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अक्षय की ‘एयरलिफ़्ट’ में झूठ दिखाया था, गिनीज़ रिकॉर्ड वाली असली और कमाल स्टोरी तो ये थी

आज 16 सितम्बर है और आज की तारीख का संबंध है भारत के अब तक के सबसे बड़े एयर रेस्क्यू ऑपरेशन से. ये रेस्क्यू ऑपरेशन गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ हुआ लेकिन ये एक एपिक स्टोरी का छोटा सा सब प्लॉट ही है. तो चलिए इस बचाव अभियान के बहाने मेन प्लॉट यानी इराक़-कुवैत युद्ध की दास्तां भी जान लेते हैं.

# बैकग्राउंड

1980 के दशक की बात है. ईरान से लंबे वक्त तक चले युद्ध के बाद इराक कर्ज़ में बुरी तरह डूबा हुआ था. उस पर सबसे ज्यादा कर्ज़ था सऊदी अरब और कुवैत का. इराक़ दोनों मुल्कों पर क़र्ज़ माफ़ी का दबाव बना रहा था. यहां से शुरू हुआ इराक-कुवैत विवाद. इस विवाद में कुवैती क्षेत्र पर इराकी दावे भी शामिल थे. इराक ने कुवैत पर तेल कीमतों में मंदी लाने का आरोप भी लगाया जो कि सही भी था. क्यूंकि यूएई और कुवैत के तेल के ओवर प्रोडक्शन के चलते तेल के दाम 18 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 10 डॉलर प्रति बैरल हो गए थे. इसकी वजह से इराक़ को एक ही साल में 7 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था. इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने इसे इराक़ के खिलाफ़ कुवैत का आर्थिक युद्ध करार दे दिया. सद्दाम का मानना था कि गल्फ में इराक विरोधी साजिश डेवलप हो रही है. क्योंकि कुवैत ने ईरान के साथ बातचीत शुरू कर दी थी, और इराक का एक दूसरा प्रतिद्वंद्वी देश सीरिया, इजिप्ट के टूर कर रहा था.

सद्दाम हुसैन (AFP)
सद्दाम हुसैन (AFP)

जुलाई 1990 में सद्दाम की सरकार ने अरब लीग के सामने अपनी संयुक्त आपत्तियां रखीं, कहा कि कुवैत अभी भी रुमैला तेल क्षेत्र का उपयोग कर रहा है, जिससे हर साल इराक़ को करोड़ों डॉलर का घाटा हो रहा है. इराक ने ये भी कहा कि ऐसे में जो पैसा संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत की तरफ़ से दिया गया है, उसे क़र्ज़ नहीं कहा जा सकता.

# इराक़ का कुवैत पर हमला

अरब लीग की वार्ता में ये तय हुआ कि रुमैला ऑयल फील्ड में इराक़ का 10 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. इतने की ही इराक़ की मांग थी. बदले में कुवैत ने 500 मिलियन देने की पेशकश की. इराक ने ये पेशकश ठुकरा दी और सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला कर दिया. 2 अगस्त, 1990 को कुवैत सिटी में इराक़ की तरफ से बमबारी शुरू कर दी गयी. उस वक्त इराक़ के पास दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आर्मी थी. युद्ध के बाद ज्यादातर कुवैती सेना या तो इराकी रिपब्लिकन गार्ड द्वारा खत्म कर दी गई थी, या सऊदी अरब भाग गई.

# भारत का रेस्क्यू मिशन

इस पूरे युद्ध के दौरान भारत ने आधिकारिक रूप से इराकी हमले की निंदा नहीं की. तो क्या भारत इराक़ के कुछेक मित्रों में से एक था? नहीं. तब के इंडियन एंबेसडर के.पी. फाबिया ने बताया था कि भारत ने दो कारणों से इस हमले की निंदा नहीं की. पहला, हमें इंडियन्स की जान की फिक्र थी. दूसरा, उन्हें सुरक्षित निकालने का सॉल्यूशन ढूंढना था.

हमारी स्टोरी के चार मुख्य देश (स्क्रीनग्रैब: गूगल मैप्स)
हमारी स्टोरी के चार मुख्य देश (स्क्रीनग्रैब: गूगल मैप्स)

कुवैत के इराक़ के आगे घुटने टेकने के चलते करीब एक लाख सत्तर हजार भारतीय कुवैत में बुरी हालत में फंस गए थे. भारतीयों को सुरक्षित निकालने के लिए तब के विदेश मंत्री आई. के. गुजराल इराक में सद्दाम हुसैन से मिलने पहुंचे. सद्दाम ने भारतीयों के रेस्क्यू ऑपरेशन करने की इजाजत दे दी.

