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येदियुरप्पा के बाद क्या इनमें से कोई बनेगा कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री?

ये विरले ही होता है कि मोदी-शाह की भाजपा बीच कार्यकाल में अपने किसी मुख्यमंत्री से इस्तीफा ले. 7 सालों में सामने आए उदाहरणों को भी आप उंगलियों पर गिन सकते हैं. फिर ऐसा क्या हुआ कि कर्नाटक में भारी जनाधार वाले बीएस येदियुरप्पा को जाना पड़ा. अपने इस्तीफे की घोषणा के वक्त वो भावुक भी हो गए थे.

भाजपा के लिए दक्षिण का द्वार है कर्नाटक. वहां उठाए किसी भी कदम का असर सूबे तक महदूद नहीं रहेगा. वो आंध्र और तेलंगाना में भी पार्टी के भविष्य पर असर डालेगा. तो आज यही समझेंगे कि येदियुरप्पा का इस्तीफा किन परिस्थितियों में हुआ और अब भाजपा कर्नाटक का सिरमौर किसे बना सकती है.

अटल-आडवाणी वाली बीजेपी और मोदी-शाह के दौर की बीजेपी में कई अंतर गिनाए जाते हैं. एक फर्क ये भी बताया जाता है कि मोदी-शाह के दौर में बीच कार्यकाल में मुख्यमंत्री नहीं बदले जाते जैसे अटल-आडवाणी के दौर में बदले जाते थे. कई उदाहरण हैं उस दौर के. 1995 में गुजरात में सरकार बनने के बाद बीजेपी ने केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाया था. लेकिन फिर लगभग सात महीने बाद ही गुजरात में मुख्यमंत्री बदला गया. सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया. केशुभाई पटेल 1998 में फिर मुख्यमंत्री बने लेकिन नरेंद्र मोदी ने 2001 में उनको रिप्लेस कर दिया.

गुजरात की तरह ही उस दौर में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में भी कई नेता आजमाए. 1997 में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. 2 साल बाद उनको हटाकर राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया. फिर उन्हें हटाकर राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया. तो उस दौर में बीजेपी दो चुनावों के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कई नेताओं को आजमाती थी. लेकिन 2014 के बाद वाले दौर में हमें ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं.

हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर ने कार्यकाल पूरा किया, उनको रिपीट भी किया. यूपी में योगी का कार्यकाल लगभग पूरा होने को है. एमपी में जब सरकार लौटी, तो सीएम शिवराज सिंह ही रहे. यही भरोसा देवेंद्र फडणवीस पर भी दिखाया गया. इसी तरह हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर पर कोई खतरा नहीं आया. 7 साल में बस तीन अपवाद हमारे सामने आए उत्तराखंड, गोवा और गुजरात. इन तीन में भी गोआ का मामला सीएम बदलने से थोड़ा हटकर था. तो ये समझ बनती है कि ज्यादातर प्रदेशों में कार्यकाल के बीच में मुख्यमंत्रियों को बदलने का रिवाज मोदी-शाह के दौर में नहीं दिखता है.

लेकिन फिर मुख्यमंत्री बदलने वाली खबर आती है कर्नाटक से. कर्नाटक में बीजेपी की राजनीति के लिए कहा जाता है कि येदियुरप्पा बिना बीजेपी नहीं और बीजेपी बिना येदियुरप्पा नहीं. कर्नाटक में मुख्यमंत्रियों वाली लिस्ट देखेंगे तो आज़ादी के बाद से बीजेपी की एंट्री 2007 में होती है. और ये एंट्री बीएस येदियुरप्पा के नाम के साथ होती है. येदियुरप्पा के दम पर ही बीजेपी को कर्नाटक में पहली बार सत्ता सुख में मिला. और पहली बार ही क्या, हर बार येदियुरप्पा ने ही बीजेपी की कर्नाटक में सरकार बनवाई.

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इस्तीफे की घोषणा करते हुए रोने लगे बीएस येदियुरप्पा. (तस्वीर- पीटीआई)

2011 में लाल कृष्ण आडवाणी ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री से हटवाया था. नाराज़ येदियुरप्पा ने बीजेपी छोड़कर कर्नाटक जनता पक्ष नाम से अलग ही पार्टी बना ली. लेकिन फिर 2013 में चुनाव हुए तो बीजेपी सत्ता में आ नहीं पाई. आखिरकार बीजेपी और येदियुरप्पा को साथ आना ही पड़ा है. और फिर मई 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा की अगुवाई में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बना ली. लेकिन जोड़तोड़ वाला गणित लगा. और सालभर के भीतर कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार बनवा दी गई. और 2019 में येदियुरप्पा पांचवीं बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए.

