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अफगानिस्तान: पंजशीर को घेर तो लिया लेकिन क्या यहां कब्जा कर पाएगा तालिबान?

सबसे पहले दो बयान सुन लीजिए-

पहला- ‘मैं ‘पंजशीर के शेर’ अहमद शाह मसूद का बेटा हूं. ‘आत्मसमर्पण’ जैसा कोई भी शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है.’

दूसरा बयान तालिबान की तरफ से-‘पंजशीर में स्थानीय अधिकारियों ने हार स्वीकारने से इनकार कर दिया है. इस्लामिक अमीरात के सैकड़ों लड़ाके पंजशीर की तरफ़ निकल चुके हैं.’

पहला बयान अहमद मसूद का है. वो पंजशीर में तालिबान-विरोधी लड़ाकों की कमान संभाल रहे हैं. पंजशीर, अफ़ग़ानिस्तान का इकलौता ऐसा प्रांत है, जो तालिबान के नियंत्रण से बाहर है. 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर शासन किया था. उस समय भी पंजशीर उसके हाथ नहीं लग पाया. अबकी बार तालिबान पंजशीर पर क़ब्ज़ा कर वो दाग़ मिटाना चाहता है. पंजशीर पर क़ब्ज़े का मतलब है, अफ़ग़ानिस्तान पर एकाधिकार. इस मकसमद को पूरा करने के लिए तालिबान ने अपने लड़ाकों को रवाना कर दिया है.

क्या तालिबान अपने इतिहास को बदलने में कामयाब हो पाएगा? क्या अहमद मसूद के लड़ाके तालिबान को टक्कर दे पाएंगे? पंजशीर की लड़ाई किस तरह से अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास का नया अध्याय लिख सकती है? आपने काबुल एयरपोर्ट पर छोटे-छोटे बच्चों को बाहर निकाले जाने की तस्वीरें देखी होंगी. 46 साल पहले भी अमेरिका ने बच्चों को बचाने के लिए एक हैरतअंगेज़ ऑपरेशन चलाया था. लेकिन ऐन मौके पर कुछ ऐसा हुआ कि सबकी जान ख़तरे में पड़ गई थी. क्या थी वो पूरी कहानी?

सोवियत भी नहीं जीत पाया पंजशीर को

पहले अतीत की बात. साल 1979. दिसंबर के महीने में सोवियत सेना अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल हुई. काबुल में कठपुतली सरकार बिठाने के बाद सोवियत संघ ने ग्रामीण इलाकों की तरफ रुख़ किया. अफ़ग़ानिस्तान की सरकार और सोवियत आर्मी साथ मिलकर अपने मिशन में जुटीं. उस समय लग रहा था कि सोवियत सेना आसानी से पूर देश पर क़ब्ज़ा जमा लेगी. लेकिन कुछ समय बाद ही ये अनुमान ग़लत साबित होने लगा. अमेरिका और पाकिस्तान के सपोर्ट से मुजाहिदीनों ने सोवियत सेना को सोचने के लिए मजबूर कर दिया.

सोवियत सेना को सबसे कड़ी टक्कर मिली हिंदुकुश पहाड़ियों की तलहटी में बसे पंजशीर में. वहां अहमद शाह मसूद अपने लड़ाकों के साथ मोर्चा संभाले हुए थे. बाद में कई और मुजाहिदीन फ़ाइटर्स उनके साथ आ मिले. सोवियत संघ ने 1980 से 1985 के बीच पंजशीर पर नौ बार हमला किया.

सोवियत सेना प्रशिक्षित थी. उनके पास बेहतर हथियार थे. वे पूरी प्लानिंग के साथ पंजशीर पर हमला करते थे. लेकिन उन्हें कभी निर्णायक जीत हासिल नहीं हो पाई. उल्टा, हर बार उन्हें और अधिक नुकसान झेलकर वापस भागना पड़ा. उस लड़ाई के अवशेष आज भी पंजशीर घाटी में बिखरे हुए हैं. ज़ंग खाए टैंकों और तबाह हेलिकॉप्टर्स की शक्ल में.

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अफगानिस्तान छोड़कर निकलता सोवियत संघ.

अहमद शाह मसूद के हाथों में सुरक्षित रहा पंजशीर

फ़रवरी 1989 में सोवियत अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल गया. इसके बाद कम्युनिस्ट सरकार को गिराने के लिए लड़ाई चली. अप्रैल 1992 में नजीबुल्लाह ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद मुजाहिदीनों ने सरकार बनाई. अहमद शाह मसूद इस सरकार में रक्षामंत्री बने. ये सरकार सितंबर 1996 तक काबुल की कुर्सी पर काबिज रही. तालिबान के आने के बाद अहमद शाह मसूद को काबुल छोड़कर भागना पड़ा. पंजशीर घाटी ने एक बार फिर उनको पनाह दी.

