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अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता देने का क्या कोई सिस्टम है?

अफगानिस्तान (Afghanistan) पर काबिज होने के बाद से तलिबान (Taliban) दो बातें बराबर दोहरा रहा है. एक कि हम किसी पर कोई जुल्म नहीं करेंगे और दूसरी सभी देश अपने-अपने दूतावास अफगानिस्तान में खुले रखें. पहली बार उदारवादी बनने की कोशिश में तालिबान 2.0 के प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने कहा,

“अमेरिका को काबुल में अपनी राजनयिक मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए. उनके साथ हमारा संवाद चैनल है और हम उम्मीद करते हैं कि वे काबुल में अपना दूतावास फिर खोलेंगे. हम उनके साथ व्यापार संबंध भी रखना चाहते हैं.”

एक वक्त अपने जुल्मों के लिए कुख्यात तालिबान आखिर इतनी नरमी क्यों दिखा रहा है? तालिबान सरकार बाकी देशों को अफगानिस्तान में बने रहने की चिरौरी काहे कर रही है? वो भी तब जब दुनिया के किसी देश ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.

इस रिपोर्ट में जानेंगे कि किसी देश की सरकार को मान्यता देने का मतलब क्या होता है? किसी देश की सरकार को अगर दुनिया मान्यता देती है तो उसे इससे फायदा क्या होता है? क्या इसका कोई स्टैंडर्ड तरीका होता है?

अफगानिस्तान में तालिबान, दुनिया ऊहापोह में

15 अगस्त 2021. काबुल पर तालिबान ने कब्जा कर लिया. इसके साथ ही दुनियाभर में राजनीतिक ऊहापोह शुरू हो गई. तालिबान को सरकार मानें या नहीं? दुनिया 1996 से 2001 तक चले तालिबान के जालिम शासन को अभी भूली नहीं थी. सो तालिबान 2.0 पर भरोसा करे तो कैसे. ऐसे में सबने Wait and Watch, मतलब देखो और इंतजार करो वाली पॉलिसी अपना ली है. फिलहाल तालिबान की पैरवी करने वाले देशों, जैसे पाकिस्तान, चीन और रूस ने भी तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.

इस बारे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर असमेर बेग़ कहते हैं,

“तालिबान को लेकर दुनियाभर के साथ बड़ी अलग स्थिति बनी हुई है. कोई भी सामने आकर उनको मान्यता नहीं देना चाहता. चीन और पाकिस्तान जैसे उनके करीबी मुल्क भी ऐसा करने से बच रहे हैं. ये नाज़ुक मामला है और सभी सावधानी से आगे बढ़ना चाहते हैं.”

यूरोपियन यूनियन के प्रवक्ता पीटर स्टैनो ने तालिबान सरकार की मान्यता को लेकर मीडिया में बयान दिया,

“तालिबान को उनके काम के जरिए परखा जाएगा. कैसे वो विश्व बिरादरी को किए गए वादों को निभाता है और कैसे वो लोकतंत्र के मूलभूत नियम और कानून के शासन को अपनाता है. इसमें सबसे बड़ी परख मानवाधिकार और खासतौर पर महिलाओं के अधिकार को लेकर होगी.”

काबुल स्तिथ अफगान राष्ट्रपति भवन पर कब्जा जमाने के बाद तालिबान (Taliban) के लड़ाके. (फोटो: एपी)
काबुल स्तिथ अफगान राष्ट्रपति भवन पर कब्जा जमाने के बाद तालिबान (Taliban) के लड़ाके. (फोटो: एपी)

किसी देश की सरकार को मान्यता देने का क्या सिस्टम है?

किसी भी सरकार को कोई देश मान्यता देता है या नहीं ये उसके अपने हितों पर निर्भर करता है. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद लल्लनटॉप से बातचीत में कहते हैं,

“इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि UN जैसी संस्था से मान्यता मिलने के बाद अक्सर दुनियाभर के देश किसी भी देश की सरकार को मान्यता दे ही देते हैं. इसके पीछे ताकतवर देशों का हित काम करता है.”

एमएमयू में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर बेग इसे अलग नजरिए से देखते हैं. वो कहते हैं,

“किसी भी देश को मान्यता देने या ना देने का मामला वैसा ही है जैसा हम अपने अमीर या ताकतवर पड़ोसी के साथ कर सकते हैं. हम उससे संबंध रखें या ना रखें ये हमारे ऊपर है. हम किसी को अमीर मानने से इंकार कर दें तो कोई क्या कर लेगा. लेकिन कूटनीति में हर देश अपने हिसाब से फैसला लेता है. चीन बहुत बड़ा मुल्क था. उसे 1949 में आजादी मिली, लेकिन अमेरिका ने उसे मान्यता नहीं दी. साल 1979 में अमेरिका ने चीन की सरकार को मान्यता दी.”

