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क्या है नया आधार कानून, जिस पर मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलट रही है!

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राज्यसभा में सोमवार यानी 8 जुलाई को नया आधार संशोधन बिल पास किया गया. इसके पहले ये बिल लोकसभा में पास किया जा चुका था. राज्यसभा में पास किए जाने के बाद इस बिल पर राष्ट्रपति की मुहर लगनी है और फिर ये बिल एक कानून की तरह सामने आएगा. लेकिन आधार बिल पास किए जाने के बाद पूरी बहस कठिन हो गयी है. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये बिल भारतीय नागरिकों की प्राइवेसी के साथ खिलवाड़ है, और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है, और सरकार का तर्क है कि इस बिल की मदद से नागरिकों की जानकारी और उनकी व्यक्तिगत जानकारियां सुरक्षित हैं.

लेकिन क्या है शुरुआत से लेकर अंत तक का मसला? आधार बिल की शुरुआत और अब तक का सफ़र? आइये देखते हैं?

आधार कब आया-कैसे आया?

आया 2009 में. जब देश में यूपीए की सरकार थी. इनफ़ोसिस के डायरेक्टर नंदन नीलेकणि ने इसकी कमान सम्हाली. और पूरी तैयारी के साथ इसे लांच किया गया 2010 में. लाने के पीछे कोशिश यही थी कि सभी नागरिकों को उनकी परिस्थितियों के हिसाब से सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मिले. धीरे-धीरे कुछ शहरों में शुरू की गयी योजना, देश के हरेक राज्य में गयी.

जन सुविधाओं के लिए मिली योजना अब सबकुछ के लिए अनिवार्य होती जा रही है
जन सुविधाओं के लिए मिली योजना अब सबकुछ के लिए अनिवार्य होती जा रही है

2014 में यूपीए चली गयी. भाजपा सत्ता में आयी. मोदी सरकार ने इस योजना को धीरे-धीरे और बढ़ाना शुरू कर दिया और कई सारी योजनाओं – जैसे बैंक खाते, फोन कनेक्शन – से जोड़ दिया.

मामले में पेंच कहां फंसा?

मामला फंसा ऐसे कि मोदी सरकार ने योजनाओं को सिर्फ आधार सिस्टम से जोड़ा ही नहीं, बल्कि अनिवार्य कर दिया. चूंकि आधार कार्ड बनवाने में आंखों की पुतली और उंगलियों की छाप ज़रूरी होती है, तो कई उम्रदराज़ लोगों के आधार कार्ड पहले तो बन ही नहीं पाते थे. और अगर बन जाते थे तो बैंकों में और फोन कनेक्शन में कई बार मैच नहीं होते थे. और चूंकि नियम के तहत ये ज़रूरी था, तो बिना आधार या उंगली के सही छाप के ये लोग सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते थे.

ये बहस हो ही रही थी कि आधार को सर्व-सुलभ कैसे बनाया जाए, तभी धीरे-धीरे आधार का डेटा लीक होने की खबरें आने लगीं. लोगों की व्यक्तिगत जानकारियां हर जगह दिखने लगीं. ट्विटर पर एलियट एंडरसन नाम के हैकर ने भारत की कई बड़ी सरकारी वेबसाइटों को खंगाला और पता लगाया कि इन वेबसाइटों पर लोगों की पर्सनल जानकारियां आसानी से उपलब्ध हैं, और ये हुआ सिर्फ आधार की वजह से. बहस उठी कि सरकार आधार मांग तो रही है, लेकिन लोगों की निजी जानकारियों को बचा नहीं पा रही है.

क्या हुआ जब मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट?

और सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल सितम्बर में कहा कि आधार का उपयोग बस जनकल्याण योजनाओं के सीधे ट्रांसफर के लिए हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और टेलीकॉम सेक्टर पर यह प्रतिबन्ध लगाया कि वे आधार का इस्तेमाल अपनी सुविधाएं देने के लिए नहीं कर सकते हैं. इसके साथ ही साथ प्राइवेट कंपनियों के लिए भी आधार के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

चुनाव आयोग ने इलैक्टोरल वॉन्ड पर चिंता जताई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार का बस उन्हीं कामों के लिए इस्तेमाल हो सकता है, जिनके लिए आधार बना था.

कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकों को उनका आधार अपने बैंक खाते और फोन कनेक्शन से जोड़ने की ज़रुरत नहीं है.

क्या कहता है सरकार का संशोधन बिल?

इस बिल के बाद सरकार एक बिल पर काम करने लगी. बिल पेश हुआ. लोकसभा में पूर्ण बहुमत से पास हो गया. बिल गया राज्यसभा में. राज्यसभा में वौइस् वोट हुआ, यानी सांसदों ने “हां” और “ना” की आवाजों के साथ वोटिंग की और आधार बिल राज्यसभा में भी पास हो गया.

