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अम्पायरों को फ़िट रखते हैं पोलार्ड!

आईपीएल 2015. 19 अप्रैल. मुंबई इंडियन्स वर्सेज़ रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर. मुंबई ने 210 रन का टारगेट दिया. जवाब देने उतरे गेल और मनविंदर बिसला. गेल अपना स्टांस मार्क कर रहे थे कि तब तक पोलार्ड उनके पास आ पहुंचे. दोनों एक ही देश के लिए खेलते हैं. अच्छे दोस्त भी बताये जाते हैं. पोलार्ड गेल को कुछ कहते हैं. चिढ़ाने के लिए.

गेल, गेल हैं. इसलिए नहीं चिढ़ते हैं. न ही कुछ कहते हैं. दोनों बड़ी देर तक आस पास खड़े रहते हैं. पोलार्ड पॉइंट पर फील्डिंग कर रहे थे. ओवर की लगभग हर गेंद के बाद गेल के पास ही पाए जा रहे थे. कुछ न कुछ कह रहे थे. पब्लिक हल्ला मचा रही थी. लेकिन वो शोर पोलार्ड के लिए नाकाफ़ी था. उसे बात करनी थी गेल से. गेल को चिढ़ाना था. गेल उस वक़्त अपने मारक-बेस्ट पर खेल रहे थे. ऐसे में उन्हें विचलित करने को ये पोलार्ड के तरकश का तीर था.

तभी अंपायर बीच में आते हैं. पोलार्ड को अपने पास बुलाकर उन्हें गेल से दूर रहने को कहते हैं. उन्हें बताते हैं कि वो इस कदर की बातचीत अलाऊ नहीं कर सकते. पोलार्ड उनसे बात करते हैं. उन्हें समझाते हैं कि वो जो भी कर रहे हैं, ग़लत मकसद से नहीं कर रहे हैं. अंपायर उन्हें फिर से सख्ती से समझाते हैं. इसपर पोलार्ड और भी नाराज़गी दिखाते हैं. अगली गेंद के बाद ओवर खतम होता है. पोलार्ड दौड़कर डग-आउट तक जाते हैं और वापस आते हैं. उन्हें देखते ही हर कोई हंसने लगता है. पब्लिक और जोर से शोर मचाने लगती है. वो स्टेडियम की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए जा रहे होते हैं.

पोलार्ड डग आउट से एक बड़ा सा बैंडेज टेप लेकर आये और मुंह पर चिपका लिया. ये एक और तीर था गेल को परेशान करने का. अब उनके मुंह पर टेप था. जो लगातार चिपका ही हुआ था. अब वो बोल नहीं सकते थे. लिहाज़ा गेल के पास खड़े हो सकते थे. ऐसा ही किया. वो गेल के पास खड़े हो गए. वहां तालियां बजा रहे थे. टेप मुंह पर बरकरार था. वो नहीं बोल रहे थे. जैसा कि अंपायर ने कहा था. अंपायर के कहे को खूब माना पोलार्ड ने. गेल कुछ ही गेंद बाद 10 रन पर आउट हो गए. हरभजन को विकेट मिला. मैं होता तो हरभजन को एक चौथाई और तीन चौथाई विकेट पोलार्ड को देता.

पोलार्ड की बैटिंग का एक नमूना देख लीजिए:

कीरोन पोलार्ड. प्लेयर है कि दैत्य, समझना मुश्किल है. वो दैत्य जिसके आतंक को देखना मज़ा देता है. वो दैत्य जिसके एक-एक शॉट पे बियर के घूंटों की छोटाई या बड़ाई डिपेंड करती थी. वो दैत्य जिससे डर नहीं लगता था. वो दैत्य जो परिवार का हिस्सा सा लगता था.

कीरोन पोलार्ड. जो गेंद को जब मारता है तो गेंद हवा में ही रहती है. न्यूटन जो ज़िंदा होते तो ग्रेविटी की परिभाषा बदलते. गेंद नीचे आने का नाम ही नहीं लेती. जो गिरता, वो बस एक सेब. न्यूटन को मुंह चिढ़ाने के लिए अक्सर ऐसे छक्के भी मारे जो मैदान के समानांतर जाते. बीच में कोई आना भी चाहता तो समय की कमी के कारण न आता.

पोलार्ड के आने से एक काम हुआ. खेल जल्दी जल्दी होने लगे. 4 ओवर में 50 रन जैसे टारगेट 3-3 ओवरों में खत्म होने लगे. गेंदें बाउंड्री तक जल्दी पहुंचने लगीं. अंपायरों की वर्जिश होने लगी. उनके दोनों हाथ छक्के के सिग्नल के लिए खड़े हो जाते. इसी से वो चुस्त रहने लगे. वहीं गेंदबाज गेंद फेंक कर अपना सर पकड़ लेते. इससे उनके सर दर्द होने के चान्सेज़ में खासी कमी आई. साथ ही सर के ऊपर भिनभिनाते मच्छरों से भी निजात मिली.

जिन्हें दिक्कत हुई वो थीं चियरलीडर्स. एक मैच के पैसे में उन्हें 3-3 मैचों जितना नाचना पड़ रहा था. कोरियोग्राफ़र्स की शामत आ चुकी थी. उन्हें नए नए स्टेप बनाने पड़ रहे थे. बाउंड्रीज़ इतनी जल्दी पड़ रही थीं कि एक ही स्टेप बारम्बार करना पड़ रहा था. चियरलीडर्स की फ़िटनेस भी आड़े आ रही थी. बिना पानी पीने का गैप मिले उन्हें दोबारा डांस करने पहुंच जाना पड़ रहा था. मेरा तो अनुमान यही है कि वेस्टइंडीज़ क्रिकेट बोर्ड ने पोलार्ड की सालों तक अनदेखी चियरलीडर्स हित में ही की.

Pollard

ग्रेविटी के नियमों को ठेंगा दिखाता, अमित मिश्रा के सपनों में आता, टोबैगो का क्रांतिकारी बल्लेबाज जब मारना शुरू करता है तो रुकना नहीं जानता. नौंवी क्लास में फिजिक्स के सर ने समझाया था, अगर किसी गाड़ी का फ्यूल यूरेनियम हो जाए तो एक ग्राम में वो जीवन भर चलेगी. पोलार्ड के साथ ऐसा ही था. इसकी मैदानी गाड़ी में पेट्रोल नहीं यूरेनियम डाला गया है. रह रह कर कहीं भी फट जाता है.


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