यहीं से तालिबान के ख़िलाफ़ जंग का बिगुल फूंका गया. अहमद शाह मसूद के नेतृत्व में ‘नॉर्दर्न अलायंस’ का गठन हुआ. नॉर्दर्न अलायंस कभी तालिबान के ख़िलाफ़ निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पाया. लेकिन उसने पंजशीर को अपने हाथ से कभी निकलने नहीं दिया. पंजशीर घाटी तालिबानियों की कसक रही है. वे ये दावा कभी नहीं कर पाए कि पूरा अफ़ग़ानिस्तान उनके नियंत्रण में है.

9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने ‘वॉर ऑन टेरर’ शुरू किया. नाटो सेनाओं के साथ मिलकर. उन्होंने दो महीने में ही तालिबान को पहले काबुल और बाद में कंधार से खदेड़ दिया. दो दशक के बाद तालिबान ने पूरा सीन पलट दिया है. विदेशी सेनाएं वापस लौट रहीं है. वो भी अफरा-तफरी में. काबुल की कुर्सी पर तालिबान की वापसी हो चुकी है. पहले से मज़बूत और हिंसक स्वरूप में.

लेकिन एक चीज़ जो जस-की-तस बनी हुई है, वो है पंजशीर घाटी. इस दफ़ा भी ये घाटी अभी तक अजेय है. इस बार भी पंजशीर घाटी तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए कमर कसकर तैयार है.

अब मसूद के बेटे संभाल रहे विद्रोह की कमान

इस बार विद्रोह की कमान अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद के हाथों में है. उनका साथ दे रहे हैं, अमरूल्लाह सालेह. वो अफ़ग़ानिस्तान की खुफिया एजेंसी के मुखिया रह चुके हैं. तालिबान के आने से पहले तक वो अशरफ़ ग़नी की सरकार में उप-राष्ट्रपति थे. ग़नी के देश छोड़कर भागने के बाद उन्होंने ख़ुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया हुआ है.

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पंजशीर के अहमद मसूद. फोटो- AP

22 अगस्त को अमरूल्लाह सालेह ने ट्वीट किया. इसमें उन्होंने लिखा कि तालिबानी पंजशीर के मुहाने तक पहुंच आए थे. लेकिन उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. रेजिस्टेंस फ़ोर्सेज़ ने सालंग हाईवे को भी बंद कर दिया है. सालंग हाईवे हिंदुकुश पहाड़ियों तक पहुंचने का मुख्य रास्ता है. सालेह ने चुनौती भरे लहजे में ये भी लिखा कि तालिबान को कुछ इलाकों में घुसने की ज़ुर्रत नहीं करनी चाहिए. कई जगहों पर सैकड़ों तालिबानियों के मारे जाने की बात चल रही है. हालांकि, अभी इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है.

अमरूल्लाह सालेह का दावा है कि उनके लड़ाके तालिबान को पंजशीर पर क़ब्ज़ा नहीं करने देंगे. इस दावे में कितना दम है?

जानकारों का कहना है कि इस बार तालिबान को रोक पाना लगभग नामुमकिन है. उनका कहना है कि इस बार का तालिबान पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली है. काबुल पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान ने कहा था कि वो अब और हमले नहीं करेगा. मतलब ये कि जिन इलाकों पर उसका नियंत्रण नहीं हुआ है, वो इलाके बचे रहेंगे. हालांकि, अब वो अपने कहे से पीछे हट गया है. उसने पंजशीर पर हमले के लिए अपने लड़ाकों को रवाना कर दिया है. तालिबानी लड़ाके पंजशीर को घेरकर बैठ चुके हैं. तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि मसले को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश की जा रही है.

तालिबान के साथ बातचीत होगी या जंग?

पिछले हफ़्ते अहमद मसूद ने अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट में एक आर्टिकल लिखा था. इसमें उन्होंने अमेरिका से मदद मांगी थी. तालिबान से लड़ने के लिए हथियारों और बाकी दूसरे संसाधनों की. मसूद ने लिखा था कि उनके लोग तालिबान से लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन उनके पास जो असलहा है, वो कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगा.

