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इरफ़ान के किस्से (भाग-2): 'मुझे सक्सेस की कोई जल्दी नहीं है, 10-20 साल भी लगे तो दूंगा'

Ashok (1)इरफ़ान. हम हिंदुस्तानियों का दुलारा कलाकार. एवरेस्ट जितना ऊंचा. इरफ़ान का शरीर हमें छोड़कर चला गया. लेकिन काम पीछे है,यादें हैं और उन यादों को संजोने वाले दोस्त भी. इरफ़ान के ऐसे ही एक दोस्त से हमने बात की. अशोक लोखंडे से. अशोक इरफ़ान के एनएसडी के दिनों के साथी हैं.1987पासआउट बैच. अशोक उन चंद लोगों में से हैं,जिन्होंने इरफ़ान को तब देखा था, जब इरफान,इरफ़ान नहीं बने थे.अशोक खुद भी एक्टर हैं. काफी फिल्मों और सीरियल में काम कर चुके हैं. आप उन्हें सीरियलदीया और बातीके भाबासा के रूप में जानते होंगे. फिल्मरमन-राघवमें भी देखा होगा. इसमें उन्होंने नवाज़ुद्दीन के किरदार की बहन (अमृता सुभाष) के पति का रोल किया था. हमने उनसे इरफ़ान के शुरुआती दिनों पर बात करनी चाही. उन्होंने हमें खूब समय दिया और दिल खोलकर बातें की. कभी हंसे,तो कभी इमोशनल हुए. उनका कहा सबकुछ हमने टीप लिया. आपके लिए लाए हैं. आगे का सबकुछ उनका कहा है,हम बस टाइप करके आप तक पहुंचा रहे हैं. पढ़िए कि एक दोस्त अपने दोस्त को कैसे याद करता है. 


(आप सीधे इस पेज पर लैंड हुए हैं तो ज़रा थम जाइए. पहले ये पार्ट-वनपढ़ डालिए. तब आगे बढिए.)

इरफ़ान ने कैरेक्टर की डेप्थ पकड़ना सीख लिया

असल में इरफ़ान ने एक अलग तरह का सेन्स ऑफ ड्रामा खुद के अंदर डेवलप किया. आप रियलिस्टिक करते जाइए.  हमारी इंडस्ट्री में बहुत से एक्टर करते भी हैं. आपको हॉलीवुड लेवल की एक्टिंग लगेगी, लेकिन अंदर से आप कनेक्ट नहीं कर पाएंगे. इरफ़ान का ऐसा नहीं था. अपना सेन्स ऑफ ड्रामा उसने अलग से ढूंढ लिया था. सबसे पहले तो उसने क्लीशे को ख़त्म कर दिया. इसी की वजह से उसकी नकल करना लगभग असंभव है. अपनी पूरी एक्टिंग की ज़िंदगी में मैं मोस्ट कम्फर्टेबल सिर्फ इरफ़ान के साथ ही रहा. उसके नेचुरल रिएक्शन से हम भी नेचुरल एक्टिंग करने लगते थे. इतनी उसकी ख़ुशबू फ़ैल जाती थी. मैंने उसके साथ आगे चलकर ‘बनेगी अपनी बात’, ‘नया दौर’. ‘चाणक्य’ जैसे सीरियल किए. मोस्टली उसका और मेरा सीन होता था, तो हम बहुत रिलैक्स होते थे. हमारा पिकअप पॉइंट अलग ही रहता था. कैरेक्टर की डेप्थ इरफ़ान की पकड़ में तुरंत आ जाती थी.

यहां एक और मज़ेदार बात बताता हूं. कभी-कभार हम दोनों किसी दूसरे का प्ले देखने जाते थे. उसमें अगर हमको ज़रा-सा भी कुछ गड़बड़ लगा और हम दोनों की आंखें मिल गईं, फिर हमारा बहुत बुरा हाल होता था हंस-हंसकर. हम चेहरा झुका लेते थे, लेकिन हमारे कंधे हिलते रहते थे. हमें प्ले छोड़कर चले जाना पड़ता था. मेरा और उसका इक्वेशन इतना ज़बरदस्त था कि हमें कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी. निगाहों में ही एक दूसरे से बोल देते थे कि क्या बकवास है यार! वो इतना हिलेरियस होता था कि हम आधे-आधे घंटे तक हंसते रहते थे.

