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किस आतंकवादी संगठन ने नवजात बच्चों को क़त्ल किया?

12 मई, यानी बीते हुए कल का दिन यूं देखें तो अफ़गानिस्तान के बाकी दिनों सा ही था. हर रोज़ की तरह सुबह सूरज उगा. शाम ढली. कुछ इस इलाके में, कुछ उस इलाके में, रोज़ की तरह कल भी लोग मारे गए. शाम ढलते-ढलते सारा हिसाब-क़िताब जोड़कर करीब 100 जानें गईं वहां. वहां 100-50 लोगों का मरना आम है. हो सकता है आपको क्रूर लगे. मगर वहां से आने वाली एकाध दर्ज़न हत्याओं की ख़बर दुनिया में हेडलाइन्स नहीं बनातीं.

मगर कल हेडलाइन्स बनीं.
इसलिए नहीं कि नानगरहार प्रांत में एक पुलिस कमांडर को दफ़नाने आए लोगों पर फिदायीन अटैक हुआ. इसलिए नहीं कि उस फिदायीन हमलावर ने ठीक तब बम फोड़ा, जब लाश को दफ़्न करने से ऐन पहले लोग फ़ातिहा पढ़ रहे थे. हेडलाइन्स बनने का कारण ये भी नहीं कि एक लाश को दफ़नाने आए 25 लोग इस हमले में ख़ुद लाश बन गए. हेडलाइन्स बनीं नानगरहार से करीब 200 किलोमीटर दूर बसे काबुल में हुए एक हत्याकांड पर. जहां सुबह के 10 बजे पुलिस की वर्दी पहने तीन हथियारबंद आतंकवादी एक अस्पताल में घुस आए. जो दिखा, उसे गोलियों से भून डाला.

मालूम है, कौन सा हिस्सा उनका निशाना बना?
मैटरनिटी वॉर्ड. अस्पताल का वो हिस्सा, जहां गर्भवती मांएं अपने बच्चों को जन्म देती हैं. जहां पालने में रखकर नवजात बच्चों को शुरुआती इलाज दिया जाता है. हमलावरों ने इस वॉर्ड को निशाना बनाया. 16 लोग मारे गए. नई मांएं. अस्पताल के स्वास्थ्य कर्मी. एक पुलिस अफ़सर. मरने वालों में दो नवजात बच्चे भी थे. इतने नवजात कि उन्होंने अभी सूरज तक नहीं देखा था. नाम तक नहीं रखा गया था अभी तक उनका. इस हमले के बाद आई तस्वीरों में एक वो तस्वीर भी है, जहां गोलियों से छलनी एक औरत ज़मीन पर पड़ी है. उसकी लाश ने अब तक अपने बच्चे को सीने से चिपकाया हुआ है. मां अपनी जान तो नहीं बचा पाई, मगर बच्चे को बचा लिया.

अफ़गानिस्तान में पहले भी अस्पतालों पर हमले हुए हैं. वहां कोई जगह सुरक्षित नहीं मानी जाती. आप कभी भी, कहीं भी मारे जा सकते हैं. मगर ऐसे में भी मैटरनिटी वॉर्ड पर हुए इस हमले ने लोगों को झकझोर दिया है.

हमला किसने कराया?
जिस मैटरनिटी क्लिनिक पर ये हमला हुआ, उसे एक अंतरराष्ट्रीय संस्था चलाती है. संस्था का नाम है- डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स. ये संस्था युद्ध प्रभावित क्षेत्रों और महामारियों से त्रस्त गरीब देशों में लोगों को मेडिकल सुविधा मुहैया कराती है. इस वजह से साल 1999 में इन्हें नोबेल शांति पुरस्कार भी मिल चुका है. इस हमले की जिम्मेदारी अभी किसी ने नहीं ली. मगर इसके पीछे अफ़गानिस्तान में सक्रिय इस्लामिक स्टेट या फिर तालिबान का हाथ होने की आशंका है. तालिबान ने इस हमले में अपना हाथ होने से इनकार किया है. मगर इस इनकार से उनके ऊपर शक़ ख़त्म नहीं हो जाता. दिसंबर 2019 में इसी तालिबान ने ज़ाबुल प्रांत स्थित एक अस्पताल के परिसर में एक धमाका किया था. उस विस्फ़ोट में 20 लोग मारे गए थे.

अफ़गानिस्तान में पिछले कई दशकों से ऐसा ही मार-काट का माहौल है. थोड़े शॉर्ट में ये अतीत सुनाते हैं आपको.

