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इरफ़ान के किस्से: 'वो मुझे किडनैप कर गाड़ी में बैठाते और ढेरों कहानियां सुनते'

अमितोष नागपाल हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से पढ़ाई की है. एक्टिंग करियर की बात करें तो दबंग, रंगरेज़, आरक्षण, बेशरम जैसी फ़िल्में उनके खाते में हैं.

हरियाणा के हिसार में पैदा हुए अमितोष एक्टिंग के उस्ताद तो हैं ही, उनकी कलम की धार भी कम नहीं. ‘ओये लक्की लक्की ओये’ के गाने उनकी कलम से निकले हैं. ‘गुलाब गैंग’ और ‘हिंदी मीडियम’ के डायलॉग उन्होंने लिखे हैं. उन्होंने इरफ़ान को लेकर कुछ लिखा है. उनकी इज़ाज़त से आपको पढ़वा रहे हैं.


2004 की बात है. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NSD) के दूसरे साल में पढ़ता था. उस समय कुछ दिनों से हमारे बैच के कुछ दोस्तों में ये ईर्ष्या का विषय बना हुआ था. कि इरफ़ान भाई थर्ड ईयर वालों की एक्टिंग की क्लास लेने आ रहे हैं. ‘वॉरियर’ NSD फिल्म क्लब में देखी जा चुकी थी. और ‘मक़बूल’ की चर्चा हवाओं में थी. एक दिन क्लास जाने से पहले हॉस्टल फ़ोन करने के लिए मैं जल्दी-जल्दी NSD रिसेप्शन पर गया तो देखा फ़ोन के पास इरफ़ान भाई खड़े थे. तुरंत फ़ोन छोड़के बोले, ‘पहले आप कर लीजिये भई’.

यह ज़रा सी मुलाक़ात कई दिनों तक याद रह गई. फिर मुंबई आने के बाद काफी बार यहां-वहां  मिलते रहे. लेकिन कभी कुछ खास बात नहीं हुई. इस बीच कभी-कभी कुछ लिखने के सिलसिले में सुतपा जी (इरफ़ान की पत्नी) से मिलना हुआ. एक दिन उनका फ़ोन आया कि इरफ़ान तुमसे मिलना चाहते हैं.

मैं बिना वजह पूछे ख़ुशी-ख़ुशी उनके बताए समय पर उनसे मिलने पहुंच गया. यह मिलने का ठिकाना मलाड में इनऑर्बिट मॉल के सामने एक ऊंची सी इमारत में था. थोड़े इंतज़ार के बाद मिलना हुआ.

“क्या हाल है?” उन्होंने पूछा.

मैंने कहा, “ठीक हूं.”

और फिर कुछ देर हम दोनों उस कमरे में चुपचाप बैठे रहे. उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई और कहा- सुना कि अच्छा लिखते हो, तो सोचा मिला जाए.

मैं अभी भी चुप ही बैठा रहा. एक पल के लिए लगा बस बातें दोनों तरफ से ख़त्म हो गयी है. मैं केवल मुस्कुराते हुए उन्हें देख रहा था. और उन्होंने कहा- “कभी कोई आइडिया शेयर करना हो, या कहानी सुनानी हो तो बताना.”

मैंने कहा- “जब आप कहें मैं तब सुना सकता हूं. आपको सुना के मुझे बहुत मज़ा आएगा.”

बड़ी देर से मुझे मुस्कुराते हुए देख कर वो भी काफी हंसते हुए बोले- “जब भी तुम्हारा मन हो. मैं अगले कुछ दिन फ्री हूं.”

मैंने कहा, “आप बोलो मैं तो अभी भी सुना सकता हूं.” उन्होंने पूछा, “कैसे सुनाओगे? लैपटॉप? मोबाइल?”

मैंने कहा, “मेरी कहानी है सुना दूंगा.”

“ठीक है, कुछ सुनाओ.” इरफ़ान ने कहा.