एक प्ले के दौरान बैचमेट्स इरफ़ान, अशोक और आलोक. प्ले का नाम था 'फाइटिंग कॉक'. (फोटो कर्टसी: अशोक लोखंडे)
एक प्ले के दौरान बैचमेट्स इरफ़ान, अशोक और आलोक. प्ले का नाम था ‘फाइटिंग कॉक’. (फोटो कर्टसी: अशोक लोखंडे)

प्ले करते वक्त हम लोग हमेशा कोई मैजिक मोमेंट क्रिएट करने में लगे रहते थे. हम बाकी लोग तो किसी गिमिक का सहारा लेते थे, लेकिन इरफ़ान बहुत कम ऐसा करता था. इरफ़ान हमेशा बहुत फोकस्ड रहता था. दिनभर की सारी शरारतें, एक्टिंग क्लासेस में तो वो हिस्सा लेता ही था. रात में जब हम सो जाते थे, तो कभी-कभी जागने पर वो स्क्रिप्ट पढ़ता हुआ नज़र आता था. सेकंड ईयर के बाद सब लोग एक कमरे में दो-दो रहते थे, वो अकेला रहता था. किचन जितने छोटे से रूम में. इनफैक्ट वो उस इमारत की किचन ही थी. मेरी रूम से जस्ट सटी हुई.

मीरा नायर ने इरफ़ान का रोल नाना को दिया!

फाइनल ईयर में स्टूडेंट प्रोडक्शन वाले प्ले होते हैं, जिसका सब ज़िम्मा स्टूडेंट्स के हवाले होता था. वहां पर इरफ़ान ने जो दो-तीन प्ले किए, वो बहुत ही आउटस्टैंडिंग हुए थे. उसका रुझान साफ़ नज़र आया था कि किस तरह के रोल करने की उसकी इच्छा है. उसका एक्टिंग क्राफ्ट निखरने के लक्षण भी दिख रहे थे. प्ले थे ‘एक्वस’, ‘मोटो-कार’ और ‘डम्ब-वेटर’. इनमें मेन रोल इरफ़ान के ही थे. मोटो-कार एक अश्वेत की कहानी थी. इससे जुड़ी एक दिलचस्प बात है. इसे देखने मीरा नायर आईं थीं. वो उस वक्त ‘सलाम बॉम्बे’ की कास्टिंग कर रही थीं. शायद वहीं से इरफ़ान को ‘सलाम बॉम्बे’ मिली थी. पहले हमने समझा कि इरफ़ान का काम बन गया है. उसे ही मेन रोल मिला है. बाद में पता चला वो नाना पाटेकर को मिला है. मैंने इरफ़ान से पूछा, यार नाना को क्यों मिला?”

वो हंसते हुए बोला, “उसकी आंखें मेरे जैसी हैं न,इसलिए.”

हालांकि हमारे लिए यही बड़ी बात थी कि इरफ़ान को फिल्म में काम मिल गया.

मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' में इरफ़ान. पत्र लिखने वाले शख्स का छोटा सा रोल किया था.
मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ में इरफ़ान. पत्र लिखने वाले शख्स का छोटा सा रोल किया था.

इरफ़ान की क्लास में इमेज ‘एक ही तरह का रोल करने वाला लड़का’ ऐसी थी. सीरियस, डेप्थ वाला रोल करने वाला लड़का, जिसे कॉमेडी वगैरह में कोई दिलचस्पी नहीं. उसे ऐसा रोल चाहिए, जो साइकोलॉजिकली स्ट्रॉन्ग हो.

