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वो भारतीय क्रिकेटर जिसने टीम में जगह पाने के लिए सेलेक्टर्स को रिश्वत देने की कोशिश की थी

20 नवंबर 2003. दोपहर कुछ डेढ़ बजे एनडीटीवी चैनल पर एक खबर चली – भारतीय क्रिकेट बोर्ड के जॉइंट सेक्रेटरी प्रोफ़ेसर रत्नाकर शेट्टी के अनुसार एक भारतीय क्रिकेटर ने टीम सेलेक्टर्स को पैसे देकर टीम में जगह पक्की करवाने की कोशिश की थी. रत्नाकर शेट्टी ने ये बातें प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया को कहीं थीं. इसी हवाले से एनडीटीवी ने ये सनसनी फैला देने वाली ख़बर पेश की. ऐसा पहली बार सुनाई पड़ रहा था. कम से कम पब्लिक में इस तरह से कोई खबर पहली बार ही आई थी. रत्नाकर शेट्टी ने कहा कि खिलाड़ी को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाएगी. शाम होते-होते खिलाड़ी का नाम साफ़ हो गया – अभिजीत काले. अभिजीत ने कुछ ही महीने पहले भारतीय टीम के लिए अपना पहला वन-डे मैच खेला था.

अभिजीत काले हालांकि मुंबई से आता था लेकिन टीम के लिए कड़े कम्पटीशन के चलते महाराष्ट्र की टीम में जगह ली. डोमेस्टिक सर्किट में ताबड़तोड़ परफॉर्म करने के बावजूद अभिजीत को नेशनल साइड का मुंह देखने को ही नहीं मिला. काले ने 84 फर्स्ट क्लास मैचों में 6,806 रन बनाए हुए थे. इस दौरान उसके बल्ले से 24 सेंचुरी और 27 हाफ़ सेंचुरी निकली थीं. यानी अपने आधे से ज़्यादा मैचों में वो 50 रन के ऊपर स्कोर रहा था. इस दौरान काले का एवरेज 58.67 का रहा. लेकिन इस सब के बावजूद काले को तब टीम में जगह मिली जब बांग्लादेश टूर पर जा रही टीम इंडिया के बड़े खिलाड़ियों ने आराम फ़रमाने का मन बना लिया.

सनथ जयसूर्या के साथ अभिजीत काले की एक तस्वीर.
सनथ जयसूर्या के साथ अभिजीत काले की एक तस्वीर.

काले ने अपने करियर की शुरुआत एक ओपनिंग बैट्समैन के तौर पर की थी. 1992 में इंडिया अंडर-19 की टीम से खेलते हुए न्यूज़ीलैंड की टीम के ख़िलाफ़ सेंचुरी मारी और सबकी निगाहों में चढ़ गया. इसके बाद महाराष्ट्र की टीम के लिए एक मजबूत मिडल ऑर्डर के रूप में काले ने बल्ला थामा. 2001 में जब इंग्लैंड की टीम ने भारत का दौरा किया तो टूर मैच के दौरान जिस भारतीय-ए साइड ने इंग्लैंड का सामना किया, उसमें अभिजीत काले ने सबसे ज़्यादा रन बनाए. इसके बाद 2003 में वेस्ट इंडीज़ के टूर पर जब इंडिया ए की टीम गई तो भी अभिजीत ने अपना कमाल दिखाया. अंत में सब कुछ होने के बाद काले बांग्लादेश के लिए उड़े. अप्रैल 2003 में एक मैच खेलने को मिला. 10 रन बनाए. और बस.

