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क्या IAS-IPS अधिकारियों की सोशल मीडिया एक्टिविटी को लेकर कोई सरकारी नियम-कायदा है?

सोशल मीडिया पर आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के हैंडल और पेज काफी पॉपुलर हैं. लोग कभी उनसे काम की चिरौरी करते दिखते हैं तो कभी टिप्स मांगते हैं. कोरोना काल में कई अधिकारी अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिए जागरूकता फैलाने का अच्छा काम करते भी दिखे. लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने 1 जुलाई को ट्रेनी आईपीएस अधिकारियों को सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह दे डाली. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वक्त बर्बाद होता है, काम नहीं हो पाता.

गृह मंत्री ने तो सलाह दे दी. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के लिए इसे लेकर कोई नियम-कायदा भी है? अगर है तो वह क्या कहता है? आइए जानते हैं.

पहले जानिए कि होम मिनिस्टर ने कहा क्या?

अमित शाह ने पुलिस अधिकारियों को सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर कई सीख दीं. गृह मंत्री ने कहा,

“ ऑल इंडिया सर्विस और खास कर आईपीएस अधिकारियों को पब्लिसिटी, और खास कर सोशल मीडिया से बचना चाहिए. पब्लिसिटी की भूख काम में बाधा पैदा करती है. हालांकि वर्तमान समय में सोशल मीडिया से बचना मुश्किल है लेकिन फिर भी पुलिस अधिकारियों को इससे दूर रह कर अपने काम पर फोकस करना चाहिए. आप सभी को पुलिस अकादमी छोड़ने से पहले एक डायरी में नोट्स बनाने चाहिए. उसमें लिखना चाहिए कि आज उन्होंने जो काम किया क्या वह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए था.”

मेन बात यह कि पुलिस अधिकारी काम पर फोकस करें दिखावे पर न जाएं. हमने होम मिनिस्टर के कमेंट पर झारखंड में तैनात एक सीनियर पुलिस अधिकारी से प्रतिक्रिया ली. उनका कहना है,

“मेरे हिसाब से होम मिनिस्टर रोज के रोज गुडवर्क के लिए सोशल मीडिया पर डाली जाने वाली पोस्ट की तरफ इशारा कर रहे थे. कुछ पुलिस अधिकारी अपने पर्सनल हैंडल से भी यह काम करते हैं. वह शायद ऐसे अधिकारियों को ही संदेश देना चाह रहे होंगे.”

क्या कहता है डिपार्टमेंट का नियम?

भारत में सिविस सर्विसेज मतलब आईएएस, आईपीएस, आईएफएस आदि डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल एंड ट्रेनिंग के अंतर्गत आती हैं. किसी अधिकारी को काम कैसे करना है, किन बातों का ध्यान रखना है, क्या कतई नहीं करना है जैसे सारे नियम यह डिपार्टमेंट बनाता है. इसमें फिलहाल ‘सोशल मीडिया’ के इस्तेमाल को लेकर किसी भी तरह के नियम-कायदे का जिक्र नहीं है. वहां पर सिर्फ Connection with Press or other media के नियम का जिक्र है. इसमें प्रेस और ‘दूसरे मीडिया’ को लेकर नियम बताया गया है, जो कहता है,

“किसी भी सरकारी कर्मचारी को किसी अखबार, मैगजीन या वेबसाइट से बिना पूर्व अनुमति के किसी भी तरह का जुड़ाव नहीं रखना चाहिए. अनुमति मिलने के बाद भी जो जानकारी दी जाए उसे अपने विचार न बता कर सरकार का पक्ष कहा जाए.”

गुजरात काडर के एक आईपीएस अधिकारी ने इस बारे में बताया,

“भले ही (इस नियम में) कहीं भी सीधे तौर पर सोशल मीडिया पर बर्ताव को लेकर कोई जिक्र नहीं है, फिर भी इसे सामान्य बर्ताव के नियम में शामिल मानना चाहिए. मिसाल के तौर पर शालीन व्यवहार, राजनीतिक निष्पक्षता और आधिकारिक गोपनियता जैसे नियमों का पालन सोशल मीडिया पर करने की उम्मीद भी रखी जाती है.”

(सिविल सेर्विसेज से जुड़े नियमों को यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)

होम मिनिस्टर रोक रहे, दूसरा मंत्रालय यूज़ करने को बोल रहा

होम मिनिस्टर भले ही पुलिस अधिकारियों को सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह दे रहे हों लेकिन सरकार का दूसरा मंत्रालय इसे बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल करने के टिप्स दे रहा है. भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ कम्यूनिकेशन एंड इंफॉर्मेशन टेक्नॉलजी ने बाकायदा सोशल मीडिया को लेकर गाइडलाइंस जारी की हैं. इसमें साफ कहा गया है कि सरकार को सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा एक्टिव रहना चाहिए. इसके लिए अधिकारी सोशल मीडिया के अकाउंट बनाएं और उन पर लगातार एक्टिव रहें. इसमें पोस्ट करते वक्त हर प्लेटफॉर्म के हिसाब से ध्यान रखने वाली बातों का भी जिक्र है. यह अपने आप में सोशल मीडिया को इस्तेमाल करने की हैंडबुक है. मिसाल के तौर पर इसमें लिखा है.