# रेस्क्यू में दिक़्क़तें

कुवैत से इंडियन्स को निकालना आसान नहीं था. लोग अपनी जिंदगीभर की कमाई छोड़कर भारत नहीं जाना चाहते थे. वे उस समय वहां की खतरनाक स्थितियों को नजरअंदाज करके उसी हालत में रहना चाहते थे. 10,000 के आसपास भारतीय तो रेस्क्यू के बाद भी नहीं आये. कुवैत से रेस्क्यू ऑपरेशन को खतरा था इसलिए भारतीयों को जॉर्डन के अमान एयरपोर्ट आने को कहा गया. कुवैत के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग कई दिनों तक अमान के स्कूलों और बिल्डिंग्स में रुके रहे.

‘दी बेटर इंडिया’ को के. पी. फेबियन बताते हैं-

इस बीच एक और समस्या चल रही थी. एयर इंडिया का एक चालक दल कुवैत में फंसा हुआ था. एयर इंडिया के पायलटों और कर्मचारियों ने धमकी दी कि जब तक हम उस चालक दल को बाहर नहीं निकालेंगे, वे बाकी उड़ानें रोक देंगे. खतरा वाकई गंभीर था. तब यह निर्णय लिया गया कि विदेश मंत्री बगदाद और कुवैत जाएं और हमारे नागरिकों के लाने की व्यवस्था करें.

भारत के अलावा अन्य देश ने नागरिकों को भी उनके देश के द्वारा रेस्क्यू किया ज़ा रहा था (AFP)
भारत के अलावा अन्य देश भी अपने नागरिकों को रेस्क्यू कर रहे थे. (AFP)

कुवैत में एक पाकिस्तानी एयरलाइन का क्रू भी फंसा था. जो चाहता था कि भारतीय विमानों से उन्हें भी कुवैत से बाहर निकाल लिया जाए. ऐसे में मानवीय आधार पर, भारतीय अधिकारी सहमत हुए और उन्हें भी भारतीय विमानों में जगह मिल गयी. 14 अगस्त, 1990 को शुरू हुआ ये रेस्क्यू ऑपरेशन लगभग 2 महीने तक जारी रहा, और 11 अक्टूबर को ऐतिहासिक सफलता के साथ ख़त्म हुआ.

# आज की तारीख़

15 सितम्बर 1990 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को 18 देशों ने अलग अलग लेटर्स लिखे. ये देश थे- फ्रांस, इटली, कनाडा, डेनमार्क, जर्मनी, बेल्जियम, फ़िनलैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, स्पेन, नीदरलैंड्स, ग्रीस, आयरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, पुर्तगाल, ऑस्ट्रेलिया और लग्ज़मबर्ग.

सभी देशों ने सुरक्षा परिषद् से इराक और कुवैत के हालात पर एक आपात बैठक की मांग की. इसके बाद 16 सितम्बर, 1990 को यानी आज की ही तारीख में सुरक्षा परिषद् की 2940वीं बैठक हुई. मीटिंग में सुरक्षा परिषद् ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इराक ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया है. ऐसे में किसी भी देश के नागरिक और डिप्लोमेट्स को कुवैत से बाहर निकालने के ऑपरेशन में इराक सरकार कोई दखल नहीं देगी, न ही कोई अड़चन पैदा करेगी. इससे भारत के रेस्क्यू ऑपरेशन में तेज़ी आनी शुरू हो गई.

#‘रंजीत कत्याल’ है काल्पनिक पात्र

अक्षय कुमार अभिनीत ‘एयरलिफ्ट’ में कहानी भले ही कुवैत के इस ऑपरेशन पर रखी गयी हो लेकिन अक्षय कुमार ने जिस रंजीत कत्याल नाम के शख्स का किरदार निभाया, वो पूरी तरह काल्पनिक है. फिल्म में इस रेस्क्यू में रंजीत की बड़ी भूमिका बताई गई है.

अक्षय कुमार अभिनीत एयरलिफ़्ट मूवी का एक सीन
अक्षय कुमार अभिनीत एयरलिफ़्ट मूवी का एक सीन

एयरलिफ्ट की रिलीज़ के बाद रंजीत कात्याल नाम के किरदार की हकीकत पर भारतीय और विदेशी न्यूज़ मीडिया में भी इस बात को लेकर खूब बहस हुई कि क्या ऐसा कोई शख्स कुवैत में था भी, या नहीं.

तमाम पत्रकारों ने रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़े वायुसेना के अधिकारियों से लेकर उस वक़्त कुवैत में रह रहे भारतीय नागरिकों तक से बात की. सबने एक ही बात कही कि उनकी जानकारी में रंजीत नाम का ऐसा कोई आदमी नहीं था जिसने रेस्क्यू में मदद की हो. हालांकि एक इंटरव्यू में अक्षय ने रंजीत के कैरेक्टर को हकीकत बताया था. फिल्म से जुड़े लोगों ने यहां तक दावा किया कि तत्कालीन विदेश मंत्री आईके गुजराल और इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की मुलाकात व्यवसायी रंजीत कात्याल ने ही कराई थी. दैनिक भास्कर की एक ख़बर के मुताबिक़-

फेबियान ऐसे किसी भी व्यक्ति की मौजूदगी से इनकार करते हैं. फेबियान तत्कालीन विदेश मंत्री गुजराल के साथ कुवैत पहुंचे थे. विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव आईपी खोसला भी फेबियान की बात का समर्थन करते हैं. लंबे समय से एयर इंडिया से जुडे रहे जीतेंद्र भार्गव भी ऐसे किसी व्यक्ति की मौजूदगी से इनकार करते हैं.

