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अफगानिस्तान पर नजर रखने के लिए भारत में एयरबेस बनाने वाला है अमेरिका?

फ़र्ज़ कीजिए आप किसी रिश्तेदार के घर मेहमान बनकर गए हों. पहले कुछ दिन तो वहां खूब आव-भगत होगी. लेकिन अगर कुछ दिन वहां ठहर गए तो उनके चेहरे पर मेहमान नवाज़ी का बोझ साफ़ झलक उठेगा. लौटने को बोलो तो सामने से जवाब आए, अरे नहीं-नहीं, अभी कहां, कुछ दिन और बिताइए हवेली में. लेकिन एक अनकहा पैक्ट है जो आपको और उनको भी पता है. वो ये कि मेहमान नवाज़ी में ना का मतलब तो हां होता है.

यही हालत आजकल दुनिया के सूपर पावर देश अमेरिका की हो रखी है. हालांकि, ना तो काबुल उसके चाचा का घर था, ना ही किसी ने उसे वहां आमंत्रण दिया था. लेकिन हालत फिर भी वही है. अफ़ग़ानिस्तान में जब तक रुका था, चारों तरफ़ से आवाज़ उठ रही थी, अमेरिका, काबुल छोड़ो! अब छोड़ चुका है, तो सर इल्ज़ाम लग रहा है कि बर्बाद करके छोड़ दिया. क्यों छोड़ दिया, नहीं छोड़ना था, आदि.

जैसे शादी पर ना जा पाने की शक्ल में लिफ़ाफ़ा भेज कर खानापूर्ति कर दी जाती है. ऐसे ही अब अमेरिका भी अफ़ग़ानिस्तान में खाना पूर्ति की कोशिश में लगा है. चारों ओर हो रही फ़ज़ीहत में वो कोई ऐसा रास्ता निकलना चाहता है, कि कुछ करे भी नहीं और करता हुआ दिखाई भी दे. क्या है ये ख़ानापूर्ति और हम किस लिफ़ाफ़े की बात कर रहे हैं. चलिए जानते हैं.

वैसे तो आपको अब तक ये रट चुका होगा. लेकिन फिर भी आप क्रोनोलॉजी समझिए. 9/11, 2001 को अल कायदा ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया. इसके अगले कुछ महीनों में ही अमेरिका ‘वॉर ऑन टेरर’ का बैनर लगाकर गाजे बाजे के साथ अफ़ग़ानिस्तान में एंटर हो गया. अमेरिका और अफ़ग़ानिस्तान के बीच आधी दुनिया का फ़ासला है. और हवाई हमले करने के लिए अमेरिका से जेट उड़ान भरें, ये प्रैक्टिकल नहीं था. वो भी जब इरादा लंबी लड़ाई का हो. इसलिए सवाल उठा एयरबेस की ज़रूरत का.

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अमेरिका के लिए तालिबान पर नजर रखना जरूरी है. फोटो- AP

अफ़ग़ानिस्तान की मैप पर लोकेशन देखिए. 6 देश हैं जो उसके बॉर्डर पर हैं. ईरान, पाकिस्तान, चाइना, ताजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान. इसमें से चाइना और ईरान तो किसी हालात में ये होने नहीं देते कि उनकी धरती पर अमेरिका का सैनिक हवाई अड्डा बने. तो अमेरिका ने बाकी देशों की तरफ़ हाथ बढ़ाया. अमेरिका तब दुनिया की इकलौती महाशक्ति हुआ करता था. आज की तरह चीन उसे टक्कर देने की हालात में नहीं था. ना ही रशिया इतना ताकतवर रह गया था कि अमेरिका का कुछ ख़ास विरोध कर सके.

इसलिए ताजिकिस्तान, उज़बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे युवा देश अमेरिका की छत्रछाया पाने को लालायित थे. इन देशों को अमेरिका में stans बोला जाता है. और इन्हीं के ज़रिए उसने सेंट्रल एशिया में अपनी सैन्य बारात का मंडप यानी एयरबेस तैयार किया.

अमेरिका का पहला बेस बना उज़बेकिस्तान का कर्शी खानाबाद हवाई अड्डा. जिसे K2 एयरबेस के नाम से जाना जाता है. ये एक पुराना सोवियत airbase था. दुनिया के सभी राष्ट्र आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका का समर्थन कर रहे थे. रशिया ने भी सोचा कि हवा के ख़िलाफ़ जाना नासमझी होगी. तो उसने भी K2 पर अमेरिकी तैनाती का विद्रोह नहीं किया.