# हर विभाग को अपने बारे में जानकारी देने, फीडबैक लेने के लिए सोशल मीडिया के कई प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहना चाहिए.

# जो भी सोशल मीडिया अकाउंट बनाया जाए, उसमें स्पष्ट तौर पर लिखा जाए कि यह किस पद के अधिकारी का अकाउंट है.

# सोशल मीडिया अकाउंट को एक्टिव रखा जाए. उस पर आने वाले सवालों और रिएक्शन पर नजर रखी जाए.

# विभाग का कोई भी कर्मचारी पर्सनल कैपेसिटी में कमेंट करने लिए आजाद है. लेकिन जब भी वो ऐसा करें तो बताएं कि वो किस अथॉरिटी से कमेंट कर रहे हैं. साफ-साफ अपना पद और पोस्टिंग की जगह बताएं. किसी भी तरह से यह आधिकारिक बयान न लगे.

सभी गाइडलाइंस यहां पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

दी लल्लनटॉप को इस दौरान एक राज्य का ऐसा आदेश मिला जिसमें पुलिस विभाग ने अपने हर अधिकारी को सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने का निर्देश दिया है. यह आदेश पिछले महीने ही राज्य के एडीजी ने जारी किया है. इसमें कहा गया है कि पुलिस विभाग के सभी अधिकारी-कर्मचारी सोशल मीडिया पर अकाउंट बना कर राज्य के बड़े अधिकारियों को फॉलो करें. इसे बेहतर को-ऑर्डिनेशन और समझ पैदा करने के लिए अच्छा बताया गया है.

क्या वाकई में सोशल मीडिया पर रहने से वक्त खराब होता है?

सोशल मीडिया और टाइम की बर्बादी को लेकर हमने कई राज्यों के पुलिस अधिकारियों से बात की. सभी ने नाम न छापने की शर्त पर हमें बताया कि सोशल मीडिया के अपने फायदे और नुकसान हैं. गुजरात काडर के एक पुलिस अधिकारी ने कहा,

“पर्सनल पब्लिसिटी के लिए हमारे पास वक्त नहीं होता. हो सकता है कुछ सिविल सर्वेंट सोशल मीडिया पर ऐसा करते दिखते हों, लेकिन ज्यादातर अपने ऑफिशियल हैंडल से ही एक्टिव दिखते हैं. सोशल मीडिया का अपना फायदा यह है कि कई बार तेजी से जानकारी लोगों तक पहुंचती है. इससे बहुत से लोगों को फायदा भी होता है. मिसाल के तौर पर ट्रैफिक या किसी दुर्घटना की स्थिति में रियल टाइम अपडेट उपलब्ध कराए जा पाते हैं. इसे मात्र पब्लिसिटी तो नहीं माना जा सकता.”

राजस्थान काडर के एक आईएएस अधिकारी ने बताया,

“विभाग का अपना हैंडल होता है. वह अपनी तरह से जानकारियां उपलब्ध कराता है. मेरा अपना हैंडल एक भारतीय नागरिक के तौर पर है. उसे इस्तेमाल करने की मुझ पर कोई रोक नहीं है. मैं उस पर अपने दोस्तों से बात करता हूं या फिर कई बार रोचक जानकारियां शेयर करता हूं. हजारों लोग इस वजह से जुड़े रहते हैं. कई लोग टिप्स भी मांगते हैं. वह देने में भी कोई हर्ज नहीं है. जब तक हम एक गंभीर सिविल सर्वेंट के तौर पर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हैं, तब तक इसे इस्तेमाल करने में हर्ज नहीं है.”

हालांकि झारखंड में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने कुछ केसेज में अतिवादिता की बात मानी. उन्होंने कहा,

“कई अधिकारी हैं जो कई बार सोशल मीडिया के इस्तेमाल की सीमा भूल जाते हैं. वह अपने हर मोमेंट को सोशल मीडिया पर शेयर करने की फिराक में रहते हैं. एक सिविस सर्वेंट तो ऐसे हैं जो अपने हर छापे का वीडियो बनाते हैं और उसे यूट्यूब पर अपलोड करते हैं. वह काफी पॉपुलर भी हैं. मुझे लगता है कि अगर फोकस पॉपुलर होने पर होगा तो काम का हर्जा जरूर होगा. हम एक सिविल सर्वेंट की हैसियत से जो करते हैं वह हमारी नौकरी का हिस्सा है. हम वह कैसे करते हैं इसका प्रचार करने का कोई मतलब नहीं है. महत्वपूर्ण काम है न कि उसे करने वाला.”

तो इस बार जब भी सोशल मीडिया पर किसी आईएएस-आईपीएस ऑफिसर के सोशल मीडिया पर जाएं, तो उसके किए काम पर उसका आंकलन करें न कि पॉपुलैरिटी के आधार पर.


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