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10 मिनट के अंतर पर दो FIR दर्ज हुई और बीजेपी के बड़े-बड़े नेता फ़ंस गए

बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के भूमि विवाद पर अपना निर्णय सुनाया. और इस समय लखनऊ की CBI की विशेष अदालत में एक ख़ास मामले की सुनवाई हो रही है. ये मामला भी अयोध्या से जुड़ा हुआ है, लेकिन थोड़ा अलग है. ये है बाबरी मस्जिद विध्वंस केस. यानी 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद कारसेवकों द्वारा ढहाई गयी, तो इस विध्वंस में किन-किन लोगों की संलिप्तता थी. इसकी तफ़तीश और सुनवाई इस केस के तहत हो रही है. 

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई कर रही स्पेशल CBI कोर्ट को आदेश जारी किया था कि इस मामले की रोज़ाना सुनवाई की जाए. साथ ही यूपी सरकार को आदेश दिया था कि इस मामले की सुनवाई कर रहे जज को किसी हाल में सेवानिवृत्त या स्थानांतरित नहीं किया जाए. मई 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI अदालत से कहा कि 31 अगस्त के पहले तक इस मामले की सुनवाई करके फ़ैसला सुना दें. और आज यानी 5 जून को जब ये ख़बर लिखी जा रही है, तो लखनऊ की स्पेशल CBI अदालत में इस मामले के प्रमुख अभियुक्तों के बयान दर्ज होने शुरू हो गए हैं. 

लेकिन ये पूरा मामला क्या है? कब और कितने बजे से शुरू होता है? किन-किन लोगों को इस मामले में बारहा लपेटा जाता है? किस-किस समय पर ये मामला इतना धीमे हो जाता है कि ख़बरों से ग़ायब ही हो जाता है? और आख़िर में, क्या कारण होते हैं कि मामले की रफ़्तार इतनी धीमी हो जाती है?

विध्वंस और पहली FIR 

6 दिसम्बर 1992. इस दिन दोपहर 12.15 बजे एक कारसेवक बैरकेडिंग फ़ांदकर बाबरी मस्जिद के भीतर घुस जाता है. एक कारसेवक के पीछे-पीछे कई कारसेवक मस्जिद परिसर में घुस जाते हैं. क़ानूनी भाषा में इस मस्जिद परिसर को विवादित ढांचा कहा गया है. अगले एक से डेढ़ घंटे में पहली गुंबद गिरती है. और धीरे-धीरे कारसेवकों की भीड़ मस्जिद को गिरा डालती है. इसी दिन शाम 5 बजकर 15 मिनट. थाना रामजन्मभूमि में बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की पहली FIR दर्ज की जाती है. थानाध्यक्ष प्रियंवदा नाथ शुक्ला. FIR संख्या 197/92. अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ़. इस FIR में डकैती, धर्मस्थल को क्षति पहुंचाने और धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने समेत आठ धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया जाता है. 

 

बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया. इस विध्वंस के कुछ ही घंटों के भीतर दो FIR दर्ज हुई. और भारत का सबसे हाई-प्रोफ़ाइल मुक़दमा शुरू हुआ.
बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया. इस विध्वंस के कुछ ही घंटों के भीतर दो FIR दर्ज हुई. और भारत का सबसे हाई-प्रोफ़ाइल मुक़दमा शुरू हुआ.

इसके 10 मिनट बाद यानी 5:25 मिनट पर इसी थाने में एक दूसरी FIR दर्ज की जाती है. 8 लोगों के खिलाफ़. FIR संख्या 198/92. चौकी इंचार्ज गंगा प्रसाद तिवारी द्वारा. धार्मिक उन्माद भड़काने, अफ़वाह फैलाने, जानमाल की क्षति पहुंचाने, आपराधिक साज़िश रचने जैसी गम्भीर धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया. इस FIR में बड़े नाम शामिल थे. कौन-कौन से नाम? लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतांभरा. इनमें से अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया की मौत हो चुकी है. 

इन दो प्रमुख FIR के बाद 47 FIR अलग-अलग दिनों पर पत्रकारों की ओर से मस्जिद विध्वंस के दौरान ख़ुद पर हमले के मामले पर दर्ज करवाई गयीं.

