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'नीची जाति' वाले कमेंट पर नरेंद्र मोदी के वो चार झूठ, जो कोई पकड़ नहीं पाया

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नरेंद्र मोदी पर पत्थर फेंकिए, वे घर बना लेंगे. पुराना इतिहास है. उन्होंने सदन में एक बार कहा था, ‘आप लोगों को बाकी विषयों में मेरी क्षमता पर शक होगा, लेकिन आप मानते होंगे कि मेरी राजनीतिक सूझबूझ तो है.’ वो मनरेगा को बंद न करने पर अपना मंतव्य स्पष्ट कर रहे थे. यकीनन, अगर आज भी किसी को नरेंद्र मोदी की राजनीतिक सूझ-बूझ पर संदेह है, तो उसे मणिशंकर अय्यर का संदर्भ लेना चाहिए.

खुद को कांग्रेस का ‘फ्रीलांस नेता’ बताने वाले अय्यर ने 7 दिसंबर को नरेंद्र मोदी पर बयान दिया, ‘मुझे लगता है कि ये आदमी बहुत नीच किस्म का आदमी है. इसमें कोई सभ्यता नहीं है और ऐसे मौके पर इस प्रकार की गंदी राजनीति की क्या आवश्यकता है.’

अय्यर के बयान के कुछ ही मिनटों बाद मोदी सूरत की चुनावी रैली के मंच पर थे. अपनी आवाज़ के मोह लेने वाले आरोह-अवरोह के साथ उन्होंने गुजराती में कहा,

“कांग्रेसी नेता ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जो लोकतंत्र में शोभा नहीं देती. आज कांग्रेस के एक बड़े नेता, जो विद्वान परिवार से आते हैं, बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी की डिग्री रखते हैं, भारत के राजदूत के दौर पर दुनिया में काम कर चुके हैं, फॉरेन सर्विस के बड़े अफसर रहे, मनमोहन सिंह जी की सरकार में बड़े जवाबदार मंत्री थे- श्रीमान मणिशंकर अय्यर. उन्होंने कहा कि मोदी तो नीची जाति का है, मोदी तो नीच है.

भाइयों बहनों, क्या ये गुजरात का अपमान है या नहीं? ये भारत की महान परंपरा का अपमान है या नहीं? ये तो मुगलई मानसिकता है, जिसने हिंदुस्तान में ऊंच-नीच का कुसंस्कार भर दिया. मुगल संस्कार वालों को मेरे जैसे का अच्छे कपड़े पहनना सहन नहीं होता. इन्हें लगता है कि कपड़ा धोने और प्रेस करने वाला ऐसे कपड़े कैसे पहन सकता है. ये मुगलई मानसिकता, सल्तनती मानसिकता है. आपने हमें गधा कहा, गंदी नाली का कीड़ा कहा, नीच जाति का कहा, नीच कहा. इसका जवाब मतपेटियां देंगी.”

सूरत रैली में नरेंद्र मोदी
सूरत रैली में नरेंद्र मोदी

यही वो अवसर है, जहां नरेंद्र मोदी की ‘राजनीतिक सूझ-बूझ’ चतुराई में बदलती दिखती है. वो PMO में बैठे एक प्रशासक से चुनाव में ध्रुवीकरण करने वाले नेता में कैसे तब्दील हो जाते हैं, ये पकड़ना मुश्किल है. मणिशंकर अय्यर का बयान बिलाशक प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, पर क्या ‘नीच’ को ‘नीची जाति’ में तब्दील करना किसी प्रधानमंत्री को शोभा देता है. देखिए, अय्यर के बयान का इस्तेमाल करते हुए मोदी ने महज़ दस लाइनों में चार बार गुमराह किया.

#1. श्रीमान मणिशंकर अय्यर ने कहा कि मोदी तो नीची जाति का है, मोदी तो नीच है.

नरेंद्र मोदी को ‘नीच’ कहने के बाद अय्यर ने सफाई दी, ‘मैं हिंदीभाषी नहीं हूं. मैंने अंग्रेज़ी के ‘Low’ शब्द का अनुवाद करके ‘नीच’ कहा था. मेरा मतलब लो बॉर्न यानी नीची जाति से नहीं था. यदि नीच शब्द का अर्थ लो बॉर्न है, तो मैं माफी चाहूंगा.’