नवंबर 2003 में किरन मोरे और प्रणब रॉय ने ये आरोप लगाए कि उन्हें टीम में जगह देने के बदले अभिजीत काले ने 10-10 लाख रुपये की पेशकश की. हांलाकि इस पूरे मसले में बहुत सी बातें धूप-छांव की तरह आईं. कभी कुछ तो कभी कुछ. शुरुआत में इन दोनों सेलेक्टर्स का कहना ये था कि अभिजीत ने पैसों की पेशकश टीम की ए साइड में रहने के लिए की थी. बाद में इस बात को बदल कर ऐसा कहा जाने लगा कि पैसों का ऑफ़र नेशनल टीम में जगह पाने के लिए था. (इस वक़्त ये ध्यान में रखा जाए कि उस दौरान इंडिया-ए के लिए टूर खेलने के एवज में हर खिलाड़ी को 4 लाख रुपये मिलते हैं. यानी अभिजीत अगर पैसे ऑफर कर रहा था तो अपनी ‘हैसियत’ से कहीं ज़्यादा ऑफर कर रहा था.) इसके साथ ही एक और बात ऐसी आई जिसे आरोप लगाने वाले पक्ष ने बाद में बदला. पहले कहा गया था कि काले ने पैसों का ऑफर दिया था, बाद में इस बात को बदल कर कहा जाने लगा कि ये ऑफर काले की मां ने दिया था. पैसों के मामले में ‘हैसियत’ की बात को महाराष्ट्र के चीफ सेलेक्टर यजुर्वेंद्र सिंह ने भी उकेरा. उन्होंने विज्डन क्रिकइंफो से कहा, “मुझे इस खबर से झटका सा लगा है. मुझे नहीं लगता है कि काले इतनी बड़ी रकम देने का सामर्थ्य रखता है.” लेकिन इसी दौरान बालासाहेब थोर्वे ने कहा कि वो नहीं चाहेंगे कि कोई भी दागी खिलाड़ी टीम का हिस्सा बने. और इस तरह से 3 दिन बाद शुरू होने वाले रणजी सीज़न में अभिजीत को जगह मिलने पर विराम लग गया.

साल 1988 में अभिजीत और सचिन दोनों को ही बॉम्बे का बेस्ट जूनियर क्रिकेटर घोषित किया गया.
साल 1988 में अभिजीत और सचिन दोनों को ही बॉम्बे का बेस्ट जूनियर क्रिकेटर घोषित किया गया.

सौरव गांगुली, उस वक़्त के भारतीय कप्तान ने कहा, “मैं अभिजीत काले को काफ़ी वक़्त से जानता हूं. मुझे नहीं लगता है कि वो ऐसा कर सकता है. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है.” 1 दिन बाद बीसीसीआई चीफ़ जगमोहन डालमिया ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि मामले में इन्क्वायरी ख़तम हो जाने तक अभिजीत काले को क्रिकेट खेलने से सस्पेंड कर दिया गया. इसी कांफ्रेंस में ये साफ़ हुआ कि 19 नवंबर 2003 को डालमिया को ये शिकायत मिली थी.

इसके बाद एनडीटीवी से बात करते हुए काले ने कहा, “मैं बोर्ड के फ़ैसले से निराश हूं. मैं मुंबई जा रहा हूं. सबसे पहले अपनी फैमिली से बात करूंगा और उसके बाद देखूंगा कि आगे क्या करना है.”

25 नवंबर 2003 को काले ने पुणे के डिस्ट्रिक्ट सिविल कोर्ट में बीसीसीआई के ख़िलाफ़ अर्जी दायर की. उसकी गुहार थी कि जब तक इन्क्वायरी पूरी नहीं हो जाती है तब तक खिलाड़ी को सस्पेंड कर देना गैर संवैधानिक है और इस लिहाज़ से उन्हें खेलने की अनुमति मिलनी चाहिए.

28 नवम्बर को पुणे के कोर्ट ने इस बात पर अभिजीत का साथ दिया कि इन्क्वायरी ख़तम होने तक खिलाड़ी को सस्पेंड नहीं ही किया जाना चहिये. और इस तरह से अभिजीत को फर्स्ट क्लास क्रिकेट में खेलने के लिए ‘परमीशन’ मिल गई थी. अब महाराष्ट्र क्रिकेट असोसिएशन के चेयरमैन का कहना था कि चूंकि कोर्ट ने अभिजीत को खेलने की अनुमति दे दी है इसलिए सभी को कोर्ट के आदेश का पालन करना होगा.

30 नवंबर को पुणे के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने मामले को गोल घुमाकर वापस शुरुआत पर लाते हुए अभिजीत पर बैन लगा दिया. बीसीसीआई ने कोर्ट में 28 नवंबर के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की थी. अभिजीत पर वापस से बैन लग गया.

