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अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-2: वो साम्राज्य जो आए थे राज करने, लेकिन कब्रगाह बन गए

 

इतिहास के जानकार अफगानिस्तान (Afghanistan) को Graveyard of Empires कहा करते हैं. मतलब ‘साम्राज्यों की कब्रगाह.’ ये सच भी है. बड़े-बड़े साम्राज्यों का गुरूर अफगानिस्तान में आकर टूटा. हालिया मामला अमेरिका का है. लेकिन इससे पहले भी कई आए और बेआबरू होकर अफगानिस्तान से बाहर निकले. अफगानिस्तान की चीट शीट के इस दूसरे हिस्से में बात उन साम्राज्यों की, जो अमेरिका से पहले अफगानिस्तान में बहुत गुरूर के साथ घुसे लेकिन बेहाल होकर बाहर निकले.

अफगानिस्तान पर चीट शीट के पहले पार्ट में आपने जान चुके हैं अफगानिस्तान का प्राचीन इतिहास और किस तरह बामियान के बुद्ध की कहानी, जिसे तालिबान में गोला बारूद लगाकर उड़ा दिया था. अगर आपने पार्ट-1 नहीं पढ़ा है, तो यहां पढ़ सकते हैं-

अफगानिस्तान चीट शीट पार्ट-1: जब कंधार मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था और बौद्ध मठों से पटा पड़ा था

ब्रिटेन और अफगानिस्तान का युद्ध

आपको लगता होगा कि अफगानिस्तान से रूस और अमेरिका ही बेआबरू होकर निकले हैं तो आपका अंदाजा गलत है. एक वक्त में उसका भी यहां बुरा हाल हो चुका है, जिसकी सत्ता में सूरज कभी डूबता नहीं था. हम बात कर रहे हैं ब्रिटिश शासन की. दूसरे विश्व युद्ध से पहले तक ब्रिटेन का दबदबा पूरी दुनिया पर था. उसी दौर में ब्रिटेन तीन बार अफ़ग़ानिस्तान में घुसा और परास्त हुआ.

पहला क़िस्सा साल 1838 का है. तब अफ़ग़ानिस्तान में दोस्त मोहम्मद ख़ान का शासन था. ब्रिटिश और रूसी साम्राज्य के बीच अफ़ग़ानिस्तान पिस रहा था. ब्रिटेन को डर था कि अगर यहां रूस आया तो भारत में उसका शासन कमज़ोर पड़ सकता है. इसके लिए काबुल की गद्दी पर कठपुतली सरकार बिठाना ज़रूरी हो गया था. दोस्त मोहम्मद ख़ान से ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी. इसलिए ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करने का फ़ैसला किया. चूंकि उस समय अफ़ग़ानिस्तान अलग-अलग कबीलों में बंटा था. कोई संगठित होकर लड़ने के लिए तैयार नहीं था. सो ब्रिटिश आर्मी को कोई खास टक्कर नहीं मिली. अप्रैल 1839 तक ब्रिटेन ने बढ़त बना ली थी. दोस्त मोहम्मद काबुल छोड़कर भाग गया. बाद में उसे अरेस्ट करके भारत लाया गया.

ब्रिटेन ने काबुल की गद्दी पर शाह शुजा को बिठाया. शाह शुजा, आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के संस्थापक अहमद शाह दुर्रानी का पोता था. इस उपलब्धि से अफ़ग़ान कबीलों को कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ा. उन्हें अपनी धरती पर विदेशी शासन की उपस्थिति और गद्दी पर कठपुतली सरकार कतई रास नहीं आई. 1841 तक कबीलों ने ब्रिटिश राज पर हमले शुरू कर दिए थे. ब्रिटेन ने बहुत कोशिश की. कबीलों में फूट डालने की साज़िश भी रची. लेकिन वहां उसकी दाल नहीं गली. थक-हारकर ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के लिए समझौता कर लिया.

