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'इस राखी बहनों को भाई का तोहफ़ा, अपनी सुरक्षा स्वयं करने का'

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अंकिता जैन
अंकिता जैन
अंकिता ने बनस्थली विद्यापीठ से कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में M.Tech करने के बाद CDAC, Pune में साल भर Artificial Intelligence में शोधकार्य किया, फिर भोपाल के बंसल कॉलेज में बतौर Lecturer पढ़ाया भी, लेकिन नौकरी से उखड़े मन ने उन्हें लेखन जगत में ला खड़ा किया, जहां उन्होंने बतौर सम्पादक एवं प्रकाशक ‘रूबरू दुनिया’ मासिक पत्रिका का तीन साल प्रकाशन किया। रेडियो के प्रसिद्ध शो यादों का इडियट बॉक्स एवं यूपी की कहानियाँ में तकरीबन 25 कहानियों का प्रसारण.  मार्च 2017 में अंकिता की पहली हिंदी किताब ‘ऐसी-वैसी औरत’ प्रकाशित हुई, जो कम समय में ही जागरण-नील्सन बेस्ट सेलर बन गई. नवंबर 2018 में अंकिता की दूसरी किताब “मैं से माँ तक” प्रकाशित हुई जो पाठकों के बीच खासी पसंद की जा रही है. अंकिता प्रभात ख़बर अखबार की साप्ताहिक मैगज़ीन सुरभी, एवं लल्लन टॉप न्यूज़ पोर्टल पर अपने ‘माँ-इन-मेकिंग’ कॉलम के लिए भी पाठकों के बीच काफी पसंद की जा चुकी हैं. 

रात के तीन बज रहे थे. छोटी बहन की ट्रेन अब से आधा घंटे में थी. हम सभी पापा का इंतज़ार कर रहे थे. उन्हें शाम को ही किसी ज़रूरी मीटिंग में जाना पड़ गया था. अगर पापा नहीं आये तो छोटी को स्टेशन छोड़ने कौन जाएगा. घर से स्टेशन लगभग 4 किलोमीटर दूर है. अपने गंतव्य पर पहुंचते ही छोटी को एग्जाम देना था इसलिए ट्रेन छोड़ भी नहीं सकती थी. राखी पर घर आये थे हम दोनों. दोनों ही अलग-अलग शहरों में हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे. त्यौहार पर ही घर आना और एक-दूसरे से मिलना हो पाता था. हमारे छोटे से शहर में रात-बिरात घर के बाहर ऑटो भी नहीं मिलते. हम सोच ही रहे थे कि क्या करें, कि तभी मां ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और कहा-

कल उससे राखी बंधवाई है न… जा उसे स्टेशन छोड़कर आ… बड़ा भाई बनी है तो उसकी ज़रूरत में उसकी सहायता भी कर.

मैं मां को आश्चर्य से देख रही थी. वो अपनी 20 साल की जवान बेटी को रात को 3 बजे बाइक से स्टेशन जाने कह रही थीं. मैंने पूछा, ‘मैं’… तो वो बोलीं-

हां तू… पापा सारी ज़िन्दगी तो तुम दोनों के साथ नहीं रह सकते न… पढ़ने-लिखने का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि आत्मनिर्भर बनना भी है बेटा. और फिर तू तो छोटी का भाई है… जा.

उस दिन मां ने जो हममें विश्वास दिखाया, जो हमारी हिम्मत बढ़ाई वो सारी ज़िन्दगी हमारे साथ रही और आगे भी रहेगी. यूं तो भाई न होने की वजह से मैं अपनी छोटी बहन से बचपन से राखी बंधवाती आई थी, लेकिन उस दिन उस राखी ने अपने असल मायने लिए.

राखी के त्यौहार की कई अलग-अलग कहानियां हैं. कहीं लिखा है, कि अलेक्जेंडर की पत्नी राक्सोना ने पोरस को एक धागा इस स्वरूप भेजा था, कि वे युद्ध में अलेक्जेंडर को मारें ना, और पोरस ने भी वचन बद्ध होकर ऐसा ही किया. कहीं लिखा है कि चित्तोर की रानी कर्णावती ने हुमाऊं को एक धागा यह वचन के साथ भेजा था कि वे बहादुर शाह से उनकी रक्षा करें. जो सबसे ताज़ा याद है इतिहास में राखी की. वो रविन्द्र नाथ टैगोर की है, जिन्होंने रक्षाबंधन का त्यौहार शान्ति का प्रतीक बनाते हुए हिन्दू और मुसलामानों के बीच एकता के लिए आयोजित करवाया था. जैन धर्म में रक्षा सूत्र इसलिए बांधा जाता है, कि उस दिन एक क्रूर राजा से 700 मुनिराजों की रक्षा हुई थी. राजा उन मुनिराजों को जलाना चाहता था. जबकि सिख धर्म में बताया जाता है कि अरविन्द-पाल सिंह जी ने राखी नाम उस वचन को दिया था, जिसमें उन्होंने किसानों को मुश्किल आर्मी से बचाने की बात कही थी.