अब दो साल के बाद ही बीजेपी ने येदियुरप्पा से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली है. अटकलें कई दिन से लग रही थीं. इस्तीफा देंगे- नहीं देंगे, वाली बातें चल रही थी. आज फाइनली येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया. और बहुत भावुक अंदाज़ में दिया. बहुत कम ही मामलों में हमने देखा होगा कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते वक्त कोई नेता भावुक हो जाए. येदियुरप्पा के आंसुओं के टिप्पणीकार सियासी अर्थ लगा रहे हैं. कि उनकी भावुकता शायद उनके कोर वोटर्स को भी भावुक करे. येदियुरप्पा को भी पता है कि अगर उनके कोर वोटर्स पर उनकी पकड़ रहेगी तो बगैर मुख्यमंत्री भी कर्नाटक की राजनीति में उनकी पकड़ बनी रहेगी. उनकी पूछ होती रहेगी.

येदियुरप्पा कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं. उत्तर कर्नाटक के लिंगायत वोटर्स और कोस्ट एरिया में ही बीजेपी का मजबूत वोट बेस माना जाता है. तो लिंगायत वोट पिछले दो दशक से बीजेपी की जीत में अहम रहे हैं. और लिंगायत वोटर्स बीजेपी के पास आते हैं येदियुरप्पा के साथ. तो फिर बीजेपी ने येदियुरप्पा को हटाने का रिस्क क्यों लिया? इसकी चार बड़ी वजहों पर बात करते हैं.

पहला कारण- येदियुरप्पा के बेटे को लेकर नाराज़गी

बीएस येदियुरप्पा के दो बेटे और तीन बेटियां हैं. दोनों बेटे राजनीति में हैं. बी वाई राघवेंद्र कर्नाटक की शिमोगा सीट से सांसद हैं. और दूसरे बेटे बी वाई विजयेंद्र कर्नाटक में बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं. विजयेंद्र को ही येदियुरप्पा की कुर्सी जाने की बड़ी वजह माना जा रहा है. विजयेंद्र के सरकार में दखल से बीजेपी के कई नेता नाखुश थे. उनके विरोधी कहते हैं कि वो सीधे मंत्रियों और अधिकारियों को आदेश देते थे, मुख्यमंत्री कार्यालय खुद चलाने लगे थे.

कर्नाटक के पर्यटन मंत्री सीपी योगेश्वर समेत कई बीजेपी नेता खुलकर विजयेंद्र की भूमिका पर सवाल उठा रहे थे. और विजयेंद्र के खिलाफ बीजेपी के मंत्रियों-विधायकों की ये नाराजगी दो साल से चली आ रही है. पिछले साल भी कुछ बीजेपी नेताओं ने एक लेटर जारी किया था, जिसमें विजयेंद्र को प्रॉक्सी सीएम कहा था. तो विजयेंद्र के कामकाज की वजह से बीजेपी में येदियुरप्पा का विरोध बढ़ता गया और कर्नाटक बीजेपी के तीन धड़े बन गए.

एक धड़ा मुखर रूप से येदियुरप्पा को हटवाने की मांग कर रहा था. दूसरा गुट न्यूट्रल था. जो येदियुरप्पा के विरोध में तो नहीं था लेकिन उनका पक्ष भी नहीं ले रहा था. और तीसरे गुट में येदियुरप्पा के समर्थक हैं. इस तरह से कर्नाटक बीजेपी में आपसी कलह बढ़ रही थी. और इसके समाधान के तौर केंद्रीय नेतृत्व ने येदियुरप्पा की कुर्सी कुर्बान की.

दूसरा कारण- एज फैक्टर

बीजेपी ने ये परंपरा बना रखी है कि मुख्यमंत्री 75 साल से कम उम्र के ही होंगे. बीजेपी के ज्यादातर मुख्यमंत्री 60 के आसपास की उम्र के हैं. इस नियम में एक मात्र अपवाद येदियुरप्पा थे. उनकी उम्र अभी करीब 78 साल है. दो साल पहले जब वो मुख्यमंत्री बने तब भी 75 क्रॉस कर चुके थे. कर्नाटक बीजेपी में उनके विरोधियों ने भी उनकी उम्र पर सवाल उठाए. बासनगौड़ा पाटिल, अरविंद बेलाड जैसे बीजेपी विधायक सरकार की नाकामियों को उनकी उम्र से जोड़ रहे थे.

