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टोलो न्यूज़ः अफगानिस्तान का वो मीडिया ग्रुप, जो तालिबान को सबसे ज्यादा डराता है

तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद दो तस्वीरों ने लोगों को हैरान कर दिया. पहली तस्वीर उस महिला रिपोर्टर बेहेस्ता अर्गांद की थी जिसने एक तालिबान लड़ाके का इंटरव्यू लिया था. और दूसरी तस्वीर काबुल की सड़कों पर बेधड़क रिपोर्टिंग करती पत्रकार हसीबा एत्कपाल की थी. ये तालिबान के राज में अजूबा ही था. इन दो महिला रिपोर्टरों में एक और बात कॉमन थी. ये दोनों ही टोलो न्यूज़ (Tolo News) नाम के मीडिया संस्थान के लिए काम करती हैं.

टोलो न्यूज़ अफगानिस्तान का वो मीडिया ग्रुप है जिसने अफगान धरती को खबरों और मनोरंजन के नए तेवरों से रूबरू कराया. लेकिन अब ये तालिबान के निशान पर है. दुनियाभर में चर्चा है कि जल्द ही तालिबान टोलो न्यूज को बंद कराने वाला है. जानते हैं कि आखिर क्यों तालिबान इस न्यूज़ चैनल से इतना डरता है.

खतरा है, लेकिन डटे हैं

हाल ही में टोलो न्यूज़ पर 150 पत्रकारों, कैमरामैन और फोटोग्राफर का लिखा एक खुला खत छपा है. ये खत शनिवार 28 अगस्त को प्रकाशित किया गया. इसमें कहा गया है,

“मीडिया में काम करने वालों और उनके परिवारों के लिए बढ़ती चुनौती को ध्यान में रखते हुए हम विश्व समुदाय और यूनाइटेड नेशंस से गुजारिश करते हैं कि हमारी रक्षा करने के लिए कदम उठाएं. मीडिया में काम करने वाले कई लोग कह रहे हैं कि दुनिया इस मुश्किल घड़ी में चुप नहीं बैठेगी और दो दशक से बिना थके काम कर रहे अफगान पत्रकारों के लिए जरूर कोई कदम उठाएगी.”

टोलो न्यूज ने एक अफगान रिपोर्टर के हवाले से लिखा है,

“इस मुश्किल घड़ी में दुनिया को बस देखते नहीं रहना चाहिए. बल्कि हमारे लिए और हमारे परिवारों को बचाने के लिए कुछ करना चाहिए.”

एक अन्य रिपोर्टर रफीउल्लाह निकजाद कहते हैं,

“हम अनिश्चितता में जी रहे हैं. हम नहीं जानते कि हमारा भविष्य क्या है. हम नहीं जानते कि हमारे साथ क्या बर्ताव किया जाएगा. पूरी दुनिया को हमारी आवाज़ सुननी चाहिए.”

नफीज़ा अहमदी एक महिला पत्रकार हैं. लेकिन 15 अगस्त को तालिबान के कब्जे के बाद वो घर पर ही हैं. उनके ऊपर अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी है लेकिन वो कुछ नहीं कर सकतीं. उन्होंने टोलो न्यूज़ को बताया,

“बहुत से रिपोर्टरों का भविष्य अंधेरे में है. तालिबान को महिलाओं को काम करने देना चाहिए क्योंकि वे अपने घर की अकेली कमाने वाली हैं.”

ये सभी बातें सामने लाने वाला टोलो न्यूज़ अब खुद खतरे में है. चर्चा जोरों पर है कि तालिबान कभी भी टोलो न्यूज़ को बंद करने का फरमान जारी कर सकता है. टोलो न्यूज के को-ओनर साद मोहसेनी ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा है,

“मुझे तो इस बात पर ही आश्चर्य है कि टोलो न्यूज़ अब भी चल रहा है. हम तालिबान को अच्छी तरह जानते हैं कि वो क्या है.”

