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अफगानिस्तान पर काबिज तो हो गया, लेकिन अब मदद के लिए ईरान की तरफ देख रहा है तालिबान!

अमेरिकी ट्रूप्स को काबुल छोड़े 3 दिन हो चुके हैं. शतरंज की बिसात पर अमेरिका को चारों खाने मात देने के बाद अब तालिबान ‘चेक मेट’ कहने जा रहा है. तालिबान के वरिष्ठ नेता अहमदुल्लाह मुत्तक़ी ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि काबुल के राष्ट्रपति भवन में एक समारोह की तैयारी हो रही है. ज़ाहिर है समारोह का कारण है, काबुल में तालिबान की ताजपोशी. सरकार बनाने को लेकर कई दिनों से अटकलें चल रही थी. लेकिन सरकार का जैसा स्वरूप हम जानते हैं, वो ना कभी तालिबान ने चलाई, ना ही उसे रिपब्लिक का मतलब पता है. लोकतंत्र तो बहुत दूर की कौड़ी है. फिर भी सरकार के नाम पर कुछ तो बनाना है, सो वो बना रहा है. एक इस्लामिक एमिरेट. कौन प्रधानमंत्री, कौन राष्ट्रपति, अभी कुछ पता नहीं है. लेकिन एक बात साफ़ है. ये कि तालिबान का एजेंडा है शरिया क़ानून लागू करना.

भारत में जब आज़ादी की किरणें फूटी तो सवाल उठा कि संविधान कैसा होगा. भारत एक राजशाही नहीं हो सकता था. आम कहावत है कि आपकी संगत तय करती है कि आप किस तरह के व्यक्ति बनेंगे. भारत को एक लोकतांत्रिक गणतंत्र स्थापित करना था. सो उसने ऐसे ही देशों की ओर देखा. भारत ने अमेरिका ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों की मदद लेकर अपना संविधान स्थापित किया.

अफ़ग़ानिस्तान भी एक नए शासन का इंतज़ार कर रहा है. वहां पहले से एक संविधान है. लेकिन अगर वो तालिबान को मंज़ूर होता तो इतनी मुसीबत ही नहीं आती. तालिबान को इतना तो मालूम है कि सरकार के गठन के लिए एक स्ट्रक्चर होना ज़रूरी है. लेकिन उसकी बारीकियों को लेकर तालिबान की समझ सीमित है. 20 साल पहले काबुल में तालिबान की सरकार ज़रूर थी. लेकिन तब के रहनुमाओं में से सिर्फ़ मुल्ला बरादर उपलब्ध है. सरकार में अनुभव की भारी कमी है. इसको लेकर चाहे तो तालिबान अपने पड़ोसी की मदद ले सकता है. एक दिखावटी सरकार बना, उसके ऊपर मिलिट्री शासन को प्रमुखता देकर, लोकतंत्र और तानाशाही की खिचड़ी कैसे बनाई जाती है. इससे बेहतर सलाह पाकिस्तान के अलावा शायद ही कोई और दे सके.

लेकिन जब स्कूल का हेडमास्टर साथ हो तो मॉनिटर की मदद कौन ले. कौन है ये हेडमास्टर? ये है ईरान. अफ़ग़ानिस्तान का एक और पड़ोसी. जिसका पूरा नाम है इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान. ईरान के राष्ट्रपति हैं इब्राहिम रेसी. बाक़ायदा पूरे गाजे बाजे के साथ चुनाव जीतकर सत्ता में आए हैं. लेकिन सत्ता सिर्फ़ नाम की है. रेसी सिर्फ़ एक कठपुतली हैं, जिसकी बागडोर किसी और के हाथ में है.

