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कहानी 1100 करोड़ रुपये के उस घोटाले की, जिसके लिए छह महीने में दो बार एक महिला को मां बना दिया

साल 2013. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बने डेढ़ साल हो चुके थे. 2013 का साल खत्म होने वाला ही था. दिन था 9 दिसंबर. उस दिन समाजवादी पार्टी की सरकार ने मजदूरों के बच्चों के पालन-पोषण के लिए एक योजना शुरू की. नाम रखा गया पालना गृह योजना. इसकी फंडिग केंद्र से हो रही थी. योजना का मकसद था कि जो महिलाएं मजदूरी कर अपने घर को चलाती हैं, उनके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में सरकार उनका जिम्मा उठाएगी और ऐसे बच्चों की देखभाल करेगी. इसके लिए एनजीओ का सहारा लिया गया. समाज कल्याण बोर्ड के दिशा निर्देशन में 280 एनजीओ को पूरे प्रदेश में पालना गृह बनाने का जिम्मा दिया गया. केंद्र सरकार की ओर से इस योजना के लिए 1100 करोड़ रुपये जारी किए गए.

लेकिन बच्चों का पैसा खा गए एनजीओ

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उत्तर प्रदेश में 3000 पालना गृह खोले गए थे.

समाज कल्याण बोर्ड ने योजना लागू करने के दौरान दावा किया कि 280 एनजीओ के सहारे प्रदेश के 74 जिलों में 3000 पालना गृह खोले गए हैं. इसके लिए पहली किश्त के तौर पर 68 करोड़ रुपये जारी कर दिए गए थे. उस वक्त श्रम मंत्री थे शाहिद मंजूर. एक दिन उनके पास शिकायत पहुंची कि प्रदेश में एक भी पालना गृह नहीं खुला है और पूरे पैसे को एनजीओ ने आपस में बांट लिया है. इसके बाद उन्होंने जांच के आदेश दिए. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में हरीश कुमार वर्मा नाम के एक शख्स ने पीआईएल दाखिल की. मामला जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस वीरेंद्र कुमार की बेंच के सामने पहुंचा. कोर्ट ने केस सीबीआई को सौंपते हुए कहा-

सरकार ने घोटाला होने की बात तो मानी है, लेकिन इसके लिए कौन अधिकारी दोषी है, सीधे तौर पर या किसी और तरीके से उनकी क्या भूमिका है, पैसे का जो दुरुपयोग हुआ है, उसकी रिकवरी के लिए क्या किया जा रहा है, इसे सरकार अब तक नहीं बता पाई है. ऐसे में सीबीआई ही जांच करेगी, जिससे पूरा मामला सामने आ सके. चूंकि इस मामले में भारत सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और दिल्ली स्थित कुछ गैर सरकारी संगठन भी शामिल हैं, इसलिए इस केस को सीबीआई को सौंपना ही बेहतर होगा, जो केस दर्ज करेगी, जांच करेगी और घोटाले में शामिल लोगों का पता लगाएगी.

इस आदेश के बाद सीबीआई ने 21 जून को केस दर्ज कर लिया. सीबीआई को इस मामले में विभाग से जुड़े 144 अधिकारियों और 280 एनजीओ से पूछताछ करनी है. इसके लिए जांच एजेंसी ने सभी को नोटिस जारी कर दी है.

सीबीआई को जो पता चला, वो चौंकाने वाला था

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(प्रतीकात्मक तस्वीर)

कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने मामले की जांच शुरू की. उसने सेंटर तलाशने शुरू किए तो मिले ही नहीं. कुछ एनजीओ ने सीबीआई को दस्तावेज मुहैया करवाए. पता चला कि एनजीओ ने तीन से छह महीने के बच्चों को पंजीरी और फल खिलाने के नाम पर सरकार से पैसे वसूल लिए हैं. इतना ही नहीं, पालना गृह में एक ही महिला के पांच बच्चे थे और उन पांचों बच्चों के जन्म में तीन से छह महीने का अंतर था. ये किसी भी सूरत में संभव नहीं है.