कोल्ड वॉर गेम्स
ये 70 के दशक की बात है. तब सोवियत अफ़गानिस्तान में अपना प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहा था. उसके समर्थन से बनी कम्यूनिस्ट सरकार ने अफ़गानिस्तान को मॉर्डन बनाना चाहा. कट्टरपंथियों ने कहा, ये ग़ैर-इस्लामिक है. सरकार का विरोध शुरू हुआ. उधर दिसंबर 1979 में सोवियत ने अफ़गानिस्तान पर हमला कर दिया. ये जगह अब सोवियत-अमेरिका के कोल्ड वॉर का अड्डा बन गई.

सोवियत से लड़ने के लिए अफ़गान मुजाहिदीनों की फौज़ इकट्ठी हुई. इनके पीछे था अमेरिका. मगर इस जंग में कोई पक्ष जीत नहीं पा रहा था. लड़ाई लंबी खिंची, तो सोवियत ने यहां से निकलने में बेहतरी समझी. फरवरी 1989 में वो अफ़गानिस्तान से निकल आया. पीछे अफ़गानिस्तान में रह गई उसके समर्थन वाली नजीबुल्लाह सरकार. नजीबुल्लाह और मुजाहिदीनों की लड़ाई जारी रही.

मुजाहिदीनों ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया
दिसंबर 1991 में इधर मॉस्को टूटा. और चार महीने बाद अफ़गानिस्तान में उसकी मातहत नजीबुल्लाह सरकार गिर गई. मुजाहिदीनों ने काबुल पर कब्ज़ा कर लिया. ऐसा होना करीब-करीब तय ही था. इसीलिए तो अप्रैल 1992 की शुरुआत में ही नजीबुल्लाह ने अपनी पत्नी और बेटियों को नई दिल्ली रवाना कर दिया था. अब नजीबुल्लाह को ख़ुद भी भागकर दिल्ली पहुंचना था. कहते हैं कि UN ने नरसिम्हा राव सरकार से उनके असाइलम की बात कर ली थी. मगर नजीबुल्लाह दिल्ली नहीं आ सके. उनके ही पुराने वफ़ादारों ने उन्हें दगा दे दिया. नजीबुल्लाह को काबुल स्थित UN कंपाउंड में शरण लेनी पड़ी.

लिटरली- विद्या की अर्थी
मुजाहिदीनों के सपोर्ट से अफ़गानिस्तान में बदरुद्दीन रब्बानी की सरकार बन गई. मगर रब्बानी को बस एक साल सत्ता में रहने की मोहलत मिली थी. इसके बाद उन्हें सत्ता का बेटन किसी और को थमाना था. मगर रब्बानी ने ऐसा नहीं किया. नतीजा, सिविल वॉर शुरू हो गया. इधर काबुल पर कब्ज़े के लिए लड़ाई हो रही थी. उधर बाकी अफ़गानिस्तान हाथ से फिसलता गया. कई लोगों ने अपने-अपने मिलिशिया ग्रुप, यानी सेनाएं बना लीं. इसी अराजकता की स्थिति में उभरा एक गुट- तालिबान. पश्तो में तालिबान का मतलब होता है विद्यार्थी. इस गुट में शामिल पश्तून कबीलाई युवा पाकिस्तान के मदरसों से पढ़कर आए थे. इनका सरगना था मुल्ला मुहम्मद ओमर, जो ख़ुद भी कभी सोवियत से लड़ने वाले मुजाहिदीनों में शामिल था.

सार्वजनिक तौर पर लगों को फांसी लटकाना. पत्थर मारकर मौत देना. चोरी करने वाले के हाथ काट देना. ये चीजें आम हो गईं. सिनेमा, संगीत, टीवी, सब पर पाबंदी लग गई. लड़कियों का स्कूल जाना बैन हो गया. 2001 में तालिबान ने बामियान की बुद्ध मूर्तियां तोड़ डालीं. इस जलालत, इन बर्बरताओं में उसके दो बड़े मददगार थे पाकिस्तान और सऊदी अरब (फ़ोटो: AFP)
सार्वजनिक तौर पर लगों को फांसी लटकाना. पत्थर मारकर मौत देना. चोरी करने वाले के हाथ काट देना. ये चीजें आम हो गईं. सिनेमा, संगीत, टीवी, सब पर पाबंदी लग गई. लड़कियों का स्कूल जाना बैन हो गया. 2001 में तालिबान ने बामियान की बुद्ध मूर्तियां तोड़ डालीं. इस जलालत, इन बर्बरताओं में उसके दो बड़े मददगार थे पाकिस्तान और सऊदी अरब (फ़ोटो: AFP)

…और काबुल गिर गया
नवंबर 1994 में कांधार पर कब्ज़ा. सितंबर 1995 में हेरात शहर पर जीत. और ठीक एक साल बाद 26 सितंबर, 1996 को तालिबान ने हासिल की अपनी सबसे बड़ी जीत. उसने काबुल फ़तह कर लिया.