ईरान का अयातोल्लाह

गेम ऑफ़ थ्रोन में लॉर्ड वैरिस का कथन याद करिए –

‘ताक़त वहां होती है, जहां लोग विश्वास करते हैं कि वो है. ये सिर्फ़ एक ट्रिक है. दीवार पर पड़ी परछाई. और एक छोटा सा आदमी भी बहुत बड़ी परछाई बना सकता है’

ईरान पर पिछले 32 सालों से सत्ता पर जिसकी परछाई है. वो हैं, रहबर-ए-मोअज्ज़्म-ए-ईरान, अयातोल्लाह अली खमेनी.
यूं तो ईरान एक लोकतांत्रिक शासन पद्धति वाला देश है. अमेरिका की तरह वहां भी जनता ही राष्ट्रपति चुनती है. अमेरिका की ही तरह राष्ट्रपति का कार्यकाल भी चार साल का होता है. ये भी नियम है कि एक व्यक्ति केवल दो बार राष्ट्रपति बन सकता है. सेम अमेरिका की ही तरह. लेकिन ईरान के पावर पिरामिड में राष्ट्रपति से ऊपर एक और शख़्स होता है. इनका आधिकारिक टाइटल है- अयातोल्लाह. और ये ही ईरान में सर्वोच्च अथॉरिटी है. ये ही ईरान का धार्मिक, राजनैतिक और सैन्य मुखिया होता है. सरकार जो भी नीतियां बना ले, वीटो का अधिकार अयातोल्लाह के पास रहता है. घरेलू से लेकर विदेशी मामलों तक, सब कुछ अयातोल्लाह ही तय करता है.

ईरान की सेना के कमांडर ऑफ़ चीफ़ की पदवी हो या ख़ुफिया संस्थाओं का कंट्रोल. पावर की सारी चाबियां सुप्रीम लीडर के पास ही होती हैं. और इस चाबियों के रखवाले होते हैं, काउंसिल ऑफ़ गार्डियन्स. जिसके 12 सदस्यों में से 6 सुप्रीम लीडर चुनता है. यही काउंसिल सुनिश्चित करती है कि ईरान में सुप्रीम लीडर की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी ना हिले. राष्ट्रपति तो जनता चुनती है, लेकिन उम्मीदवार कौन होगा, इसका निर्णय काउंसिल ऑफ़ गार्डियन्स करती है. चुनाव अधिकारियों से लेकर, निर्वाचन आयोग के मुख्य सदस्यों को भी काउंसिल ही चुनती हैं. मोटामोटी समझें तो काउंसिल ऑफ़ गार्डियन्स ये पक्का करती है कि सभी उच्च पदों पर अयातोल्लाह के ही वफ़ादार बैठें हों.

1979 में इस्लामिक रिपब्लिक के गठन के बाद से अब तक ईरान में दो सुप्रीम लीडर हो चुके हैं. पहले, अयातोल्लाह रुहोल्लाह ख़ोमैनी. 1989 में उनकी मौत के बाद अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई सुप्रीम लीडर बने. तालिबान ईरान सरकार के इसी मॉडल को अफ़ग़ानिस्तान में लागू करना चाहता है. जल्द से जल्द सरकार का गठन हो. ये तालिबान की मजबूरी है. क्यों?

Akhundzaada Ali Khameni
तालिबान में अखुंदजादा (बाएं) को अब सुप्रीम लीडर बनाया जा सकता है. ठीक उसी तरह जैसे ईरान में अयातोल्लाह रुहोल्लाह ख़ोमैनी (दाएं) है

तालिबान की मजबूरी

31 तारीख़ को जैसे ही अमेरिका के आख़िरी प्लेन ने काबुल हवाई अड्डे से उड़ान भरी. तालिबान ने जश्न मनाना शुरू कर दिया. आतिश बाज़ियां हुई. हवाई फ़ायर किए गए. अमेरिका अपने पीछे बहुत से हथियार और इक्विप्मेंट छोड़ गया है. इन हथियारों की प्रदर्शनी लगाते हुए तालिबान शादी का फूफा बन रहा है. लेकिन इस जीत की खुमारी उतरते देर नहीं लगने वाली. 20 साल तक अमेरिकी फ़ौजों के लिए बम बोने वाला तालिबान अब हुकूमत का पेड़ खड़ा करना चाहता है. लेकिन निरंकुश लड़ाकों को शासन-प्रशासन की पेचीदगियां समझाना आसान नहीं है.

