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अब्बास कियारोस्तमी : आज के तोप फिल्मी लोग जिन्हें अपना आदर्श मानते हैं

ईरान मूल के कियारोस्तमी 22 जून 1940 में जन्मे थे. फ्रांस में 2016 में उनका निधन हुआ जब वे 76 बरस के थे.

मैं कहानी सुनाने में, बांधना नहीं चाहता हूं. मैं दर्शक को भावनात्मक तौर पर उत्तेजित करना या सलाह देना पसंद नहीं करता हूं. मैं उसे अपराध के भाव तले दबाना या तुच्छ करना नहीं चाहता हूं. ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें मैं फिल्मों में पसंद नहीं करता हूं.

– अब्बास कियारोस्तमी (1940-2016)

द ब्रेड एंड एली अब्बास कियारोस्तमी की पहली फिल्म थी जो उन्होंने 1970 में बनाई थी. 10.21 मिनट की ये ब्लैक वाइट कहानी एक बच्चे के बारे में थी जो तेहरान की गलियों से होता हुआ घर जा रहा है. उसका मन बचपन की पूरी तरंग में लीन है. रास्ते में एक खाली डब्बे को लात से मारता जा रहा है. हाथ में बड़ी रोटी है जो संभवत: ईरानी ब्रेड संगेक का प्रकार है. एक गली में उसकी तेजी से दौड़ती लय टूटती है जब एक कुत्ता सामने आ जाता है. वह भौंकता है. बच्चा डरकर गली के पिछले मोड़ दौड़ जाता है. कुत्ता आगे रास्ते में बैठ जाता है. बच्चा घर नहीं जा पा रहा. ये एक ऐसी स्थिति है जिससे दुनिया के हर गांव-कस्बे के बच्चे दो-चार हुए हैं. मैं भी. लेकिन इसे किसी फिल्म में कभी नहीं देखा. ये फिल्म किरायोस्तमी ने तेहरान स्थित बच्चों और वयस्क युवाओं के बौद्धिक विकास संस्थान ‘कानून’ के फिल्ममेकिंग विभाग के लिए बनाई थी. इस विभाग के सह-संस्थापक वे ही थे और ये विभाग की पहली फिल्म थी. बाल शिक्षा के लिए बनी होने के बावजूद फिल्म की प्रस्तुति और खासकर अंत ऐसा था जो एक अच्छे फिल्मकार द्वारा ही सोचा जा सकता है.

The Bread and Alley (1970)
The Bread and Alley (1970)

उनकी आखिरी फिल्म थी लाइक समवन इन लव जो 2012 में प्रदर्शित हुई. ये एक बूढ़े प्रोफेसर और एक युवती की कहानी है जो एक विश्वविद्यालय की छात्रा है और वेश्यावृत्ति करती है. जापान में शूट हुई, जापान में ही स्थित इस फिल्म का मूल विचार इससे 20 साल पहले उन्हें आया था जब वे टोकयो के एक कारोबारी इलाके में खड़े थे. वहां काले सूट-बूट में कई कारोबारी खड़े थे और उनके अंधेरों के बीच एक सफेद ब्राइडल गाउन में एक लड़की खड़ी थी. कियारोस्तमी ने किसी से पूछा तो पाया कि वह एक वेश्या है. उसने ब्राइडल गाउन इसलिए पहना हुआ था क्योंकि ऐसे परिधान वो युवा छात्राएं पहनती हैं जो पार्ट टाइम वेश्यावृत्ति करती हैं. मूल फिल्म में हालांकि काफी तब्दीलियां थीं.

Like Someone in Love (2012)
Like Someone in Love (2012)

इन दो फिल्मों के बीच अब्बास कियारोस्तमी का पूरा जीवन बसा है. उन्होंने 40 से ज्यादा फिल्में, शॉर्ट और डॉक्यूमेंट्री बनाईं. ईरान में क्रांति आई. इस्लामिक मुल्क बन गया. सेंसरशिप बढ़ गई. लेकिन वे अपनी फिल्में बनाते रहे. तमाम दिक्कतों के बीच. दुनिया में ईरान के सिनेमा को उन्होंने सबसे व्यापक पहचान दी. एक और पश्चिमी देश उनके मुल्क को axis of evil यानी शैतान की धुरी कहने में बिजी रहे, कियारोस्तमी अपनी फिल्मों से ऐसे एंबेसेडर बने हुए थे कि जब अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद न्यू यॉर्क फिल्म फेस्टिवल में उन्हें आने के लिए वीजा मना कर दिया गया तो फेस्टिवल के निदेशक ने इसे बहुत बुरा संकेत बताया. अन्य फिल्मकारों ने भी फेस्टिवल को बॉयकॉट किया.