सरकार और उसकी फ़ौज, दोनों काबुल छोड़कर भाग गए थे. पीछे अनाथ छोड़ गए वहां की 10 लाख आबादी को. जिन्हें अब तालिबान ने अपनी प्रजा बना लिया. मगर ये जीत काफी नहीं थी उनके लिए. उन्हें अपना ख़ौफ़ बनाना था. इसी नीयत से तालिबान के लड़ाके घुसे UN कंपाउंड में. चार साल से वहां छुपे नजीबुल्लाह और उनके भाई को घसीटते हुए बाहर लाए. उन्हें ख़ूब यातनाएं दीं. नजीबुल्लाह का लिंग काट दिया. फिर गाड़ी के पीछे बांधकर नजीबुल्लाह को घसीटते ले गए प्रेजिडेंशल पैलेस. वहां एक लैंप पोस्ट पर नजीबुल्लाह की लाश टांग दी. खून से लथपथ लाश की खिल्ली उड़ाने में कोई कसर न रह जाए, ये सोचकर तालिबानियों ने लाश के मुंह में सोवियत के नोट और सिगरेट ठूंस दिए.

क़िस्मत देखिए, अप्रैल 1992 से सितंबर 1996 तक काबुल स्थित UN कंपाउंड में शरण लेकर बैठे रहे नजीबुल्लाह. कई बार भागने की कोशिश की. मगर कामयाब नहीं हुए. सितंबर 1996 में जब तालिबान काबुल फ़तेह करने को था, तब मुजाहिदीन कमांडर अहमद शाह मसूद ने नजीबुल्लाह को शरण देने का प्रस्ताव भिजवाया. कहा, हेलिकॉप्टर से पंजशिर आ जाओ. मगर नजीबुल्लाह नहीं गए. उन्हें पता नहीं था कि महीना ख़त्म होने से पहले तालिबान इतनी निर्ममता से उनकी हत्या कर देगा.

तालिबान ने कहा, अब से अफ़गानिस्तान बन गया है इस्लामिक अमीरात. और इस अमीरात का अमीर अल-मुमिनिन, यानी कमांडर है मुल्ला उमर.

तस्वीर में नजीबुल्लाह और उनके भाई की लाश लटक रही है, पास में खड़े हैं तालिबानी (फ़ोटो: AFP)
तस्वीर में नजीबुल्लाह और उनके भाई की लाश लटक रही है, पास में खड़े हैं तालिबानी (फ़ोटो: AFP)

कॉम्बो पैक: तालिबान+अल-क़ायदा
1998 आते-आते करीब 90 फीसद अफ़गानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया था. तालिबान अकेला नहीं था. उसकी यारी थी पाकिस्तान से. ISI हथियार से लेकर ख़ुफिया नेटवर्क तक, हर तरह से तालिबान की मदद कर रहा था. तालिबान को मिली इस जीत ने और भी कई इस्लामिक कट्टरपंथियों को अफ़गानिस्तान की तरफ खींचा. इनमें से एक था- ओसामा बिन लादेन. वो सूडान से भागकर अफ़गानिस्तान चला आया. लादेन और उसके आतंकी संगठन अल-कायदा को तालिबान से मदद मिली. 1998 में इसी अफ़गानिस्तान से लादेन ने अमेरिका के विरुद्ध जिहाद का ऐलान किया. यहीं पर बैठकर लादेन ने केन्या और तंजानिया स्थित अमेरिकी दूतावासों पर हमले करवाए.

लादेन और वॉशिंगटन की लड़ाई का चरम था सितंबर 2001 में अमेरिका पर हुआ आतंकी हमला. इस हमले में शामिल करीब 15 हाइजैकर्स सऊदी अरब के नागरिक थे. उस सऊदी के नागरिक, जिसने तालिबान सरकार को मान्यता दी हुई थी. वो तालिबान, जो अल-क़ायदा का पार्टनर था. डिप्लोमैटिक मकड़जाल देखिए कि तालिबान को मान्यता देने वाले तीन बड़े खिलाड़ी- सऊदी, UAE और पाकिस्तान, तीनों अमेरिका के सहयोगी थे.