सरकार के अधिकतर अधिकारी पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ गनी के साथ देश छोड़ चुके हैं. अब तालिबान पर प्रेशर है कि वो जल्द से जल्द सत्ता में आया वैक्यूम भरे. दूसरी दिक़्क़त आंतरिक विद्रोह की है. दरअसल तालिबान बहुत सारे फ़ैक्शन से मिलकर बना है. अगर उसकी सेंट्रल लीडरशिप ने जल्द ही डोरी टाइट नहीं की. तो एक और गृह युद्ध शुरू होने में देर नहीं लगेगी. इतनी मुसीबतों के अलावा अमेरिका से भी पीछा पूरी तरह से छूटा नहीं है. बाइडन बयान दे चुके हैं कि चाहे वो अफ़ग़ानिस्तान छोड़ चुके हैं, लेकिन वहां के हालात पर अमेरिका की पूरी नज़र है.

कूटनीतिक रूप से अमेरिका और तालिबान की वार्ता जारी है. लेकिन तालिबान जानता है कि पासा कभी भी पलट सकता है. अमेरिका के साथ भविष्य में और तनातनी की पूरी सम्भावना है. अमेरिका से अदावत का अनुभव ईरान से ज़्यादा शायद ही किसी देश को हो. इसलिए तालिबान चाहता है कि वो ईरान की राह पकड़ ले. खबर है कि ईरान की देखा-देखी वो एक इस्लामिक रिपब्लिक बनाने जा रहा है. जिसमें शरिया क़ानून लागू होगा. ईरान की तर्ज़ पर शेख़ हिब्तुल्लाह अखुंदजादा को अफ़ग़ानिस्तान का सुप्रीम लीडर नियुक्त किया जाएगा. अफ़ग़ानिस्तान की न्यूज़ ऐज़ंसी तोलो न्यूज़ से बात करते हुए कल बुधवार को तालिबान के अधिकारियों ने ये जानकारी दी.

तालिबान का आध्यात्मिक गाइड- हिब्तुल्लाह 

तालिबान के अधिकतर लीडर अपनी सैन्य क़ाबिलियत के चलते जाने जाते हैं. लेकिन जानने वालों का कहना है कि हिब्तुल्लाह एक व्यावहारिक लेकिन कट्टर इस्लामिक स्कालर है. तालिबान के फ़िदायीन हमलों की शुरुआत उसने ही की थी. उसके क्रेडेंशियल्स का सबूत है उसका अपना बेटा. जिसने फ़िदायीन हमले की ट्रेनिंग ली. और 23 साल की उम्र में हेलमंद प्रॉविंस में एक आत्मघाती हमले में खुद को उड़ा लिया. हिब्तुल्लाह को तालिबान का आध्यात्मिक गाइड माना जाता है. शरिया के मसलों पर अंतिम व्याख्या का अधिकार उसी को है.

इसके अलावा क़यास लगाए जा रहे हैं कि अब्दुल गनी बरादर सरकार के रोज़मर्रा के काम देखेगा. बरादर तालिबान का फ़ाउंडर रह चुका है और हिब्तुल्लाह का डेप्युटी है. इसके अलावा सन 2000 के पहले उसे सरकार में काम का अनुभव भी है. तब वो तालिबान सरकार में रक्षा मंत्री रह चुका है. बरादर के अलावा सरकार में महत्वपूर्ण पद पाने वालों में जिनका नाम आ रहा है, उनमें शामिल हैं हक्कानी नेटवर्क का सिरमौर, सिराजुद्दिन हक्कानी. और तालिबान के जन्मदाता मुल्ला उमर का बेटा मुहम्मद याकूब.

तालिबान सत्ता पाने के जश्न में मशगूल है. और आम जनता का क्या हाल है?

आवाम का हाल

40 साल जंग के बाद तितर-बितर हो चुका अफ़ग़ानिस्तान क़रीब 4 करोड़ लोगों का देश है. भुखमरी और ग़रीबी का आलम ये कि पूछो मत. हज़ारों लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हैं. उस पर कोविड. जब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश 2 साल बाद भी कोविड से उबर नहीं पाए हैं. तो अफ़ग़ानिस्तान का तो कहना ही क्या. वैक्सीन किस चिड़िया का नाम है, आधी से ज़्यादा जनता को ये भी नहीं पता.