20 दिसंबर तक का घटनाक्रम ऐसा रहा – डीवी सुब्बाराव ने इन्क्वायरी कर उसकी रिपोर्ट बीसीसीआई को भेजी जिसे डिसिप्लिनरी कमिटी के पास जाना था. इस इन्क्वायरी में अभिजीत काले के ख़िलाफ़ प्राइमा-फ़साई सबूत मिले हैं जिसकी वजह से और गहराई में जाकर जांच करनी होगी. इस इन्क्वायरी रिपोर्ट में सबसे बड़ा मामला जो कि सब कुछ काले के ख़िलाफ़ रख रहा था – वो फ़ोन कॉल्स (कई सारी) जो कि सेलेक्टर्स को की गईं. इस रिपोर्ट में लिखा हुआ था कि अभिजीत ने किरन मोरे को 10 लाख रुपये ऑफर किये थे और ऐसा जून-जुलाई में हुआ था. काले के वकील ने कहा कि काले ने फ़ोन सिर्फ इसलिए किये थे कि सेलेक्टर्स को वो ये बता सकें कि उनकी कंधे की चोट सही हो गई है और वो टीम में शामिल किये जाने के लिए फिट थे. इसके अलावा रिपोर्ट से ये भी मालूम चला कि काले ने प्रणब रॉय को 5 बार फ़ोन कॉल की और एक  बार मुंबई एयरपोर्ट पर भी मुलाक़ात की. यहीं पर इस रिपोर्ट के ज़रिये ये सामने आया कि मोरे के अनुसार काले की मां बड़ौदा में उनके घर गईं और मोरे की गैर मौजूदगी में उनकी पत्नी से बात की. दिसंबर के पहले हफ़्ते में एक कमिटी बनी जो कि काले के ख़िलाफ़ जांच में जुट गई. अगले हफ़्ते ही अभिजीत के ख़िलाफ़ कारण-बताओ नोटिस जारी हुआ जिसका जवाब देने के लिए उसे 15 दिन का समय दिया गया. 20 दिसंबर को अभिजीत काले ने ये कहा कि उसने 1 अगस्त को आख़िरी बार मोरे से बात की थी जबकि 18 नवंबर को प्रणब रॉय से फ़ोन पर बात हुई लेकिन वो कॉल महाराष्ट्र क्रिकेट असोसिएशन के चेयरमैन थोवरे की जानकारी में किया गया था.

सेलेक्शन मीटिंग में किरन मोरे और प्रणब रॉय. साथ में हैं कप्तान राहुल द्रविड़ और कोच ग्रेग चैपल. (इस तस्वीर का इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं है)
सेलेक्शन मीटिंग में किरन मोरे और प्रणब रॉय. साथ में हैं कप्तान राहुल द्रविड़ और कोच ग्रेग चैपल. (इस तस्वीर का इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं है)

इस बात पर थोवरे ने भी बातें बताईं – थोवरे को मोरे ने बताया कि कैसे अभिजीत उनके ऊपर टीम में सेलेक्शन के लिए प्रेशर डाल रहा था और एक रोज़ उसकी मां उनके घर पहुंच गई थीं. इसके बाद थोवरे ने तुरंत ही काले से बात की जहां अभिजीत काले ने बताया कि उसकी मां उसकी शादी के लिए लड़की ढूंढने बड़ौदा गई थीं और वहीं काले का फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट मोरे को देने उनके घर चली गई थीं. थोवरे ने बताया कि इसके ठीक बाद काले मोरे से बात करने के लिए चला गया. जो फ़ोन कॉल था वो एमसीए के ऑफिस से ही किया गया था लेकिन दोनों के बीच क्या बातें हुई, इसके बारे में थोवरे को कुछ नहीं मालूम पड़ा.

15 मई 2004 को इस मामले में एक बड़ा काम हुआ. 9 घंटे की मैराथन सुनवाई चली. जगमोहन डालमिया की मौजूदगी में. डिसिप्लिनरी कमिटी के सामने अभिजीत काले बैठे हुए थे. एक के बाद एक गवाह लाये जा रहे थे. प्रणब रॉय के दोस्त राजीव गुप्ता ने आकर ये बताया कि उनकी मौजूदगी में मुंबई एयरपोर्ट पर अभिजीत ने रिश्वत की बात कही थी. इसके अलावा किरन मोरे की पत्नी रावी ने ये कहा कि उनके घर पर अभिजीत की मां आईं और उन्होंने कहा कि रावी किरन से कहकर अभिजीत को टीम में जगह दिलवाएं वरना अभिजीत ख़ुदकुशी कर लेगा. इस सुनवाई के दौरान अभिजीत काले फूट-फूट कर रोये. बाद में अख़बारों में ये ख़बरें छपीं कि काले ने अपने गुनाह को कुबूला है जिसे अभिजीत काले ने तुरंत ही झूठा बता दिया.

