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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी शासन के ख़िलाफ़ बन रहे ‘नॉर्दर्न अलायंस 2.0’ की कहानी ये है

ये कहानी साल 1996 के शुरुआती दिनों की है. अफ़ग़ानिस्तान(Afghanistan) के सभी अहम प्रांत तालिबान के क़ब्ज़े में आ चुके थे. अब उनकी नज़र राजधानी काबुल पर थी. वहां क़ब्ज़े का मतलब था, सत्ता पर एकाधिकार.

जनवरी 1996 तक तालिबान काबुल को घेरकर बैठ चुका था. तालिबान ने गुलबदीन हेकमेतयार के गुट को पहले ही राजधानी से खदेड़ दिया था. हेकमेतयार को ‘काबुल का कसाई’ कहा जाता था. ये नाम उसे ऐसे ही नहीं मिला था. इसके पीछे वाज़िब कारण थे.

उसके बारे में एक मशहूर कहानी है. जब भी काबुल में कैबिनेट मीटिंग का ऐलान होता, हेकमेतयार के रॉकेट्स मीटिंग वाली जगह पर गिरने लगते थे. थोड़ी देर के बाद हमला रोक दिया जाता था. तब गुलबदीन हेकमेतयार अपने क़ाफ़िले के साथ मीटिंग में हिस्सा लेने पहुंचता था. वो सरकार में शामिल नहीं था. लेकिन वहां सबसे मज़बूत आवाज़ उसी की होती थी. अगर उसकी किसी बात पर ना-नुकूर होती तो वो चुपचाप वापस लौट जाता. लौटने के कुछ ही मिनट बाद काबुल पर फिर से बमों की बारिश होने लगती थी. 1992 से 1995 के बीच हेकमेतयार के ‘हिज़्ब-ए-इस्लामी’ गुट ने कम-से-कम 50 हज़ार लोगों की हत्या की. इस दौरान आधा काबुल शहर बर्बाद हो चुका था.

गुलबदीन हेकमेतयार को काबुल का कसाई भी कहा जाता है.
गुलबदीन हेकमेतयार को काबुल का कसाई भी कहा जाता है.

इतना शक्तिशाली होने के बावजूद तालिबान के आगे उसकी एक नहीं चली. हेकमेतयार को खदेड़ने के बाद तालिबान चौड़े में था. उन्हें काबुल में अपनी जीत का पूरा भरोसा था. वे बस मौके के इंतज़ार में थे. समय लगभग स्थिर था. तभी एक दिन तालिबान के अड्डे में हड़कंप मचा. एक व्यक्ति तालिबानी नेताओं से बातचीत करने पहुंचा था. दरवाज़े पर उसे रोका भी गया था. लेकिन जब उसने अपना नाम बताया तो फिर सब अवाक रह गए.

वो शख्‍स था, अफ़ग़ानिस्तान की अंतरिम सरकार में रक्षामंत्री, अहमद शाह मसूद. सोवियत के साथ लड़ाई में मसूद मुजाहिदीन बनकर आए थे. उनकी बहादुरी की कसमें खाईं जाती थी. कहते हैं कि सोवियत सेना 09 बार पंजशेर यानी (पांच शेरों की घाटी) घाटी में घुसी थी. लेकिन हर बार उन्हें हार कर लौटना पड़ा. वही मसूद अकेले, बिना किसी सिक्योरिटी के तालिबान के गढ़ में घुस आए थे. पंजशेर, काबुल से लगभग सौ किलोमीटर दूर है. पांच शेरों की उस घाटी के बेताज बादशाह थे, अहमद शाह मसूद.

उन्हें कुछ ज़रूरी बातें करनी थी. अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर. इस्लामिक शासन को लेकर. और, देश में शांति को लेकर. मसूद ने कहा,

‘तुमलोग अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक शासन चाहते हो, मैं भी यही चाहता हूं. मेरा बस इतना कहना है कि अब और ख़ून-खराबा नहीं. हम साथ मिलकर सरकार चला सकते हैं. ऐसी सरकार, जो उदार और विदेशी प्रभुत्व से परे हो.’