विश्व में सिनेमा विधा के जो पहली पंक्ति के legend हैं, अब्बास कियारोस्तमी उस पंक्ति में खड़े होते हैं. इन्हीं का सोमवार को फ्रांस में निधन हो गया. वे कैंसर का इलाज करवा रहे थे. पिछले महीने पैरिस में उनका ऑपरेशन भी हुआ था.

एक अच्छी फिल्म क्या होती है आज उसे लेकर जो भी कमर्शियल परिभाषाएं मौजूद हैं वे सब भ्रम पैदा करने वाली हैं. कियारोस्तमी एक अच्छी फिल्म को इन अर्थों में देखते थे:

मुझे लगता है एक अच्छी फिल्म वो होती है जिसमें लंबे समय तक बने रहने की ताकत होती है. आप थियेटर छोड़ने के बाद उसे फिर से गढ़ने लगते हैं. ऐसी बहुत सी फिल्में हैं जो बोरिंग लगती हैं लेकिन वे अच्छी फिल्में हैं. वहीं दूसरी ओर ऐसी फिल्में हैं जो आपको सीट पर जकड़ देती हैं और इतना अभिभूत कर देती हैं कि आप सब कुछ भूल जाते हो, लेकिन बाद में आप छला हुआ महसूस करते हो. यही वो फिल्में होती हैं जो आपको बंधक बना लेती हैं. मैं बिलकुल भी पसंद नहीं करता हूं ऐसी फिल्में जिनमें फिल्मकार दर्शकों को बंधक बना लेते हैं और उन्हें भड़काते हैं. बल्कि मैं उन फिल्मों को वरीयता देता हूं जो थियेटर में अपने दर्शकों को सुला देती हैं. मुझे लगता है वो फिल्में इतनी दयालु होती हैं कि आपको एक प्यारी झपकी लेने देती हैं और आपको विचलित नहीं छोड़ती जब आप थियेटर से जा रहे होते हैं. कुछ फिल्में रही हैं जिन्हें देखकर मैं थियेटर में सोया हूं लेकिन उन्हीं फिल्मों ने मुझे रात रात भर जगाया है. जिनके बारे में सोचता-सोचता सुबह को मैं जागा हूं. जिनके बारे में हफ्तों तक सोचता रहा हूं. इस तरह की फिल्में हैं जिन्हें मैं पसंद करता हूं.

विश्व के सिनेमा में जापान के अकीरा कुरोसावा, भारत के सत्यजीत रे, ऑस्ट्रिया के माइकल हेनेके, फ्रांस के जॉन लूक गोदार, जर्मन मूल के वर्नर हरजॉग जैसे लोग नहीं हुए हैं. इन्होंने व अन्य ने कहा है कि कियारोस्तमी होने के मायने क्या हैं और इनकी टिप्पणियां पत्थर की लकीर हैं.

फिल्म इतिहास में मील का पत्थर सेवन सामुराई (1954) और राशोमोन (1950) बनाने वाले अकीरा कुरोसावा ने कहा था, “जब सत्यजीत रे का देहांत हुआ तो मैं बहुत उदास हो गया था. लेकिन कियारोस्तमी की फिल्में देखने के बाद मैंने भगवान का शुक्रिया किया कि उन्होंने रे की जगह लेने के लिए हमें एकदम सही आदमी दे दिया है.”

फिट्जकराल्डो (1982) के रचयिता वर्नर हरजॉग ने अपनी नजर की टॉप-5 फिल्में बताईं तो उनमें चौथे नंबर पर कियारोस्तमी की वेयर इज़ द फ्रेंड्स होम? (1987) थी.

Where Is the Friend's Home? (1987)
Where Is the Friend’s Home? (1987)

2013 में बेस्ट फॉरेन फिल्म का ऑस्कर जीती एमूर और खासतौर पर द सेवंथ कॉन्टीनेंट (1989) के निर्देशक माइकल हेनेके से जब 2009 में पूछा गया कि वे समकालीन फिल्ममेकिंग परिदृश्य में किसके काम को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं तो उन्होंने कहा था, “मुझे कहना होगा, कियारोस्तमी. अभी भी उनसे आगे कोई नहीं निकल पाया है. जैसे ब्रेख़्त (Bertolt Brecht) ने कहा है, “जिसे हासिल कर पाना सबसे कठिन है वो है सादगी.” हर कोई सपना देखता है कि चीजों को सामान्य रूप से करेगा लेकिन फिर भी उसे दुनिया की भरेपन से भर देता है. सिर्फ बेस्ट लोग ही इसे हासिल कर सकते हैं. कियारोस्तमी ने किया है, ब्रेसों (रॉबर्ट, फ्रेंच फिल्मकार) ने किया है.”