उस पर तुर्रा ये कि UN ने अफ़ग़ानिस्तान को लेकर एक नई चेतावनी जारी की है. सितंबर महीने के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान में फ़ूड स्टॉक ख़त्म हो जाएगा. UN की तरफ़ से अफ़ग़ानिस्तान ने ह्यूमैनिटेरियन कोऑर्डिनेटर रमीज़ अलक़बरोव ने कहा है कि एक-तिहाई अफ़ग़ान जनता के सामने बड़ा खाद्यान संकट उत्पन्न होने वाला है. जब तक काबुल में लोकतांत्रिक सरकार चल रही थी. अमेरिका उसकी मदद कर रहा था. इवैक्यूएशन के दौरान तालिबान ने भी अमेरिका का सहयोग किया. लेकिन भविष्य में आपसी सहयोग को लेकर अभी कुछ तय नहीं हुआ है.

अमेरिका के ‘जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ’ के चेयरमैन जनरल ‘मार्क ए मिली’ ने मंगलवार को पेंटागन में रिपोर्टर्स से बात की. आगे की रणनीति के सवाल पर उन्होंने कहा,

‘तालिबान क्रूर लोगों का एक समूह है. उसमें कितना बदलाव होगा ये कहा नहीं जा सकता.’

सबसे बड़ा सवाल है आर्थिक मदद का. UN और अमेरिका इस असमंजस में है कि अगर आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाए, तो भी पता नहीं वो आम लोगों तक पहुंच पाए या नहीं. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान के कैश रिज़र्व भी फ़्रीज़ कर दिए हैं. जिनकी कुल क़ीमत लगभग 700 अरब रुपए के बराबर है. IMF से मिल रही मदद भी बंद कर दी गई है. मुद्रास्फीति आसमान पर है और तालिबान अफ़ग़ानी औरतों और बच्चियों से बुर्के ख़रीदवा रहा है. बिजली, पानी जैसी ज़रूरतों की आपूर्ति तो पहले ही ख़स्ताहाल थी.

तालिबान के डर के कारण लोग काम पर नहीं जा पा रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान फ़्यूल, बिजली और खाने का आयात करता है. फंड फ़्रीज़ हो जाने के कारण ज़रूरी समान के आयात पर रोक लग गई है. इसके कारण आम जनता के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है.

काबुल एयरपोर्ट पर क्या स्थिति है?

अमेरिका के जाने के बाद हवाई अड्डा ठप पड़ा है. वहां से इस वक्त कोई आवाजाही नहीं हो रही है. तालिबान के प्रवक्ता जबीबुल्लाह मुज़ाहिद ने बयान दिया है कि काबुल एयरपोर्ट कुछ ही दिन में दुबारा काम करने लगेगा. लेकिन इसके आसार कम ही हैं, क्योंकि तालिबान के पास एयरपोर्ट के संचालन के लिए तकनीकी लोगों को अभाव है. तुर्की ने एयर पोर्ट के संचालन में मदद की इच्छा ज़ाहिर की है. लेकिन इस पर अभी कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं.

तालिबान के क़ब्ज़े से निकलने के लिए अफ़ग़ानी नागरिक अब बॉर्डर का रुख़ कर रहे है. काबुल से 140 मील दूर अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान का बॉर्डर लगता है. जगह का नाम टोरखम. बुधवार को हज़ारों अफ़ग़ान नागरिक यहां पहुंच गए. इस उम्मीद में कि पाकिस्तानी अधिकारी उन्हें पाकिस्तान में एंटर करने देंगे. इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो काम की तलाश में पाकिस्तान जाना चाहते हैं. लेकिन यहां भी उनके हाथ मायूसी ही लग रही है.

पाकिस्तान ने कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान से और लोगों को अपने यहां एंटर करने नहीं देगा. इस बीच UN की रेफ़्यूजी ऐज़ंसी ने चेतावनी दी है है कि साल के अंत तक लगभग 5 लाख अफ़ग़ान नागरिक देश छोड़कर जा सकते हैं. UN ने पड़ोसी मुल्कों से अपील की है कि वो अफ़ग़ान नागरिकों के लिए अपने बॉर्डर खुले रखें. पिछले एक साल में अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 35 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं. जिनमें से अधिकतर बच्चे और औरतें हैं.

Kabul
सितंबर महीने के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान में फ़ूड स्टॉक ख़त्म हो जाएगा.