Shah Shuja Afghanistan
ब्रिटिश म्यूजियम की इस पेंटिंग में शाह शुजा को अपने दरबार में दिखाया गया है. (फोटो-विकीपीडिया)

सर विलियम हे मैक्नाथन अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटेन के पॉलिटिकल एजेंट थे. 23 दिसंबर 1841 को वो एक मीटिंग में हिस्सा लेने पहुंचे. जैसे ही मीटिंग खत्म हुई, अफ़ग़ानों ने उन्हें पकड़ लिया. बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी. ब्रिटेन को लगा, अब देर की तो ग़ज़ब हो जाएगा. 6 जनवरी, 1842 को साढ़े सोलह हज़ार लोगों का काफ़िला काबुल से निकला. अफ़ग़ानों ने काफ़िले को घेरकर ख़ून की नदियां बहा दीं. उनमें से कुछ सौ लोग ही ज़िंदा बच पाए. ब्रिटेन के निकलते ही शाह शुजा को भी मार दिया गया. 1843 में दोस्त मोहम्मद ख़ान काबुल की गद्दी पर फिर से काबिज हो चुका था.

ब्रिटेन ने 1878 में फिर वापसी की. उस समय राज था, दोस्त मोहम्मद के बेटे शीर अली ख़ान का. ब्रिटेन ने कहा, हमारा शासन क़बूल कर लो. शीर ने कहा, नो चांस. उसने रूस के दूत को काबुल में एंट्री दे दी. लेकिन ब्रिटेन के काफ़िले को बॉर्डर से ही लौटा दिया. नाराज़ वायसराय लॉर्ड लिटन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. शीर अली काबुल छोड़कर भाग गया. अंग्रेज़ों ने उसके बेटे को सत्ता सौंपी. लेकिन कुछ दिनों बाद ही ब्रिटेन के राजदूत की हत्या हो गई. काबुल में ही. ब्रिटेन ने फिर हमला किया. इस बार पूरी ताक़त के साथ. ब्रिटेन जीत गया.

इस बार उसने शीर अली ख़ान के भतीजे अब्द अल-रहमान को अफ़ग़ानिस्तान का राज-पाट सौंप दिया. ये सिस्टम पहले विश्व युद्ध की शुरुआत तक चकाचक चला. जैसे ही वर्ल्ड वॉर शुरू हुआ, माहौल अचानक से बदल गया. ब्रिटेन, ऑटोमन तुर्की से लड़ रहा था. मुसलमान ऑटोमन साम्राज्य को सपोर्ट कर रहे थे. अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटेन की कठपुतली सरकार थी. ज़ाहिर था कि विरोध होता. हुआ भी. ऑटोमन समर्थकों ने अफ़ग़ानिस्तान के शासक हबीबुल्लाह ख़ान की हत्या कर दी.

अफ़ग़ानों ने ब्रिटेन से आज़ादी का ऐलान कर दिया. ब्रिटेन वर्ल्ड वॉर से परेशान था. वो इसका विरोध नहीं कर पाया. अगस्त 1919 में रावलपिंडी में संधि हुई. ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान की आज़ादी को मान्यता दे दी. अफ़ग़ानिस्तान ने आज़ाद होते ही सोवियत सरकार से संधि कर ली. अफ़ग़ानिस्तान, सोवियत संघ को मान्यता देने वाले देशों में सबसे आगे था. अफ़ग़ान-सोवियत संघ की दोस्ती वहीं से गाढ़ी हो चुकी थी. फिर एक फ़ोन कॉल हुआ और सब कुछ हमेशा के लिए बदल गया.

ये भी पढ़ेंः तालिबान लड़ाकों के पीछे दिख रही पेंटिंग का भारत से क्या कनेक्शन है?