अहमद शाह मसूद दो घंटे तक समझाते रहे. उन्होंने अल-क़ायदा और दूसरे आतंकी संगठनों को पनाह देने पर भी सवाल उठाए. लेकिन सारी बातें तालिबानी नेताओं के सिर के ऊपर से निकल गईं. उन्हें कठमुल्लाओं वाला, सदियों पुराना, विकृत धार्मिक शासन लाना था. बात ना बननी थी, ना बनी.

मसूद लौट आए. उनके चेहरे पर निराशा पसरी हुई थी. उन्होंने बस इतना कहा,

‘इनके साथ शांति की बात करने का कोई मतलब नहीं है. अब दो ही रास्ते बचे हैं. या तो हम अपना सिर झुका लें या संघर्ष करते हुए शहीद हो जाएं.’

अहमद शाह मसूद ने संघर्ष का रास्ता चुना. काबुल पहले से ही तबाह था. अफ़ग़ान सेना लगातार चल रही लड़ाई से ऊब चुकी थी. तालिबान को ज़्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. 27 सितंबर 1996 को नजीबुल्लाह की हत्या के बाद तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया.

अहमद शाह मसूद अपने विश्वासपात्र लोगों के साथ अपने गढ़ पंजशेर चले गए. वहां से उन्होंने ‘नॉर्दर्न अलायंस’ का गठन किया. उन्हें ईरान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और भारत समेत कई और देशों का सपोर्ट मिला. ये तालिबान-विरोधी लड़ाकों का गुट था. बाद में इसमें कई और मुजाहिदीन लीडर्स भी साथ आए. पंजशेर, नॉर्दर्न अलायंस का मुख्यालय बना रहा. ये अजेय किला था. जब तालिबान अपने पूरे शबाब पर था, तब भी वो पंजशेर को नहीं जीत पाया.

Ahmad Shah Massoud
अहमद शाह मसूद. (फ़ोटो-विकिपीडिया)

जब 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया, उन्होंने वहां नॉर्दर्न अलायंस को अपना पार्टनर बनाया. तालिबान की हार के बाद इस गुट को भंग कर दिया गया. इनमें से कई बाद में सरकार में भी शामिल हुए.

आज इस कहानी को सुनाने का क्या मतलब है? दरअसल, 25 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान उसी मोड़ पर खड़ा दिख रहा है. काबुल की कुर्सी पर तालिबान बैठा है. अफ़ग़ानिस्तान के लगभग सभी प्रांत उसके क़ब्ज़े में हैं. पंजशेर को छोड़कर. वहां एक बार फिर से तालिबान-विरोधी मोर्चा पनप रहा है. उन्हें बंदूक के दम पर छीनी गई सत्ता स्वीकार नहीं है. वे इसे चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. इस गुट को ‘नॉर्दर्न अलायंस 2.0’ का नाम दिया जा रहा है.

एक दिलचस्प बात पता है! इस बार के नॉर्दर्न अलायंस की कमान संभालने वाला कोई और नहीं, बल्कि अहमद शाह मसूद का इकलौता बेटा अहमद मसूद है.

आज हम समझेंगे, नॉर्दर्न अलायंस की पूरी कहानी क्या है? इस गुट को कहां से सपोर्ट मिल रहा था? और, इस बार के नॉर्दर्न अलायंस में कितना दम है? साथ में करेंगे, फ़ैक्ट-चेक. तालिबान की पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में किए गए दावों का.

इतिहास

फ़रवरी 1989 में अंतिम सोवियत सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से निकल गया. इसके साथ ही 10 साल लंबे सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध का औपचारिक अंत हो गया. लड़ाई बाहरी मोर्चे पर बंद हुई थी. अंदर की आग अभी बाकी थी. उस समय अफ़ग़ानिस्तान पर कम्युनिस्ट नेता मोहम्मद नजीबुल्लाह का शासन चल रहा था. सोवियत संघ बाहर रहकर भी उन्हें मदद मुहैया करा रहा था.