टैक्सी ड्राइवर (1978), रेजिंग बुल (1980) और गुडफेलाज़ (1990) जैसी अनेक फिल्मों के दिग्गज अमेरिकी निर्देशक मार्टिन स्कॉरसेज़ी ने कहा था कि कियारोस्तमी सिनेमा में सबसे ऊंचे स्तर की कला का प्रतिनिधित्व करते हैं.

कियारोस्तमी के निधन के बाद उन्होंने द हॉलीवुड रिपोर्टर को जारी अपने वकतव्य में गहरा दुख जताया, “जब मैंने अब्बास कियारोस्तमी की मृत्यु की खबर पढ़ी तो मुझे गहरा धक्का लगा और मैं बहुत दुखी हुआ हूं. वे उन कुछेक दुर्लभ आर्टिस्टों में से थे जिन्हें दुनिया का खास ज्ञान होता है. महान जॉन रेनुआ ने कहा था “सच्चाई हमेशा जादुई होती है” और ये बात कियारोस्तमी के अद्वितीय काम का निचोड़ है.”

असगर फरहादी कियारोस्तमी से मिलने पैरिस जाने वाले थे लेकिन उससे पहले ही वे चल बसे. फरहादी ईरान की उस पीढ़ी के निर्देशक हैं जिन्होंने बड़े होते हुए रोमांचित होकर कियारोस्तमी की फिल्में देखीं. वे उनकी पीढ़ी के लिए बेस्ट आइकन थे. इन्हीं फरहादी ने आगे जाकर अ सेपरेशन जैसी अद्भुत फिल्म बनाई जिसे 2012 में बेस्ट फॉरेन फिल्म का ऑस्कर मिला. और ऐसा करने वाली ईरान की ये पहली फिल्म थी. फरहादी ने कहा कि कियारोस्तमी ने ईरान और ईरान के बाहर बहुत फिल्मकारों की पीढ़ियों को अपने काम से प्रेरित किया है.

मोहसेन मख़मलबाफ ईरान के प्रमुख फिल्मकारों में आते हैं. इनसे जुड़ी असली घटना पर कियारोस्तमी ने फिल्म क्लोज़ अप बनाई थी. मख़मलबाफ ने कहा कि ईरान के सिनेमा को जो वैश्विक पहचान आज मिली हुई है वो उसके कारण है. लेकिन उनके अपने ही मुल्क में उनके काम को पर्याप्त जगह नहीं मिली. उन्होंने दुनिया के सिनेमा को बदल कर रख दिया था. उसे ताजा किया था. उसका मानवीयकरण किया था. जो हॉलीवुड के खराश भरे संस्करण का उलटा था.

Close-Up (1990)
Close-Up (1990)

अब्बास कियारोस्तमी 1940 में जन्मे थे. तेहरान में. तेहरान विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स से उन्होंने पेंटिंग में मेजर किया. पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने ट्रैफिक पुलिसकर्मी के तौर पर भी काम किया. 60 के दशक में ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर काम किया. फिर विज्ञापन पोस्टर और फिल्में बनानी शुरू की.

जीवन को लेकर कियारोस्तमी के आधारभूत विचार बेहद अनूठे थे. उन्होंने एक कलाकार के तौर पर वो कहानियां चुनीं जो वक्त के दरिया को पार करके भी जिंदा रहेंगी क्योंकि उन्हें बनाने को लेकर दिमाग में किसी किस्म की मिलावट नहीं रखी गई. किसी क्षणिक प्राप्ति का लालच नहीं है. उनकी फिल्मों में ईरान का ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, लोगों का स्वभाव, उनका भोलापन, सादगी, बच्चों के विशिष्ट किरदार, व्यवहार, जीवन दर्शन, मृत्यु का दर्शन, हसरतें, सपने, फैंटेसी, गली-मुहल्ले, मध्यमवर्गीय और निम्नमध्यमवर्गीय जीवन, सही-गलत, नया-पुराना, समुदाय, सुंदर लैंडस्केप नजर आए हैं.