टोलो न्यूज़ से इतना डरा क्यों है तालिबान?

तालिबान और टोलो न्यूज़ का छत्तीस का आंकड़ा रहा है. टोलो न्यूज़ अमेरिका में एक खास तरह का खुलापन लाने का पहरुआ रहा है. यही चैनल था जिसने नए अंदाज़ में खबरें और विदेशी कार्यक्रम दिखाने का चलन शुरू किया. ये बात तालिबान को इस मीडिया ग्रुप के शुरू होने के बाद से ही खटकती रही है. तालिबान ने अमेरिकी सेना की मौजूदगी में भी टोलो न्यूज़ को निशाने पर लिया था.

ये जनवरी 2016 की बात है. तालिबान ने टोलो न्यूज़ को निशाना बनाया था. एक आत्मघाती हमलावार ने अपनी कार को टोलो न्यूज़ के स्टाफ को ले जा रही बस में टक्कर मारी. भारी धमाके के साथ टोलो न्यूज़ के 7 कर्मचारियों की जान चली गई और 15 घायल हो गए. तालिबान ने टोलो न्यूज़ को अश्लीलता परोसने वाला, अधर्मी, नग्नता और विदेशी संस्कृति को फैलाने वाला मीडिया संस्थान करार देते हुए हमले की जिम्मेदारी ली.

ये वो वक्त था जब अमेरिकी सेना के साथ अफगान सेना मुस्तैद थी. लेकिन अब अमेरिका जान छुड़ाकर भाग चुका है और अफगान सेना हथियार डाल चुकी हैं. ऐसे में टोलो न्यूज़ अब तालिबान के रहमो-करम पर है.

कई अफगान पत्रकारों को ट्रेनिंग देने वाले बीबीसी के पत्रकार एंड्रयू नॉर्थ न्यूयॉर्क टाइम्स से कहते हैं,

“ये समझना मुश्किल है कि कैसे टोलो न्यूज़ ने अफगानिस्तान में एक खास तरह के आजाद मीडिया को स्थापित किया है. टोलो इस मामले में मिसाल है. टोलो न्यूज़ आया और इसके आते ही अफगानिस्तान में सबकुछ बदल गया.”

टोलो न्यूज़ ने अफगानिस्तान में क्या-क्या बदल दिया, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि जब तालिबान 20 साल बाद अफगानिस्तान पर काबिज़ हुआ तो वहां 170 रेडियो स्टेशन खड़े हो चुके थे. सिर्फ काबुल में ही दर्जनों न्यूज़ चैनल खुल गए थे. लोग सोशल मीडिया पर बहसें करते और समाचार सुनते नजर आने लगे थे. ये सब अब खत्म सा होता दिख रहा है.

Taliban Kabul Afghanistan
टोलो न्यूज हमेशा से तालिबान के निशाने पर रहा है. तालिबान इसके कार्यक्रमों को अश्लील औऱ पश्चिमी सभ्यता फैलाने वाला बताता रहा है.
(फोटो-पीटीआई)

अफगानिस्तान का रूपर्ड मर्डोक, जिसने टोलो न्यूज़ शुरू किया

1996 से 2001 तक तालिबान ने हर तरह के मीडिया को बैन कर रखा था. फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान में एंट्री की और तालिबान को पीछे धकेल दिया. साल 2001 के बाद भी अफगानिस्तान में ज्यादातर सरकारी मीडिया ही था. लेकिन धीरे-धीरे दूसरे मीडिया की आहट शुरू हुई. इसकी शुरुआत करने वालों में एक शख्स ने बड़ी भूमिका निभाई. उसका नाम है साद मोहसेनी.