मैंने कहा, “अगर आप बोर हो जाओ तो मुझे बीच में ही रोक देना, मुझे बुरा नहीं लगेगा.”

उन्होंने हंसते हुए कहा, “हां, रोक दूंगा.”

Irrfan Khan
इरफान (फोटो: Twitter | Irrfank)

पर उन्होंने नहीं रोका और मैंने ढाई घंटे तक कहानी सुनाई. बीच-बीच में वो फ़ोन पर अपने बाकी काम टालते रहे. वो इतने मन से कहानी सुन रहे थे कि पूरी कहानी मुझे उनके चेहरे पर घटते हुए दिखाई दे रही थी.

कहानी ख़त्म होते ही उन्होंने कहा- “ये बहुत अच्छा किरदार है. ये मुझे करना है भाई.”

मैंने भी उतनी ही तेजी से कहा- “नहीं, ये मुझे करना है इरफ़ान भाई.”

वो थोड़े हैरान हुए. जैसे उन्हें कुछ गलत सुनाई दिया और अचरज से पूछा- “मतलब?”

मैंने कहा- “जी. यह मैंने अपने लिए सोची है कहानी.”

“तो मुझे क्यों सुनाई फिर?”

मैं थोड़ा घबरा गया. “आपने कहा न कुछ सुनाओ.”

एक पल के लिए उनके चेहरे पर गुस्से और नाराज़गी के बीच का कोई भाव दिखाई दिया और फिर मेरी तरफ देख के ज़ोर से हंस दिए.

“सुनो भाई मुझे कहानियां सुनना पसंद हैं. पर उनको सुनने की एक वजह होती है न? मैं एक्टर हूं न भाई.”

उनकी हंसी में अपनी हंसी मिलाते हुए जैसे अपनी गुस्ताखी के लिए माफ़ी मांगते हुए मैंने कहा- “जी इरफ़ान भाई. मैं भी एक्टर ही हूं.”

अब बात वाकई ख़तम हो चुकी थी. हम दोनों को शायद लग रहा था ये इस वक़्त का सही इस्तेमाल नहीं था. पर कहानी सुनाकर मुझे मज़ा बहुत आया था. बाद में कई बार उन्होंने ज़िक्र किया कि उन्हें भी बहुत मज़ा आया. मेरे जाने के कई देर बाद तक वो इस मुलाक़ात पे हंसते रहे थे.

थोड़ी देर मोबाइल को देखने के बाद उन्होंने कहा- चलें फिर?

वो भी उस फ्लैट से मेरे साथ ही निकल लिए. अजीब सी चुप्पी थी. मुझे बीच-बीच में लग रहा था कि मैंने बहुत ही बेवकूफाना हरकत की है. अपने पसंददीदा अभिनेता से मिलकर मैंने खुद ही ऐसा काम कर दिया है कि फिर कभी मिलना न हो पाए. लिफ्ट में घुसे तो बिल्डिंग के बच्चों ने वो चुप्पी तोड़ी. ढेर सारे बच्चे ऑटोग्राफ की ज़िद करने लगे. लिफ्ट से गाड़ी तक जाते हुए वो चुप्पी बनी रही. गाड़ी तक पहुंचने से ज़रा पहले वो रुके और उन्होंने कहा-

“एक्टिंग जो भी करे. लेकिन ये कहानी है बहुत अच्छी. मेरे लिए कोई कहानी हो तो ज़रूर सुनाना.”

मैंने कहा- “है न भाई. बिल्कुल है.”

उन्होंने एक बच्चे की तरह चिढ़ते हुए कहा- “तो वो क्यों नहीं सुनाई भाई मेरे?”

मैंने कहा आप जब कहें. उन्होंने शरारत भरी हंसी के साथ कहा- “अब ये मत कह देना अभी सुन लो. अभी मुझे घर जाना है.”

मैंने कहा- “नहीं. नहीं. आप बताइए कब ?”

और फिर आधा घंटा हम जाने क्या बात करते रहे. उन्होंने पांच दिन बाद का टाइम दिया और पूछा- “वो कहानी भी पूरी लिखी हुई है न?”