बता दें कि भारत में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने 1950 में ही चीन की सरकार को मान्यता दे दी थी.

UN की मान्यता कैसे मिलती है?

तकनीकी तौर पर किसी देश की सरकार को मान्यता देने के प्रोसेस को Diplomatic Recognition या कूटनीतिक मान्यता देना कहते हैं. मतलब ये कि उस देश के साथ राजनयिक स्तर पर संबंध कायम हो गए हैं. ऐसे हाल में दोनों देश एक-दूसरे के यहां राजदूतों के आने-जाने का सिलसिला शुरू करते हैं. संयुक्त राष्ट्र में शामिल देश किसी देश की सरकार को मान्यता देने के बाद उसकी सदस्यता के पक्ष में वोटिंग करवाने की मांग कर सकता है. कोई देश संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनेगा इसका एक प्रोसेस भी है.

# कोई भी देश यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुखिया यानी सेक्रेटरी जनरल को अर्जी देकर सदस्य बनाने की दरख्वास्त कर सकता है.
# इसके बाद यूनाइटेड नेशंस की सिक्योरिटी काउंसिल इस अर्जी पर फैसला लेती है. किसी भी सिफारिश को तभी स्वीकार किया जाता है जब उस पर सिक्योरिटी काउंसिल के 15 मेंबर्स में से 9 लोगों ने सकारात्मक वोट किया हो. इसमें भी अगर सिक्योरिटी काउंसिल के परमानेंट मेंबर चीन, फ्रांस, रूस, यूके और अमेरिका में से किसी ने असहमति जता दी तो प्रोसेस रुक जाता है.
# सिक्योरिटी काउंसिल से प्रस्ताव पास हो जाने के बाद जनरल एसेंबली में पहुंचता है. यहां पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देश वोटिंग करते हैं. वोटिंग में अगर दो-तिहाई वोट मिलते हैं तो वो देश संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से एक देश के तौर पर मान्यता पा जाता है.

हालांकि कई देश यूएन की मान्यता नहीं भी लेते हैं. स्विट्जरलैंड इसका उदाहरण है. वो 2002 तक यूएन का हिस्सा नहीं था. ऐसा उसने अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए किया. यूएन का सदस्य ना होते हुए भी स्विट्जरलैंड की सरकार को मान्यता भी मिली हुई थी और दूसरे देशों से उसके संबंध भी चल रहे थे.

इस हिसाब से एक पेच और है. जरूरी नहीं कि किसी देश को मान्यता मिल जाने के बाद उस देश की सरकार को मान्यता मिली ही रहे. अफगानिस्तान के केस में भी ऐसा ही हुआ है. पिछली सरकार में अफगानिस्तान की तरफ से नियुक्त राजदूत अब भी यूनाइटेड नेशंस में हैं. लेकिन अब उसका कोई मतलब नहीं रह गया है. जो सरकार देश पर काबिज़ है उन्हें मानने को दुनिया तैयार नहीं है. ये नई स्थिति है. इसलिए दुनिया फूंक-फूंक कर कदम रख रही है.

प्रोफेसर बेग कहते हैं,

“डिप्लोमैसी बहुत धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया है. इसमें हड़बड़ी नहीं होती. चीजों का इंतजार करके अच्छी तरह से हिसाब-किताब लगाया जाता है. उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाता है. किसी भी देश की सरकार को मान्यता देने या कब तक ना देने का फैसला हर देश अपने नफा-नुकसान के हिसाब से ही करता है.”

डी फैक्टो, डी ज्यूरे

किसी भी देश को यूएन में मान्यता देने के लिहाज से दो शब्दों को समझना बहुत जरूरी है. एक डी फैक्टो (De facto) और दूसरा डी ज्यूरे (De jure). इसमें डी फैक्टो का मतलब है कि परिस्थितिवश या कहें कि मजबूरी में किसी सरकार को मान्यता देना. ये अस्थायी मामला है. 31 अगस्त को खबर आई कि यूएन की सिक्योरिटी काउंसिल ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को ‘डी फैक्टो’ मान्यता दे दी है. फिलहाल यूएन के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था.

हालांकि डी फैक्टो मान्यता को कभी भी वापस लिया जा सकता है. ये तालिबान सरकार को कानूनी मान्यता देना तो नहीं है, लेकिन इसे एक कदम आगे बढ़ना जरूर कहा जा सकता है.

असल खेल ‘डी ज्यूरे’ मान्यता देने का है. ये एक परमानेंट स्थिति है. मतलब इस स्थिति में किसी भी देश की सरकार को स्थायी मान्यता मिल जाती है. विश्व समुदाय जब किसी सरकार को लेकर निश्चित हो जाता है तभी ये स्टेटस दिया जाता है.