29 मई 2004 को अभिजीत काले ने बोर्ड के नाम एक ख़त लिखा और ये कहा कि उन्होंने टीम के सेलेक्टर्स को प्रभावित करने की कोशिश की थी. हांलाकि उसने ये भी कहा कि उसके पैसों की पेशकश नहीं की थी. इसके साथ ही काले ने ये भी कहा कि बोर्ड सज़ा सुनाते वक़्त थोड़ी ढिलाई बरते क्यूंकि परिवार के अकेले कमाऊ होने के नाते क्रिकेट खेलने से बैन करने पर उसके और उसके परिवार पर असर पड़ेगा.

2 जून 2004 को भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने अभिजीत काले को 31 दिसंबर 2004 तक के लिए बैन कर दिया.


इस पूरी कहानी के दौरान जो बाकी की क्रिकेट दुनिया चल रही थी उसमें न जाने कितनी ही बातें उठीं. हैदराबाद के खिलाड़ी और इंडिया-ए के प्लेयर वांका प्रताप ने बताया कि 1998 में नेशनल सेलेक्टर के एक दलाल ने उसे अप्रोच किया था और भारतीय टीम में जगह दिलवाने के एवज में पैसों की मांग की थी. हैदराबाद के ही खिलाड़ी पवन कुमार ने वांका की बातों को सही ठहराया था.

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग एज-ग्रुप में चलने वाले रेट-कार्ड्स भी सामने आए. अंडर-17 प्लेयर रीतेश यादव ने उत्तर प्रदेश के सेलेक्टर्स शशिकांत खांडेकर और गोपाल शर्मा के ख़िलाफ़ सीधे आरोप लगाते हुए कहा, “उन्होंने मुझसे 50,000 रुपये मांगे. जब मैंने कहा कि मैं नहीं दे सकता तो उन्होंने कहा, ‘थैंक यू. आप जा सकते हैं.’ जब मैंने ये सब कुछ लिखित में जगमोहन डालमिया को दिया तो उन्होंने कहा कि उचित कार्रवाई की जाएगी लेकिन मालूम देता है कि कुछ भी नहीं हुआ.”

पूर्व बीसीसीआई ट्रेज़रर किशोर रुंगटा ने पीटीआई को बताया कि कई सेलेक्टर्स अविश्वसनीय हैं. कुछ ही वक्त दो सेलेक्टर्स एक होटल रूम में वेश्याओं के साथ पकड़े गए थे.

वांका प्रताप (हैदराबादी प्लेयर) ने एक खिलाड़ी का नाम लिया जिसकी कहानी मज़ेदार है – नोएल डेविड. ये वही डेविड है जिसे 1997 के वेस्ट इंडीज़ टूर पर जवागल श्रीनाथ के चोटिल हो जाने पर उनके रिप्लेसमेंट के तौर पर बुलाया गया था. डेविड एक ऑफ स्पिनर थे और श्रीनाथ एक फ़ास्ट बॉलर. वांका प्रताप बताते हैं कि जिस वक़्त डेविड को इंडियन टीम के लिए चुना गया था, वो हैदराबाद की टीम तक का हिस्सा नहीं था. उस वक़्त बोर्ड के सेक्रेटरी रहे जयवंत लेले कहानी सुनाते हैं. उस कहानी के अनुसार – सचिन तेंदुलकर जो कि उस वक़्त भारतीय कप्तान थे, डेविड को टीम में नहीं चाहते थे. क्यूंकि उन्होंने डेविड का नाम भी नहीं सुना था. सचिन ने लेले को फैक्स किया और कहा कि उन्हें बड़ौदा के तुषार अरोठे या फिर हैदराबाद के कंवलजीत सिंह चाहिए थे. सेलेक्टर्स को ये बात बताई गई लेकिन उन्होंने डेविड का नाम ही दिया. सचिन ने फिर से पूछा, “ये डेविड कौन है?” सचिन ने एक और फैक्स किया जिसमें फिर से अरोठे या फिर कंवलजीत को टीम में रखने की बात दोहराई. लेकिन कप्तान की बातों को अनसुना कर दिया गया और डेविड ही वेस्ट इंडीज़ के प्लेन पर बैठा.

नोएल डेविड.
नोएल डेविड.

अभिजीत काले 2003 में खेले इकलौते वन-डे मैच के बाद भारतीय टीम के लिए कभी भी नहीं खेल पाया. बैन होने के बाद एक इंटरव्यू में कहा कि उसने सेलेक्टर्स को प्रभावित करने की कोशिश की थी लेकिन पैसों की बात कहीं भी नहीं थी. वो ये भी मानता रहा कि सेलेक्टर्स को बड़ी आसानी से छोड़ दिया गया.


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