मुजाहिदीन, नजीबुल्लाह को गद्दी से उतारना चाहते थे. लेकिन सोवियत सपोर्ट के आगे वे लगातार मात खा रहे थे. उन्हें मौका मिला, दिसंबर 1991 में. जब सोवियत संघ का विघटन हुआ. और, रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने नजीबुल्लाह सरकार को दी जा रही मदद बंद कर दी. नजीबुल्लाह को अंदाज़ा हो गया कि अब सत्ता में टिके रहना मुश्किल है. 16 अप्रैल को उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

मुजाहिदीन काबुल तक पहुंच चुके थे. अब बात सत्ता के हस्तांतरण पर टिक गई थी. इसी समय गुलबदीन हेकमेतयार और अहमद शाह मसूद के बीच एक दिलचस्प टकराव हुआ. मसूद का कहना था कि सोवियत संघ के ख़िलाफ़ जिहाद में कई गुटों ने हिस्सा लिया है. इसलिए, सत्ता में सबकी हिस्सेदारी होनी चाहिए. वहीं, हेकमेतयार का मन था कि वो अकेले काबुल की गद्दी पर बैठे. उसे कुर्सी का बंटवारा पसंद नहीं था. मसूद सरकार बनाने पर सहमति बनने के बाद ही काबुल में घुसना चाहते थे. लेकिन हेकमेतयार को अपनी शक्ति का घमंड था. उसने कहा कि मैं तलवार के दम पर काबुल को जीत लूंगा, मुझे कोई नहीं रोक सकता.

ये सुनकर मसूद नाराज़ हो गए. उन्होंने हेकमेतयार से कहा कि अगर तुमने ऐसा किया तो मैं आम लोगों की तरफ से खड़ा मिलूंगा. तुम्हें पहले मुझसे टकराना होगा.

खैर, बात मसूद की ही रखी गई. 24 अप्रैल 1992 को पेशावर में संधि हुई. अफ़ग़ानिस्तान में अंतरिम सरकार का गठन हुआ. सिबघतुल्लाह मुजादिदी को अंतरिम राष्ट्रपति, जबकि अहमद शाह मसूद रक्षामंत्री बने. गुलबदीन हेकमेतयार को प्रधानमंत्री का पद दिया गया. उसे छोड़कर बाकी सभी मुजाहिदीन लीडर्स ने दस्तख़्त कर दिए. हिकमतेयार का गुस्सा कायम रहा. वो तालिबान के आने तक काबुल में तबाही मचाता रहा.

पेशावर अकॉर्ड के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अंतरिम सरकार का गठन हुआ.

तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा तो कर लिया था. लेकिन उसकी सरकार को सिर्फ़ तीन देशों ने मान्यता दी थी. पाकिस्तान, यूएई और सऊदी अरब. वहीं, मसूद वाली अंतरिम सरकार को अधिकतर देशों का समर्थन था. नॉर्दर्न अलायंस के आधिकारिक मुखिया थे, अंतरिम सरकार में राष्ट्रपति रहे बुरहानुद्दीन रब्बानी. रब्बानी 33 देशों में अफ़ग़ानिस्तान का दूतावास भी चला रहे थे.

सीधी लड़ाई की ज़िम्मेदारी अहमद शाह मसूद पर थी. मसूद के पुराने दुश्मन भी उनके आ गए थे. अब्दुल रशीद दोस्तम और हेरात के पूर्व गवर्नर इस्माइल ख़ान ने भी हाथ मिला लिया.

उधर, अहमद शाह मसूद अपने लड़ाकों के साथ पूर्वोत्तर अफ़ग़ानिस्तान की पंजशेर घाटी पहुंचे. इधर, तालिबान ने उनको सबक सिखाने की तैयारी कर ली. एक बार फिर संघर्ष शुरू हुआ. नॉर्दर्न अलायंस और तालिबान के बीच. कभी ये भारी पड़ते तो कभी तालिबान. हालांकि, तालिबान कभी पंजशेर घाटी को नहीं जीत पाया. मसूद ने तालिबान को भारी नुकसान पहुंचाया था. लेकिन ये जीत कभी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंची.

मसूद के नॉर्दर्न अलायंस को कहां से सपोर्ट मिल रहा था?