मोहसेनी अफगानिस्तान से जरूर थे, लेकिन उनका जीवन युद्धग्रस्त अफगानिस्तान के उन नागरिकों से अलग था जिनकी सुबह इस चिंता से शुरू होती कि आज जान बचेगी या नहीं. साद मोहसेनी के पिता यासिन मोहसेनी अफगानिस्तान के डिप्लोमेट रहे और साद का जन्म लंदन में हुआ. जीवन के शुरुआती 25 साल उन्होंने अपने पिता के साथ दुनिया देखते हुए बिताए. वो अपने पिता के साथ ही काबुल, वाशिंगटन, लंदन, इस्लामाबाद और टोक्यो जैसे शहरों में रहे.

साद मोहसनी के पिता जब टोक्यो में एक अफगानिस्तान के राजनयिक के तौर पर नियुक्त थे, तभी सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया. इसके बाद साद के पिता यासिन मोहसेनी ने टोक्यो में ही शरण ले ली थी. 1982 में उनका पूरा परिवार ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में जाकर बस गया.

साद मोहसेनी ने ऑस्ट्रेलिया में एक इंवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर अपना करियर शुरू किया. लेकिन फिर वही हुआ जो अक्सर होता है – जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै. पूरी दुनिया घूमघाम के साद मोहसेनी साल 2003 में अफगानिस्तान पहुंचे. उस समय तक अमेरिका तालिबान को काबुल से खदेड़ चुका था. ये वो वक्त था जब वहां कोई भी प्राइवेट मीडिया हाउस नहीं था.

मोहसेनी को पता था कि 20 सालों से खबरों और मनोरंजन के भूखे अफगानिस्तान में मीडिया समूह स्थापित करने का बिल्कुल सही मौका है. 2003 में साद मोहसेनी ने अपने भाईयों के साथ मिलकर अरमान एफएम नाम से देश का पहला प्राइवेट रेडियो स्टेशन लॉन्च किया. शुरुआत में उस रेडियो स्टेशन पर अफगान और वेस्टर्न पॉपुलर म्यूजिक ही बजता था. ये सब वही था जिसे 90 के दशक में तालिबान ने बैन कर दिया था.

अरमान एफएम ने तेजी से लोगों में जगह बनाई. फिर आया 2010 का साल. ये मोहसेनी के लिए टर्निंग पॉइंट बन गया. अपने भाईयों के साथ मिलकर उन्होंने टोलो न्यूज की नींव रखी. कुछ ही बरस में ये अफगानिस्तान का सबसे बड़ा मीडिया हाउस बन गया. टोलो न्यूज ने लोगों को नए अंदाज़ में न्यूज़ के अलावा अमेरिकी सीरीज़ औऱ फिल्मों से रूबरू कराया. साद ने वो काम कर दिखाया था जिसकी शायद ही कोई उम्मीद कर रहा था. यही कारण है कि साद मोहसेनी को अफगानिस्तान का रुपर्ट मर्डोक कहा जाता है.

मोहसेनी ने अपने मोबी ग्रुप के नाम से मीडिया ग्रुप बनाया. साल 2012 में मीडिया मुगल कहे जाने वाले रुपर्ट मर्डोक भी मोबी ग्रुप में माइनॉरिटी शेयरहोल्डर बने.

Tolo News Saad Mohseni
टोलो न्यूज़ को एक ब्रिटेन में पैदा हुए अफगान बैंकर ने शुरू किया. टोलो न्यूज़ के को फाउंडर साद मोहसेनी (राइट) को अफगानिस्तान का रूपर्ड मर्डौक भी कहा जाता है.

तालिबान ने 1996 में मीडिया के साथ क्या बर्ताव किया था?

‘तालिबान 2.0’ ने कई बार दावा किया है कि वो पहले वाला तालिबान नहीं है. उसमें बदलाव आ चुका है. ऐसे में ये भी जान लीजिए कि पिछली बार यानी 1996 में जब तालिबान आया था तो उसने मीडिया का क्या हाल किया था.