मामले में CBI का आगमन

कुल 49 FIR दर्ज हो जाती हैं. 13 दिसम्बर 1992. केंद्र सरकार का आदेश आता है. कहा जाता है कि इस मामले की पहली FIR यानी 197/92 की CBI द्वारा जांच करवाई जाए. इस तारीख़ को CBI इस FIR 197/92 की बिना पर एक रेगुलर केस दर्ज करती है. कारसेवकों के खिलाफ़ जांच शुरू होती है. 

केस दर्ज किए जाने के कुछ ही दिनों के भीतर केस की कमान CBI को दे दी गयी. इसके बाद मामले में नयी सतरें और नये पेच सामने आने लगे.
केस दर्ज किए जाने के कुछ ही दिनों के भीतर केस की कमान CBI को दे दी गयी. इसके बाद मामले में नयी सतरें और नये पेच सामने आने लगे.

7-8 महीनों बाद. 25 अगस्त 1993 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस से जुड़े सभी मामलों की जांच का ज़िम्मा केंद्र सरकार ने CBI को दे दिया. यानी 197/92 की जांच तो CBI कर ही रही थी. इसके साथ ही 198/92 और बाक़ी मामलों के जांच की जिम्मेदारी भी CBI के पास चली गयी. 27 अगस्त 1993. इस मामले के दूसरे और हाईप्रोफ़ाइल FIR यानी 198/92 पर CBI ने केस दर्ज किया. साथ ही आगे आने वाले कुछ दिनों में पत्रकारों द्वारा दर्ज कराए गए 47 FIR पर भी मामला दर्ज किया गया. सारे मामलों की विवेचना शुरू हो गयी. लेकिन प्रमुख मामले शुरुआती दो FIR के ही रहे.

दो अलग-अलग अदालतों में सुनवाई 

यूपी के दो अलग-अलग जिलों में इन दो मामलों की सुनवाई शुरू हुई. ललितपुर, झांसी में CBI की अस्थायी कोर्ट बनाई गयी. यहां मामला 198/92 की सुनवाई शुरू हुई. लखनऊ की विशेष अदालत में मामला संख्या 197/92 की सुनवाई शुरू हुई. कुछ ही दिनों बाद ललितपुर वाला मामला उठाकर यूपी की रायबरेली कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया. CBI एक ही मामले में दो अलग-अलग जिलों में भागदौड़ करनी पड़ रही थी. लिहाज़ा सितम्बर 1993 में CBI ने अपील दायर की कि सभी मामलों को लखनऊ की विशेष CBI अदालत में ही सुना जाए. अपील सुन ली गयी. बीतते-बीतते 24 जनवरी 1994 को तमाम मामलों की पत्रावली भी लखनऊ कोर्ट पहुंच गयी. 

बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में सीबीआई ने बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा समेत कई नेताओं के खिलाफ केस दर्ज किया था, जिसकी सुनवाई लखनऊ सीबीआई कोर्ट में चल रही है.
बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में सीबीआई ने बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा समेत कई नेताओं के खिलाफ केस दर्ज किया था, जिसकी सुनवाई लखनऊ सीबीआई कोर्ट में चल रही है.

लेकिन इसके कुछ दिनों पहले इस मामले में एक निर्णायक मोड़ आया. 5 अक्टूबर 1993. CBI ने इस मामले में पहली चार्जशीट दायर की. इस चार्जशीट में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, बृजभूषण शरण सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, विहिप नेता अशोक सिंघल, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतांभरा, गिरिराज किशोर, शिवसैनिक पवन पांडेय, अयोध्या के तत्कालीन डीएम आरएस श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी राय का नाम था.

आडवाणी, जोशी और अशोक सिंघल : राम मंदिर आंदोलन को इस मोड़ तक लेकर आने में इन तीन नेताओं का प्रमुखता से लिया जाता रहा है.
आडवाणी, जोशी और अशोक सिंघल : राम मंदिर आंदोलन को इस मोड़ तक लेकर आने में इन तीन नेताओं का प्रमुखता से लिया जाता रहा है.

7 दिसंबर 1993. पहली चार्जशीट के आधार पर आरोपियों की पेशी लखनऊ अदालत में हुई. कोर्ट ने कहा कि सभी को निजी मुचलके पर ज़मानत दे दी जाए. सभी आरोपियों ने ज़मानत लेने से इंकार कर दिया. कोर्ट ने न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने का आदेश दे दिया. और अगली पेशी की तारीख़ मुक़र्रर हुई 20 दिसम्बर 1993. सुरक्षा कारणों का हवाला दिया गया. इस दिन तमाम आरोपियों की पेशी नहीं हो पाई. कोर्ट ने कहा कि बिना किसी शर्त के आरोपियों को ज़मानत दे दी जाए. 