मैंने कहा- “जी.”

आज तक मैं उन्हें ये नहीं बता पाया कि पांच दिन बाद मैंने उन्हें जो कहानी सुनाई. वो पूरी फिल्म मैंने उन्ही पांच दिनों में दिन-रात जगकर लिखी थी.

हमेशा सोचता था कि कभी इत्मिनान से बताऊंगा. यह फिल्म सुनाने मैं अपने निर्देशक दोस्त मक़बूल के साथ गया था. उनके मड आइलैंड वाले घर पर नाश्ते से गपशप शुरू हुई. थोड़ा वक़्त गपशप में बीत गया और अब उन्हें ‘डी डे’ फिल्म की प्रमोशन के लिए जुहू पहुंचना था. मक़बूल और मैं सोच ही रहे थे कि कहानी की बात शायद अब अगली मुलाक़ात में हो. मक़बूल भाई चाहते भी थे कि बात ज़रा टल ही जाए तो अच्छा है. क्योंकि बस उन्हें ही ये राज़ मालूम था की ये कहानी पांच दिन में लिखी गई है. और उस कहानी को सुनाने से पहले हम एक दूसरे को ठीक से सुना भी नहीं पाए थे.

लेकिन अचानक इरफ़ान भाई ने कहा- “यह तो कहीं भी सुना सकते हैं, और कभी भी, है न?”

मैंने कहा- “जी बिलकुल.”

फिर कहा- “तो मैं भी कहीं भी सुन सकता हूं. गाड़ी में?”

हम बिल्डिंग से नीचे आए. तो उन्होंने कहा- “मैं तुम्हारी गाड़ी में आ जाता हूं. और मेरी गाड़ी पीछे-पीछे आ जाएगी.”

मक़बूल भाई ने गाड़ी चलानी शुरू की और मैंने कहानी सुनानी. और उन्होंने कहानी सुनना. ये जादू भरा सफर था.  हम तीनों ठहाके लगते गए. न उस गाड़ी का ज़्यादा भरोसा था और न उस पांच दिन में लिखी कहानी का लेकिन गाड़ी चलती गई. कहानी भी. जब कहानी ख़त्म हुई, इरफ़ान भाई का मेकअप हो चुका था. ‘सन एंड सैंड’ होटल के बेसमेंट में ‘डी-डे’ फिल्म का प्रमोशन शुरू हो चूका था! और अपनी फिल्म की कहानी ख़त्म हो चुकी थी. उस फिल्म की कहानी के लिए फिर लगातार हम मिलते रहे.

वो फिल्म तो नहीं बन सकी, लेकिन उस कहानी के बहाने एक दूसरे को जानने का एक बड़ा खूबसूरत सिलसिला शुरू हो गया. ऐसे ही कहानी सुनने सुनाने के बहाने कभी भी ज़रा देर के लिए फ़ोन आता और फिर घंटो बातें चलती. एक दिन उन्होंने वही कहानी फिर से सुनाने के लिए कहा जो मैंने पहली मुलाक़ात में सुनाई थी. मैंने कहा- “भाई. मैंने कहा था वो मैं एक्टर के तौर पर खुद करना चाहता हूं.”

उन्होंने कहा- “इसीलिए पूछ रहा हूं. मुझे पता है तुम एक्टर हो. हम कुछ फिल्में प्रड्यूस करना चाह रहे हैं और वो फिल्म मेरे दिल के बहुत करीब है.” ऐसे कुछ मौकों पर मुझे सपने देखने पे यक़ीन लौट आता था. कई बार बड़ी अजीबोगरीब कहानियां या सीन उनसे शेयर करता तो हम खूब ठहाके लगाते. और वो पूछते- “लेकिन क्या सच में ऐसा ही करने का मन है?”

मैं कहता- भाई मन तो है.

और वो कहते- “मन का सब हो जायेगा क्या बे?”