द ब्रेड एंड एली के चार साल बाद 1974 में उनकी फिल्म द ट्रैवलर आई थी जो एक लड़के कासम की कहानी थी. वह ईरान के छोटे शहर में रहता है और उसे दूर एक फुटबॉल मैच देखने जाना है. पैसे जुटाने के लिए वो अपने दोस्तों और पड़ोसियों को ठगता है. इस फिल्म में मानव स्वभाव और सही-गलत का बेहद अनूठा विश्लेषण है. ऐसा observation हमारी फिल्मों में नहीं मिलता.

 The Traveler (1974)
The Traveler (1974)

फिर 1977 में आई रिपोर्ट एक टैक्स अधिकारी की कहानी थी जिस पर रिश्वत लेने का आरोप लगता है. वो आत्महत्या का विचार करता है. वेयर इज द फ्रेंड्स होम? (1987), जिसने उन्हें व्यापक वैश्विक पहचान दिलाई, एक 8 साल के बच्चे की कहानी है जो अपने दोस्त की कॉपी लौटाने के लिए पड़ोस के गांव को निकला है. अगर वो ऐसा नहीं कर पाया तो उसके दोस्त को स्कूल से निकाल दिया जाएगा. लेकिन वो दोस्त के घर का रास्ता नहीं जानता.

इस फिल्म के बाद उन्होंने जो दो फिल्में बनाईं – लाइफ एंड नथिंग मोर (1992) और थ्रू द ऑलिव ट्रीज (1994) – इन्हें कोकर ट्रिलजी कहा जाता है. क्योंकि ये उत्तरी ईरान के कोकर गांव के इर्द-गिर्द बनी हैं. 1990 में ईरान में भूकंप आया था जिसमें 40,000 लोग मारे गए थे. इस हादसे का संदर्भ भी इनमें हैं.

Through the Olive Trees (1994)
Through the Olive Trees (1994)

क्लोज़-अप (1990) सच्ची घटना पर आधारित फिल्म थी जिसमें एक आदमी ईरानी फिल्म निर्देशक मोहसेन मख़मलबाफ बनने का नाटक करता है. एक परिवार के लोगों कहता है कि वो उसकी अगली फिल्म में काम करने वाले हैं. बाद में वो खुलासा होता है तो संबंधित परिवार कहता है कि चोरी करने के लिए उसने ये नाटक किया लेकिन ऐसा करने वाला होसेन कहता है कि बात इससे कहीं ज्यादा जटिल है.

उनकी सबसे आइकॉनिक फिल्म टेस्ट ऑफ चेरी (1997) मानी जा सकती है. ये एक ऐसे आदमी की कहानी है जो आत्महत्या करना चाह रहा है. वो अपनी गाड़ी में एक के बाद एक लोगों से मिल रहा है और चाह रहा है कि जब वो मर जाए तो कोई उसे ठीक से दफना दे. ये एक मस्ट वॉच है. वैसे बाकी सब भी.

Taste of Cherry (1997)
Taste of Cherry (1997)

उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उनकी काव्यात्मकता है. उसके अलावा यात्राएं. खासकर कारों में होने वाली पात्रों की यात्राएं और बातें. इन्होंने इस फॉर्मेट को बहुत अच्छे से बरता था. जैसे द विंड विल कैरी अस देख लीजिए. या फिर टेन देख लीजिए. बाद में अब्बास खुद 10 ऑन टेन नाम की डॉक्यूमेंट्री में भी इसी अंदाज में नजर आए जहां वे कार में उन जगहों पर जाते हैं और बातें करते हैं जहां पिछली फिल्में शूट कीं.

ईरान के जाने-माने फिल्मकार जफर पनाही की 2015 में प्रदर्शित फिल्म टैक्सी इसी प्रारूप पर बनी थी. इसमें पूरी फिल्म टैक्सी, इसे चला रहे जफर और अंदर बैठ रहे पात्रों की बातचीत पर आधारित होती है.

उनके इस प्रारूप को चुनने की खास वजह रही. दरअसल जफऱ कियारोस्तमी के शिष्य हैं. फिल्म थ्रू द ऑलिव ट्रीज़ में वे उनके असिस्टेंट थे. कियारोस्तमी ने ही जफर की 1995 में आई पहली फिल्म द वाइट बैलून लिखी और प्रोड्यूस की थी. ये जफर वही हैं जिनकी फिल्मों की विषय वस्तु को लेकर मार्च 2010 में उन्हें उनकी पत्नी, बेटी और दोस्तों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद दुनिया भर के कलाकारों, बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं ने उनकी रिलीज की कोशिशें कीं. लेकिन 2010 में उन्हें छह साल जेल की सजा सुनाई गई. 20 साल फिल्में बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. बाद में उन्हें नजरबंद कर दिया गया. उनके देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी. बावजूद इसके जफर ने दो-तीन फिल्में बनाईं जो विदेशों में प्रदर्शित हुई और जीती.