CBI की दो साल की जांच के बाद अब तारीख़ आती है 11 जनवरी 1996. इस दिन CBI लखनऊ कोर्ट में एक सप्लीमेंटरी चार्जशीट दायर करती है. इस चार्जशीट में कुछ और नाम जोड़े जाते हैं. ये नाम हैं रामविलास वेदांती, धर्म दास, नृत्य गोपाल दास, महामण्डलेश्वर जगदीश मुनि महाराज, बैकुंठ लाल शर्मा, परमहंस रामचंद्र दास, विजया राजे सिंधिया और सतीश कुमार. इस चार्जशीट में CBI ये भी कहती है कि बाबरी मस्जिद पर जो हमला किया गया, उसकी भरपूर प्लानिंग की गयी थी. और ये एक बड़ी साज़िश का हिस्सा था. 

आरोप तय करने का खेल

साल 1997. लखनऊ कोर्ट के जज ने आदेश दिया कि इस मामले के अब तक के 48 आरोपियों के खिलाफ़ आरोप तय किए जाएं. इसके खिलाफ़ 48 में से कुल 33 आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष अदालत के आरोप तय करने के फ़ैसले को चुनौती दी. लगभग 4 सालों तक इस केस में कोई भी ख़ास बढ़त नहीं हो सकी. लेकिन 12 फ़रवरी 2001 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 198/92 के तहत सुनवाई के लिए जो आदेश जारी हुआ था, वो ग़लत था. हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि विशेष जज को 198/92 में सुनवाई करने का अधिकार नहीं है. ख़बरें बताती हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 198/92 के तहत चल रहे केस में आरोपियों के खिलाफ़ आपराधिक साज़िश का चार्ज हटाने का आदेश दिया. बातें हुईं कि ऐसा करने से CBI का केस कमज़ोर पड़ने लगा. 

कल्याण सिंह ने बाबरी गिरने से पहले कुछ और कहा था और बाबरी गिरने के बाद कुछ और कहने लगे थे.
कल्याण सिंह ने बाबरी गिरने से पहले कुछ और कहा था और बाबरी गिरने के बाद कुछ और कहने लगे थे. जब राजस्थान के राज्यपाल के पद से निवृत्त हुए, CBI ने फिर से घेरे में ले लिया.

4 मई 2001. यूपी में बसपा और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन की सरकार थी. राजनाथ सिंह के हाथों प्रदेश की बागडोर थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद यूपी सरकार ने 198/92 के तहत दर्ज किया गया 21 आरोपियों के खिलाफ़ मामला वापिस ले लिया. CBI ने तुरंत इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की. 20 मई 2001 को CBI की याचिका ख़ारिज कर दी गयी. 

ख़ारिज किए जाने के बाद CBI ने हाईकोर्ट में ही पुनर्विचार याचिका दायर की. इसी साल 16 जून को CBI ने यूपी सरकार को पत्र लिखा कि वो नए सिरे से सुनवाई करने के लिए अध्यादेश जारी करे. 

17 सितंबर 2002. यूपी सरकार ने कहा कि CBI पूरे प्रकरण की रायबरेली में सुनवाई करे. 21 मार्च 2003 को इस मामले की पत्रावली रायबरेली पहुंचती है. 29 मार्च को विशेष अदालत आदेश जारी करती है कि सभी आरोपी न्यायालय में हाज़िर हों. 

बाबरी मस्जिद विध्वंस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बारहा नाम आता है. कई मौक़ों पर कोर्ट के आदेशों ने मामले को अलग दिशा दी.
बाबरी मस्जिद विध्वंस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बारहा नाम आता है. कई मौक़ों पर कोर्ट के आदेशों ने मामले को अलग दिशा दी.

19 सितंबर 2003. CBI विशेष अदालत में तैनात विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट विमल कुमार सिंह ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को सभी आरोपों से बरी कर दिया. इसे देखते हुए 10 अक्टूबर 2003 को भाजपा नेता मुरलीमनोहर जोशी ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि उन पर तय किए गए आरोपों पर पुनर्विचार किया जाए. 