इरफ़ान ज़्यादातर सीनियर्स के साथ रहता था. सुबह-सुबह नहाकर एक लेदर का झोला लटकाकर चल देता था. देखा तो किसी सीनियर के साथ किसी पेड़ के नीचे लम्बी बात चल रही है. इरफ़ान अक्सर एक बात बोलता था. एनएसडी में हम सबको ये था कि पढ़ाई ख़त्म करके मुंबई जाएंगे, स्टार बनेंगे जल्दी से. इरफ़ान ऐसा कभी नहीं कहता था. वो कहता था, ‘मुझे कोई जल्दी नहीं है, दस-बीस जितने भी साल लगे, मैं दूंगा’.

जब दुष्यंत के किरदार को ‘नो मीन्स नो’ बोल दिया

हमारा मणिपुर का टूर बहुत यादगार रहा. एनएसडी के हर बैच को आखिर में किसी एक रीजनल डायरेक्टर के पास जाना पड़ता है, जो मोस्टली एनएसडी का सीनियर रहता है. हम इंफाल में रतन दा के पास गए. वो बिज़ी थे, तो उन्होंने इबोतोम्बी नाम के डायरेक्टर को अपॉइंट किया. नाटक था ‘शाकुंतलम’. इरफ़ान इस प्ले में बिल्कुल भी काम नहीं करना चाहता था. सारे लोग परेशान कि भई कर ले. इरफ़ान का जवाब था,

मैं नहीं करूंगा. मुझे नहीं करना है. मुझे कहीं कोरस-वोरस में खड़ा कर दो.”

क्योंकि उसको अंदाज़ा था कि ‘शाकुंतलम’ उसके स्टाइल का है नहीं, उसे उससे कुछ नहीं मिलने वाला था. समय ही बरबाद होता. उसने किया नहीं, तो किया ही नहीं.

जब गांववाले मारने के लिए इकट्ठे हुए

इंफाल में एक लोकल दारू मिलती थी ‘यू’ नाम की. वहां शाम चार बजे ही अंधेरा हो जाता था. इदरीस न जाने कहां जाकर चोरी से ‘यू’ लेकर आता था. फिर हम वो ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ गाने जैसे मग में पिया करते थे. एक महीना वहां हमने खूब एन्जॉय किया. हम सब ज़िंदगी में पहली बार फ्लाइट में भी बैठे. एक बार तो ऐसा कांड हुआ कि गांववाले हमें मारने इकट्ठे हो गए थे. क्रिसमस का वक्त था. शाम हुई तो हम पीने निकल गए. इरफ़ान समेत बहुतों ने खूब पी. अमित, बशीर और लड़कियों को छोड़कर.

इदरीस को इतनी चढ़ गई कि वो क्रिसमस ट्री पर ही धड़ाम से जा गिरा. उससे पहले वो एक चर्च में गया. वहां प्रार्थना चल रही थी. इदरीस ज़ोर से चिल्लाया, ‘ओ येशु’.. वहीं से गांववाले सुलगने शुरू हो गए थे. फिर क्रिसमस ट्री वाला हादसा हुआ, तो वो बहुत चिढ़ गए. हमें मारने के लिए भीड़ जमा होने लगी. हमें कुछ होश नहीं था. अमित और वहां के कुछ लोकल साथियों ने हमारा सामान मिनी-बस में फेंका. साथ-साथ हमें फेंका और भगा दिया. दूसरे दिन हमारी खूब क्लास लगी.

इम्फाल के उस टूर के कुछ मस्तीभरे पल. (फोटो कर्टसी: अशोक लोखंडे)
इम्फाल के उस टूर के कुछ मस्तीभरे पल. (फोटो कर्टसी: अशोक लोखंडे)

उसी ट्रिप पर एक बार हम डेंजर टेरिटरी में भी घुस गए थे. बाद में पता चला कि वो उल्फा वालों का इलाका था.