रजिस्टर में जो नाम थे, वो हकीकत में मिले ही नहीं

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0 से 6 साल तक के बच्चों के लिए थी योजना.

योजना के मुताबिक एक पालना गृह में 0 से 6 साल तक के अधिकतम 25 बच्चों को रखा जा सकता था. बच्चों के खाने-पीने से लेकर डॉक्टरी सुविधाएं, कपड़े और अन्य चीजों के लिए सरकारी सहायता मिली थी, जो एनजीओ के जरिए उनतक पहुंचती थी. पहले तो एनजीओ ने पंजीरी और फल खिलाने के नाम पर पैसे ले लिए. फिर बच्चों की डॉक्टरी जांच के नाम पर पैसे ऐंठ लिए. जिन डॉक्टरों को इसके लिए भुगतान किया गया, वो भी नकद में था. इसके अलावा जिन बच्चों को पालना गृह योजना में शामिल होना दिखाया गया, सीबीआई जब उनकी तलाश में पहुंची तो कोई भी श्रमिक नहीं मिला.

जिनको नहीं मिलना था लाभ, उन्हें भी दे दिया

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(मनरेगा के लाभार्थियों को भी दे दिया फायदा.)

योजना थी कि जो भी मजदूर केंद्र सरकार की किसी योजना या मनरेगा के तहत काम कर रहे हैं, उनके बच्चों को इस योजना का लाभ नहीं मिल सकता है. हुआ उल्टा. सीबीआई ने जब जांच शुरू की तो पता चला कि रजिस्टर में जिन बच्चों के पिता या माता के नाम दर्ज हैं, वो पहले से ही मनरेगा के तहत रजिस्टर्ड हैं. इसके अलावा योजना में बच्चों और उनकी मां के अलावा मजदूर पिता का भी नाम दर्ज करना होता है. अधिकतर पालना गृह में मजदूरों का रिकॉर्ड नहीं मिल पाया है.

बिना जांच के जारी किया जाता रहा पैसा

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बिना तहकीकात किए एनजीओ को अगली किश्त जारी की जाती रही.

दिसंबर 2013 में जब योजना लागू हुई तो पहली किश्त के तौर पर 68 करोड़ रुपये जारी किए गए. किसी अधिकारी ने ये भी देखने की जहमत नहीं उठाई कि कोई पालना गृह खुला है या नहीं, इसके बाद भी उन्होंने पैसे का भुगतान करना जारी रखा. बताया गया कि हर किश्त के बाद एनजीओ से 40 फीसदी पैसे लेकर उन्हें अधिकारियों को दे दिया गया.

खुलने थे 15000 पालना गृह, अगर खुल गए होते तो घोटाला और भी बड़ा होता

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प्रदेश में कुल 15000 पालना गृह खोले जाने की योजना थी.

इस योजना के तहत जो 3000 पालना गृह खोले गए थे, वो पहला चरण था. कुल मिलाकर 15000 पालना गृह खुलने थे. लेकिन इस योजना के तहत ये तय नहीं हुआ था कि किस जिले में कितने पालना गृह खोले जाएंगे और किस एनजीओ को कितने पालना गृह का जिम्मा दिया जाएगा. इसी वजह से जिस एनजीओ का जितना जुगाड़ था, उसने उतने पालना गृह खोल लिए. उदाहरण के तौर पर राजधानी लखनऊ के जिम्मे 213 पालना गृह आए, जबकि मीरजापुर में नौ ही खोले गए. कानपुर में 170, बाराबंकी में153, गाजियाबाद में 142, गोरखपुर में 119, गाजीपुर में 106 और रायबरेली-उन्नाव में 105-105 पालना गृह खोले गए. अभी कुल मिलाकर 3000 ही पालना गृह खुले थे और घोटाला पकड़ा गया. अगर सभी 15000 पालना गृह खुल गए होते, तो ये घोटाला पांच गुना बड़ा हुआ होता.


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