अमेरिकाज़ अफ़गान वॉर
9/11 हमले के बाद बुश प्रशासन ने तालिबान को धमकी दी. कहा कि वो लादेन समेत अल-क़ायदा के सारे लीडरान अमेरिका के हवाले कर दे. वरना जो गत लादेन और उसके लोगों की होगी, वही अंजाम तालिबान का भी होगा. अक्टूबर, 2001 में बुश प्रशासन ने अफ़गानिस्तान पर हमला कर दिया. शुरुआत में अमेरिका और उसके सहयोगियों को एक-के-बाद-एक कामयाबियां मिलती गईं. तालिबान और अल-क़ायदा पीछे हटते गए. 16 दिसंबर, 2001 को एक घोड़े पर बैठकर लादेन अफ़गानिस्तान से पाकिस्तान भाग गया. 5 दिसंबर, 2001 को अफ़गानिस्तान में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ. इसके मुखिया थे हामिद करजई. 9 दिसंबर, 2001 को कांधार से सफ़ाये के साथ ही तालिबानी हुकूमत का भी ख़ात्मा हो गया. मगर ये जंग इतनी ज़िद्दी थी कि ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी.

लादेन मारा गया, मगर जंग ख़त्म नहीं हुई
अक्टूबर 2004 में हामिद करजई लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले अफ़गान राष्ट्रपति बने. मई, 2011 में लादेन भी मारा गया. अब अमेरिका वहां से निकलने के लिए छटपटाने लगा. वो तालिबान के साथ वार्ता की कोशिश शुरू कर चुका था. उधर अफ़गानिस्तान के हालात का फ़ायदा उठाकर इस्लामिक स्टेट भी यहां घुस आया. एक तरफ तालिबान और अमेरिका लड़ रहे थे. दूसरी तरफ तालिबान और इस्लामिक स्टेट में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई.

ट्रस्ट अस, ये भी हुआ: तालिबान और अमेरिका ने हाथ मिलाया
जनवरी 2017 में डॉनल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति का पदभार संभाला. वो हर हाल में अमेरिका को अफ़गानिस्तान से निकालना चाहते थे. उन्होंने तालिबान के साथ शांति वार्ता पर ज़ोर दिया. 29 फरवरी, 2020 को आख़िरकार दोनों के बीच एक शांति समझौता हो ही गया. अमेरिका क्रमबद्ध तरीके से अपनी फौज़ निकालने के लिए राज़ी हो गया. बदले में तालिबान ने वायदा किया कि वो किसी आतंकी संगठन को पनाह नहीं देगा.

मगर क्या इस समझौते पर अमल हो पाया?
जवाब है, नहीं. अमेरिका-तालिबान डील में एक पेच था. शर्त थी कि इस समझौते के बाद तालिबान और अफ़गान सरकार दोनों मिलकर बैठेंगे और आगे का रास्ता तय करेंगे. मगर ऐसा हो, इसके लिए तालिबान ने अपनी एक शर्त जोड़ दी. कहा, पहले अफ़गानिस्तान हमारे पांच हज़ार लड़ाकों को कैद से रिहा करेगा. अफ़गान सरकार ये शर्त मानने को राज़ी नहीं हुई. नतीजन, अफ़गान सरकार और तालिबान के बीच कोई समझौता नहीं हुआ. ऐसे में अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते की भी कोई प्रासंगिकता नहीं रही.

इन सबके बीच में आ धमका कोरोना. राष्ट्रपति अशरफ़ गनी ने तालिबान से संघर्षविराम की अपील की. मगर तालिबान राज़ी नहीं हुआ. उसने हमले और तेज़ कर दिए. इतने आम हैं ये हमले कि बहुत बड़े स्तर पर जान न जाए लोगों की, तो बाहर ख़बरें भी नहीं बनती हैं.

ये वर्जिनिया स्थित CIA मुख्यालय 'जॉर्ज बुश सेंटर फॉर इंटेलिजेंस' की एक तस्वीर है (फ़ोटो: AFP)
ये वर्जिनिया स्थित CIA मुख्यालय ‘जॉर्ज बुश सेंटर फॉर इंटेलिजेंस’ की एक तस्वीर है (फ़ोटो: AFP)

एक समय की बात है: सुनो कहानी, सुनो…
जाते-जाते आपको सोवियत के अफ़गानिस्तान से बाहर निकलने के बाद का एक क़िस्सा सुनाता हूं. ये क़िस्सा है एक मिसाइल का. जिसका नाम था स्टिंगर. ये बड़ा पोर्टेबल था. कहीं भी ले जा सकते थे इसको. कंधे पर उठाकर दाग सकते थे इसको. 1986 के करीब की बात है. CIA ने मुजाहिदीनों को करीब ढाई हज़ार स्टिंगर मिसाइल की सप्लाई पहुंचाई. 1986 से 1989 के बीच इन अमेरिकी स्टिंगर मिसाइलों की मदद से मुजाहिदीनों ने सोवियत के कई हेलिकॉप्टर गिराए. इस मिसाइल का इतना ख़ौफ था सोवियत सेना में कि इसकी वजह से उन्हें कई बार अपनी हवाई रणनीति बदलनी पड़ी.