'वार ऑन ड्रग्स' अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का उछाला टर्म है. इसी के चलते अमेरिका ने ड्रग्स के खिलाफ जो अभियान चलाया उसके लिए इस टर्म उछाला गया था.
किसी भी देश को और उसकी सरकार को मान्यता देने का काम सबसे पहले यूनाइडेट नेशंस की सुरक्षा परिषद करती है. (सांकेतिक तस्वीर)

किसी सरकार को मान्यता मिलने के फायदे क्या होते हैं?

सबसे बड़ा फायदा है कारोबार. सरकार को मान्यता मिलने से उस देश के साथ बाकी दुनिया की आर्थिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं. अफगानिस्तान के केस में ये इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तालिबान के आने के बाद वहां दूसरे देशों से कारोबार ठप पड़ गया है. देश बुरे आर्थिक हालात की तरफ बढ़ रहा है. अफगानिस्तान को दूसरे देशों से मिलने वाली आर्थिक मदद पूरी तरह से बंद हो चुकी है. सरकार को मान्यता मिली तो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से लोन मिलने का रास्ता खुलेगा.

फिलहाल यूरोपियन यूनियन, अमेरिका और ब्रिटेन ने अफगानिस्तान के लिए अपने सभी सहायता कार्यक्रम रोक दिए हैं. अफगानिस्तान सेंट्रल बैंक का जो रिजर्व पैसा दूसरे देशों में है, उसे भी फ्रीज़ कर दिया गया है. आईएमएफ पिछली सरकार को सितंबर में 400 मिलियन डॉलर यानी तकरीबन 2900 करोड़ रुपए देने वाला था. लेकिन तालिबान सरकार आने के बाद उसने वो पैसा भी रोक दिया है. मतलब साफ है कि जब तक सरकार को मान्यता नहीं मिलती डॉलर फंसे रहेंगे.

मान्यता देने पर भारत की कूटनीति

भारत ने भी कई देशों को मान्यता नहीं दे रखी है. ऐसे ही कुछ देश हैं कोसोवो, सोमालीलैंड, ताइवान, अब्खाजिया, सहरावी रिपब्लिक और साउथ ओसेतिया. कोसोवो को लेकर साल 2018 में एक अजीब स्थिति पैदा हो गई थी. तब भारत में महिला बॉक्सिंग की वर्ल्ड चैंपियनशिप चल रही थी. कोसोवो की महिला बॉक्सर डोंजेटा सदिकू को भी इसमें हिस्सा लेना था. चूंकि भारत इस देश को मान्यता नहीं देता, इसलिए उन्हें वीज़ा देने से इनकार कर दिया गया.

इसी तरह का फैसला भारत ने ताइवान के मामले में ले रखा है. वो ताइवान को चीन से अलग देश नहीं मानता. हालांकि भारत ने 1947 से 1950 के बीच ताइवान को मान्यता दी थी, लेकिन फिर वापस ले ली.

कहने का मतलब ये कि भारत भी बदली परिस्थियों के हिसाब से देशों से अपने रिश्तों के डायनामिक्स सेट करता रहा है. इसमें कई इस्लामिक देश हैं, जहां आदर्श लोकतंत्र नहीं है. लेकिन भारत से उनके रिश्ते अच्छे हैं और भारत उन्हें मान्यता भी देता है. मिसाल के तौर पर ईरान को ले सकते हैं. उससे भारत के रिश्ते आजादी के बाद से ही काफी मजबूत रहे हैं. भारत के तीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई ईरान यात्रा पर गए.

ईरान के शाह ने भी 1978 में भारत की यात्रा की थी. लेकिन 1979 में एक बड़ी घटना घटी और दुनियाभर में ईरान को लेकर हलचल शुरू हुई. ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. लोगों ने वहां शाह की सरकार को उखाड़ फेंका. धार्मिक गुरु अयातउल्ला खुमैनी को देश का सुप्रीम लीडर चुना गया. शरिया के नियमों के हिसाब से कानून तय हुए. एक लोकतंत्र समर्थक देश के तौर पर भारत के सामने भी ईरान की सरकार को मान्यता देने या ना देने की चुनौती सामने आई.

इसके चलते भारत-ईरान के रिश्ते ठंडे बस्ते में चले गए. फिर 1990 के दशक में संबंध सुधरने शुरू हुए. पीएम नरसिंह राव ने 1993 में ईरान का दौरा किया. 1995 में ईरानी प्रेसिडेंट अकबर हाशमी रफसंजानी भारत आए. रिश्ते फिर से चल पड़े. अमेरिका ईरान को ‘बुराई की धुरी’ कहता है तो भारत पारंपरिक दोस्त.

फिलहाल तालिबान के मामले में सब इंतजार कर रहे हैं उस कुंजी का, जो रिश्तों को लेकर पैदा हुई ऊहापोह का ताला खोले.


वीडियो – दी लल्लनटॉप शो: भारत की अध्यक्षता में UN ने तालिबान को ‘सशर्त मान्यता’ किस आधार पर दी?

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