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मुहम्मद अली जिन्ना के पूर्वज हिंदू थे!

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ये बाजू में दिख रही फोटो नितिन ठाकुर की है. इनका मानना है कि आज-कल के ज़माने में आप मनचाहा खा सकते हैं, मनचाहा गा सकते हैं, मनचाहा बजा सकते हैं और तो और अब तो मनचाहा ब्याह भी सकते हैं. लेकिन सबसे मुश्किल जो हो चला है, वो है – ना मनचाहा लिख सकते हैं और ना मनचाहा बोल सकते हैं. तो नितिन को हमने लल्लनटॉप का एक कोना अलॉट कर दिया है, ‘अलख निरंजन’ नाम से. इसमें नितिन हर हफ्ते मनचाहा लिखेंगे – कोई कहानी, कोई किस्सा या कभी-कभी बस ‘मन की बात.’ 


कई चीज़ें आपको पढ़ते-लिखते ही समझ आती हैं. जैसे मैं तब चौंका जब मैंने इकबाल या जिन्ना के बारे में पढ़ा. पाकिस्तान की अवधारणा को आगे बढ़ाने वाले मोहम्मद इकबाल के दादा कश्मीर के सप्रू ब्राह्मण थे. इकबाल ने हमेशा खुलकर माना कि वो हिंदू मूल से हैं. उन्होंने तो लिखा भी-

”मैं अस्ल का ख़ास सोमनाती, आबा मेरे लातियो-मनाती
है फलसफा मेरी आबो गिल में, पेशीदा है मेरे रेशहाए दिल में”

मतलब यही कि मैं सोमनाथ का असली अनुयायी हूं. मेरे पुरखे मूर्ति पूजते थे. दर्शन मेरे शरीर के मिट्टी-पानी में बसा है. वो मेरे अंतर के नस-नस में है.

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ठीक इसी तरह पाकिस्तान को हकीकत में तब्दील करने वाले जिन्ना के पुरखे गुजरात के काठियावाड़ इलाके में राजकोट ज़िले से थे. वो बाहर से आकर वहीं एक गांव पानेली में बस गए. गांधी के पोरबंदर से पानेली 30 किलोमीटर दूर ही है. जिन्ना के एक जीवनीकार अज़ीज़ बेग के मुताबिक एक बार जिन्ना ने ही बताया था कि उनके पूर्वज पंजाब के शाहीवाल राजपूत थे जिन्होंने इस्माइली खोजा परिवार में शादी कर ली थी. हालांकि उनकी अपनी सगी बहन अपने पुरखों का मूल ईरान में बताती थीं.

मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी
मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी

वैसे जिन्ना के सबसे पहले जीवनीकार बोलिथो ने काफी मशक्कत करके मालूम किया था कि जिन्ना के पूर्वज मुल्तान के हिंदू थे. वो वैश्य समाज की लोहाना जाति से थे. इतिहास बताता है कि लेन-देन करने वाली इस जाति का एक बड़ा हिस्सा सत्रहवीं सदी के अंत और अठाहरवीं सदी की शुरूआत में सिंध से काठियावाड़ आ बसा था. उनमें से कई परिवारों ने अठारहवीं सदी के पहले या दूसरे दशक में इस्लाम कबूल लिया. जिन्ना के दादा पुंजाभाई का परिवार भी उनमें एक था.

वीरेंद्र कुमार बरनवाल जी की किताब बताती है कि उद्योगपति अज़ीम प्रेमजी के पूर्वज भी काठियावाड़ के लोहाना जाति के हिंदू ही थे और ठीक उसी दौरान उनके पुरखे भी मुसलमान बन गए थे. आखिर में एक और दिलचस्प जानकारी दे दूं.. जिन्ना के पिता का नाम जिण्णाभाई पुंजाभाई था. जिण्णा का मतलब गुजराती में नन्हा होता है और ये नाम गुजराती हिंदुओं में भी खूब प्रचलित रहा है. जिन्ना और इकबाल आम हिंदुस्तानी के लिए विलेन हैं लेकिन मेरा मानना है कि मेकिंग ऑफ नायक  से ज़रूरी मेकिंग ऑफ खलनायक  समझना है.

जिण्णाभाई पुंजाभाई, मोहम्मद अली जिन्ना के पिता (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स
जिण्णाभाई पुंजाभाई, मोहम्मद अली जिन्ना के पिता (फोटोःविकीमीडिया कॉमन्स

अब जिन्ना का एक और किस्सा… पाकिस्तान के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत के शिक्षामंत्री रहे मोहम्मद याहिया जान ने 26 नवंबर 1982 को फ्रंटियर पोस्ट अखबार में एक सनसनीखेज़ लेख लिखा. लेख का नाम था- ‘कायदे आज़म के डॉक्टर ने मुझे बताया.’ इसमें जिन्ना के अंतिम दिनों के चिकित्सक रहे कर्नल डॉ इलाहीब्श के हवाले से बताया गया कि जब जिन्ना की तबीयत बेहद खराब थी तब उन्हें देखने पीएम लियाकत अली खां पहुंचे. उन्हें देखते ही जिन्ना को गुस्सा चढ़ गया. उन्होंने कहा,

”तुम अपने को बहुत बड़ा आदमी समझने लगे हो. तुम एक नाचीज़ हो. मैंने तुम्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया. तुम सोचते हो कि तुमने पाकिस्तान बनाया. मैंने इसे बनाया है पर अब मुझे पूरा यकीन है कि मैंने इसे बनाकर ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल की है.”

लेख के मुताबिक जिन्ना ने कहा था कि अगर उन्हें मौका मिला तो वो दिल्ली जाकर जवाहरलाल नेहरू से कहेंगे,

”वो बीते दिनों की बेवकूफियों को भूल जाएं और एक बार फिर से दोस्त बन जाएं…!!”

ऐसी बहुत सी बातें हैं, बहुत सी घटनाएं हैं जो पढ़ने के बाद पुरानी धारणाएं टूटती हैं या फिर नई धारणाएं बनती हैं. एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी इतिहास की किताब उठाते जाइए और परस्पर विरोधी बातें गुनते जाइए. अच्छे विद्यार्थी की यही पहचान होती है कि वो इतिहास दिल से नहीं दिमाग से पढ़ता है.


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