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अपराधिक छवि वाले नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितने काम का है?

2004 से 2014 तक का वक्त. देश के प्रधानमंत्री थे डॉ मनमोहन सिंह. लोग कहते थे कि जनता जो सुनना चाहती थी, वो बोलते नहीं थे. मनमोहन सिंह खामोश थे, तो बोलता कौन था? एक सूबे का सीएम, जिसका कद दिन दिन-रात बढ़ता था. 2014 आते-आते ये शख्स एक महत्वाकांक्षी नेता से भारत के प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार बन गया था. नेता का नाम-नरेंद्र मोदी. नरेंद्र मोदी 2014 में जब चुनावी रैली में बोलते थे, तो लगता था कि देश क्रांति की दहलीज़ पर खड़ा है. चुनाव होगा, निज़ाम बदलेगा और हर वो चीज़ बढ़िया हो जाएगी, जिससे लोगों को कोफ्त होती थी- ढीली-ढाली और अनिर्णायक सरकार, भ्रष्टाचार और राजनीति में अपराध. 2014 में नरेंद्र मोदी पर किसी तरह का कोई आपराधिक मामला नहीं चल रहा था. वो मुंह खोलते थे तो रैली में आई भीड़ एक ही शब्द सुनती थी-विकास. फिर आया 2014 का वक्त. चुनाव प्रचार जोरों पर था. 16 वीं लोकसभा के लिए पांच चरणों की वोटिंग हो चुकी थी. नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के हरदोई में चुनाव सभा करने के लिए पहुंचे. तारीख थी 21 अप्रैल, 2014. अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नरेंद्र मोदी ने अपनी बात पॉलिटिकल पंडितों का मज़ाक बनाकर की. कहा, हवा का रुख देखना है तो हरदोई आ जाइए. कुछ और चुनावी बयान देने के बाद उन्होंने एक गंभीर बात कही. उन्होंने कहा,

मैं ने ठान के रखी है. 16 मई के बाद जो भी पार्लियामेंट के चुनाव लड़ने वाले हैं औरअपने फॉर्म में भरा है कि इतने मुकदमें हैं. 16 मई के बाद सबकी कॉपी निकलवाउंगा और इसमें भाजपा वालों को भी नहीं छोड़ूंगा. NDA वालों को भी नहीं. एक भी को नहीं छोड़ूंगा. और सुप्रीम कोर्ट को कहूंगा इनपे तत्काल केस चलाओ. और जो सच्चे गुनहगार हैं उनपर तुंरत जेल में डालो.

इस बयान के बाद नरेंद्र मोदी दो बार देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं. उन्होंने अपनी बात पर कितना अमल किया वो हम आपको बाद में बताएंगे. पहले बताते हैं कि हमने आपको ये पुराना बयान सुनाया क्यों. वजह है सुप्रीम कोर्ट की एक तीखी टिप्पणी. 13 फरवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एफ नारीमन की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा,

‘राजनैतिक पार्टियों को प्रत्याशी के चुनाव की वजह और उसके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर जारी करनी होगी. किसी शख्स को अपना प्रत्याशी बनाने के लिए पार्टियों को वजह मेरिट यानी योग्यता के आधार पर देनी होगी. प्रत्याशी जीत सकता है, इसे पर्याप्त वजह नहीं माना जाएगा. ये जानकारी पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक और ट्विटर पर डालनी होगी. साथ ही एक स्थानीय भाषा के अखबार और एक राष्ट्रीय अखबार में छापनी होगी. ये सब प्रत्याशी तय होने के 48 घंटों के भीतर करना होगा. 72 घंटों के अंदर-अंदर ये सारी जानकारी एक कंप्लायंस रिपोर्ट की शक्ल में चुनाव आयोग को भेजनी होगी. अगर चुनाव आयोग के पास ये जानकारी न पहुंचे, तो चुनाव आयोग को इसकी सूचना सर्वोच्च न्यायालय को देगा. अगर पार्टियां ये काम न करें या चुनाव आयोग इस आदेश को लागू न करवा पाया तो इसे सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना की तरह देखा जाएगा.’

सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश सुनने में ऐसा है जिसका आम जनता खुले दिल से स्वागत करेगी. नेता और पार्टियां भी ऊपर-ऊपर से तो यही कहेंगे कि अच्छा फैसला है. सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस तरह का आदेश दे चुकी है. सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने केंद्र सरकार को तुरंत एक ऐसा कानून बनाने का आदेश दिया था जिससे गंभीर अपराधों में शामिल रहे नेताओं के चुनाव लड़ने और पार्टी में कोई पद लेने पर रोक लगे.

पूर्व में कोर्ट ये आदेश तक दे चुका है कि कैंडिडेट नामांकन भरने के बाद अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी तीन बार अखबारों में छपवाएं. लेकिन इस दिशा में कोई खास प्रगति हुई नहीं. तो भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय समेत दूसरे याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका लगाई. इसमें 2018 वाले आदेश पर अमल न करने के लिए केंद्र और चुनाव आयोग पर अवमानना का मामला चलाने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में साफ कहा था कि केंद्रीय चुनाव आयोग प्रत्याशियों के खिलाफ मामलों की जानकारी अखबारों में छपवाने के आदेश पर प्रभावी रूप से अमल नहीं करवा पा रहा है.