1979 भी कियारोस्तमी के जीवन में एक बहुत विकट समय था. इस समय ईरान में क्रांति हो गई थी. अमेरिका समर्थित मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी को देश छोड़कर जाना पड़ा और धर्मगुरु अयातोल्लाह खोमेनी देश के सर्वोच्च बन गए. उन्होंने ईरान को इस्लामी गणराज्य बना दिया. इस क्रांति के दौर में कई फिल्मकार, बुद्धिजीवी और कलाकार देश से बाहर चले गए क्योंकि गहरी सेंसरशिप लगनी लाज़िम थी. लेकिन कियारोस्तमी देश छोड़कर नहीं गए. उन्होंने नई सत्ता के तले सेंसर के नए नियमों की मांगों के बीच अस्तित्व बचाए रखा. बाद में जब उनसे पूछा गया तो वे बोले थे, “एक पेड़ जो जमीन में उगा है, उसे अगर आप एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं तो वो पेड़ फल देना बंद कर देगा. अगर मैंने अपना मुल्क छोड़ दिया होता तो मैं उस पेड़ जैसा हो जाता.”

इसके बाद लंबे समय पर कियारोस्तमी धैर्य के साथ सेंसर का सामना करते हुए फिल्में बनाते रहे. और अच्छी फिल्में बनाते रहे. लेकिन महमूद अहमदीनेजाद के सत्ता में आने के बाद उनके लिए फिल्में बनाना बहुत मुश्किल हो गया. तो अपनी आखिरी दो फिल्में उन्होंने ईरान से बाहर शूट की. सर्टिफाइड कॉपी इटली में और आखिरी फिल्म लाइक समवन इन लव जापान में. पिछले हफ्ते ही ऑस्कर पुरस्कारों की एकेडमी ने जिन 683 फिल्मी लोगों को आमंत्रित किया उनमें कियारोस्तमी भी थे.

ईरान जैसे मुल्क में सेंसरशिप में भला उन्होंने कैसे काम किया होगा? ये सवाल जरूर मन में कौंधता है. इसका जवाब भी कियारोस्तमी ही देते हैं. और संभवत: दुनिया में जिस भी कोने में आर्टिस्ट खुद को बंधा हुआ पाते हैं. जिन्हें लगता है कि सेंसरशिप है. उनके लिए कियारोस्तमी गज़ब प्रेरणा हैं. उन्होंने कहा था:

सपना लेने की क्षमता, सबसे महत्वपूर्ण मानवीय चारीत्रिक विशेषताओं में से है जो हर किसी में आनुपातिक रूप से समान नहीं है लेकिन सबके लिए पर्याप्त है. कल्पना कर पाना ऐसा सबसे विशिष्ट और अद्वितीय उपहार है जो मानवों को प्रदान किया गया है. हम देखने, चखने और सुनने जैसी अन्य इंद्रियों को महसूस कर सकते हैं और उनके लिए कृतज्ञ हैं. लेकिन हम नहीं जान रहे कि कल्पनाशीलता के जरिए सामने अपार संभावनाएं खुली हैं. अगर हमारे जीवन में सपनों की कोई क्रिया नहीं होती तो इनके होने का भी कोई कारण नहीं होता. हम सपने कब लेते हैं? जब हम अपनी परिस्थितियों के कारण नाखुश होते हैं. और ये कितनी अद्वितीय बात है कि दुनिया की कोई तानाशाही इन्हें (सपनों, कल्पनाशीलता को) काबू में नहीं कर सकती? न्याय की कोई व्यवस्था हमारी फैंटेसियों को नियंत्रित नहीं कर सकती. वो आपको जेल में फेंक सकते हैं लेकिन आपके पास फिर भी वो क्षमता होगी कि आप अपनी जेल अवधि जेल से बाहर काट सकते हैं और कोई आपको अंदर रख नहीं पाएगा. कल्पनाशीलता के जरिए आप दुनिया की सबसे दुर्गम दीवारों को लांघ सकते हैं और आपका कोई निशान भी पीछे नहीं छूटा होगा.

– अलविदा मास्टर!

AK

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(Story first published on July 6, 2016.)
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