बीजेपी को दो साल बाद 2023 में विधानसभा चुनाव भी लड़ना है. बीजेपी के लिए अब 78 साल के लिए येदियुरप्पा कर्नाटक का भविष्य तो नहीं हो सकते. तो देर सबेर बीजेपी को येदियुरप्पा से आगे बढ़ना ही था. चुनाव तक इंतजार ना कर बीजेपी ने अभी ये कर लिया.

तीसरा कारण – पार्टी में बीएल संतोष का बढ़ता कद

बीएल संतोष अभी बीजेपी के संगठन मंत्री हैं. पार्टी के बड़े नेताओं के भरोसेमंद हैं. बीएल संतोष भी कर्नाटक से आते हैं. येदियुरप्पा और बीएल संतोष एक दूसरे के विरोधी रहे हैं. अमुमन ऐसा होता है कि राज्य का कोई नेता केंद्रीय नेतृत्व में ऊंचे पद पर पहुंचता है तो राज्य के पार्टी मामलों में उसका दखल बढ़ जाता है. हमें ऐसे कई राज्यों के उदाहरण मिलते हैं. गुजरात के नेता नरेंद्र मोदी जब 1999 में बीजेपी के संगठन महासचिव बने, तो 2 साल बाद गुजरात के मुख्यमंत्री बनकर लौटे. तो बीएल संतोष को भी येदियुरप्पा की पार्टी पर पकड़ कमज़ोर होने की वजह माना जा रहा है.

और चौथी वजह ये कि बीजेपी अब ये चाह रही होगी कि कर्नाटक के लिंगायत समुदाय में भी येदियुरप्पा पॉलिटिक्स के बजाय बीजेपी की पॉलिटिक्स मजबूत हो. यानी लिंगायत सिर्फ येदियुरप्पा के ना रहकर पूरी बीजेपी के हों. बीजेपी चाहती है कि बिना येदियुरप्पा भी वो लिंगायत वोटों को साध सकें. और इसके अलावा जो दूसरे समुदाय हैं बीजेपी उनको भी साध सके.

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कर्नाटक के सीएम बीएस येदियुरप्पा ने आखिरकार इस्तीफा दे दिया. येदियुरप्पा के खिलाफ उनकी ही पार्टी के कुछ विधायकों ने मोर्चा खोल रखा था.

अब ये समझते हैं कि सीएम पद से हटाने के बाद भी येदियुरप्पा को खुश रखना बीजेपी के लिए क्यों ज़रूरी है. कर्नाटक में सबसे बड़ा समुदाय है लिंगायत. लिंगायत आबादी करीब 17 फीसदी है. हालांकि लिंगायत समुदाय में भी लगभग 98 छोटे पंथ हैं. कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से करीब 122 में लिंगायत समुदाय के अच्छी तादाद में वोटर्स हैं. इनमें से लगभग आधी सीटें बीजेपी के पास हैं.

लिंगायत वोटों के बिना बीजेपी सरकार में नहीं आ सकती, ऐसा माना जाता है. और लिंगायत वोटों को बीजेपी में लाने वाले येदियुरप्पा हैं. कर्नाटक में लिंगायत वोटों को नाराज़ करना किसी भी पार्टी को कितना भारी पड़ सकता है, इसे समझने के लिए 1990 का उदाहरण दिया जाता है. 1990 में लिंगायत समुदाय से ही आने वाले कांग्रेस नेता वीरेंद्र पाटिल कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. उनके कार्यकाल में कांग्रेस में साप्रदायिक दंगे हुए.

राजीव गांधी दंगा प्रभावित इलाकों के दौरे पर गए. राजीव गांधी उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे. राजीव गांधी ने दौरे के बाद मीडिया से बातचीत में कह दिया कि मुख्यमंत्री हटाए जाएंगे. इस बयान की प्रतिक्रिया हुई. प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल ने भी कहा कि वो इस्तीफा नहीं देंगे. पाटील को तब लकवा मारा हुआ था. उनका चेहरा कुछ तिरछा हो गया था. और उस हालत में उन्होंने कहा कि वो अपने पद से नहीं हटेंगे. हालांकि बाद में उन्हें हटना पड़ा. लेकिन राजीव गांधी के इस फैसले से कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ.

लिंगायत समुदाय कांग्रेस के खिलाफ हो गया. और अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई. माना जाता है कि कांग्रेस के उस फैसले के बाद ही बीएस येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के नेता बनकर उभरे. 90 के दशक में येदियुरप्पा कर्नाटक के बीजेपी अध्यक्ष थे. बीजेपी लिंगायत समुदाय को नाराज नहीं करना चाहती. इसलिए येदियुरप्पा को 75 क्रॉस करने के बाद भी मुख्यमंत्री बनाया गया. और सालभर से भारी विरोध के बावजूद भी बीजेपी उन्हें हटाने का फैसला टालती रही. अब भी उन्हें 2 साल पूरे करने दिए गए. यानी इस्तीफे में भी थोड़ा सम्मान रखा गया. अमुमन हम देखते हैं कि बीजेपी के फैसले अचानक होते हैं. इस मामले में ऐसा नहीं है.