जब इरफ़ान कहता था कि मांगना ही है, तो कुछ बड़ा मांगो  

ये किस्सा इरफ़ान की अलर्टनेस की हाइट का है. जब हम थर्ड ईयर में थे, हमारा थोड़ा जलवा था. हम कुछ भी मांगते थे, हमें मैनेजमेंट से मिल जाता था. जैसे हम ट्रिप मांगते थे, फ़ौरन मिल जाती थी. जो हमें ज़रूरी लगता, हम मांग लेते. इरफ़ान ने कहा, थम जाओ ज़रा. उनसे बोला, ये जो हमारी अक्ल में आता है हम मांग लेते हैं, आप दे देते हैं इसका क्या मतलब है? हमारी मांगें होती भी छोटी-मोटी हैं. हमारी डिमांड खुद को एनहांस करने की होनी चाहिए. उसके लिए हम क्या बोलेंगे! ये तो आपको सोचना चाहिए कि हमें क्या चाहिए! हम तो कल कुछ भी मांग लेंगे. आप बोलेगे यस. इसका क्या मतलब है? आप यहां पर कर्ता-धर्ता हैं. हमारे भले के लिए क्या है, वो आपको खुद सोचकर हमें देना चाहिए.

इतना अलर्ट था इरफ़ान! एनएसडी से हमें क्या मिलना चाहिए इसको लेकर. हमें बहकने से बचाता था इरफ़ान! छोटी सी चीज़ में सैटिस्फाई न होने का आइडिया देता था इरफ़ान! एनएसडी से कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा अच्छी चीज़ें कैसे हासिल करें, ये हमें इरफ़ान ने सिखाया. हम बहुत लकी थे कि वो हमारे साथ था. अगर वो नहीं होता, तो हमारी बैच बहुत ही एवरेज होती. उसका काफी कंट्रीब्यूशन है हमारे जीवन में. आर्ट की फील्ड को, थिएटर को, एक्टिंग को, सिनेमा को, दुनिया को, फिलॉसफी को, रिश्तों को, दोस्ती को एक अलग तरह का आयाम देने में इरफ़ान का काफी बड़ा हाथ है.

और फिर इरफ़ान, गोविंद निहलानी के हाथ लग गए

पासआउट के बाद दूसरी जर्नी शुरू हो गई. सुतपा और इरफ़ान दिल्ली में ही लगे रहे. प्रसन्ना जी हमारे बैच को लेकर बहुत उत्साहित थे. हमने एक ग्रुप खोला. नाम रखा ‘एकत्र’. एक प्ले बनाया ‘लाल घास पर नीले घोड़े’. उस प्ले के दौरान मशहूर थिएटर डायरेक्टर सत्यदेव दूबे जी की नज़र इरफ़ान पर पड़ी. उन्होंने कहा कि ये तो बहुत ही रियल एक्टिंग करता है. वो काफी इम्प्रेस हुए. उन्होंने गोविंद निहलानी से कहा उस प्ले को टेलीविज़न के लिए शूट करने को. और इस तरह इरफ़ान सही हाथों में पहुंच गए.

गोविंद निहलानी की फिल्म 'दृष्टि' का पोस्टर. इसमें डिंपल कपाड़िया और शेखर कपूर ने लीड रोल किया था.
गोविंद निहलानी की फिल्म ‘दृष्टि’ का पोस्टर. इसमें डिंपल कपाड़िया और शेखर कपूर ने लीड रोल किया था.

गोविंद निहलानी से जुड़ना उनके लिए मुंबई का एंट्री टिकट बना. गोविंद जी ने इरफ़ान को केंद्र में रखकर तीन प्ले किए. और एक फिल्म में भी इरफ़ान को रोल दिया. नाम था ‘दृष्टि’. उसका पोस्टर बड़ा हिट रहा था. डिंपल कपाडिया के साथ इरफ़ान का बड़ा इंटिमेट सीन था. हमने कहा यार इरफ़ान की तो चल पड़ी! उसी दौरान मुझे अमोल पालेकर का सीरियल मिल गया और मैं भी मुंबई में जमने लगा. कुछेक सीरियल हमने साथ भी किए.

