वाली तारीख थी 9 जुलाई, 1925.

गुरु दत्त पैदा करनाटक में हुए लेकिन वो पले-बढ़े बंगाल के भवानीपुर में.
गुरु दत्त पैदा करनाटक में हुए लेकिन वो पले-बढ़े बंगाल के भवानीपुर में.

गुरु दत्त को सिनेमा का नशा था. उसमें डूबे रहते थे. इस कदर कि अपने एक सीन को फाइनल करने के लिए 104 रिटेक लिए. वो भी तब जब वो सीन में खुद खड़े थे. फिल्म थी ‘प्यासा’. फिल्म के सिनेमैटोग्रफर वी.के. मूर्ती ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि जूनियर आर्टिस्ट के साथ कुछ सीन्स शूट हो रहे थे, लेकिन वो सही नहीं लग रहे थे. इस चीज़ से गुरु दत्त बहुत चिढ़े हुए थे. इसके बाद उनका खुद का एक सीन आया. शाम के पांच बजे इस सीन का शूट शुरू हुआ. मूर्ति ने तकरीबन साढ़े पांच घंटे बाद गुरु दत्त को याद दिलाया कि अब रात के साढ़े 10 बज चुके हैं. ये सीन सुबह शूट करेंगे. गुरु दत्त नहीं माने. शूटिंग एक घंटे और चली. लेकिन गुरु दत्त मानने को तैयार नहीं थे. मूर्ति के बहुत मनाने के बाद जाकर जब वो माने, तब तक 104 रीटेक्स हो चुके थे. इसके बाद अगले दिन फिर से इसी सीन से शूट शुरू हुआ और गुरु दत्त ने पहले ही टेक में वो सीन ओके कर दिया.

अपने सिनेमैटोग्रफर वी.के.मूर्ती के साथ गुरु दत्त. गुरु से वीके की मुलाकात उनकी एक फिल्म के शूट के दौरान हुई थी. वीके उस समय असिस्टेंट हुआ करते थे.
अपने सिनेमैटोग्रफर वी.के.मूर्ती के साथ गुरु दत्त. गुरु से वीके की मुलाकात उनकी एक फिल्म के शूट के दौरान हुई थी. वीके उस समय असिस्टेंट हुआ करते थे. गुरु को वीके का एक शॉट अच्छा लग गया, जिसके बाद वो उनसे अपनी फिल्में शूट करवाने लगे.

अपने काम को लेकर गरु दत्त निर्ममता की किसी भी हद तक जा सकते थे. इसका ही उदाहरण रहा जब उन्होंने बीमार ए.स.डी बर्मन से फिल्म छीनकर ओ.पी. नैय्यर को दे दी. हुआ ये कि गुरु दत्त ‘बहारें फिर भी आएंगी’ नाम की एक फिल्म बना रहे थे. इस फिल्म के म्यूज़िक के लिए उन्होंने एस. डी. बर्मन को चुना. एस. डी. के साथ वो पहले भी कई फिल्मों में काम कर चुके थे. और उन फिल्मों का म्यूज़िक भी खासा हिट रहा था. फिल्म की मेकिंग के दौरान एस. डी. बीमार हो गए. गुरु दत्त ने उन्हें फिल्म से निकालकर उनकी जगह ओ.पी. नय्यर को साइन कर लिया. वहीं देव आनंद अपनी फिल्म ‘गाइड’ प्लान कर रहे थे और उस फिल्म में एस. डी. बर्मन से म्यूज़िक करवाना चाहते थे. उन्होंने एस. डी. के ठीक होने तक इंतज़ार किया और उसके बाद फिल्म शुरू की. ‘गाइड’ का म्यूज़िक जबरदस्त हिट रहा, जबकि ‘बहारें फिर भी आएंगी’ फिल्म गरु दत्त कभी पूरी नहीं कर पाए. इस फिल्म को बाद में धर्मेंद्र के साथ पूरा किया गया.

गुरु दत्त बैंगलोर करनाटक में पैदा हुए लेकिन पले-बढ़े बंगाल के भवानीपुर में.
गुरु दत्त के लिए  ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम ‘ जैसा लोकप्रिय गाना  एस.डी.बर्मन ने ही बनाया था.