हमने कोर्ट के फैसले को लेकर प्रोफेसर जगदीप छोकर से बात की. प्रोफेसर छोकर IIM अहमदाबाद में पढ़ाते थे. ये नेशनल इलेक्शन वॉच और असोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म्स ADR के फाउंडिंग मेंबर्स में से एक हैं. हमने प्रोफेसर साहब से नरेंद्र मोदी के 2014 में दिए बयान को लेकर सवाल किया. उनसे पूरी बातचीत क्रमबद्ध तरीके से हम यहां लिख रहे हैं.

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जगदीप छोकर IIM अहमदाबाद में प्रोफेसर थे.(फोटोः एएनआई)

सवाल : 2014 में नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि पीएम बनने के बाद वह सुप्रीम कोर्ट में जाकर आपराधिक छवि के नेताओं के मुकदमों पर जल्द सुनवाई को कहेंगे. तब से वह दो बार पीएम बन चुके हैं. क्या आपके अनुभव में आपने सरकार को इस पक्ष में सक्रियता से काम करते देखा है?
जवाब : नहीं. प्रो-एक्टिवली काम करते हुए भी नहीं देखा और जो काम प्रो-एक्टिवली किया जाता है उसे रोकने की कोशिश करते देखा है. भाई, केन्द्रीय सूचना आयोग ने कहा कि छह राष्ट्रीय पार्टियां RTI के अंदर पब्लिक अथारिटी हैं. उन्होंने उसका कहना नहीं माना. फिर हमने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को शिकायत की. CIC ने कहा हम कुछ नहीं कर सकते. फिर हमने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की. कोर्ट में सबसे पहले भारत सरकार ने एफिडेविट दिया कि पॉलिटिकल पार्टीयां RTI में नहीं आनी चाहिये.

सवालसर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को पहले भी एड्रेस किया था? इस पर क्या कहेंगे आप ?
जवाब : सुप्रीम कोर्ट ने जो 2018 में कहा था, जिसे अब भी दोहराया गया है, वो 18 साल से हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट का 2018 में कहना कि पॉलिटिकल पार्टियां इसे अपनी वेबसाइट पर डालें, इसका कोइ मतलब नहीं बनता न. कह रहे हैं कि बोल्ड अक्षर में लिख दीजिए. क्या हो जाएगा इससे?

सवाल : क्या इस फैसले से (प्रत्याशियों के आपराधिक रिकॉर्ड के) डेटा की विज़िबिलिटी नहीं बढ़ेगी?
जवाब : विज़िबिलिटी तो 18 साल से है. और 2004 में 25% सांसदों पर क्रिमिनल केस थे. 2009 में 31% हो गये. 2014 में 38% हो गये और 2019 में 43 % पर केस है. तो ये तो बढ़ता जा रहा है. विज़िबिलिटी से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला. वोटर्स को कोई चॉइस नहीं है. कैंडिडेट चाहें 20 हों, जिनकी जीतने की संभावना होती है, वो दो तीन ही होते हैं. अगर उनपर केस है तो आपके पास चॉइस क्या है.
आप गवर्मेंट को छोड़ दीजिए. ये पॉलिटिकल पार्टियों की इच्छा है. गवर्मेंट तो आती जाती रहती हैं. आज आपकी है कल किसी और की होगी. ये पॉलिटिकल पार्टियां कोई बदलाव नहीं चाहती हैं इसमें. ये सिचुएशन बहुत कमफर्टेबल है. वो बस ये देखते हैं कि भई ये जीतेगा या नहीं. वो किस वजह से जीतेगा, इससे उन्हें कोई ताल्लुक नहीं है. वो मारपीट करके जीतेगा, या पैसा खर्च करके जीतेगा, कि काम करके जीतेगा इससे कोइ मतलब नहीं.

सवाल : तो क्या आज के फैसले के बाद बदलाव के चांसेज कम हैं?
जवाब : चांसेज बिल्कुल जीरो हैं.

सवाल : क्या होना चाहिये था, जो नहीं हुआ?
जवाब : होना ये चाहिये, कि भाई अगर किसी पर सीरियस केस है. और इलेक्शन के छह महीना पहले दर्ज हो गया था और चार्जेस फ्रेम हो गये हैं तो उन्हें चुनाव लड़ने की परमीशन नहीं होनी चाहिए. ये संसद तो करेगी नहीं. सुप्रीम कोर्ट कहती रहती है. एक और प्रवाधान है कि लेजिसलेशन में अगर कोई कमी है और संसद उसको पूरा नहीं कर रही है, जिससे पब्लिक इंट्रेस्ट को नुकसान होता है, तो सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार है, और कर्तव्य है कि उस को पूरा करे. ये हमारे ही केस में हो चुका है. 2002 के हमारे केस में हुआ था. वो करते ही नहीं. पता नहीं क्यों? उनकी मर्जी.


वीडियो देखें : आपराधिक छवि वाले नेताओं पर SC सख्त

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