दुनियाभर में पत्रकारों के हक की लड़ाई लड़ने वाले एनजीओ कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की एक रिपोर्ट है. इसे अफगान गृह युद्ध में शामिल रहे एक युवक मसूद फरिवार ने तैयार किया है. वो अब अमेरिकी नागरिक और पत्रकार हैं. रिपोर्ट में मसूद लिखते हैं,

“तालिबान ने 1996 में काबुल पर कब्जा करते ही पढ़े-लिखे लोगों और पत्रकारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. बहुत से पत्रकार भाग कर पाकिस्तान, ईरान और सेंट्रल एशिया के देशों में चले गए और वहीं से स्वतंत्र पत्रकारिता की शुरुआत की. पुरानी समाचार एजेंसियों को खत्म कर दिया गया. दो नई न्यूज़ एजेंसियां बनाईं गईं. ये थीं अफगान इस्लामिक प्रेस और सहार न्यूज़ एजेंसी. यही पश्चिमी वायर सर्विसेज को अफगानिस्तान की भरोसेमंद न्यूज़ पहुंचाती थीं.

इसके अलावा तालिबान ने लोकल पत्रकारों को भी निशाना बनाया. पेशावर की रहने वाली एक अफगान पत्रकार को तब जेल भेज दिया गया जब वो 1996 में तालिबान शासन के दौरान अफगानिस्तान आई. इसके अलावा दो पाकिस्तानी पत्रकारों को जासूसी के शक में तालिबान ने हिरासत में ले लिया. तालिबान ने पत्रकारों को चिट्ठियां लिख कर धमकाया कि अगर तालिबान के बारे में कुछ उल्टा-सीधा लिखा तो जान से हाथ धोना पड़ सकता है.”
(पूरी रिपोर्ट यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.)

इसी तरह का आंखों देखा हाल बिजनेस इनसाइडर के पत्रकार एलेन चिन ने लिखा है. वो तब एक युवा रिपोर्टर थे और 1996 में तालिबान का शासन आने के बाद ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए काबुल पहुंच गए थे. एलेन उस समय का जिक्र करते हुए लिखते हैं,

“मैं तालिबान शासन में काबुल स्थित विदेश मंत्रालय के ऑफिस पहुंचा. मैं वहां जर्नलिस्ट के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन कराने गया था. तालिबान के सैनिकों को खुद अपनी सफलता पर भरोसा नहीं हो रहा था. वे ऑफिस हॉल में बंदूकें लेकर इधर-उधर घूम रहे थे. शरिया और इस्लाम के कट्टर नियमों के मानने वाले तालिबानी टीवी, म्यूजिक रिकॉर्डिंग तोड़ रहे थे. मैंने सड़क किनारे कैसेट और टूटे हुए टीवी पड़े देखे. सिनेमा हॉल के सामने तालिबान लड़ाकों ने फिल्म की रीलें निकाल कर उनमें आग लगा दी थी. पुलिस स्टेशन पर तालिबान का कब्जा था और उसके अहाते में टूटे हुए टेलिविजन सेट्स का टीला बन चुका था.”
(पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं)

अब अफगानिस्तान के मीडिया पर तालिबान का काला साया फिर बढ़ता जा रहा है. वहीं इससे उबर जाने की बात भी हो रही है. टोलो न्यूज के कंटेंट डायरेक्टर न्यूयॉर्क टाइम्स से कहते हैं कि वो अफगान माहौल के हिसाब से ढलने में माहिर हैं. वो याद करते हैं कि जब उनके बचपन में तालिबान का शासन था तो वो एक कंक्रीट के पीछे बैन डिश एंटीना लगा कर विदेशी फिल्में देख लिया करते थे. जानकार इस बात को लेकर उम्मीद जता रहे हैं कि पिछले 20 बरस में इंटरनेट और टीवी न्यूज़ के साथ एक पीढ़ी तैयार हुई है. इसे अचानक बोतल में बंद कर देना आसान नहीं होगा.

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