सोवियत तो रुख़सत हो गए अफ़गानिस्तान से. अब CIA को लगने लगा डर. उसने सोचा, अगर ये स्टिंगर मिसाइल किसी आतंकी संगठन या ईरान जैसे दुश्मनों के हाथ लग जाए, तो अमेरिकी विमानों को ख़तरा हो सकता है. ऐसे में अमेरिकी सरकार ने CIA से कहा, जितने स्टिंगर मिसाइल अफ़गानिस्तान पहुंचाए थे उन्हें वापस लेकर आओ. अब कोई यूं तो लौटाता नहीं मिसाइलें. इसीलिए CIA ने कहा, हम अपनी वो मिसाइलें मोल खरीदेंगे. माने, जिसके पास भी वो मिसाइलें हैं, उन्हें हम पैसा देंगे और उनसे स्टिंगर वापस लेंगे. कितना पैसा देना तय हुआ? प्रति मिसाइल करीब डेढ़ लाख डॉलर. मतलब एक बार तो अमेरिका ने उन मिसाइलों को बनाने पर ख़र्चा किया. और फिर उन्हें वापस पाने के लिए मोटा पैसा बहाया.

कहानी का सबसे मज़ेदार हिस्सा
मिसाइलें वापस खरीदने का जिम्मा मिला CIA के नॉर्थ-ईस्ट डिविज़न को. यही डिविज़न इस्लामाबाद का CIA स्टेशन संभालता था. उसी के सिर थी ये जिम्मेदारी. अब मुश्किल ये थी कि CIA के पास कोई हिसाब-किताब नहीं था. उसको नहीं पता था कि मिसाइलें किसको दी गईं, किसके पास हैं. ये पता लगाने के लिए उसने मदद ली पाकिस्तानी ख़ुफिया एजेंसी ISI की. CIA ने ISI से कहा कि हमारी मिसाइलें खोजवा दो. हम पेमेंट करेंगे, तुम बस उन्हें वापस खरीदकर हमारे सुपुर्द कर दो. इस काम के लिए CIA ने ISI का कमीशन तय कर दिया. हर एक मिसाइल CIA तक वापस लाने का कमीशन खाया ISI ने.

स्टीव कोल की लिखी इस क़िताब 'घोस्ट वॉर्स' को पुलित्ज़र अवॉर्ड भी मिल चुका है (फ़ोटो: ऐमज़ॉन)
स्टीव कोल की लिखी इस क़िताब ‘घोस्ट वॉर्स’ को  2005 में पुलित्ज़र अवॉर्ड मिला था. स्टीव कोल वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार थे. 1989 से 1992के बीच उन्होंने अफ़गानिस्तान भी कवर किया  (फ़ोटो: ऐमज़ॉन)

किसने खड़े किए मुजाहिदीन? किसने तालिबान की स्क्रिप्ट लिखी?
स्टीव कोल की लिखी एक बड़ी अच्छी क़िताब है- घोस्ट वॉर्स. इसमें आपको सोवियत के हमले से 9/11 तक का अफ़गानिस्तान से जुड़ा सारा इतिहास मिल जाएगा. घोस्ट वॉर्स और इन जैसी क़िताबों को पढ़कर आपको समझ आएगा कि तालिबान के पैदा होने की वजह ख़ुद अमेरिका ही था. उसने सोवियत से लड़ाई में अफ़गानिस्तान का इस्तेमाल किया. कट्टर इस्लामिक मुजाहिदीनों की फ़ौज खड़ी की. और फिर सोवियत के निकलने के बाद अफ़गानिस्तान को इन कट्टरपंथियों के सुपुर्द कर वहां से चलता बना. यही वैक्यूम, यही विस्फ़ोटक हालात अफ़गानिस्तान में गृह युद्ध की वजह बने. जिसका फ़ायदा उठाकर तालिबान और अल-क़ायदा जैसे आतंकी संगठनों ने यहां अपनी पैठ बनाई. वही अमेरिका एक बार फिर अफ़गानिस्तान को अधर में छोड़कर, उसे कट्टरपंथियों के हवाले करके वहां से निकल जाना चाहता है. क्यों? क्योंकि यहां उसके जीत पाने की संभावनाएं शून्य हैं. और इस हारी लड़ाई को लड़ते-लड़ते वो थक गया है.


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