उज़बेकिस्तान भी इसके लिए झट तैयार हो गया और उसने ये बेस अमेरिका के हवाले कर दिया. पहली किश्त में अमेरिकी आर्मी के 10th माउंटेन डिविज़न के एक हज़ार सैनिक K2 बेस पर तैनात हुए. और बाद में 416th Air Expeditionary ग्रुप के C-130 और C-17 कार्गो मिशन्स को यहां से ऑपरेट किया जाने लगा. बदले में अमेरिका ने उज़बेकिस्तान सरकार को मिलिटरी हार्डवेयर, सुरक्षा सर्विस, और US Export-Import Bank credits मुहैया कराए.

इसके बाद अमेरिका ने उज़बेकिस्तान के पड़ोसी देश की सरकार से समझौता किया. और किर्गिस्तान के मानस एयरबेस को अफ़ग़ानिस्तान में हवाई कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करने लगा. इस तरह सेंट्रल एशिया में अमेरिका के दो एयर बेस हो गए. साल 2005 तक उसने इन दो सैन्य हवाई अड्डों की मदद से काबुल से तालिबान को खदेड़ दिया. और इन्हीं सालों में उसने अफ़ग़ानिस्तान के कई महत्वपूर्ण सैन्य हवाई अड्डों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया. लेकिन उसने इन दो एयरबेस का इस्तेमाल जारी रखा.

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लंबे वक्त तक अमेरिका का बेस K2 में बना रहा. फोटो- AP

क्योंकि उसकी नज़र सेंट्रल एशिया में अपना प्रभुत्व जमाने की ओर भी थी. 4 साल तक सब कुछ चला लेकिन 2005 में यहां भी अमेरिका की हालत बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना वाली हो गई. तब उज़बेकिस्तान के तब के प्रेसिडेंट थे, इस्लाम करिमोव. उज़बेकिस्तान तब धार्मिक उन्माद और कट्टरपंथियों का सामना कर था. करिमोव सरकार ने इनसे निपटने के लिए कड़े सुरक्षा कदम उठाए. लेकिन साथ ही वो दिन पर दिन आम नागरिकों पर भी कई तरह की पाबंदियां बढ़ाते जा रहे थे. जिससे जनता में विद्रोह बढ़ता जा रहा था. इस आग में घी का काम किया 2005 की एक घटना ने.

उज़बेकिस्तान के पूर्वी छोर पर एक शहर पड़ता है, अंडिजन. मई 2005 में यहां 23 लोगों को धार्मिक उन्माद फैलाने और आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया. ये लोग कोर्ट में अपनी पेशी होने का इंतज़ार कर रहे थे कि 12 मई 2005 की रात सशस्त्र आतंकियों ने जेल पर हमला कर दिया. इन 23 लोगों के अलावा उन्होंने 100 के क़रीब दूसरे अपराधियों को जेल से छुड़वा दिया. इसके बाद इन लोगों ने आसपास की सरकारी इमारतों पर क़ब्ज़ा कर लिया.

अगली सुबह यानी 13 मई को हजारों लोग अंडिजन के मेन चौराहे पर इकट्ठा होकर प्रदर्शन करने लगे. इन लोगों की मांग थी कि राष्ट्रपति करिमोव खुद आकर इनसे मिलें. उज़्बेक रक्षा बलों ने भीड़ को चारों तरफ़ से घेर लिया और गोलियां चलाना शुरू कर दिया. इस घटना में बच्चों और औरतों समेत 100 से ज़्यादा लोग मारे गए. कुछ साल बाद हुई तहक़ीक़ात में पता चला कि ये सब करिमोव के इशारे पर हुआ था. ताकि सरकार के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों को दबाया जा सके.

इस घटना के बाद अमेरिका और उज़बेकिस्तान के रिश्तों में दरार आना शुरू हो गई. अमेरिकी संसद में मांग उठी कि इन घटना की जांच हो. लेकिन अमेरिकी DOD (डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस) इससे कतरा रहा था. कारण कि अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के लिए K2 एयरबेस अमेरिका की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता था. जिस दिन अमेरिकी संसद में इस मामले पर बहस हुई, उसके अगले ही दिन K2 एयरबेस से अमेरिकी जेट्स के रात को उड़ान भरने पर पाबंदी लगा दी गई.

