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आत्महत्या पर एक निबंध

एक बार किशोर अवस्था में
हताशा के किसी क्षण में
मैंने मां से कहा :
‘मैं आत्महत्या कर लूंगा!’

उन्होंने जवाब दिया :
‘मेरे साथ यह घटियाई
मत करना!’

वह बहुत कम पढ़ी-लिखी हैं
पर जो ज्ञान उन्होंने मुझे दिया
आज तक
किसी किताब में नहीं मिला.

ऊपर दी गई कविता हिंदी कवि पंकज चतुर्वेदी की है. इसका शीर्षक है : ‘आत्महत्या के विरुद्ध’. याद हो कि न याद हो लेकिन इस शीर्षक से ही रघुवीर सहाय का एक कविता-संग्रह है, जिसमें इस शीर्षक से ही एक कविता है और जिसमें यह लाइन आती है :

‘मरते मनुष्य के बारे में क्या करूं क्या करूं मरते मनुष्य का.’

पंकज चतुर्वेदी की यह नई कविता आत्महत्या के विरुद्ध जीवन के पक्ष में एक मानवीय बयान है— सहज और आत्मीय भी. इसमें मां के हवाले से आया बयान किताबी नहीं है, इसलिए याद रहा आता है और असर करता है.

वैसे आत्महत्या के विरुद्ध और उसके पक्ष में झाड़े गए उपदेशों की कहीं कोई कमी नहीं है. ये उपदेश आत्महत्याओं जितने ही प्राचीन हैं.

जीवन को जीने लायक बनाए जाने की कोशिशें युगों से जारी हैं और जीवन को ठुकरा देने की भी.

नई आत्महत्याएं खबरों में पुरानी आत्महत्याओं को धुंधला कर देती हैं. इस दरमियान न आत्महत्या करने के तरीके बहुत बदलते हैं और न ही उन पर खबर करने के.

इस सिलसिले में स्वामी विवेकानंद की बात भी याद कर लेनी चाहिए :

”जीवन में मैंने एक महत्त्वपूर्ण बात सीखी वह यह कि आपका ध्येय जितना ऊंचा होगा, उतने ही आप दुखी होंगे.

इस सृष्टि में मुख्यत: दो प्रकार के लोग मिलते हैं. पहले प्रकार के लोग दृढ़, मन के पक्के, शांत, प्रकृति के आगे समर्पित होने वाले, कल्पना-शक्ति के फेर में न पड़नेवाले, किंतु अच्छे, सज्जन, दयालु, मधुर स्वभाव के होते हैं. यह सृष्टि ऐसे ही लोगों के लिए है. ये लोग सुखी होने के लिए ही जन्म लेते हैं.

इसके विपरीत दूसरे प्रकार के लोग अत्यंत संवेदनशील स्वभाव के, कल्पना-प्रधान होते हैं. इनकी भावना अत्यंत तीव्र होती है. इस तरह के लोग एक पल में ही ऊंची उड़ान भरते हैं, तो दूसरे ही पल एकदम जमीन पर होते हैं. ऐसे लोगों के भाग्य में सुख नहीं होता है.”

इस उद्धरण को आगे बढ़ाएं तो कह सकते हैं कि ये दूसरे प्रकार के लोग ही आत्महत्या करते हैं.

बहुत यथार्थवादी लोगों से आत्महत्या का विचार बहुत दूर रहता है. आत्महत्या की प्राथमिक शर्त है कल्पनाशीलता. कल्पनाशीलता के अभाव में की गई आत्महत्या हत्या सरीखी है.

आत्महत्या को कायरता से जोड़ देने का प्रचलन भी पुराना है, यह निबंध भी इस प्रचलन के पक्ष में है, लेकिन आत्महत्या को कायरता मानते हुए भी, यह कहना जरूरी है कि उन मन:स्थितियों को समझना जिनमें कोई व्यक्ति खुद को खत्म कर लेने से जैसा कदम उठाता है, प्रवचनकारों और मुझ जैसे निबंध-लेखकों के बूते का नहीं है.

बहरहाल, बूते में यह कहना जरूर है कि आत्महत्या अंतत: एक व्यर्थता के लिए की जाती है. वह मुक्ति से ज्यादा विस्मृति के लिए की जाती है और यह उसकी सामर्थ्य है कि वह तमाम धूल खा रहे उद्धरणों, कविताओं, प्रवचनों और मुझ जैसे निबंधकारों को सक्रिय कर देती है.

यह सक्रियता आत्महत्या के इरादों की हत्या कर सकती है, यह शुभ-इच्छा अपनी जगह है, लेकिन इससे यह तो जाहिर होता ही है कि आत्महत्या के इरादों का अपना एक नेपथ्य (ग्रीनरूम) होता है, जिसमें मौजूद आत्महत्यारा यह मान कर चलता है कि आत्महत्या की आलोचना एक गैर-जरूरी चीज है और इसने अब तक केवल उन्हें ही फायदा पहुंचाया है जिन्होंने अब तक आत्महत्या नहीं की.

***

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