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अफगानिस्तान से शरणार्थियों की बाढ़ आई तो क्या करेगा भारत?

15 अगस्त 2021. भारत अपनी आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहा था और पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान (Afghanistan) के नागरिक आजादी के साथ अपने मूल अधिकारों से भी वंचित किए जा रहे थे. तालिबान (Taliban) ने काबुल (Kabul) पर कब्जा किया और अफगानिस्तान में अफरा-तफरी मच गई. तालिबान के इतिहास को देखते हुए सबको अपनी जान की चिंता थी. लोग अपना अपना शहर-अपना घर छोड़कर भागने लगे हैं. अपने ही देश से निकलने की ऐसी जल्दी दिखी कि जिसे जहां जो जगह मिली वो उधर ही भागता दिखा. लोग प्लेन के पहियों तक पर लटक गए.

अफगानिस्तान के इस संकट का असर आस-पड़ोस के देशों पर पड़ा. इनमें भारत भी शामिल है. भारत में रह रहे अफगान नागरिकों को वीज़ा खत्म होने की चिंता सताने लगी तो भारत सरकार इस बात को लेकर चिंतित दिखी कि शरणार्थियों की बाढ़ से कैसे निपटा जाए. इसलिए आज जानते हैं कि भारत में किसी देश के नागरिक को शरण देने का क्या सिस्टम है.

रोज़ हजारों की संख्या में देश छोड़ रहे हैं अफगान नागरिक

अफगानिस्तान के मौजूदा संकट के चलते दुनियाभर के बाकी देशों की तरह भारत पर भी शरणार्थियों को लेने का दबाव बना है. अमेरिकी मीडिया का अनुमान है कि पिछले 10 दिनों के दौरान हर रोज़ करीब 30 हजार अफगानी नागरिक देश छोड़ रहे हैं. ज्यादातर लोग पैदल या सड़क के रास्ते सीमावर्ती पाकिस्तान, ईरान और अल्बानिया के साथ ही भारत की तरफ भी बढ़ रहे हैं. बताया जा रहा है कि आम नागरिक ही नहीं कई खास लोग भी देश छोड़ कर भारत का रुख कर चुके हैं.

बीते सप्ताह से अब तक कई बड़े अफगानी नेता और सांसद भारत पहुंच चुके हैं. अफगानिस्तान के सांसद वहीदुल्लाह कलीमजई, अब्दुल अजीज हकीमी, अब्दुल कादिर जजई, मालेम लाला गुल और अफगानिस्तान के उच्च सदन के वरिष्ठ सलाहकार समेत करीब 12 सांसद और नेताओं ने भारत में शरण ली है. अफगान मुख्य वार्ताकार अब्दुल्ला अब्दुल्ला का परिवार भी फिलहाल भारत में रहता है.

किरी अत्री भारत में यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजी (UNHCR) की रिलेशंस ऑफिसर हैं. उन्होंने न्यूज18 से बातचीत में पिछले 20 सालों में भारत आए अफगान शरणार्थियों के बारे में बताते हुए कहा हैं,

“जुलाई 2021 तक भारत में UNHCR के पास 15467 अफगान शरणार्थी रजिस्टर्ड हैं.”

Afghanistan Kabul Aiport Plane
काबुल हवाई अड्डे पर विमान में चढ़ते लोग. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

जानकारों का मानना है कि अफगानिस्तान से भारत में शरण मांगने वालों की संख्या तेजी से बढ़ेगी. इधर, भारत सरकार  दो तरह से अफगानिस्तान के नागरिकों के भारत में आने या बने रहने की समस्या से निपट रही है.

# जल्दी वीजा देकर

अफगानिस्तान को ई-वीजा कैटेगिरी में डाला गया

भारत में कई अफगान नागरिक पढ़ाई करते हैं या दूसरे कामों की वजह से बने हुए हैं. वो वक्त-वक्त पर अफगानिस्तान जाते हैं और वापस आते हैं. लेकिन बदले हुए हालात में वो अफगानिस्तान जाना ही नहीं चाहते. इसे देखते हुए भारत ने वीजा नियमों में बदलाव किया है. गृह मंत्रालय ने इलेक्ट्रॉनिक वीजा की एक नई कैटेगरी शुरू की है, ताकि भारत आने वाले अफगानियों को जल्द से जल्द वीजा मिल सके.