उन्हें भारत, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान, रूस, तुर्की और ताजिकिस्तान से मदद मिल रही थी. पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘अ कॉल टू ऑनर’ में लिखा है कि भारत और नॉर्दर्न अलायंस के रिश्तों की कहानी बहुत लंबी है. इसे दर्ज़ किया जाना बाकी है. तालिबान से लड़ाई के बीच में मसूद दिल्ली भी आए थे. चार दिनों की यात्रा पर. इस टूर को पूरी तरह सीक्रेट रखा गया. तालिबान और आईएसआई मसूद की हत्या का मौका हमेशा तलाशते रहते थे.

मसूद का गुस्सा इस बात को लेकर भी था कि पाकिस्तान, तालिबान सीधा सपोर्ट कर रहा था. साथ ही, वो दुनियाभर के आतंकी संगठनों के लिए वहां ट्रेनिंग भी दे रहा था. ये अफ़ग़ानिस्तान की धरती का अतिक्रमण था. इसके अलावा, तालिबान सुन्नी इस्लाम को मानता है. वो उसके अलावा किसी भी पंथ को मानने वाले लोगों को देखना नहीं चाहता. जबकि, नॉर्दर्न अलायंस में हर पंथ के लोग थे. पश्तून से लेकर शिया हज़ारा तक.

अहमद शाह मसूद पहले सोवियत संघ से लड़े. बाद में उन्होंने तालिबान का ताउम्र मुक़ाबला किया.
अहमद शाह मसूद पहले सोवियत संघ से लड़े. बाद में उन्होंने तालिबान का ताउम्र मुक़ाबला किया.

अहमद शाह मसूद ने कपड़ों से लेकर हेलिकॉप्टर तक की मदद ली. लेकिन उन्होंने कभी विदेशी आक्रमण की इजाज़त नहीं दी. उनका कहना था कि हम पाकिस्तान के प्रभुत्व के ख़िलाफ़ ही तो लड़ रहे हैं. हमें बस मदद दीजिए, बाकी हम देख लेंगे.

इस प्रण की एक कहानी सुनाता हूं. सितंबर 1998 की बात है. मज़ार-ए-शरीफ़ स्थित ईरानी दूतावास पर तालिबानियों ने हमला कर दिया. इसमें ईरान के दस डिप्लोमैट और एक पत्रकार की हत्या हो गई. गुस्साए ईरान ने लगभग एक लाख सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर खड़ा कर दिया. ईरान अंदर घुसकर तालिबान पर हमले के लिए तैयार था. तब मसूद ने उन्हें समझाया. उन्होंने कहा कि सोवियत संघ वाली ग़लती आप क्यों कर रहे हैं. हम हैं ना, हम देख लेंगे. आप हमारा साथ देते रहिए. ये सुनकर ईरान ने अपनी सेना वापस बुला ली.

अब सवाल आता है कि पाकिस्तान, तालिबान सरकार का समर्थन क्यों कर रहा था?

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक इंटरव्यू में पाकिस्तान के शामिल होने की बात को स्वीकारा था. हालांकि, उन्होंने कहा कि वे भारत के बढ़ते प्रभाव को खत्म करना चाहते थे.

असलियत क्या थी? पाकिस्तान, 1980 के दशक से अफ़ग़ानिस्तान में था. पहले मुजाहिदीनों के साथ. बाद में उसने तालिबान का हाथ पकड़ लिया. आतंकी संगठन अल-क़ायदा की स्थापना पाकिस्तान के पेशावर में ही हुई थी. वो भी 1988 में. तालिबान के बनने से पहले. तालिबान के लड़ाकों में अधिकतर वे लोग शामिल थे, जिनकी शिक्षा-दीक्षा पाकिस्ताान के मदरसों में हुई थी. इन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने ट्रेनिंग दी थी. ये बात कई खुफिया रिपोर्ट्स में साफ़ लहजे में लिखीं थी. इसके बावजूद, अमेरिका कभी पाकिस्तान पर ज़रूरी दबाव नहीं बना पाया.

अहमद शाह मसूद ने अल-क़ायदा के बड़े हमले की चेतावनी पहले ही जारी कर दी थी.
अहमद शाह मसूद ने अल-क़ायदा के बड़े हमले की चेतावनी पहले ही जारी कर दी थी.