ओ.पी. नय्यर और गुरु दत्त का एक और किस्सा बड़ा मशहूर रहा है. फिल्म ‘बाज़’ का म्यूज़िक गुरु दत्त ने ओ.पी. नय्यर से करवाया था. फिल्म पिट गई. गुरु दत्त की हालत इतनी खराब हो गई कि वो किसी भी आर्टिस्ट का पेमेंट तक नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में नय्यर उनके पास आए और अपना पैसा मांगने लगे. नय्यर की पहली फिल्म भी नहीं चली थी और इस फिल्म के बाद तो वो टूट ही गए थे. अब वो बंबई से वापस अपने घर चंडीगढ़ लौट जाना चाहते थे. गुरु दत्त के पास पैसे तो थे नहीं, इसलिए उन्होंने नय्यर से वादा किया कि अपनी अाने वाली फिल्मों में काम देंगे. नय्यर मान गए. इसके बाद गुरु दत्त ने नय्यर को ‘आर पार’ और ‘सीआईडी’ जैसी फिल्मों मे म्यूज़िक करने का मौका दिया, जो काफी सफल रहीं.

‘सीआईडी’ के साथ गुरु दत्त ने सिर्फ ओ.पी. से किया वादा ही पूरा नहीं किया था. इस फिल्म में उन्होंने ने देव आनंद से 10 साल पहले की उस ड्रिंक्स वाली शाम को किया वादा भी निभाया. गुरु दत्त ने ‘बाज़ी’ में देव आनंद को हीरो लिया. दोस्ती के इस किस्से में एक बात का ज़िक्र ट्रिविया के तौर पर किया जा सकता है. वो ये कि गुरु दत्त ‘सीआईडी’ के डायरेक्टर नहीं, प्रोड्यूसर थे जबकि वादा उस फिल्म में हीरो बनाने का था जिसे गुरु दत्त डायरेक्ट करते.

ओ.पी. नैय्यर, गुरु दत्त और मो. रफी (बाएं से दाएं). ओ.पी. नैय्यर को 'ये देश है वीर जवानों का' जैसे गाने के लिए याद किया जाता है.
ओ.पी. नैय्यर, गुरु दत्त और मो. रफी (बाएं से दाएं). ओ.पी. नैय्यर को ‘ये देश है वीर जवानों का’ जैसे गाने के लिए याद किया जाता है.

एक के बाद एक हिट हो रही फिल्मों ने गुरु दत्त को सफलता का आदी बना दिया था. वो ‘फ्लॉप’ शब्द के मायने भूल गए थे. लेकिन उन्हें जल्द ही मालूम चल गया. और वो इस असफलता से कभी उबर नहीं पाए. फिल्म थी ‘कागज़ के फूल’ (1959). ये फिल्म इतनी सुंदर बन रही थी कि सिनेमैटोग्रफर मूर्ति ने पहले आठ सीन के बाद ही कह दिया कि फिल्म तो कविता जैसी बन रही है लेकिन कोई देखेगा नहीं. जवाब में गुरु दत्त ने कहा,

‘…ये फिल्म मैं पब्लिक के लिए नहीं, अपने लिए बना रहा हूं…’

हालांकि यही बात गुरु दत्त ने फिल्म ‘प्यासा’ की मेकिंग के दौरान भी कही थी. ‘कागज़ के फूल’ बन तो गई लेकिन जनता को पसंद नहीं आई. फिल्म बुरी तरह पिट गई. गुरु दत्त एकदम टूट गए. उन्होंने तय कर लिया कि आगे से कोई फिल्म डायरेक्ट नहीं करेंगे. कहा जाता है कि ये फिल्म गुरु दत्त की अपनी लाइफ पर बेस्ड थी. जैसे, इस फिल्म में दिखाया गया था कि फिल्म के डायरेक्टर को अपने फिल्म की हीरोइन से प्यार हो जाता है. गुरु दत्त और वहीदा रहमान का किस्सा हर दूसरे आदमी की ज़ुबान पर हुआ करता था. इससे गुरु दत्त और गीता दत्त की शादी में बहुत दिक्कतें आ गई.

पत्नी गीता और बेटे तरुण के साथ गुरु दत्त. गुरु दत्त के कुल तीन बच्चे थे, दो बेटी और एक बेटा.
पत्नी गीता और बेटे तरुण के साथ गुरु दत्त. गुरु दत्त के कुल तीन बच्चे थे, दो बेटी और एक बेटा.