आजतक की खबर के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक वीजा की नई कैटेगरी e-Emergency X-Misc Visa शुरू की गई है. इमरजेंसी सेवा के तहत सभी अफगानी नागरिक वीजा के लिए अप्लाई कर सकते हैं. जो भी अफगानी नागरिक (हिंदू, सिख या कोई और) चाहे वीजा के लिए अप्लाई कर सकता है. हालांकि उसे वीजा देना है या नहीं, इसका फैसला भारतीय दूतावास करेगा. अभी तक अफगानी नागरिकों को ई-वीजा नहीं दिया जाता था, लेकिन अफगानिस्तान के हालात को देखते हुए अफगानी नागरिकों को भी ई-वीजा दिया जाएगा. पहली बार ई-वीजा 6 महीने के लिए दिया जाएगा.

क्या होता है ई-वीजा?

किसी भी देश में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है. मसलन अगर आपको अमेरिका जाना है तो भारत में स्थित अमेरिकी एंबेसी जाकर वीजा लेना होगा. उसकी फीस भरनी होगी. कई देश वीजा के लिए इंटरव्यू लेते हैं. कई देशों ने सहूलियत बढ़ाने के लिए ई-वीजा या इलेक्ट्रॉनिक वीजा देने का सिस्टम शुरू कर दिया है. मतलब कागजी कार्रवाई से लेकर एंबेसी में जाने का झंझट खत्म. सब काम ऑनलाइन ही हो जाएगा.

भारत ने भी कुछ देशों को ये सहूलियत दे रखी है. मतलब उन्हें अपने देश में भारत की एंबेसी जाने की जरूरत नहीं है. वो सीधे एंबेसी के वेब पोर्टल पर जाकर वीजा एप्लाई कर सकते हैं. वीजा मिलने और उसकी अवधि से लेकर रिजेक्ट होने तक की जानकारी भी यहीं मिल जाएगी.

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किसी भी दूसरे देश में जाने और ठहरने के लिए वीजा की जरूरत होती है. भारत ने अफगानिस्तान के नागरिकों के लिए ई-वीजा की सुविधा शुरू करने की घोषणा की है. (फोटो- AP)

# शरण देकर

क्या है शरण देने का तरीका?

जहां तक बात दूसरे देश के नागरिक को भारत में शरण देने की है तो ये मामला काफी जटिल है. सबसे बड़ी चुनौती राज्य और केंद्र सरकारों के अधिकारों को लेकर है. कानून व्यवस्था राज्य का विषय होता है, जबकि नागरिकता केंद्र सरकार का. इसकी वजह से ये मामला लंबा खिंचता है. मिसाल के तौर पर म्यांमार का मामला ही लें. वहां से आने वाले शरणार्थी मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आ रहे हैं. ऐसे में किसी भी तरह की गड़बड़ न हो, इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार पर है. लेकिन चूंकि मामला विदेशी नागरिकों से जुड़ा है, इसलिए केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है.

भारत ने भले ही शरणार्थियों के लिए यूनाइटेड नेशंस के बनाए नियम-कायदों पर दस्तखत न किए हों, लेकिन वो इसके अलावा भी कई तरह के समझौतों से बंधा है. इनमें से एक है यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स कमीशन (UNHRC). अपने देशों में परेशानी झेल रहे नागरिकों को दूसरे देशों में शरणार्थी के तौर पर बसाने के काम में ये संस्था मदद करती है. मानवाधिकार के मुद्दों से जुड़ी ये संस्था भारत में भी काम करती है. इसके ऑफिस दिल्ली और चेन्नई में हैं, जहां शरणार्थी अप्लाई करते हैं.