करिमोव अब मांग रखने लगे कि अमेरिका को K2 एयरबेस के लिए किराया देना चाहिए. इस बीच अंडीजन में हिंसा बढ़ती गई. जिस कारण हज़ारों रेफ़्यूजी बॉर्डर पार कर पड़ोसी देश किर्गिस्तान में जा पहुंचे. संसद के दबाव में बुश सरकार को रेफ़्यूजियों की मदद के लिए आगे आना पड़ा. जुलाई 2005 में अमेरिका ने उज़्बेक रेफ़्यूजियों को एयरलिफ़्ट कर रोमानिया पहुंचा दिया.

28 जुलाई को रेफ़्यूजी रोमानिया पहुंचे और 29 जुलाई यानी अगले ही दिन ताशकंद स्थित अमेरिकी ऐम्बसी में उज़्बेक सरकार का लेटर पहुंच गया. इस लेटर के अनुसार अमेरिका को K2 बेस खाली करना था और इसके लिए 180 दिन की मोहलत दी गई थी. नवम्बर 2005 में अमेरिका ने K2 ऐयरबेस खाली कर दिया. 2005 के बाद मध्य एशिया में अमेरिका का सिर्फ़ एक एयरबेस रह गया. किर्गिस्तान का मानस एयरबेस.

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किर्गिस्तान का मानस एयरबेस.

लेकिन वहां भी हालत ज़्यादा अच्छे नहीं थे. 2005 के बाद किर्गिस्तान में राजनैतिक उथल पुथल तेज हो गई. तब वहां के राष्ट्रपति थे ‘अक्सर अकायेव’. 2005 में हुए चुनाव में हुई धांधली के चलते जनता ने उनके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. इसे टूलिप रेवलूशन के नाम से जाना जाता है. क्रांतियों को रंगों और फूलों का नाम देने की पुरानी परम्परा रही है. जैसे 2004 में यूक्रेन में हुआ ऑरेंज रेवलूशन, चेकोस्लोवाकिया में हुआ वेल्वेट रेवलूशन और 2003 में जॉर्जिया में हुआ रोज़ रेवलूशन.

टूलिप रेवलूशन के बाद राष्ट्रपति ‘अक्सर अकायेव’ को भागकर रशिया में शरण लेनी पड़ी. 2006 में किर्गिस्तान के नए राष्ट्रपति बने ‘कुरमानबेक बकियेव’. जिसके बाद मानस एयरबेस को लेकर मकान मालिक और किराएदार का खेल शुरू हो गया. आते ही कुरमानबेक ने नए मकान मालिक की तरह मानस एयरबेस का किराया बढ़ाने की मांग की. अमेरिका तब बेस के बदले 13 मिलियन डॉलर की रक़म अदा करता था.

2006 में ही एक और घटना हुई जिसके कारण किर्गिस्तान की जनता भी अमेरिका के ख़िलाफ़ हो गई. हुआ यूं कि एक अमेरिकी सैनिक ‘ज़ैकरी हैटफ़ील्ड’ ने एक किर्गिस्तानी नागरिक को तब गोली मार दी, जब वो सामान पहुंचाने के लिए मानस एयरपोर्ट में दाखिल हो रहा था. किर्गिस्तान सरकार ने ज़ैकरी को सजा दिए जाने की मांग की. लेकिन अमेरिका जिसके लिए अपने देश के नागरिक, नागरिक और बाक़ी लोग जनसंख्या लगते हैं. उसने ज़ैकरी को कोई सजा नहीं दी और उसे वापस अमेरिका भेज दिया.

इस घटना के बाद किर्गिस्तान में अमेरिका के ख़िलाफ़ विद्रोह बढ़ता गया. साल 2009 के आते-आते दुनिया के हालात बदल चुके थे. अमेरिका के प्रति 2001 जैसी सहानुभूति भी नहीं रह गई थी. रशिया ताक में था कि किसी तरह मध्य एशिया से अमेरिका की छुट्टी की जाए. 2009 में किर्गिस्तान की संसद ने एक बिल पेश किया गया. जिसके मुताबिक़ मानस एयरबेस को खाली कर दिया जाना था. और जिस दिन ये बिल पास उसके अगले ही दिन रशिया और किर्गिस्तान के समझौते का ऐलान भी हो गया. साफ़ था कि कठपुतली की डोर रशिया के हाथ में थी. समझौते के अनुसार रशिया को किर्गिस्तान को 2 बिलियन डॉलर बतौर लोन देने वाला था.

