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क्या अल्ताफ़ वाले मामले में परिवार पर दवाब बनाने की कोशिश की जा रही है?

राम – जिनके लिए सत्य और कर्तव्य से बड़ा कुछ था ही नहीं. राम – जिनके राज में प्रजा इतनी सुखी रही, कि नया शब्द ही बन गया – रामराज्य. ऐसी शासन व्यवस्था, जिसमें बड़े छोटे का कोई भेद नहीं था. अमीर गरीब का भेद नहीं था. राम को सब बराबर प्यारे. सब बराबर सुखी. और इस सुख का कारण था राम का न्यायप्रिय होना.

न्याय और कर्तव्य का महत्व बताती ये कहानी आम जनता तक तभी पहुंची जब गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस की रचना की. लेकिन जिस कासगंज को तुलसीदास की जन्मस्थली बताया जाता है, उसी कासगंज के पुलिस अधिकारियों ने लगता है इस कहानी से कोई सबक नहीं लिया है. वो भी तब, जबकि जिस सरकार के मातहत वो काम करते हैं, वो राम का नाम जपते थकती नहीं.

कासगंज की सदर कोतवाली में अल्ताफ की मौत का मामला इतने बल खा चुका है, कि उनका हिसाब रखना दूभर हो रहा है. एक लड़की के गायब होने से संबंधित मामले में अल्ताफ के खिलाफ पुलिस में शिकायत हुई थी. पुलिस पूछताछ के बहाने उसे 8 नवंबर को अपने साथ ले गई. 9 नवंबर को अल्ताफ की मौत हो गई. पुलिस ने कहा कि उसने कोतवाली के टॉयलेट में नल की टोंटी में अपने जैकेट की डोरी लपेटकर फांसी लगा ली. जबकि परिवार का कहना था कि अल्ताफ की हत्या हुई है.

अल्ताफ के पिता चांद मियां का एक बयान आया था, जिसमें उन्होंने कह दिया था कि उनके बेटे ने आत्महत्या ही की है. लेकिन अल्ताफ की मां का कहना था कि उनके पति ने दबाव में ऐसा कहा होगा. अब आगे की कहानी बताते हैं.

10 नवंबर की शाम को अल्ताफ के पिता द्वारा लिखा गया एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. इसमें चांद मियां लिखते हैं,
मेरे पुत्र अल्ताफ ने डिप्रेशन में आकर फांसी लगा ली.

उसे पुलिस वाले उपचार हेतु अस्पताल ले गए जहां पर इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई. मुझे पुलिस वालों से कोई शिकायत नहीं है. न मैं, न मेरा परिवार कोई कार्रवाई करना चाहता है. और न ही भविष्य में करूंगा.
इस खत के नीचे चांद मियां का अंगूठा लगा है. इसके साथ ये खबर भी आई कि अल्ताफ के परिवार से वादा किया गया है कि उन्हें 10 लाख की मदद दी जाएगी.

लेकिन जब देर शाम प्रेस ने अल्ताफ के पिता से जाकर खत के बारे में पूछा, तो उन्होंने कह दिया कि जहां-जहां पुलिस ने अंगूठा लगवाया, उन्होंने लगा दिया. उन्हें नहीं मालूम कि कागज़ पर लिखा क्या था. यहां हम रुककर एक सवाल पूछना चाहते हैं. –

अल्ताफ के पिता या कोई भी और शख्स पुलिस वालों को कुछ भी लिखकर दें, इससे इस मामले के तथ्यों और आगे होने वाली अदालती कार्रवाई पर क्या फर्क पड़ना चाहिए?

सही जवाब है – कुछ भी नहीं. अल्ताफ की मौत कैसे हुई, ये अभी जांच का विषय है. लेकिन ये तथ्य है कि मरते वक्त वह पुलिस कस्टडी में था. अगर अल्ताफ ने वाकई आत्महत्या की है, उस सूरत में भी कोतवाले पर तैनात पुलिस कर्मियों की ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा न होता, टोंटी वाली कहानी बता रहे कप्तान पांच पुलिस कर्मियों को सस्पेंड क्यों किया?

कप्तान ने कहा था कि अल्ताफ ने जैकेट की डोरी से फांसी लगा ली. अगर इस बात को सच मान लिया जाए, तो जब ये हो रहा था, तब कोतवाली का स्टाफ क्या कर रहा था? उन्होंने क्यों जल्द मालूम नहीं किया कि अल्ताफ इतनी देर से अंदर कर क्या रहा है. क्या ये लापरवाही आपराधिक नहीं थी?