केतना मेहता को ना बोल दिया!

एक बात मुझे बाद में पता चली, जो मेरे लिए बहुत शॉकिंग थी. इरफ़ान ने ‘केतन मेहता’ की फिल्म ‘माया मेमसाब’ में रोल रिजेक्ट कर दिया था. बहुत अहम रोल था. केतन मेहता नाम भी बड़ा था. मैंने इरफ़ान से पूछा कि तू ऐसा कैसे कर सकता है! इरफ़ान ने बोला मुझे वो नहीं करना था, पसंद नहीं था. मेरा कहना ये था कि अभी हमारी कोई चॉइस नहीं है. बेगर्स आर नॉट चूज़र्स. और तू रोल रिजेक्ट कर रहा है! उसका इंस्टिंक्ट था कि उसे अच्छा काम करना है. उसे ये भलीभांति पता था कि अच्छा काम करूंगा, वो लोगों के सामने आएगा, तो और अच्छा काम मिलेगा. और इसके लिए टर्म्स मैं डिक्टेट करूंगा. ये उसने बड़ी शिद्दत से फॉलो किया. ये चीज़ मेरे लिए बड़ी अमेजिंग थी कि इतने बड़े डायरेक्टर को मना कर दिया. तब तक इरफ़ान काफी प्लेज़ और शॉर्ट फ़िल्में कर चुके थे. उनका कहना था कि मेरा सारा काम इनके सामने है. ये मुझे कौन सा रोल दे रहे हैं!

ऐसा ही कुछ उनका चंद्रप्रकाश द्विवेदी के साथ भी हुआ. उस वक्त वो कोई फिल्म बना रहे थे. वहां भी इरफ़ान मेन रोल के लिए ट्राई कर रहे थे. द्विवेदी साहब को वो इसके काबिल नहीं लगे. उनकी नज़र में मेन रोल के लिए राहुल रॉय जैसा कोई फिट होता. इरफ़ान को बहुत ख़राब लगा. उसने कहा कि मैंने अपनी सारी अच्छी चीज़ें दिखाई. उन्होंने मेरा काम देखा, उसे एप्रिशिएट भी किया, फिर मेन रोल क्यों नहीं देते?

जब सुतपा इरफ़ान का संबल बनी

सुतपा-इरफ़ान और हम सबका एक साथ स्ट्रगल चल रहा था. साथ में रहते थे, साथ में स्ट्रगल करते थे. सुतपा को टोनी सिंह के यहां एक सीरियल में राइटिंग का काम मिल गया और वहीं पर इरफ़ान को रोल मिल गया. सीरियल था ‘बनेगी अपनी बात’. इससे उनकी गाडी थोड़ी पटरी पर आने लगी. इरफ़ान के पास एक बेनिफिट भी था. सुतपा लिखती थी. इरफ़ान का स्ट्रगल चल ही रहा था. इसी कारण इरफ़ान कई बार काम ठुकराने तक की हिम्मत दिखा सके. वो चीज़ें चुन सकते थे. इस तरह सुतपा ने इरफ़ान को उभारने में बड़ा मेजर रोल प्ले किया. इरफ़ान को फिल्मों में भी लगातार रोल मिलते रहे.

इरफ़ान-सुतपा. बैचमेट, दोस्त, लाइफ पार्टनर...
इरफ़ान-सुतपा. बैचमेट, दोस्त, लाइफ पार्टनर…

फिर उसको मिली ‘हासिल’. और उसके बाद तो सब हिस्ट्री है. इरफ़ान बड़ा होता गया. बड़े होने के साथ-साथ मसरूफियत बढ़नी ही थी. बढ़ी. मुलाकातों का वक्फा लंबा होता गया. काफी दिनों में मुलाक़ात होती. किसी ओकेजन पर, किसी पार्टी में. हम हाउस पार्टीज़ भी बहुत करते थे. सबकी फैमिलीज़ होती थीं बच्चों समेत. साल में कम से कम दो बार तो ऐसी पार्टीज़ ज़रूर होती थीं. इसके अलावा किसी फ़िल्मी पार्टी में या किसी सीरियल की पार्टी में मुलाक़ात हो ही जाया करती थी. या किसी और दोस्त के घर वो भी आ गया, मैं भी आ गया टाइप मिलना होता था.