अगर मसूद की इस बेबसी की तुलना तालिबान से की जाए तो उसकी जीत निश्चित नज़र आती है. तालिबान के पास वेपंस की कोई कमी नहीं है. उन्होंने विदेशी सेनाओं के बेस से हथियार लूटे हैं. इसके अलावा, पूरा सरकारी तंत्र तालिबान के हाथ में है. पाकिस्तान भी तालिबान को खुला सपोर्ट करता है.

इस वक़्त जो हालात हैं, अहमद मसूद के गुट को शायद ही कोई देश सपोर्ट करे. विदेशी सरकारें अपने लोगों को बाहर निकालने में इस कदर व्यस्त है कि उन्हें कुछ और सूझ ही नहीं रहा. ये देश सोवियत संघ और अमेरिका की हार का सबक भी नहीं भूले होंगे. ऐसे में अहमद मसूद को मदद मिलने की गुंज़ाइश बेहद कम है.

जो नेता एक समय अहमद शाह मसूद के साथ मिलकर तालिबान के ख़िलाफ़ लड़े थे, उन्होंने भी हाथ छोड़ दिया है. पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, तालिबान के साथ मिलकर सरकार बनाने की रणनीति बना रहे हैं. एक समय अहमद शाह मसूद के सबसे क़रीबी रहे अब्दुल्लाह अब्दुल्ला तालिबान के साथ हाथ मिला चुके हैं.

अहमद मसूद इस स्थिति को भांप चुके हैं. उन्होंने अपील की है कि अगर तालिबान समावेशी सरकार बनाने की पहल करता है तो वो बातचीत के लिए तैयार हैं. हालांकि, उन्होंने ये भी जोड़ा था कि अगर बात लड़ाई पर आए तो भी वो पीछे नहीं हटेंगे.

अभी पंजशीर में क्या चल रहा है, इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है. अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान ने कहा है कि पंजशीर में लड़ाई शुरू हो चुकी है. वहीं, अहमद मसूद ने कहा है कि उन्हें घाटी में तालिबान का कोई निशान अभी तक नहीं दिखा. दावा किया जा रहा है कि पंजशीर घाटी को लेकर अगले कुछ दिनों में निर्णायक ख़बर आ सकती है. यही अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के एकाधिकार का खाका तय करेगी.

अफ़ग़ानिस्तान में और क्या चल रहा है?

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि अगर ज़रूरत पड़ी तो 31 अगस्त के बाद भी यूएस आर्मी काबुल में तैनात रहेगी. अमेरिका ने सभी सैनिकों को निकालने के लिए 31 अगस्त की डेडलाइन तय की थी. तालिबान ने इस डेडलाइन में ढील देने से मना कर दिया है. उसने कहा है कि अगर डेडलाइन का पालन नहीं हुआ तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. जिन भी देशों के नागरिक अफ़ग़ानिस्तान में फंसे हैं, उन्होंने एयरलिफ़्ट मिशन तेज़ कर दिया है. अमेरिका ने इस मिशन के लिए पैसेंजर एयरक्राफ़्ट्स को भी तैनात किया है.

पिछले कुछ दिनों में आपने काबुल एयरपोर्ट पर छोटे-छोटे बच्चों को एयरलिफ़्ट किए जाने की बहुत सारी तस्वीरें देखी होंगी. एक तस्वीर ख़ूब वायरल भी हो रही है. जिसमें एक नवजात बच्चे को दीवार पर खड़े सैनिक के हाथ में दिया जा रहा है. ताकि उसे किसी तरह अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकाला जा सके.

वियतनाम वॉर का किस्सा- ऑपरेशन बेबीलिफ़्ट

उन तस्वीरों को देखकर चार दशक पुरानी एक घटना याद आती है. वियतनाम वॉर के दौर की. साल 1975 की बात है. अप्रैल का महीना था. वियतनाम वॉर में अमेरिका की हार लगभग तय हो चुकी थी. यूएस आर्मी के पास अब साइगॉन ही बचा था. वियतनाम वॉर के समय साइगॉन, दक्षिणी हिस्से की राजधानी थी. इसे अब हो ची मिन्ह सिटी के नाम से जाना जाता है.

जल्दी ही साइगॉन भी दुश्मनों के हमले की चपेट में आ गया. उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति थे जेराल्ड फ़ोर्ड. उन्होंने ऐलान किया कि वॉर के दौरान साउथ वियतनाम के अनाथ बच्चों को एयरलिफ़्ट किया जाएगा. उन बच्चों की परवरिश की व्यवस्था अमेरिका में होनी थी. इस ऑपरेशन का नाम रखा गया, ‘ऑपरेशन बेबीलिफ़्ट’.