एयर इंडिया के खाते में बहुत से एयरलिफ़्ट हैं (AFP)
एयर इंडिया के खाते में बहुत से एयरलिफ़्ट हैं (AFP)

35 साल कुवैत में रहे पत्रकार जावेद अहमद ने हिन्दी अखबार अमर उजाला को बताया-

(रंजीत नाम का) ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसने बड़े पैमाने पर लोगों की मदद की. ये फिल्म झूठ पर आधारित है. उसका हकीकत से कोई संबंध नहीं है. फिल्म में दसमान पैलेस की बात की गई, लेकिन दसमान पैलेस में उस वक्त कुछ नहीं था. कुवैत के अमीर वहां से चले गए थे. शायद ही कोई बचा हो. मैं उस वक्त वहां मौजूद था. सारा दिन वहां सड़कों पर घूमता था.

# गिनीज़ वर्ड रिकॉर्ड

एयर इंडिया के पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर जीतेन्द्र भार्गव ने गिनीज बुक के संपादक को एक लेटर पोस्ट किया (तब दुनिया को ई-मेल के बारे में नहीं पता था). उन्होंने पूछा कि किसी सिविल एयरलाइनर द्वारा रेस्क्यू का कोई रिकॉर्ड मौजूद है या नहीं. भार्गव बताते हैं-

पंद्रह दिन बाद, गिनीज के संपादक ने जवाब दिया कि उनकी किताबों में इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. इस बीच एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइंस और भारतीय वायुसेना के विमानों से रेस्क्यू ऑपरेशन तेज़ी से जारी रहा. रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के बाद गिनीज को एक डिटेल्ड लेटर भेजा गया जिसमें यात्रियों की कुल संख्या, संचालित उड़ानें, पूरे ऑपरेशन का टाइम आदि सब कुछ था. गिनीज ने रिकॉर्ड स्वीकार कर लिया और एक लेटर भेजकर विधिवत सूचित किया.

कुछ महीनों के बाद ही गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के नए एडिशन में इस रिकॉर्ड को एयर इंडिया की उपलब्धियों के साथ विधिवत सूचीबद्ध किया गया.

# रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद क्या हुआ?

इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन के हमले के जवाब में अमेरिका समेत 38 देश उसके खिलाफ हो गए. अमेरिका ने 16 जनवरी, 1991 को इराक के खिलाफ ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ की शुरुआत की. इस जंग को गल्फ वॉर के नाम से जाना जाता है. 200 से ज्यादा दिनों तक कुवैत पर कब्जे के बाद 26 फरवरी, 1991 को इराकी फौज को देश छोड़ना पड़ा. जब इराक ने संयुक्त राष्ट्र के सभी 12 प्रस्तावों को मान लिया तो दो दिन बाद राष्ट्रपति बुश ने युद्धविराम की घोषणा कर दी. युद्धविराम की दो शर्ते थीं. पहली ये कि लड़ाई में पकड़े गए अमरीका और सभी सहयोगी देशों के सैनिकों को वापस कर दिया जाए. दूसरा कि इराक के कुवैत पर सभी दावे खत्म हों.

खाड़ी युद्ध में अमेरिकी सेना (AFP)
खाड़ी युद्ध में अमेरिकी सेना (AFP)

युद्ध जैसी त्रासदियां रचते हैं, उनमें ज़िंदगी का मोल बहुत कम हो जाता है. भारत से जो लोग कुवैत गए थे, उनमें से सभी साधन संपन्न नहीं थे. कई लोग छोटे-मोटे काम करते थे. जब वो घिर गए, तो उन्हें मदद की ज़रूरत थी. और वो देकर सरकार ने उस विचार की लाज रखी, जिसे हम भारत कहते हैं, भारत मानते हैं. एक देश, जिससे आप कितने भी दूर चले जाएं, वो आपसे दूर नहीं जाएगा. और उसमें आपके लिए हमेशा जगह रहेगी. वो आपको सात समंदर पार से भी घर ले आएगा. चाहे चारों तरफ कोई युद्ध ही चल रहा हो.

अंत में यहूदियों र्की एक धार्मिक पुस्तक का कोट इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन पर सटीक बैठता है-

यदि कोई एक जीवन बचाता है तो वो पूरी मानवता बचाता है.

और यहां तो, डेढ़ लाख से ज़्यादा जीवन बचा लिए गए थे.


पिछला तारीख़ देखें: स्वतंत्र भारत का पहला बैटलशिप, जिसने समंदर में भारत का परचम लहराया-

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