इस संशोधन बिल में सरकार ने कहा है कि भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से आधार का उपयोग कर सकते हैं. केंद्र सरकार ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में कहा है

“इस संशोधन के बाद कोई भी व्यक्ति अपना आधार नंबर या इसके सत्यापन की प्रक्रिया से होकर गुजरने के लिए बाध्य नहीं होगा.”

सरकार इस बिल में यह प्रावधान भी ला रही है कि UIDAI – यानी वह एजेंसी जो आधार का सारा कामधाम देखती है – किसी भी संस्था पर 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लगा सकती है. ये जुर्माना उस स्थिति में जब वो संस्था आधार लॉ का पालन ना करे या UIDAI द्वारा जानकारियां मांगी जाने पर न सौंपे.

फोन से लेकर बैंक तक, सबके लिए आधार की ज़रुरत है.
फोन से लेकर बैंक तक, सबके लिए आधार की ज़रुरत है.

सरकार ने यह भी कहा है कि 18 वर्ष की कम आयु के बच्चे अगर आधार रखते हैं, और 18 वर्ष की आयु तक आने पर वे अपना आधार कैंसिल करा सकते हैं. इस पर सदन में बहस करते हुए भाजपा नेता, कानून मंत्री और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आधार से जुड़ा डाटा पूरी तरह से सेफ है. उन्होंने ये भी कहा कि आधार से जुड़ी जानकारियां अदालत के आदेश और राष्ट्र की सुरक्षा को चुनौती के समय ही साझा की जाएंगी, बाकी समय सभी जानकारियां पूरी तरह से सेफ हैं.

क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए नया क़ानून बना रही है?

हां. ऐसा कह सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि प्राइवेट कम्पनियां आधार का उपयोग नहीं कर सकती हैं. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि बैंक और टेलीकॉम आधार का उपयोग नहीं कर सकते हैं. इसका उपयोग योजनाओं के सीधे लाभ तक ही सीमित रहना चाहिए. लेकिन सरकार का बिल फिर से आधार को बैंकों, मोबाइल कंपनियों, इनकम टैक्स और दूसरी प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल रहा है.

रविशंकर प्रसाद पहले आधार पर सरकार का निर्णय बचाते थे, अब नया बिल बचा रहे हैं.
रविशंकर प्रसाद पहले आधार पर सरकार का निर्णय बचाते थे, अब नया बिल बचा रहे हैं.

भले ही सरकार ने उपयोग को नागरिक की अपनी इच्छा तक ही सीमित रखा हो, लेकिन ऐसा लगता तो यही है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बाईपास कर रही है. रविशंकर प्रसाद ने हामी भी भरी और कहा कि लोकसभा और राज्यसभा के पास अधिकार है कि वे किसी आदेश को पलटने के लिए, आदेश के कारण को ही ख़त्म कर दे.

बहस क्या हो रही है?

विपक्ष ने कई सवाल उठाए हैं. सीधे-सीधे तो यही कहा है कि सरकार कोर्ट का आदेश पलटना चाह रही है. तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि आधार प्राइवेट कंपनियों द्वारा उपयोग में न लाया जाए, लेकिन सरकार का बिल सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलटने की कोशिश है.

महुआ मोइत्रा ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की थी.
महुआ मोइत्रा ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की थी.

इसके साथ ही नागरिकों के डाटा की सुरक्षा पर बहस हो रही है. कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह नागरिकों की निजी जानकारियों की सुरक्षा कैसे करेगी? उन्होंने कहा कि सरकार डाटा सुरक्षा से नज़रें फेर रही है. सपा सांसद रवि प्रकाश वर्मा ने कहा आधार का सिस्टम बहुत सेफ नहीं है. उन्होंने कहा कि मान लीजिए कि कोई हैकर किसी नागरिक का आधार बंद कर देता है, ऐसी स्थिति में सरकार क्या करेगी? और जब बैंक और कंपनियां एक दूसरे से जुड़ेंगे तो दोनों के बीच ग्राहक के निजी डाटा का आदान-प्रदान होगा. इसे सरकार कैसे रोकेगी?

क्या कहते हैं जानकार?

हमने सलमान वारिस से बात की. साइबर और टेक मामलों के वकील. उन्होंने कहा,

“ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें हैकरों ने लोगों का निजी डाटा चुरा लिया. बाकायदा सोशल मीडिया पर प्रूफ भी है. लोगों ने बवाल भी किया. खबरें भी छपीं, लेकिन UIDAI ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. और ये निजी डाटा बेहद संवेदनशील किस्म का होता है.”

सरकार को क्या करना चाहिए? इस सवाल पर सलमान वारिस कहते हैं,

“सरकार ने इस कानून को लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया है. लेकिन अगर लाना ही था, तो उसके पहले सरकार को डाटा सुरक्षा का क़ानून लाना चाहिए था, ताकि वह आधार संशोधन बिल का सही तरीके से बचाव कर सके.”


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