ये लोग हैं रेस में

अब बात आती है कि येदियुरप्पा के बाद बीजेपी कर्नाटक की कमान किसे देंगे. इसमें कई नाम सामने आ रहे हैं. नया मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय से हो सकता है. या कर्नाटक के दूसरे सबसे बड़े समुदाय वोक्कालिग्गा से हो सकता है. या फिर किसी अन्य समुदाय से हो सकते हैं. कुछ संभावित नामों पर चर्चा कर लेते हैं. एक नाम चल रहा है मुरुगेश निरानी का. मुरुगेश येदियुरप्पा सरकार में खनन मंत्री थे. ये लिंगायत समुदाय के पंचमशाली पंथ से आते हैं. पंचमशाली लिंगायत में सबसे बड़ा पंथ माना जाता है. ये बगलकोट ज़िले की बिल्गी सीट से विधायक हैं और कई फैक्ट्री भी चलाते हैं.

दूसरा नाम है अरविंद बेलाड. ये हुबली-धारवाड इलाके से आते हैं. दो बार के विधायक हैं. ये भी पंचमशालील लिंगायत हैं. इनके पिता चंद्रशेखर बेलाड भी आरएसएस बीजेपी के नेता रहे हैं. इनका नाम भी सीएम की लिस्ट में चल रहा है. तीसरा नाम है – बसवाराज बोमई. ये भी कर्नाटक सरकार में गृह मंत्री हैं. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस आर बोमई के बेटे हैं. लिंगायत समुदाय से ही आते हैं. खबरें हैं कि ये येदियुरप्पा की पसंद हैं. मुख्यमंत्री के लिए येदियुरप्पा ने इनका नाम आगे बढ़ाया है.

अगला नाम है सीएस अश्वथ नारायण – ये वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. अभी कर्नाटक के डिप्टी सीएम हैं. वोक्कालिगा समुदाय को साधने के लिए बीजेपी इनके नाम पर मुहर लगा सकती है. वोक्कालिगा समुदाय से ही एक और नाम चल रहा है सीटी रवि का. ये बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं अभी. ये चिकमंगलुरू से चार बार विधायक रह चुके हैं. बीजेपी के संगठन महासचिव बीएल संतोष के करीबी माने जाते हैं. येदियुरप्पा सरकार में भी रह चुके हैं.

सूत्रों के मुताबिक बीजेपी इस फॉर्मूले पर भी विचार कर रही है कि किसी बड़े समुदाय से मुख्यमंत्री ना बनाकर अन्य समुदाय से बनाएं. जैसे हरियाणा में बीजेपी ने ये प्रयोग आजमाया. प्रभावशाली जाट समुदाय से सीएम ना बनाकर मनोहर लाल खट्टर को बनाया जो पंजाबी खत्री हैं. इस फॉर्मूले से बीजेपी गैर लिंगायत और गैर वोक्कालिगा वोटों को साधना चाहती है. जैसे कांग्रेस ने सिद्धारमैया को कर्नाटक का सीएम बनाया. जो कर्नाटक में दलितों और पिछड़ों का चेहरा बनकर उभरे. अनुमान है कि बीजेपी भी कर्नाटक में ये फॉर्मूला अपना सकती है. इसलिए मुख्यमंत्री के फ्रंट रनर्स में दो और नाम आ रहे हैं.

एक नाम है- बीएल संतोष. बीजेपी में संगठन के महासचिव. कर्नाटक से आते हैं. आरएसएस से बीजेपी में आए नेता हैं. अभी कर्नाटक से बीजेपी के सबसे बड़े नेता कहे जा सकते हैं. ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. तो बीएस संतोष का नाम भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री के लिए चल रहा है. हालांकि येदियुरप्पा और बीएल संतोष की नहीं बनती है. ऐसे में बीएल संतोष को मुख्यमंत्री बनाने से येदियुरप्पा बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं. प्रहलाद जोशी – ये कर्नाटक में बीजेपी की राजनीति का ब्राह्मण चेहरा हैं. धारवाड से पांच बार के सांसद हैं. प्रधानमंत्री मोदी समेत केंद्रीय नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं. अभी मोदी सरकार में कोयला और खनन मंत्री हैं.