गीता अपने समय की मशहूर सिंगर्स में गिनी जाती थीं. उन्होंने गुरु दत्त (और उस समय के दीगर डायरेक्टर्स के लिए भी) की कई फिल्मों में गाने गाए थे. लेकिन अपनी शर्तों पर. ‘साहब बीवी और गुलाम’ (1962) में उन्हें वहीदा रहमान की आवाज़ बनने का ऑफर दिया गया था. उन्होंने इससे साफ मना कर दिया. कारण स्पष्ट था. बाद में वहीदा की आवाज़ आशा भोसले ने दी, जबकि गीता ने फिल्म में मीना कुमारी के लिए गाने गए.

‘साहब बीवी और गुलाम’ से जुड़ा एक और किस्सा ज़िक्र के लायक है. अबरार अल्वी गुरु दत्त के लिए फिल्में लिखा करते थे. ‘साहब बीवी और गुलाम’ पहली फिल्म थी जो उन्होंने डायरेक्ट की. फिल्म के रिलीज़ होने पर अबरार ऐसे डायरेक्टर बन गए जिनकी पहली ही फिल्म ज़बरदस्त हिट रही. लेकिन फिल्म के रिलीज़ होने के साथ ही एक बड़ा विवाद भी छिड़ गया. ये फिल्म गुरु दत्त के मिज़ाज़ की थी, इसलिए ये कहा जाने लगा कि इसे गुरु दत्त ने ही घोस्ट डायरेक्ट (मतलब छुप-छुपा के, बिना अपना नाम बताए डायरेक्ट करना) किया है. ये बातें इसलिए भी बनीं कि ‘साहब बीवी और गुलाम’ के कुछ हिस्सों और गानों को दत्त ने सचमुच डायरेक्ट किया था. इस बात से अबरार अल्वी बहुत दुखी रहते थे. कि इतनी बड़ी फिल्म डायरेक्ट करने के बावजूद उन्हें कोई क्रेडिट नहीं देना चाहता था.

अबरार अल्वी ने गुरु दत्त के लिए 'कागज़ के फूल', 'प्यासा' और 'साहब बीवी और गुलाम' जैसी फिल्में लिखी हैं.
अबरार अल्वी ने गुरु दत्त के लिए ‘कागज़ के फूल’, ‘प्यासा’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ जैसी फिल्में लिखी हैं.

‘कागज़ के फूल’ के बाद गुरु दत्त फिल्में प्रोड्यूस करने लगे. ‘साहब बीवी और गुलाम’ के अलावा ‘चौदहवीं का चांद’ जैसी फिल्में उन्हीं के प्रोडक्शन हाउस से निकलीं. ‘बहारें फिर भी आएंगी’ (एक्टर-प्रोड्यूसर) वो आखिरी फिल्म रही जिससे वो किसी भी तरह जुड़े थे. लेकिन इस वक्त तक वो अपनी पूरी ऊर्जा फिल्मों को दे नहीं पा रहे थे. करियर ढलान पर था और निजी जीवन में भूचाल आया हुआ था. चीज़ें हाथ से फिसलने लगीं तो गीता दत्त बच्चों को लेकर मायके चली गईं. घर गुरु दत्त को काटने को दौड़ने लगा. उन्होंने घर बेच दिया और किराए से रहने लगे. इन्हीं दिनों उनके यार भी उनसे दूर होने लगे. अबरार दक्षिण के सिनेमा में काम करने चले गए. वी.के. भी कुछ दिनों में जाने का मन बना रहे थे. गुरु दत्त ने कहा,

‘…मैं अनाथ हो गया हूं…’

अवसाद ने गुरु दत्त को घेर लिया. शराब बहुत बढ़ गई. इस दुनिया के महलों, तख्तों और ताजों पर से उनका दिल उठ गया. इन्हीं दिनों वो अपने पुराने दोस्त देव आनंद से मिले. देव अपने इंटरव्यू में बताते हैं कि गुरु दत्त ने उस दिन साथ काम करने की पेशकश की थी. और देव मान गए थे. लेकिन इस मुलाकात के चंद दिनों के भीतर ही गुरु दत्त एक रात फिर टूटे. और इतने टूटे कि बिखर गए. शराब और नींद की गोलियां साथ ले लीं. अगली सुबह वो पेडार रोड के अपने किराए के अपार्टमेंट में मिले. मृत.

दुनिया मिल जाने के हासिल को भी सिफर कहने की जुर्रत करने वाले गुरु दत्त अपनी प्यास दबाए जा चुके थे. विरक्ति के उस भाव के साथ कि वो रहें या न रहें, ‘बहारें तो फिर भी आएंगी’.


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