अय्यर इससे पहले भी कई भद्दे बयान दे चुके हैं. 2014 में वो नरेंद्र मोदी चाय बेचने की जगह दिलाना चाहते थे. उससे पहले उन्होंने मोदी को सांप, बिच्छू और जोकर भी कहा था. वो अपनी ही पार्टी के खिलाफ भी मोर्चा खोल चुके हैं. लेकिन अय्यर के अतीत में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते, जहां उन्होंने जाति के आधार पर किसी नेता को निशाना बनाया हो. वो जिस पार्टी से सस्पेंड किए गए हैं, वो ‘निचली जातियों’ के आरक्षण के हक में बात करती दिखती है.

नरेंद्र मोदी और मणि शंकर अय्यर (पुराने दिन)
नरेंद्र मोदी और मणि शंकर अय्यर (पुराने दिन)

जिस तरह नरेंद्र मोदी ने ‘नीच’ का मतलब ‘नीची जाति’ निकाला, उसी तरह बीजेपी का कोई मुस्लिम नेता भी इसकी अपने हिसाब से व्याख्या कर सकता है. आप भी अपने हिसाब से व्याख्या कर सकते हैं. पर क्या अय्यर की वो बात नहीं सुनी जाएगी, जो उन्होंने माफी मांगते हुए कही.

#2. भाइयों बहनों, क्या ये गुजरात का अपमान है या नहीं? ये भारत की महान परंपरा का अपमान है या नहीं?

नरेंद्र मोदी प्रतीकों की राजनीति समझते हैं. वो खुद पर की गई टिप्पणियों को जनता के सामने वृहद अर्थ में पेश करते हैं. वो अपने सम्मान को गुजरात, यूपी और बिहार के साथ सुविधानुसार तरीके से जोड़ते हैं. उन्हें ‘नीच’ कहा गया, जिसे उन्होंने ‘नीची जाति’ से जोड़ा. अपने कपड़ों पर भी बात की. अपनी नीतियों और व्यक्तित्व को किसी के सम्मान और गरिमा के साथ जोड़ना एक कुशल रणनीति है. याद कीजिए विदेश में किसी नेता को गीता गिफ्ट करते हुए मोदी ने कहा था, ‘मैं भारत में ये करता, तो विवाद हो जाता.’ वो अपने अपमान को भारत के अपमान के तौर पर स्थापित करते हैं.

बनारस में रोडशो के दौरान नरेंद्र मोदी
बनारस में रोडशो के दौरान नरेंद्र मोदी

#3. ये तो मुगलई मानसिकता है, जिसने हिंदुस्तान में ऊंच-नीच का कुसंस्कार भर दिया.

अंतत: नरेंद्र मोदी खुलकर सामने आते हैं. हिंदुत्व की प्रयोगशाला गुजरात में बोलते समय उनके भाषाई खजाने में ‘मुगलई’ ही नहीं, ‘औरंगजेब’, ‘बाबर’ और ‘मियां’ जैसे तमाम शब्द होते हैं, लेकिन सबका अर्थ एक ही होता है- मुसलमान. वो ‘मुगलई मानसिकता’ कहते हैं, उनका समर्थक ‘मुस्लिम मानसिकता’ समझता है. वो ‘औरंगजेब’ कहते हैं, उनका समर्थक ‘मुसलमान’ समझता है. वो ‘अहमद मियां पटेल’ कहते हैं, उनका समर्थक ‘मुस्लिम सीएम कैंडिडेट’ समझता है. भीड़ को समझने वाले मोदी चुनाव में बड़ी बारीकी से पोलराइजेशन को पुचकारते हैं.

अहमदाबाद में लगे अहमद पटेल के पोस्टर, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि ये कांग्रेस ने नहीं लगवाए
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इतिहास में झांकिए. भारत में ऊंच-नीच का कुसंस्कार मुगलों के आने से कहीं पहले से भरा हुआ है. भारत में हमला करने वाला पहला मुस्लिम शासक मोहम्मद बिन कासिम था, जिसने 715 AD में हमला किया था, लेकिन भारत को जाति व्यवस्था देने वाली ‘मनुस्मृति’ 1250 BC की है. भारत में मुगल शासन 1526 ई. में बाबर से शुरू हुआ, लेकिन ऊंच-नीच का कुसंस्कार तो कहीं पहले से था. ऊंच-नीच वाली जाति व्यवस्था के लिए सनातन धर्म की आलोचना, बाकी धर्मों के मुकाबले ज्यादा होती है.