तालिबान अपने बयानों में बार-बार ये दोहरा रहा है कि जिनके पास पासपोर्ट है, वो उन्हें देश से निकलने की इजाज़त देगा. लेकिन अधिकतर लोगों को उसकी बात पर भरोसा नहीं है. उन्हें लगता है कि सरकार बनाने के बाद उनका देश से निकलना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में अभी जितनी कोशिश कर ली जाए, उतना बेहतर.

पंजशीर अभी बाकी है

सरकार बनाना ही तालिबान की अकेली दिक़्क़त नहीं है. पंजशीर का इलाक़ा अभी भी तालिबान की पकड़ से बाहर है. पंजशीर में तालिबान ‘नॉर्दर्न एलायंस’ से लड़ रहा है. बुधवार को दोनों तरफ़ से बयान आया कि वो इस लड़ाई में जीत रहे हैं. 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर शासन किया. उस समय भी पंजशीर उसके हाथ नहीं लग पाया था. तालिबान एक ओर लड़ाकों को भेज रहा है ताकि पंजशीर पर क़ब्ज़ा जमा सके. दूसरी ओर शांति और अमन के बयान भी जारी कर रहा है. तालिबानी नेता आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने बुधवार को पंजशीर के लोग़ों के लिए एक संदेश जारी किया. मुत्तक़ी ने कहा,

“नॉर्थ अफ़ग़ानिस्तान की जनता को तालिबान के विरोधियों को समझाना चाहिए. पूरे अफ़ग़ानिस्तान में शांति है. सिवाय पंजशीर के. इस लड़ाई में आम लोग पिस रहे हैं. उन्हें और सहन करने की ज़रूरत नहीं है”

अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और पूर्व जिहादी कमांडर अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद पंजशीर में डेरा जमाए हुए हैं. अशरफ़ घनी के भाग जाने के बाद से सालेह ने खुद को अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर रखा है. सालेह ने बुधवार को फ़ेसबुक पर एक पोस्ट डालकर कहा है कि वो किसी भी हालत में तालिबान के साथ समझौता नहीं करेंगे. पोस्ट में वो आगे लिखते हैं,

“हमारा प्रतिरोध केवल पंजशीर के लिए नहीं है. बल्कि हम पूरे अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों के लिए लड़ रहे हैं. हम लड़ रहे हैं ताकि सभी अफ़ग़ान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके. पंजशीर की घाटी आज पूरे अफ़ग़ानिस्तान का नेतृत्व कर रही है. हमारी लड़ाई उन लोगों की आख़िरी उम्मीद है, जो तालिबान के दमन और उनकी काली सोच से बचना चाहते हैं. अगर अफ़ग़ान जनता को तालिबान पर भरोसा होता तो बॉर्डर पर हज़ारों लोगों क्यों इकट्ठा हैं. लोग सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार है. पर वो किसी भी क़ीमत पर तालिबान के क़ब्ज़े से निकलना चाहते हैं”

अफ़ग़निस्तान को लेकर अमेरिका से एक और अपडेट है. निकी हेली संयुक्त राष्ट्र (UN) में अमेरिका की राजदूत रह चुकी हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि चाइना अफ़ग़ानिस्तान स्थित बगराम ऐयरफ़ोर्स बेस को अपने कब्जे में ले सकता है. फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में हेली ने कहा –

अमेरिका को चीन पर नज़र बनाए रखनी होगी. मुझे लगता है कि चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी चाल चलनी शुरू कर दी है. वो पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का उपयोग भारत के ख़िलाफ़ करने की कोशिश ज़रूर करेगा. चीन और रशिया अमेरिका की वापसी का मज़ाक़ बना रहे हैं. ये देश मौक़ा ढूंढ रहे हैं कि वो कैसे स्थिति का फ़ायदा उठाएं. बाइडन के लिए ज़रूरी है कि वो भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे मित्र राष्ट्रों से रिश्ते मज़बूत करने की ओर कदम उठाएं.

निक्की इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की रणनीति को लेकर राष्ट्रपति बाइडन की आलोचना कर चुकी हैं. अपने बयान में उन्होंने कहा था कि बाइडन की विदेश नीति आगे जाकर अमेरिका के लिए विनाशकारी साबित होगी.


तालिबान राज में अफगानिस्तान क्रिकेट टीम पहले टेस्ट मैच के लिए तैयार

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