Irrfankhan
लंचबॉक्स फिल्म का एक दृश्य (स्क्रीनग्रैब: यूट्यूब)

ऐसे ही एक रात फिल्म डायरेक्ट करने की ज़िद लेके उनके घर पहुंच गया था. वो खाना खा रहे थे. मैं बगल में ‘हां या न बोल दो’ टाइप शक्ल लेकर बैठ गया. उन्होंने कहा- “लिखी है न तुमने? और कह रहे थे एक्टिंग करनी है तुम्हें? अब क्या नया?” और ज़रा देर बाद एक बड़े भाई की तरह लगभग डांटते हुए कहा- “डिसाइड तो कर.”

मैंने कहा- “भाई. जो अभी मन कर रहा है वो बता रहा हूं.”

और उन्होंने फिर ज़ोर से हंसते हुए कहा था- “मन का सब हो जाएगा क्या बे?”

कभी-कभी उनका फ़ोन आता- “घर से बांद्रा जा रहा हूं. रास्ते से तुम्हें किडनैप कर लूं? कुछ कहानी सुन लेंगे.” और मैं किडनैप होने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी राज़ी रहता.

सबसे मज़े की बात थी कि 2-3 बार उन्हें चलती गाड़ी से इतने बड़े शहर में, मैं कहीं भीड़ में घूमता हुआ जाने कैसे नज़र आ गया था. आवाज़ देके बिठा लेते, ‘आओ थोड़ी दूर तक’ और गाड़ी में गपशप मारते हुए मैं देखता था कि चलती गाड़ी में उन्हें और भी जाने कितने लोग नज़र आ जाते थे. और वो गाड़ी रोक के सबका हालचाल पूछ लेते थे.

कभी अचानक 10-15 मिनट मिलने का प्लान बनता और घंटो कब बीत जाते पता नहीं चलता था.  इस बीच उन्होंने कई फिल्मों पे साथ जुड़ने के लिए कहा और मैं जब उनसे कहता था की पढ़ने या सुनने के बाद मज़ा नहीं आया. तो कहते- “हां. हां. मज़े नहीं आए तो मत करना. मज़ा आना चाहिए.”

इसी सिलसिले में जब ‘हिंदी मीडियम’ की बात हुई तो उन्होंने कहा- अब ये वाली कर डालो यार तुम. मज़े बहुत आयेंगे. और सच में मज़े बहुत आए. अपने पसंददीदा अभिनेता के साथ वक़्त बिताने और फ़ोन पर गपियाने का बहाना जो मिल गया था. घर बुला के एक-एक सीन को स्वाद लेके सुनते. और हर सीन में मेरा मन होता कि उनका ये स्वाद कम न हो. इसके साथ ही बहुत सारे किस्सों और कहानियों ने हमें चुन लिया. और फिर अचानक ऐसे बहुत से किस्से कहानियां अचानक रास्ते में कहीं रुक गए.

उनकी तबीयत खराब हुई और फिर ज़्यादा बातचीत नहीं हो पाई. मुझे बात करने का कोई और बहाना नहीं मिला. इन मुलाक़ातों में और बातों में बहुत कुछ सीखा मैंने उनसे लेकिन अभी अभी तो मिलने का लालच शुरू हुआ था. मैं इंतज़ार करता रहा कि अचानक गाड़ी का शीशा नीचे उतरेगा और मेरी कहानियों का ‘नायक’ मुझे ज़रा देर के लिए किडनैप करके ले जाएगा. इस शहर में जो कहानी किसी को समझ नहीं आती, उस कहानी पर वो घंटों बात करेंगे. छोटी छोटी बातों पर ज़ोर से हसेंगे. और खूब ‘मज़ा’ करेंगे.

आज मन उदास है. आंखें भीगी है. मन यक़ीन नहीं करना चाहता.

और मुझे वो मुस्कुराती आंखों से देखते हैं और पूछते हैं- “मन का सब हो जायेगा क्या बे?”


विडियो- इरफान का सौरभ द्विवेदी के साथ वो इंटरव्यू, जिसमें वो सब कुछ बोल गए थे

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