सोवियत संघ का अफगानी पंगा

आज़ाद होने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में राजतंत्र स्थापित हुआ. 1933 में ज़हीर शाह अफ़ग़ानिस्तान के राजा बने. उन्होंने 40 बरस तक शासन किया. एक दिन उनके नीचे से कुर्सी खींच ली गई. राजा साहब बेसहारा हो गए. उन्हें निर्वासन में भेज दिया गया. राजा साहब की कुर्सी खींचने वाला कोई और नहीं बल्कि उनका अपना भतीजा था. नाम मोहम्मद दाऊद ख़ान. दाऊद ख़ान ने राजशाही व्यवस्था हटा दी. वो अफ़ग़ानिस्तान के पहले राष्ट्रपति बने. दाऊद ख़ान सबको साथ लेकर चलना चाहते थे. अमेरिका को भी और सोवियत संघ को भी. लेकिन दो नावों की सवारी संभव नहीं थी. अफ़ग़ान कम्युनिस्ट पार्टी PDPA को दाऊद ख़ान का चलन रास नहीं आया. अप्रैल 1978 में दाऊद ख़ान की हत्या कर दी गई. मास्टरमाइंड का नाम नूर मोहम्मद तराक़ी. द न्यू रूलर ऑफ़ द रिपब्लिक ऑफ अफ़ग़ानिस्तान.

तराक़ी का पूरा झुकाव सोवियत संघ की ओर था. अफ़ग़ानिस्तान में सदियों से सामंती व्यवस्था चली आ रही थी. तराक़ी ने उसको खत्म करने की कोशिश की. उसका दूसरा फ़ैसला ये था कि लड़कियों का स्कूल जाना अनिवार्य है. इस फ़ैसले से कठमुल्ला नाराज़ हो गए. उन्होंने विरोध किया. तराक़ी ने ऐसे लोगों को बेरहमी से कुचला. इसका नतीजा ये हुआ कि कम्युनिस्ट सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा. मसले को शांति से सुलझाने की बजाय तराक़ी ने दमन का रास्ता चुना. हर तरह के विरोध को दबाया जाने लगा. धर्म को दरकिनार किया जाने लगा. अख़बारों को नियंत्रित किया गया. आलोचना करने की गुंज़ाइश को खत्म कर दिया गया. धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ने लगा था.

फिर 15 मार्च 1979 की तारीख़ आई. हेरात में अफ़ग़ान सेना के एक पूरे डिविज़न ने विद्रोह कर दिया. उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. इस घटना में तीस हज़ार से अधिक लोग मारे गए. हालांकि, ये विद्रोह सफ़ल नहीं रहा. लेकिन विद्रोही सैनिक बड़ी संख्या में हथियार लेकर पहाड़ों की तरफ भाग गए. वहीं से उन्होंने कम्युनिस्ट सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखी. ये तराक़ी के लिए बड़ा झटका था. 18 मार्च को उन्होंने सोवियत संघ के प्रधानमंत्री एलेक्सी कोजेगिन को फ़ोन किया. तराक़ी ने सीधे मांग रखी कि उन्हें सोवियत से सैन्य सहायता की दरकार है. कोजेगिन ने आशंका जताई कि इससे युद्ध के हालात पैदा हो जाएंगे. कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया को पता चल जाएगा कि सोवियत संघ ने हमला कर दिया है. ये हमारे लिए नुकसानदेह साबित होगा.

Soviet Afghan War
सोवियत अफगान युद्ध की तस्वीर.

लेकिन उस दिन तराक़ी कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं था. उसने कोजेगिन को एक सुझाव दिया. तराक़ी ने कहा कि सोवियत सैनिकों को अफ़ग़ान सेना के यूनिफ़ॉर्म में भेजा जाए तो किसी को पता नहीं चलेगा. तब केजीबी और जीआरयू ने मिलकर एक बटालियन तैयार की. इनमें से अधिकतर ताज़िक, उज़्बेक और तुर्क़ थे. इनकी सूरत और सीरत अफ़ग़ान लोगों से मिलती-जुलती थी. बाद में इस बटालियन को ‘मुस्बैट’ के नाम से जाना गया. मुस्लिम बटालियन. सोवियत संघ, तराक़ी के कहने पर अफ़ग़ानिस्तान में चला गया. उधर, अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए मुजाहिदीन को सपोर्ट बढ़ाना शुरू कर दिया. माहौल गर्म हो चुका था.