रियलिज़्म की जो ज़िद थी, उसी को ताकत बनाया इरफ़ान ने

इरफ़ान का जो स्टाइल था, उसको लेकर हम बड़े सशंकित रहा करते थे. हम उससे कहते कि हमें नहीं लगता इससे तुम्हें रोटी मिलेगी. तू जो कर रहा है वो बहुत डीप है, यहां के लोग नहीं समझेंगे. मैंने उसको सलाह दी थी कि कुछ थोड़ा इसमें ऑल्टर कर ले. इरफ़ान ने कहा भी कि वो फॉलो करेगा. मुझे बहुत फक्र है कि उसने अपने स्टाइल को मेंटेन किया, उसको अपनी टर्म्स पर एग्जीक्यूट किया और उसे सक्सेस में बदलकर दिखाया. जो मेरे लिए किसी मिरैकल से कम नहीं है. ऐसी ग्रैंड सक्सेस जो किसी ने नहीं सोची थी. ये सक्सेस किसी बॉलीवुड सुपरस्टार वाली सक्सेस नहीं है. ये क्रिएशन की सक्सेस है. वर्ल्ड सिनेमा को टक्कर देने की सक्सेस है. मुझे कोई हैरानी नहीं होती कि इरफ़ान एक दिन ऑस्कर ले आता.

इरफ़ान की एक्टिंग एक प्रोसेस थी, जो लगातार चलती रहती थी. कमर्शियल ऑडियंस को भी उन्होंने डिफरेंट एक्टिंग देखने की लत लगाई. इरफ़ान की एक्टिंग देखकर कोई भी कह सकता है कि यार ये तो बहुत सरल एक्टिंग है, मैं भी कर लूंगा. लेकिन ऐसा नहीं है. वो बहुत कठिन काम था. और बहुत थकाने वाला भी.

इरफ़ान. सिनेमा की दुनिया का ध्रुव तारा. जो जगह बना ली, वो हमेशा रहेगी.
इरफ़ान. सिनेमा की दुनिया का ध्रुव तारा. जो जगह बना ली, वो हमेशा रहेगी.

इरफ़ान की सक्सेस को देखकर बहुत ख़ुशी होती थी, अभिमान भी. कि ये हमारा बैचमेट है. उसकी सक्सेस का जो घोंसला है, वो हमने बुनते देखा. उसको पनपते देखा. हमने उससे सीखा. कुछ उसने हमसे सीखा. हमारा प्रॉडक्ट पूरी दुनिया पर छा गया. कहीं न कहीं इरफ़ान में हम सब बसते थे. उसकी सारी परफॉरमेंसेस में हम दिखते हैं.

आखिरी बार चेहरा नहीं देख पाया दोस्त का

उसके गुज़रने वाले दिन मैं कब्रिस्तान गया था. लेकिन मैं उसकी सूरत नहीं देख पाया. सिर्फ 20 ही लोगों को परमिशन मिली थी. पुलिस को कन्विंस करते-करते बहुत समय चला गया. कई करीबी दोस्त बाहर ही खड़े थे. मीता ने कहीं से जुगाड़ लगाकर एंट्री करवाई. जब तक मैं अंदर जा पाता, उसे दफना दिया गया था. लोग मिट्टी डाल रहे थे. एक झंझावात जो हमेशा के लिए सो गया था. पर उसने वो सब ‘हासिल’ कर लिया था, जो वो सोचा करता था. मैंने भी अपने यार की कब्र पर अपने हिस्से की मिट्टी डाली. और उसको अलविदा कहकर आ गया.


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