कर्नाटक दक्षिण में बीजेपी का एक मात्र बेसिन है. दक्षिण के तेलंगाना, आंध्र प्रदेश या बाकी राज्यों में अपना वोट बेस बढ़ाने के लिए लिहाज से भी कर्नाटक की सत्ता बीजेपी के लिए अहम है. अब देखना है कि येदियुरप्पा के बाद बीजेपी नए मुख्यमंत्री के साथ कर्नाटक में पकड़ कितनी मजबूत रख पाती है. और मुख्यमंत्री से हटाने के बाद येदियुरप्पा को बीजेपी कैसे साध पाती है.

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ट्रैक्टर पर संसद पहुंच गए राहुल गांधी

तीन कृषि कानूनों के विरोध में आज राहुल गांधी ट्रैक्टर पर संसद भवन पहुंच गए. चूंकि मॉनसून सत्र के कारण संसद से सटे इलाकों में धारा 144 लागू है, और राहुल गांधी ने पूर्व सूचना नहीं दी थी, इसलिए ट्रैक्टर को ज़ब्त कर लिया गया. इस दौरान कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और बी श्रीनिवास समेत दीगर कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया गया. बाद में सभी को रिहा कर दिया गया. राहुल ने कहा कि वो ऐसा करके किसानों के संदेश को संसद तक लाए हैं. जवाब में भाजपा की तरफ से कहा गया कि विपक्ष किसी राजनैतिक हथियार की तरह किसानों के इस्तेमाल पर आमादा है.

Rahul Gandhi
जब ट्रैक्टर लेकर संसद पहुंचे राहुल गांधी. (तस्वीर- पीटीआई)

किसानों की ट्रैक्टर मार्च की तैयारी

अब 15 अगस्त को एक और ट्रैक्टर मार्च की बात चल पड़ी है. आज किसान नेता और भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि मुरादाबाद, हापुड़ और अमरोहा से किसानों का जत्था स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली में प्रदर्शन स्थल पर पहुंचेगा और परेड निकाली जाएगी. दर्शक जानते ही हैं कि 26 जनवरी के रोज़ किसान परेड में जमकर हिंसा हुई थी. और किसान लाल किले की प्राचीर पर चढ़ गए थे और एक धार्मिक झंडा फहरा दिया था. वैसे अब टिकैत दिल्ली की तरह ही यूपी की राजधानी लखनऊ को भी घेरने की बात कर रहे हैं. यूपी में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं और इसीलिए किसान मोर्चा और केंद्र दोनों अपना फोकस सूबे की तरफ किए हुए हैं.

महाराष्ट्र में बारिश के कारण मरने वालों का आंकड़ा बढ़ा

पिछले हफ्ते भारी बारिश के चलते महाराष्ट्र के कई ज़िलों में भूस्खलन हुए थे. इनमें से सबसे भीषण हादसा रायगढ़ ज़िले में हुआ था. यहां से अब तक 53 लोगों के शव बरामद हो चुके हैं और पांच घायल हैं. 31 लोग गुमशुदा हैं, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है. गांव वालों का कहना है कि इनके बचे होने की संभावना नहीं है और अब मलबा हटाने का कोई मतलब नहीं है. महाराष्ट्र में भारी बारिश से जुड़े अलग-अलग हादसों में मृतकों का आंकड़ा अब 200 की तरफ बढ़ रहा है. इससे मिलता-जुलता हादसा 25 जुलाई के रोज़ हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में भी हुआ. पहाड़ की ढलान पर चट्टानें खिसकीं और एक ट्रैवलर से टकरा गई. हादसे में आठ पर्यटकों और एक ड्राइवर की जान चली गई.

पेगासस मामले पर संसद में जांच की मांग उठी

आज कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में जांच चलाने की मांग रखी. थरूर सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष हैं. लोकसभा में आज सरकार कुछ बिल पास कर पाई. लेकिन राज्यसभा की कार्यवाही लगभग पूरी तरह कृषि कानून और पेगासस मामले पर हंगामे की भेंट चढ़ गई. पेगासस मामले की बात चली है तो आपको ये भी बताते चलें कि पश्चिम बंगाल सरकार ने पेगासस मामले में जांच बैठा दी है. सेवानिवृत्त जस्टिस एमवी लोकुर और जस्टिस ज्योतिर्मय भट्टाचार्य इस जांच पैनल का हिस्सा होंगे. ये पैनल पश्चिम बंगाल में फोन हैकिंग के मामलों को देखेगा.


वीडियो- कर्नाटक में येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद किसे मुख्यमंत्री बना रही है BJP?

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