पुराने ज़माने में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में ब्लड मनी का चलन था. जिसमें परिवार को ये विकल्प दिया जाता था कि पैसे लेकर वो कत्ल के मुजरिम को माफ कर दे. लेकिन भारत इन कबीलाइ परंपराओं पर नहीं चलता है. अल्ताफ के पिता किसी कागज़ पर कुछ भी लिख दें, कानून इस घटना को देखने का तरीका नहीं बदल सकता. क्योंकि अल्ताफ के पिता पीड़ित पक्ष हैं, न कि घटना के गवाह. उन्होंने खुद कहा था कि जब वो अपने बेटे की जानकारी लेने के लिए नदरई चौकी गए, तो उन्हें वहां से फटाकर कर भगा दिया गया था –

कासगंज कोतवाली का स्टाफ तो ये बात जानता ही होगा. फिर उन्होंने चांद मियां से ये खत लिखवाया क्यों? और अगर चांद मियां ने ये खत अपने से लिखकर दिया, तो फिर पुलिस ने इसे लिया क्यों? क्या ये इस मामले में ”दबाव” कम करने की कोशिश है?

दूसरी तरफ जिस लड़की के खोने के संबंध में अल्ताफ को उसके घर से उठाया गया था, वो अभी तक नहीं मिली है. कासगंज पुलिस अधीक्षक प्रमोद बोत्रे के मुताबिक अल्ताफ ने पुलिस को बताया था कि वो लड़की को जानता था. वो दोनों रिलेशनशिप में थे. लेकिन फिर अलग हो गए. एसपी ये भी कह रहे हैं कि इस बात को साबित करने के लिए पुलिस के पास सबूत हैं. सूत्रों का दावा है कि अल्ताफ और लड़की एक वीडियो में साथ नज़र भी आते हैं.

इन सारी बातों के जवाब में अल्ताफ के परिवार का कहना है कि अल्ताफ लड़की को जानता तो था, लेकिन उसकी गुमशुदगी में अल्ताफ की कोई भूमिका नहीं है.

अब आते हैं इस मामले पर हो रहे राजनैतिक आरोप प्रत्यारोप पर. आज अल्ताफ के परिवार से मिलने कांग्रेस का प्रतिनिधि मंडल पहुंचा. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा कि कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल द्वारा उन्हें जब जानकारी मिलेगी, तब वो मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देंगी. उधर AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इस बात को मुद्दा बना लिया है कि लखीमपुर की तरह कासगंज जाने के लिए नेताओं ने लाइन नहीं लगाई. उन्होंने आज आरोप लगाया कि जहां मुसलमानों की हत्या होती है, वहां अखिलेश और प्रियंका नहीं जाते.

आज इस मामले पर योगी सरकार की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई. योगी कैबिनेट में मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा है कि इस मामले में एक प्रक्रिया के तहत कार्यवाही हो रही है. और मृतक के पिता ने तो कह भी दिया है कि वो संतुष्ट हैं. लेकिन विपक्ष तुष्टीकरण की राजनीति कर रहा है.

इस तरह के आरोप प्रत्यारोप चलते रहेंगे. लेकिन ये सब मिलकर इस तथ्य को नहीं बदल पाएंगे कि एक शख्स की पुलिस थाने में मौत हो गई. और हम नहीं जानते कि कैसे? इसका गुनहगार कौन है. क्योंकि दिसंबर 2020 में आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर हमारे यहां तत्र ने कान ही नहीं दिया.

तब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर एफ नरीमन, जस्टिस के एम जोज़फ और जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने एक फैसले में सभी राज्यों और UT को आदेश दिया था कि ऐसी कोई भी एजेंसी, जो गिरफ्तारी और पूछताछ के अधिकार रखती है, मिसालन पुलिस, सीबीआई, एनआईए वगैरह, के दफ्तरों में सीसीटीवी लगवाया जाए. और इसकी रिकॉर्डिंग कम से कम एक साल तक सुरक्षित रखने का प्रबंध हो.

ये फैसला आए एक साल होने को है. क्या वाकई पूरे देश के थानों में सीसीटीवी लग गया? एक ऐसा सिस्टम जिसे लगवाने में मुश्किल से तीन दिन नहीं लगते उसे लगाने में थानों ने कितनी तत्परता दिखाई? और सबसे बड़ा सवाल ये, कि यूपी पुलिस के ही डीजीपी रहे प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधार पर जो सुझाव दिए, उनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिए वो कब तक धूल खाते रहेंगे. कितने वाई एस सचान, कितने मनीष गुप्ता और कितने अल्ताफ ऐसी संदिग्ध परिस्थितियों में दम तोड़ते रहेंगे, जो इस देश में सरकार और कानून के राज पर हमारा भरोसा डिगाता रहेगा? सोचिएगा.

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