लेकिन दो साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आडवाणी को मिली चैन की सांस छीन ली. 6 जुलाई 2005. हाईकोर्ट ने आदेश जारी किया. आडवाणी पर फिर से आरोप तय करने का आदेश जारी हुआ. 28 जुलाई 2005. विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट विनोद सिंह ने आडवाणी पर फिर से साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप तय कर दिया.

साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर के गयी CBI की पुनर्विचार याचिका भी ख़ारिज हो गयी. आडवाणी और अन्य लोगों के खिलाफ़ आपराधिक साज़िश के आरोप रद्द ही रहे. साल 2010 तक रायबरेली और लखनऊ, दो अलग-अलग अदालतों में मुक़दमों की सुनवाई हो रही थी. रायबरेली में 198/92 का मुक़दमा तो लखनऊ में 197/92 का मुक़दमा. 2010 में ही CBI ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. याचिका दायर की. और अगले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में कई याचिकाएं दायर होती रहीं. इस वजह से केस की रफ़्तार धीमी पड़ती रही. 

सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में लम्बे समय से चल रहा गतिरोध ख़त्म किया. 2017 में आदेश और सबकुछ फ़ास्टट्रैक पर.
सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में लम्बे समय से चल रहा गतिरोध ख़त्म किया. 2017 में आदेश और सबकुछ फ़ास्टट्रैक पर.

आख़िरकार 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया. आडवाणी और बाक़ी लोगों को आपराधिक साज़िश के आरोप के अधीन लाया गया. और CBI कोर्ट को ये आदेश जारी किया गया कि वो अगले 2 साल में इस मामले की सुनवाई पूरी कर ले. 2 साल की मियाद पूरी हो गयी. फिर 19 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई और फ़ैसले की मियाद को 9 महीने के लिए बढ़ा दिया. कहा कि अग़ले 6 महीने में सभी गवाहों और आरोपियों के बयान दर्ज कर लें. और उसके बाद फ़ैसला. 

इस केस के मुख्य आरोपी और विध्वंस के समय यूपी के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह से भी लम्बे समय तक पूछताछ नहीं हो सकी थी. 4 सितम्बर 2014 को कल्याण सिंह ने राजस्थान के राज्यपाल पद की शपथ ले ली थी. इस शपथ के बाद उन्हें भारतीय संविधान के तहत इम्यूनिटी मिली. राज्यपाल से पूछताछ या गिरफ़्तारी नहीं की जा सकती थी. लेकिन सितम्बर 2019 में राज्यपाल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद कल्याण सिंह पर फिर से CBI का शिकंजा कसा. और अब सुनवाई और आरोपियों की लिस्ट में फिर से आ गए हैं. और अब जो है, वो सब आपके सामने है. 

गवाहों की लम्बी फ़ेहरिस्त

मीडिया में प्रकाशित ख़बरों की मानें तो अब तक इस मामले में कुल 348 गवाह कोर्ट आ चुके है. गवाहों को खोजने, उन्हें जुटाने और कोर्ट तक लाने में CBI ने लम्बी मशक़्क़त की है. कहा तो ये भी जा रहा है कि अब तो बहुत सारे गवाहों की मृत्यु हो चुकी है, और कुछ भारत के बाहर रहते हैं. इसके साथ ही इस मामले की मीडिया रिपोर्टिंग इस मामले में आरोपियों की संलिप्तता का बहुत बड़ा सबूत है. न्यूज़ रिपोर्ट्स के 100 से ज़्यादा वीडियो कैसेट हैं. कई फ़ोटोग्राफ़ हैं. कई छपी ख़बरें हैं. कोर्ट में बारी-बारी इन सभी चीज़ों को सामने लाया जाता है. और आरोपों से मिलान करने की कोशिश की जाती है.

4 जून 2020 से फिर से आरोपियों की पेशी कोर्ट में शुरू हुई है. पहले दिन रामविलास वेदांती और पवन पांडेय की पेशी हुई. आगे आने वाले 2-4 दिनों के भीतर अन्य आरोपियों की भी पेशी होगी. लेकिन CBI कोर्ट के सामने चुनौती है. 31 अगस्त 2020 के पहले फ़ैसला सुनाने की. 


वीडियो : बाबरी मस्जिद विध्वंस केस: बीजेपी के जिन बड़े नेताओं के खिलाफ सीबीआई ने जांच की थी, उसका क्या हुआ?

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