अमेरिका ने भी पास फेंका. उसने किर्गिस्तान में डेढ़ सौ मिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया. साथ ही मानस एयरबेस के किराए के तौर पर वो 60 मिलियन डॉलर देने को राज़ी हो गया. एशिया की एक और बड़ी ताक़त चीन भी कहां पीछे रहने वाला था. उसने किर्गिस्तान से कहा कि अगर अमेरिका मानस एयरबेस खाली करता है तो वो मदद के तौर पर 3 बिलियन डॉलर की मदद देगा.

नए रक्षा समझौतों की मदद से अमेरिका ने किर्गिस्तान में मौजूदगी बनाए रखी. लेकिन जब 2011 में किर्गिस्तान की सरकार एक और बार बदली तो अमेरिका ने किर्गिस्तान में अपने दिन गिनने शुरू कर दिए. 2014 में मानस एयरबेस की लीज़ पूरी हुई और अमेरिका वहां से भी निकल गया.

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इन मुलाकातों के अब मायने निकाले जा रहे हैं.

आज हम आपको इन एयरबेस की कहानी क्यों सुना रहे हैं? दरअसल अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद अमेरिका इस चिंता में है कि अल कायदा दुबारा अफ़ग़ानिस्तान को अपनी आतंकी साज़िशों का अड्डा बना सकता है. ज़मीन पर फुट सोल्जर्स की गैर मौजूदगी के बावजूद वो तालिबान पर नज़र बनाए रखना चाहता है. हवाई सर्विलांस के लिए उसे एक ऐसे सैन्य अड्डे की तलाश है जहां से वो अपना ड्रोन प्रोग्राम चालू रख सके.

इससे जुड़ी एक हिंट मिली 14 सितम्बर 2021 को. जब स्टेट सेक्रेटरी ऐंटॉनी ब्लिंकन अमेरिकी संसद की ‘फॉरेन अफेयर्स कमिटी’ के सामने पेश हुए. यहां वो राष्ट्रपति बाइडन के अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के फ़ैसले का बचाव कर रहे थे.इस दौरान कमिटी के एक सदस्य मार्क ग्रीन ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पाकिस्तान की इंटेलिजेन्स ऐजंसी ISI के साथ गठजोड़ से तालिबान भविष्य में अमेरिका के ख़िलाफ़ साज़िश रच सकता है. अल क़ायदा के दुबारा पनपने से अमेरिका के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है.

आगे बोलते हुए मार्क ग्रीन ने ब्लिंकन से पूछा कि क्या बाइडन प्रशासन ने इस मामले में नई दिल्ली से सम्पर्क किया है. आगे उन्होंने कहा कि भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र से अफ़ग़ानिस्तान पर ड्रोन और हवाई ऑपरेशन किए जा सकते हैं. अमेरिकी संसद में दिल्ली का ज़िक्र भारत में कान खड़े कर देने वाला था. इसलिए इस बात तो लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं कि अमेरिका भारत में सैन्य हवाई अड्डा बना सकता है. हालांकि इस मामले पर ब्लिंकन ने कोई साफ़-साफ़ जवाब तो नहीं दिया लेकिन इतना ज़रूर कहा कि हम भारत के साथ ‘अक्रॉस द बो’र्ड बात कर रहे हैं.

ज़्यादा डिटेल्स ना बताते हुए उन्होंने कहा कि इस मामले की स्पेफ़िक्स सुरक्षा कारणों से पब्लिक में नहीं बताई जा सकती. भारत सरकार ने इस मामले में अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन पिछले सालों में भारत से अमेरिका की बढ़ती हुई नज़दीकियों से इन क़यासों को बल मिलता हुआ दिखाई दे रहा है. इसी साल जुलाई में US स्पेशल ऑपरेशन्स कमांडर, जनरल रिचर्ड डी क्लार्क ने दिल्ली का दौरा किया था. इस दौरे पर उन्होंने इंडियन आर्मी चीफ़ General M. M. Naravane से मुलाक़ात की थी.

इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के 10 दिन बाद ही यूनाइटेड स्टेट्स इंडो-पसिफ़िक कमांड के कमांडर Admiral जॉन सी. एक्विलिनो ने चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ जनरल, बिपिन रावत से मुलाक़ात की थी. पिछले सालों में भारत अमेरिका के बड़े रक्षा साझेदार के रूप में उभरा है. इंडो पसिफ़िक में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिए QUAD के गठन से तो हम वाक़िफ़ ही है.

इसके अलावा 2016 में दोनों देशों के बीच Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA) साइन हुआ था. जिसके बाद ये चर्चा ज़ोर पकड़ी थी कि सरकार ने भारत में अमेरिकी सैन्य हवाई अड्डा खोलने का रास्ता साफ कर दिया है. 2016 के बाद अमेरिका और भारत के बीच 2 और महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हो चुके हैं.

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अमेरिका और भारत की नजदीकी पर दुनिया भर की नजरें हैं.

2018 में दोनों देशों ने Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA) पर हस्ताक्षर किए. और 2020 में Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA) पर साइन हुए जिसके बाद दोनों देशों के बीच जियो स्पेशियल जानकारी और ख़ुफ़िया इंटेलीजेंस शेयर करने को लेकर सहमति बनी थी.

हालांकि भारत में एयरबेस खोलने की बात अभी सिर्फ़ एक क़यास भर है. लेकिन ये बात पूरी तरह हवा-हवाई भी नहीं है. अफ़ग़ानिस्तान में शर्मिंदगी झेलने के बाद अमेरिका बैकफुट पर है. चीन और रूस अपना दबदबा बड़ा रहे हैं. ऐसे में मध्य ऐशिया में अमेरिका को किसी साझेदार की सख़्त ज़रूरत है. ताकि वो अफ़ग़ानिस्तान पर नज़र रख सके. इसी साल 15 अप्रैल को न्यू यॉर्क टाइम्ज़ में छपी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों ने उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के अधिकारियों से सैन्य हवाई अड्डे को लेकर बात शुरू की है.

लेकिन अब वैश्विक हालात बदल चुके हैं. ये सब देश Collective Security Treaty Organization (CSTO) और Shanghai Cooperation Organization (SCO) जैसे गुटों का हिस्सा हैं. जिन पर चीन और रूस का वर्चस्व है. पिछले ही महीने यानी अगस्त 2021 में रशिया ने उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ मिलकर अफ़ग़ान बॉर्डर पर संयुक्त सैन्य अभ्यास में भाग लिया. चाइना ने ताजिकिस्तान में एक मिलिटरी बेस बनाया हुआ है. और उसने भी ताजिक मिलिटरी के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास कर अमेरिका को आइना दिखाने की कोशिश की है.

इन सैन्य अभ्यासों का एक ही मकसद है. अमेरिका को दिखाना कि मध्य एशिया में उसकी दाल नहीं गलने वाली. चीन और रूस कई बार ये बयान दे चुके हैं कि मध्य एशिया में अमेरिका के दख़ल की ज़रूरत नहीं है और CSTO और SCO जैसे संगठनों के माध्यम से ऐसा किया जा सकता है. इतिहास और वर्तमान हालात को देखकर लगता नहीं कि मध्य एशिया में अमेरिका कोई सैन्य मौजूदगी रख सकेगा.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और अल क़ायदा पर नज़र रखने के लिए उसे हवाई पहुंच चाहिए. और सैन्य अड्डों के नाम पर उसके पास खाड़ी के देशों का ऑप्शन है. कतर और कुवैत में उसे एयरबेस है लेकिन वहां से अफ़ग़ानिस्तान की दूरी को देखते हुए ये मुमकिन नहीं लगता. ऐसे में भारत में ऐयरबस की सम्भावना उतनी दूर की भी कौड़ी नहीं जितनी प्रथम दृष्टया लगती है. ख़ासकर तब वो पहले ही इंडियन ओशियन में 60 प्रतिशत नेवल फ़्लीट उतारने की घोषणा कर चुका है.


वीडियो- दुनियादारी: अमेरिका और भारत की दोस्ती से कसेगा अफगानिस्तान में आतंक पर शिकंजा!

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