नतीजा, 9/11 का हमला. लगभग तीन हज़ार अमेरिकी नागरिकों की मौत. आईएसआई-समर्थित आतंकियों ने 1990 के दशक में कई विदेशी दूतावासों पर हमला करके ट्रेलर दे दिया था. यहां तक कि अहमद शाह मसूद ने भी पाकिस्तान और ओसामा बिन लादेन को लेकर चेतावनी जारी की थी. लेकिन इन पर कभी अमल नहीं हो पाया.

नॉर्दर्न अलायंस ने तालिबान के एकाधिकार को रोककर रखा. उन्होंने ये साबित किया कि बंदूक के दम पर छीनी गई सत्ता का विरोध ज़रूरी है.

काबुल से भगाए जाने के 20 साल बाद तालिबान की सत्ता-वापसी हुई है. और, इसी के साथ वापसी हो रही है, नॉर्दर्न अलायंस की. पुराना गुट एक बार फिर से एकजुट हो रहा है. उसी पंजशेर घाटी में, जहां से अहमद शाह मसूद विरोध का बिगुल फूंकते रहे.

इस बार इसकी पहल उनके बेटे अहमद मसूद ने की है. उनके साथ हैं, अफ़ग़ानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरूल्लाह सालेह. पंजशेर में लगातार बैठकें चल रहीं है. कई मुजाहिदीन नेता अपने लड़ाकों को इकट्ठा करने में जुटे हैं.

अहमद मसूद ने कहा है कि अगर तालिबान शांति के लिए तैयार नहीं हुआ, तो मुजाहिदीन एक बार फिर से हथियार उठा लेंगे. टोलो न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, अहमद मसूद ने अपने बयान में कहा,

‘अगर इस मसले का हल लड़ाई से निकलता है, तो हम उसके लिए भी तैयार हैं. हम मुजाहिदीनों के सुझाव और लोगों के सहयोग से अपनी तैयारी करेंगे. हम एक ऐसी इस्लामिक व्यवस्था लाना चाहते हैं, जो आम जनता की बुनियादी मांगों के पक्ष में खड़ी रहेगी.’

अहमद मसूद के साथ अमरूल्लाह सालेह भी हैं. 17 अगस्त को उन्होंने ट्विटर पर इसका ऐलान भी किया. सालेह ने लिखा कि संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति की गैर-मौज़ूदगी में उप-राष्ट्रपति सर्वोच्च नेता होता है. यानी, सालेह ने ख़ुद को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया है. ताजिकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास से अशरफ़ ग़नी की तस्वीर हटा दी गई है. उनकी जगह सालेह की फ़ोटो लगाई गई है.

अहमद शाह मसूद के साथ काम कर चुके अमरूल्लाह सालेह 'नॉर्दर्न अलायंस 2.0' में शामिल हैं.
अहमद शाह मसूद के साथ काम कर चुके अमरूल्लाह सालेह ‘नॉर्दर्न अलायंस 2.0’ में शामिल हैं.

सालेह ने कहा था कि अमेरिका को भूल जाइए. ये लड़ाई हमारी है और हम तालिबान का मुक़ाबला करने के लिए तैयार हैं.

सालेह के बारे में और क्या पता है?

उप-राष्ट्रपति बनने से पहले वो अफ़ग़ानिस्तान की सीक्रेट सर्विस के मुखिया थे. उससे पहले वो विदेश मंत्रालय भी संभाल चुके हैं. फ़र्स्ट नॉर्दर्न अलायंस में भी वो अहम भूमिका निभा चुके हैं. नॉर्दर्न अलायंस का एक मुख्यालय ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में हुआ करता था. 1997 में सालेह को वहां लाइज़न ऑफ़िसर के तौर पर तैनात किया गया था. अहमद शाह मसूद से मिलने वाले विदेशी अधिकारियों को पहले सालेह से होकर गुज़रना होता था. अगर ‘नॉर्दर्न अलायंस 2.0’ अस्तित्व में आता है तो उनका अनुभव बेहद काम आने वाला है.

