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बसपा ने कुरान पढ़ना शुरू कर दिया है

न चलेगी साइकिल, न खिलेगा फूल
पंजा टूटेगा, हाथी चलेगा झूम झूम

न कमल पे न साइकिल पे, मोहर लगेगी हाथी पे.

अभी जब मोहर्रम पर मैं अमरोहा अपने गांव सैद नगली गया था. तो ये तुकबंदी सुनने को मिली. मेरा गांव उस इलाके में पड़ता है, जहां मुस्लिम काफी तादाद में रहते हैं. मतलब जिला संभल से 21 किलोमीटर दूर और मुरादाबाद से करीब 45 किलोमीटर दूर. अपने गांव में ये तुकबंदी सुनना मेरे लिए काफी हैरान करने वाला था. क्योंकि वो इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ है. इसकी वजह है मेरे गांव से 5 किलोमीटर दूर उझारी कस्बे का होना, जहां के समाजवादी नेता कमाल अख्तर हैं. और इस वक्त वो सपा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर हैं. काफी दबदबा बना रखा था आस-पास के मुसलमानों में. उन मुसलामनों को बसपा के बारे में बात करते देखना सोच में तो डाल ही देता.

मुझे लगा था शायद ये सपा सरकार से नाराज़गी की वजह होगी. शायद उसका कामकाज मुसलमानों को उससे दूर कर रहा है. शायद इसकी वजह मुज़फ्फरनगर, कैराना, दादरी हैं. ये काफी हद तक सच भी था, क्योंकि मुसलमानों को सपा से काफी उम्मीदें थीं, जो पूरी नहीं हो पाईं. लेकिन इसकी वजह सिर्फ ये ही नहीं है. कुछ और भी है. वो वजह खुद बसपा का मुसलमानों पर किया जा रहा फोकस है. जिसकी झलक मंच से खुद मायावती ने दिखाई थी.

लखनऊ में रैली की. मौका था कांशीराम की 10वीं बरसी का. तब मंच से मायावती ने कहा, जहां बीजेपी का राज है, वहां दलितों का उत्पीड़न हुआ. मुसलमानों के साथ पक्षपात वाला रवैया है. मुस्लिम कम्युनिटी ख़ौफ में जीने को मजबूर है. ये तो सिर्फ एक बानगी थी. जमीन तो डिस्ट्रिक्ट लेवल पर तैयार की जा रही है. वो भी कुरान का हवाला देकर. अब अगर कुरान का हवाला दिया जाए और मुसलमान इंकार करे, ये कैसे हो सकता है!

सपा और कांग्रेस से मुस्लिमों का मोह भंग करने के लिए कुरान और हदीसों का सहारा लिया जा रहा है. ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है. क्योंकि अब तक राम मंदिर को ही चुनावी मुद्दा बनाया गया है.

बसपा की होर्डिंग (फोटो: सौरभ द्विवेदी)
बसपा की होर्डिंग (फोटो: सौरभ द्विवेदी)

यूपी के संभल जिला में बहजोई कस्बा है, ये भी मेरे गांव से करीब 45 किलोमीटर दूर है. वहां मुस्लिम भाईचारा मीटिंग हुई. मुस्लिमों की काफी तादाद थी. बसपा के जोनल कोऑर्डिनेटर अतर सिंह राव मुस्लिमों से कहते हैं, ‘आपकी हदीस कहती है कि मुसाफिरों के काफिले को अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए एक काइद (लीडर) की जरूरत होती है. दलितों ने इस हदीस को फॉलो किया. एकजुट होकर एक नेता और बैनर के तले चले, जो कम्युनिटी पांच हजार साल तक गुलाम रही, वह आपकी हदीस की वजह से एक बड़े मुकाम पर पहुंच गई.

मुस्लिमों को लुभाने के लिए राव की कितनी तैयारी थी, ये आप खुद उनके बयान से अंदाज़ा लगा सकते हैं. राव ने कहा कि नमाज़ और जनाजे के लिए आप एक साथ आते हैं, लेकिन वोट करने के वक्त बिखर जाते हैं.

इस भाईचारे वाली मीटिंग में जनरल सेक्रेटरी नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी शामिल रहे. उन्होंने कहा, ‘जिस काफिले का कोई रहबर नहीं होता, वो भटक जाता है. लुट जाता है.’ बसपा नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुसलमानों का काइद बनाकर पेश कर रही है. तभी तो राव ने मुसलमानों को याद दिलाया कि जब बसपा की सरकार थी तो सिद्दीकी के पास 18 पोर्टफोलियो थे. और सत्ता में बड़ी हैसियत रखते थे.

सिद्दीकी के बेटे अफजल को जिम्मेदारी दी गई है कि वो मुसलमानों को बसपा के करीब लाएं. और ये अफज़ल की ही ट्रिक है कि मुस्लिमों के साथ बातचीत करने के दौरान कुरान की आयतें पढ़ी जाएं और हदीसों का हवाला दिया जाए.

मुसलमानों को लुभाने वाला ये तरीका मुझे बहुत हद तक कामयाब लगता है. क्योंकि मैंने वेस्ट यूपी में अपने रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वाले मुसलमानों को बोलते सुना है कि भाजपा और सपा मुसलमानों को बांटने के काम में लगी हैं ताकि उनकी सियासत चलती रहे. बसपा भी ये ही मेसेज आयतों और हदीसों के जरिए मुसलमानों में पहुंचाना चाहती है. और नसीमुद्दीन सिद्दीकी का इस्तेमाल उस तरह किया जा रहा है जैसे सब्जी का टेस्ट बढ़ाने के लिए उसमें छौंक लगाया जाता है. भाजपा नेताओं की बयानबाजी और सपा की ख़ामोशी मुसलमानों में बसपा के लिए माहौल बना रही है.

भले ही कुरान की आयतों और हदीसों से बसपा खुद को भाजपा और सपा से अलग बताने की कोशिश कर रही हो, लेकिन ये तरीका तो राम मंदिर की तरह ही है. हां, ये सच है कि मुसलमान धर्म को लेकर बड़ा ही सेंसेटिव है. जो नारा-ए-तकबीर पर बहुत कुछ करने को उतारू हो जाता है. लेकिन बसपा को ये समझ लेना चाहिए कि वो कोई मुफ़्ती, मौलवी, या कार्टून नहीं है. जो उसके लिए सड़कों पर उतर आएंगे. क्योंकि तब उनका धर्म संकट में पड़ा नजर आता है और जब राजनीति की बात होती है तो महज अपने-अपने फायदे के लिए बंट जाता है. या फिर मंदिर का खौफ अक्ल पर पर्दे डाल देता है. अब कहा तो ये जाने लगा है कि मुसलमान समझदार हो गया है. भले ही इसमें कुछ सच शामिल हो, लेकिन है अभी भी वोट बैंक ही. चाहे वो बसपा के लिए हो या सपा के लिए या फिर किसी और के लिए.


 


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