04 अप्रैल, 1975 को पहला प्लेन साइगॉन से उड़ा. 250 बच्चों और 78 सैनिकों के साथ. कई बच्चे तो इतने छोटे थे कि उन्हें आरादायक टोकरी में रखकर प्लेन की सीट पर सुलाया गया था. प्लेन को हवा में उड़ान भरे 12 मिनट ही हुए थे कि उसमें खराबी आ गई. प्लेन को वापस एयरपोर्ट की तरफ मोड़ा गया. लेकिन प्लेन एयरपोर्ट पर पहुंचने से पहले ही धान के खेत में क्रैश हो गया. प्लेन में सवार 78 बच्चों और 35 सैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई. बाकी बच्चों को बाद में दूसरे प्लेन से रवाना किया गया. ऑपरेशन बेबीलिफ़्ट साइगॉन पर विद्रोहियों के क़ब्ज़े तक चला. इस दौरान अमेरिका ने तकरीबन तीन हज़ार बच्चों को बाहर निकाल लिया था. इनमें से अधिकतर को सैन्य परिवारों ने गोद लिया.

दुनिया भर की बड़ी खबरें

नाइजीरिया में 100 से अधिक बच्चों का अपहरण

नाइजीरिया. पांच जुलाई को काडुना स्टेट में अपराधियों ने सौ से अधिक बच्चों का अपहरण कर लिया था. ये सभी बच्चे बेथल बैपटिस्ट स्कूल में पढ़ते थे. इनमें से 15 बच्चों को 22 अगस्त को रिहा कर दिया गया. अब तक कुल 56 बच्चे छूटकर आ चुके हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रिहाई के बदले किडनैपर्स को अच्छी-खासी रकम दी गई. एक बच्चे के लिए लगभग डेढ़ लाख रुपये. अभी भी 65 से अधिक बच्चे किडनैपर्स के चंगुल में फंसे हैं. पुलिस का कहना है कि वे सबको बचाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, पिछले दो महीने में उनकी एक भी कोशिश सफ़ल नहीं हो पाई है.

दिसंबर 2020 से अब तक एक हज़ार से अधिक स्कूली बच्चों का अपहरण हो चुका है. फिरौती देने के बाद इनमें से अधिकतर बच्चे अपने घर लौट आए. सरकार लगातार ये अपील करती रही है कि किडनैपर्स को फिरौती न दी जाए. लेकिन जब बच्चों को सुरक्षा देने की बात आती है, उसमें सरकारी तंत्र पिछड़ जाता है.

इटली में अनोखा मिशन

इटली के सार्डिनिया द्वीप पर लोग एक अनोखे मिशन में जुटे हैं. ये मिशन है – दो हज़ार साल पुराने जैतून के एक पेड़ को बचाना. इस पेड़ के साथ हुआ क्या था? पिछले कुछ हफ़्ते से इटली वाइल्डफ़ायर से परेशान था. इसी दौरान जैतून के पेड़ में भी आग लग गई. ये पेड़ दो दिनों तक आग में झुलसता रहा. अब जब आग थमी है, लोग अवशेषों के सहारे उसे फिर से ज़िंदा करने में जुटे हैं. वाइल्डफ़ायर के दौरान मिट्टी का तापमान 80 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. सबसे पहले उसमें ठंडा पानी डाला गया. पड़ोस के एक गांव ने वॉटर टैंक दिया.

प्लंबर ने पेड़ तक पानी पहुंचाने के लिए इरिगेशन सिस्टम तैयार किया. एक कंस्ट्रक्शन कंपनी ने इक़्विपमेंट्स दान किए. कंपनी पेड़ के लिए शेड भी तैयार कर रही है. ताकि सूरज की तपन से कोई परेशानी न हो. इस तरह पूरा गांव मिलकर पेड़ को बचाने में जुट गया है. जहां ये सब हो रहा है, वो इनकम के लिए पूरी तरह से जैतून के पेड़ों पर निर्भर था. आग ने वहां के 90 फ़ीसदी पेड़ों को ख़ाक कर दिया है. जिस पेड़ को बचाने की कोशिश हो रही है, वो उनमें सबसे पुराना था. लोगों का कहना है कि ये पेड़ उनकी पहचान का हिस्सा था. वे इसे यूंही बर्बाद नहीं होने देंगे. अगर सब ठीक रहा तो सितंबर-अक्टूबर तक पेड़ में पत्तियां निकलने लगेंगी.


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