इस बार नॉर्दर्न अलायंस को कौन सपोर्ट करेगा?

अफ़ग़ानिस्तान से भारत के बहुत सारे हित जुड़े हैं. जानकारों का कहना है कि भारत को उनका सपोर्ट करना चाहिए. इस बार तालिबान की सरकार को कई बड़े देश मान्यता दे सकते हैं. जैसे कि पाकिस्तान, रूस और चीन जैसे देश. अगर अफ़ग़ानिस्तान से भारत की उपस्थिति खत्म हुई तो वो ज़मीं भारत में आतंकी हमलों का लॉन्चपैड बन सकती है. कई और भी देश हैं, जिन्हें तालिबान के आने से ख़तरा महसूस हो रहा है. हालांकि, अभी तक इस पर कोई भी आधिकारिक बयान नहीं आया है.

अफ़ग़ानिस्तान में आगे दिलचस्प स्थिति दिख रही है. आने वाले कुछ दिन निर्णायक साबित होने वाले हैं. अफ़ग़ानिस्तान के लोगों और उनके भविष्य के लिए.

अब कुछ फ़ैक्ट-चेक. तालिबान के दावों का.  काबुल पर क़ब्ज़े के बाद 17 अगस्त को तालिबान ने पहला प्रेस कॉन्फ़्रेंस किया. इसमें उन्होंने कई लुभावने दावे किए. हम उनमें से कुछ की सच्चाई बता देते हैं.

काबुल पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान की पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस.
काबुल पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान की पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस.

पहला दावा – महिलाओं को शरिया कानून के हिसाब से सभी अधिकार दिए जाएंगे.

अब सच सुनिए. 18 अगस्त की सीएनएन की रिपोर्ट है. ये घटना जुलाई 2021 की है. जब तालिबान ने अलग-अलग इलाकों में हमले शुरू किए ही थे. फरयाब प्रांत में आधी रात को लगभग 15 तालिबानी एक घर में पहुंचे. उन्होंने सबके लिए खाना बनाने के लिए कहा. अंदर मौजूद महिला ने कहा कि मैं ग़रीब हूं. मेरे पास ख़ुद के खाने के लिए नहीं है. मैं इतने लोगों के लिए खाना कैसे बना पाऊंगी?

तालिबानियों ने तीन बार दरवाज़े पर दस्तक दी. चौथी बार में उन्होंने दरवाज़ा तोड़ दिया. उसके बाद उन्होंने उस महिला की बंदूक से पीट-पीटकर हत्या कर दी.

दूसरा दावा – हम दुनिया को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा.

सच क्या है? 17 अगस्त को तालिबान ने बामयान में हज़ारा समुदाय के नेता अब्दुल अली मज़ारी की मूर्ति को बम से उड़ा दिया. तालिबानी, हज़ारा मुस्लिमों को दोयम दर्ज़े का मानते हैं. उनकी हत्या करने से परहेज़ नहीं करते. आप तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारा मुस्लिमों के भविष्य की कल्पना कर सकते हैं.

तीसरा दावा – अब अफगनिस्तान नारकोटिक्स-फ्री देश होगा. इसके लिए दुनिया का सहयोग चाहिए.

जब तालिबान सत्ता में नहीं आया था. तब उसकी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा अफ़ीम की खेती से आ रहा था. अरबों रुपये का धंधा उनकी संरक्षण में चल रहा था. क्या तालिबान अपनी सदाबहार कमाई को छोड़ देगा? इस बात पर भरोसा करना बेहद मुश्किल है.

चौथा दावा – अफ़ग़ानिस्तान की धरती को किसी और के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देंगे. दुनिया को इसका भरोसा देते हैं. 

तालिबान ने बगराम समेत कई जेलों से आइएस के आतंकियों को छुड़ाया है. उनका क्या किया जाएगा, इसका जवाब तालिबान को देना चाहिए.

तालिबान के ऐसे दावे और भी हैं, जिन्हें उनके ही कृत्य झूठा साबित करते हैं.


वीडियो- दुनियादारी: अफ़ग़ानिस्तान की ये दिलचस्प कहानियां बहुत कम लोगों को पता हैं

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