एक तरफ़ कोल्ड वॉर की गोटियां सेट की जा रही थीं, वहीं दूसरी तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान सरकार के भीतर ही फूट पड़ चुकी थी. तराक़ी के प्राइम मिनिस्टर थे हफ़ीजुल्लाह अमीन. अक्टूबर 1979 में अमीन ने तराक़ी का मर्डर करवा दिया और ख़ुद अफ़ग़ानिस्तान का सर्वेसर्वा बन गया. सोवियत संघ परेशान हो गया. केजीबी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अमीन अमेरिका का एजेंट है. सोवियत लीडरशिप ने तय किया कि अमीन को रास्ते से हटा दिया जाए. उस समय अफ़ग़ानिस्तान में कोका-कोला बहुत फ़ेमस था. तय हुआ कि इसी में ज़हर मिलाकर अमीन को मारा जाए. लेकिन ज़हर का कोई असर ही नहीं हुआ. अमीन बच गया.

प्लान बी के तहत डायरेक्ट हमले की योजना थी. 27 दिसंबर 1979 की रात सोवियत एजेंट्स ने पैलेस में घुसकर अमीन की हत्या कर दी. इसके तुरंत बाद एक लाख सोवियत सैनिकों ने अफ़ग़ानिस्तान में दाख़िल होना शुरू कर दिया. ये दस साल लंबे सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध की शुरूआत थी.

मुजाहिदीनः अमेरिका का मोहरा

सोवियत संघ ने जैसे ही अफगानिस्तान में एंट्री की, अमेरिका की नींद हराम होने लगी. उसे लगा कि अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र संघ की मौजूदगी एशिया और मिडिल ईस्ट में उसकी स्थिति को कमजोर कर देगी. हालांकि उसके पास सीधे हस्तक्षेप करने का विकल्प भी नहीं था क्योंकि हाल ही में वो वियतनाम युद्ध (1955-75) से हाथ जलाकर निकला था. ऐसे में सीआईए नया प्लान लेकर आया. ऐसा प्लान जिसमें अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान की जमीन पर उतरकर अपने बूट भी गंदे नहीं करने पड़ेंगे और सोवियत संघ पर दबाव भी बन सकेगा. अमेरिका ने मुजाहिदीन को सपोर्ट करने का प्लान तैयार किया. मुजाहिदीन शब्द बना है मुजाहिद से. मुजाहिदम माने वो जो धर्म के लिए युद्ध करे. इसी तरह धर्म के लिए लड़ने वाली सेना मतलब मुजाहिदीन.

80 के दशक में अफगानिस्तान में लड़े गए युद्धों को लेकर एक बड़ा बदलाव आया. अब तक लड़े गए युद्धों में धर्म का तड़का नहीं था. लेकिन रूस के खिलाफ लड़ाई सिर्फ अफगानिस्तान के लिए एक देश को तौर पर आजादी के अलावा जिहाद भी था. जिहाद मतलब धर्म को बचाने की लड़ाई. 1985 तक आते-आते मुजाहिदीन धार्मिक तौर पर एक व्यापक गठबंधन के तौर पर उभरा. जिसे अफगानिस्तान मुजाहिदीन की इस्लामी एकता के रूप में जाना जाता था. यह गठबंधन सात प्रमुख सरदारों की सेनाओं से बना था, इसलिए इसे सेवन पार्टी मुजाहिदीन गठबंधन या पेशावर सेवन के नाम से भी जाना जाता था.