ये सभी बातें इतिहास में लिखीं हुई हैं. लेकिन आप और हम राखी को किस तरह जानते हैं? हम जानते हैं कि राखी के दिन हम अपने भाइयों को सुन्दर सा एक धागा उनकी कलाई पर बांधते हैं, उनकी लम्बी और स्वस्थ आयु की कामना करते हैं, और बदले में हमें भाई से मुंह मांगा तोहफा मिलता है. हम बहनें पूरा साल इस दिन का इंतज़ार करती हैं कि भाई से इस बार हमें क्या मिलेगा. बस क्या इतना ही है ये त्यौहार? भाइयों से मिलने वाली रक्षा हमें किस हद तक इस दुनिया में सुरक्षित रख पाती है जहां आये दिन बलात्कार और छेड़छाड़ के केस दर्ज हो रहे हैं? ऐसे में क्या भाइयों का हमारी रक्षा कर पाना संभव है?

ख़बर ज्यादा पुरानी नहीं है, छतीसगढ़ के शहर जशपुर में 11 अगस्त, 2014 में एक केस दर्ज हुआ, जिसमें एक आदिवासी लड़की का उसके अपने चचेरे भाई ने दोस्तों के साथ मिलकर रेप किया. अगली खबर इलाहबाद की है जिसमें रक्षाबंधन के ठीक एक दिन पहले एक भाई ने अपनी बहन का क़त्ल कर दिया. एक और खबर थी जिसमें दो बहनों का गैंगरेप सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि उनके भाई ने अपनी जाति से ऊंची जाति वाली लड़की से शादी कर ली थी.

इस तरह के ये सिर्फ तीन ही मामले नहीं हैं. यदि पूरे भारत में होने वाले बलात्कार के मामले दर्ज किये जाएं, तो रक्षाबंधन का दिन भी अछूता नहीं रह जाएगा, जिस दिन बलात्कार के मामले दर्ज ना हुए हों. अब यहां सोचने वाली बात यह है कि जो बलात्कार कर रहे हैं क्या वे किसी के भाई नहीं? या जिनका बलात्कार हो रहा है वे किसी की बहनें नहीं? भाई होते हुए भी जब बहनें असुरक्षित हैं तो फिर राखी बंधवाते समय भाइयों को कैसा वादा करने की ज़रूरत है कि उनकी बहनें उनकी गैर-मौजूदगी में भी सुरक्षित रहें.

वो वादा है-

अपनी सुरक्षा ख़ुद करने का.

जब भाई-बहनों से राखी बंधवाते समय यह वादा करने लगेंगे, कि अब तुम्हें तुम्हारी सुरक्षा करना मैं सिखाऊंगा. और यह भी सिखाऊंगा कि कैसे जीवन में आगे बढ़ते हुए राह में आने वाले दरिंदों से निपटना है. उस दिन आज के ज़माने की राखी सफल होगी.

अब यहां यह प्रश्न किये जाने की सम्भावना है कि पहले भाई ऐसे वादे क्यों नहीं करते थे. जवाब होगा क्योंकि पहले महिलाओं को घर से बाहर निकलकर, रात-बिरात आने जाने की आज़ादी नहीं थी. आज जहां बेटियां अपना जीवन बनाने, पढ़ने, नौकरी करने घरों से बाहर आती-जाती हैं, क्या वहां हर वक़्त उनके साथ भाइयों का रह पाना, उन्हें सुरक्षा दे पाना संभव है? नहीं. तो क्या राखी के इस त्यौहार के मायने अब सिर्फ कागज़ी और तोहफे लेने-देने तक सीमित रह गए हैं?

अभी कुछ दिन एक छोटे से शहर में दीवारों पर कराटे क्लासेस के पोस्टर लगे देखे थे. उन पोस्टर की ख़ास बात यह थी कि उसमें सिर्फ कराटे करते हुए लड़कियों को दिखाया गया था. और आकर्षित करने वाली लाइन साथ में लिखी गई थी जो थी-

इस राखी बहनों को भाई का तोहफ़ा, अपनी सुरक्षा स्वयं करने का.

मुझे इससे बेहतर तोहफा आज तक नहीं दिखा. हम आज की बहनों को अपने भाइयों से इसी तरह के तोहफों की ज़रूरत है. जिसमें वे न सिर्फ हमें कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाएं, बल्कि आज की दुनिया में अपने को सुरक्षित रहते हुए स्वयं कैसे आगे बढ़ें यह भी सिखाएं. हजारों सालों तक सिर्फ घर में बैठे रहने से हम बहनों-बेटियों के जो कदम जाम हो गए हैं उन्हें अगर किसी सहारे के साथ चलना सीखने और आगे बढ़ने की ज़रूरत है वह है भाई-बेटे.

हाल ही में एक बेटे की मां बनने के बाद मैंने तो ख़ुद से यह वादा कर लिया है कि अपने बेटे को न सिर्फ बहनों की इज्ज़त करना, बल्कि पुरुष सत्तात्मकता की सोच से कहीं परे परवरिश देनी है… क्या आप भी इस राखी पर ऐसा ही वादा करेंगे?


वीडियो देखें:

यूट्यूब पर हिट होने के लिए ट्रेन के सामने सिलेंडर रखकर वीडियोज़ बनाए, पुलिस ने पकड़ लिया-

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