शरण मांगने के लिए ये आधार जरूरी हैं

# शरण मांगने वाले को ये दिखाना पड़ता है कि उसे अपने देश में बहुत खतरा है और वह हर हाल में अपना देश छोड़ने को मजबूर है.
# शरण मांगने वाले को ये सिद्ध करना होता है कि उसे उसकी जाति, धर्म, पहचान, राजनीतिक विचारधारा या किसी सामाजिक समूह का हिस्सा होने की वजह से उसके देश में परेशान किया जा रहा है.
# ये शर्तें पूरी करने के बाद शरण लेने वाले को यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजी (UNHCR)  के दिल्ली या चेन्नई ऑफिस जाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है. ये एक जटिल व्यक्तिगत प्रक्रिया है. इसमें शरणार्थी और उसके परिवार के सदस्यों (अगर कोई है) को सेंटर पर मौजूद होना होता है.
# सेंटर पर मौजूद अधिकारी शरणार्थी से बात करके उसका केस समझते हैं. पता लगाते हैं कि केस रजिस्टर करने लायक है भी कि नहीं.
# इसके बाद जरूरी कागजात मांगे जाते हैं. इनमें शामिल हैं-

– अगर पहले से UNHCR में रजिस्ट्रेशन हो चुका है तो उसका केस नंबर
– पासपोर्ट, राष्ट्रीयता को साबित करने वाला कोई डॉक्युमेंट
– जन्म प्रमाणपत्र, बच्चों का वैक्सिनेशन सर्टिफिकेट
– मैरिज या डिवोर्स सर्टिफिकेट
– इनके अलावा अन्य डॉक्युमेंट्स, जो केस मजबूत कर सकें, जैसे एजुकेशनल क्वॉलिफिकेशन या कोई खास स्किल से जुड़ा डॉक्युमेंट

# इस सबके बाद फॉर्म भरने की प्रक्रिया शुरू होगी. अगर एक भी डॉक्युमेंट नहीं है तो ये भी फॉर्म में दर्ज किया जाएगा. तस्वीर खींची जाएगी. बायोमैट्रिक स्कैनिंग, जिसमें फिंगरप्रिंट और आंखों की पुतलियों को स्कैन किया जाता है.
# एक बार फॉर्म जमा होने के बाद “Under Consideration Certificate” (UCC) दे दिया जाता है. इसका मतलब शरण लेने का मामला सरकार को भेज दिया गया है.
# अमूमन 20 महीने के भीतर आवेदक का इंटरव्यू लिया जाता है. इसमें उसके दावे को परखा जाता है. अगर उसके दावे में दम लगता है तो शरणार्थी का स्टेटस दे दिया जाता है.
# अगर इंटरव्यू के बाद शरण देने का केस रिजेक्ट हो जाता है तो 30 दिन के भीतर उसके खिलाफ अपील की जा सकती है.

अफ़ग़ानिस्ता रेफ़्यूजी
तालिबानी आतंक से डरकर अफ़गानिस्तान के लाखों लोगों ने पाकिस्तान समेत अन्य पड़ोसी मुल्कों में शरण ली है.

किसे शरण मिली, किसे नहीं?

आवेदन की इस पूरी कवायद में एक बात ध्यान रखने वाली है. किसी भी नागरिक को शरण देने या न देने का फैसला पूरी तरह से देश की सरकार करती है. वो मामले को समझ कर, सारे राष्ट्रीय और अतरराष्ट्रीय गुणा-गणित लगाने के बाद ही किसी नागरिक को शरण देने का फैसला लेती है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत ने श्रीलंका में LTTE संकट के वक्त, 1989 में म्यांमार में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के चलते और बांग्लादेश संकट के वक्त बिना जरूरी कागजात के ही बहुत से लोगों को शरणार्थी का दर्जा प्रदान किया था. लेकिन 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने म्यांमार से आए 40 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने से इन्कार करके उन्हें वापस भेज दिया था.


वीडियो – अफगानिस्तान के इन दो पड़ोसी देशों को सता रहा तालिबान का डर!

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