उस समय जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति थे. उन्होंने ही अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को मुजाहिदीन के पास भेजा. बाद में कार्टर ने इन लड़ाकों को हथियार और पैसे मुहैया कराए. कार्टर के जाने के बाद अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन. उन्होंने मुजाहिदीन को दिए जाने वाले फंड और हथियार, दोनों में बढ़ोतरी कर दी. न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर रहे इकबाल हसन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रीगन ने साल 1983 में इन मुजाहिदीन को वाइट हाउस बुलाया और उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानियों’ की संज्ञा दी.

Ronald Reagan
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन ने तो मुजाहिदीनों को खुलेआम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कह दिया था. (फोटो: एएफपी)

रीगन यहीं नहीं रुके. उन्होंने इन कट्टर इस्लामिक विचारधारा वाले लड़ाकों को नैतिक तौर पर अमेरिका के संस्थापक और महान नेता जॉर्ज वाशिंगटन और थॉमस जैफरसन जैसा बता दिया. अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1982 में रीगन ने अमेरिकी स्पेस शटल ‘कोलंबिया’ को अफगानिस्तान के सोवियत विरोधी ‘विद्रोहियों’ को समर्पित किया था.

अमेरिका के पॉपुलर कल्चर में भी मुजाहिदीन की धमक दिखी. मशहूर मूवी फ्रैंचाइजी रैंबो ने भी इस सीरीज़ में एक फिल्म बनाई. नाम था रैंबो थ्री. ये फिल्म 1988 में बनी और इसमें हीरो थे सिल्वेस्टर स्टेलॉन. इस फिल्म की कहानी अफगानिस्तान में रूसी सेना को छकाने वाले एक स्पेशल कमांडो रैंबो की थी. इसमें रूस से लड़ने वाले मुजाहिदीन कैरेक्टर्स को भी दिखाया गया है. पहले इस फिल्म को अफगानिस्तान में लड़ने वाले मुजाहिदीन लड़ाकों को समर्पित किया गया था. लेकिन जब अमेरिका का दांव उल्टा पड़ा तो इसे बदलकर अफगानिस्तान के बहादुर लोगों को समर्पित करने वाले कैप्शन से बदल दिया गया.

बता दें कि मुजाहिदीन कमांडरों में सबसे प्रसिद्ध (और सबसे प्रभावी) अहमद शाह मसूद (1953-2001) था, जिसे “पंजशीर का शेर” कहा जाता था. उनकी सेना जमीयत-ए-इस्लामी के बैनर तले लड़ी. ये बुरहानुद्दीन रब्बानी के नेतृत्व में पेशावर सात गुटों में से एक थी. रब्बानी ही रूस को देश से बाहर निकालने के बाद अफगानिस्तान के 10वें राष्ट्रपति बने. मसूद एक रणनीतिक और सामरिक प्रतिभा सम्पन्न शख्स थे. रूस के खिलाफ लड़ने वालों में वो प्रमुख रूप से जाने जाते हैं. ये वही अहमद शाह मसूद थे, जिनका बेटा अहमद मसूद पंजशीर में अब भी तालिबान के खिलाफ मोर्चा ले रहा है.
अमेरिका ने मुजाहिदीन के जरिए रूस को अफगानिस्तान से भगा दिया लेकिन वो ये नहीं समझ पाया कि इस देश में फंसने का अगला नंबर उसका ही है. मुजाहिदीन को उनका आजाद वतन मिल चुका था लेकिन दूसरे देशों से अफगानिस्तान की धरती पर लड़ने आए वॉर लॉर्ड का युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था. असल में उनके लिए तो ये एक नए युद्ध की शुरुआत थी. कैसे? जानने के लिए अफगानिस्तान की चीट शीट का पार्ट-3 पढ़िए.


वीडियो – अमेरिका में महिलाओं के साथ जो हो रहा है, उसके बाद तालिबान की आलोचना का अधिकारी नहीं

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