भारत की जाति-व्यवस्था मुगलों से कहीं पहले मनु-स्मृति की देन है
भारत की जाति-व्यवस्था मुगलों से कहीं पहले मनु-स्मृति की देन है

#4. ये मुगलई मानसिकता, सल्तनती मानसिकता है.

मुगलई मानसिकता से मोदी का आशय स्पष्ट है, पर सल्तनती मानसिकता जैसा शब्द इस्तेमाल करते समय उनका शब्दकोश छोटा पड़ जाता है. वो ‘राजशाही’ शब्द भी इस्तेमाल कर सकते थे, पर ये उनके उद्देश्य में फिट नहीं बैठता. राजशाही या सल्तनती व्यवस्था में एक राजा के बाद उसका बेटा राजा बनता है. वंशवाद के मसले पर वो कांग्रेस को सल्तनती कह सकते हैं, पर इस व्यवस्था में हिंदू भारतीय राजा और मुगल शासकों में कोई अंतर नहीं था.

नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के संभावना को ‘औरंगजेब राज’ बताया. वो राजशाही-वंशवाद के खिलाफ बोल रहे थे, लेकिन ‘राजशाही’ शब्द में हिंदू राजा भी निहित हो जाते हैं. वहीं ‘औरंगजेब राज’ से संदेश निकलता है कि मेरा विरोधी मुस्लिम-परस्त है. इसके बाद उन्हें अपना पक्ष बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

राहुल गांधी
राहुल गांधी

नरेंद्र मोदी ने अपना प्रधानमंत्री चुनाव काफी हद तक गुजरात मॉडल के दम पर जीता था. कमाल की बात ये है कि आज खुद गुजरात के चुनाव में वो जाति और धर्म पर विमर्श कर रहे हैं. यूपी विधानसभा चुनाव के समय भी उन्होंने बड़ी चालाकी से PMO का लबादा उतार दिया था. 19 फरवरी को बहराइच में वो कब्रिस्तान के बदले श्मशान और फतेहपुर में रमजान के बदले दिवाली की बिजली मांगते नज़र आए.

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देश के पूर्व-उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की राज्यसभा से विदाई के मौके पर मोदी ने कहा था, ‘पिछले दस वर्षों में आपने संविधान संबंधित काम बखूबी निभाया. हो सकता है शायद कोई छटपटाहट रही होगी भीतर, लेकिन आज के बाद शायद वो संकट आपको नहीं रहेगा.’ मोदी किस छटपटाहट का ज़िक्र कर रहे थे, जगजाहिर है. किंतु ‘मुगल’ शब्द को इतनी हेय दृष्टि से देखने के पीछे कौन सी छटपटाहट है. मुगल भारतीय इतिहास के वो पन्ने हैं, जिन्हें फाड़कर अलग नहीं किया जा सकता. ये सिर्फ आपसी अविश्वास और संघर्ष को बढ़ावा देगा.

नरेंद्र मोदी को भी मणिशंकर अय्यर जितना बेनेफिट ऑफ डाउट मिलना चाहिए. उनके ‘मुगलई मानसिकता’ शब्द की व्याख्या उनके पक्ष में भी की जा चाहिए. पर उन्होंने मणिशंकर अय्यर की तरह कभी अपने कहे के लिए खेद नहीं जताया. अपने कहे के प्रति अगाध बेपरवाही उनकी ‘राजनीतिक चालाकी’ को खोदकर रख देती है.

नरेंद्र मोदी की प्रतीकों की राजनीति का एक उदाहरण
नरेंद्र मोदी की प्रतीकों की राजनीति का एक उदाहरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनाव प्रचार वाले नरेंद्र मोदी में एक मोटा फर्क है. चुनाव प्रचार में वो बारीकी से एक-आध ऐसा बयान दे जाते हैं, जो पूरे चुनाव के दौरान जनता के दिमाग में बना रहता है. याद कीजिए यूपी विधानसभा चुनाव, जहां मऊ में बीजेपी की गाड़ियों में चुनावी गाने नहीं, नरेंद्र मोदी का एक बयान लूप में बजा रहा था- ‘अगर रमज़ान में बिजली मिलती है, तो दीवाली में भी बिजली मिलनी चाहिए.


जब देश ‘नीची जाति’ की महत्वपूर्ण बहस में व्यस्त था, तभी मालदा के सैयादपुर गांव में अफराज़ुल के घर में मातम मन रहा था. जानिए अफराज़ुल की खबरों के बारे में:

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