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न्यूज़ीलैंड में हिंदी बोलने पर लड़की चीखने-चिल्लाने लगी, लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हुई

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हममें से हर कोई हर दिन कहीं न कहीं आता-जाता होगा. ज़्यादातर हम ट्रेन, बस और मेट्रो के सहारे होते हैं. भरी हुई बस या ट्रेन में अक्सर कुछ ऐसे भी लोग चढ़ते हैं जो हमारे शहरों के लिए नए-नए होते हैं. इस महादेश के किसी भी अनाम देश से आया कोई भी परिवार हो सकता है. जो आपकी शहरी सभ्यता के सफ़र में आपके साथ शुरू से नहीं रहे हैं. अभी-अभी आपकी सभ्यता, सोसाइटी और कल्चर वाली बस में चढ़े हैं, शहर में नए हैं. आपके बिग बाज़ारों और शॉपिंग मॉलों से अनजान ये लोग अपने अनाम गांवों से बाल्टी, टोकरी, सूप जैसी चीज़ें लिए चले आते हैं. तब आपको बाक़ी लोगों की नज़रें पढ़नी चाहिए. कसमसाती हुई तिरछी निगाहें इनका स्वागत नहीं कर रही होतीं. शायद हम आप असहज हो जाते हैं. अपनी नौकरियों, सड़कों, अस्पतालों और पार्कों में हिस्सेदार बढ़ने का डर दिखता है. लेकिन हम सब डरे हुए लोग भी असल में लगभग ऐसी ही किसी उदास दोपहर या ठिठुरती रात में इन शहरों का हिस्सा बने थे, किसी अनाम क़स्बे या गांव से आकर.

हमने शहर चुने कुछ लोग देश चुनते हैं. और इसी तरह की तिरछी निगाहों का सामना भी करते हैं. ज़्यादातर बार ज़्यादातर लोग उस नए आने वाले से परेशान ही होते हैं. कुछ लोग उल्टा सीधा बोल भी देते हैं. लेकिन देखने वाली बात ये होती है कि उन उल्टा सीधा बोलने वालों के साथ कौन खड़ा होता है.

# मामला क्या है

लेकिन न्यूज़ीलैंड की एक घटना इस मामले में एक किस्म का अपवाद है. हुआ ये कि एक ट्रेन में एक हिंदुस्तानी शख्स अपनी बीवी से बात कर रहा था. बात वो कर रहा था हिंदी में. उसके बगल में एक लड़की बैठी हुई थी. वहीं न्यूज़ीलैंड की रहने वाली उस लड़की ने आदमी पर चिल्लाना शुरू किया. लड़की ने आदमी से कहा ‘हिंदी न बात आ बंद करो. अपने देश वापस जाओ. यहां रहना है तो अंग्रेज़ी में बात करो’

# लेकिन अब जो हुआ वो असली ख़बर है

एक भारतीय पर जब न्यूज़ीलैंड की एक लड़की चीख रही थी, तब पूरा कोच उस भारतीय शख्स के साथ था. ट्रेन के कंडक्टर जे.जे.फ़िलिप को ये बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुई. कंडक्टर ने बाक़ायदा ट्रेन रुकवा दी और उस लड़की को तुरंत ट्रेन से उतरने के लिए कहा. कंडक्टर के इस फ़ैसले से हर पैसेंजर सहमत था. सबका यही मानना था कि न्यूज़ीलैंड वो मुल्क नहीं है जो किसी और देश के नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार करे. लड़की लगातार कहती रही कि वो ट्रेन से नहीं उतरेगी, लेकिन कंडक्टर ने पुलिस बुलाई और लड़की को वहीं ट्रेन से उतार दिया.

इसी साल पंद्रह मार्च को न्यूज़ीलैंड की दो मस्जिदों में हुई ताबड़तोड़ फ़ायरिंग में दो दर्जन से ज़्यादा लोग मारे गए थे. उसके बाद भी इस देश का ये रवैया बेहद तारीफ़ के क़ाबिल है.

# मेयर ने इनाम दिया है

शहर के मेयर ने अगले दिन अपने फ़ेसबुक पर इनाम की घोषणा की. मेयर ने कहा कि ट्रेन में उस भारतीय का साथ देने वाले कंडक्टर और यात्रियों को इनाम दिया जाएगा

मेयर की इस FB पोस्ट की भी ख़ूब चर्चा हो रही है. इस पोस्ट पर जो कमेंट्स आए हैं सबमें यही बात है कि भारतीय के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था
मेयर की इस FB पोस्ट की भी ख़ूब चर्चा हो रही है.
इस पोस्ट पर जो कमेंट्स आए हैं सबमें यही बात है कि भारतीय के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था

# लोगों ने मेयर की इस घोषणा पर ख़ुशी जताई है

मेयर की पोस्ट पर आए इस कमेंट में भी यही लिखा है कि उसे कंडक्टर पर गर्व है और ट्रेन लेट तो हुई लेकिन इस बात की ज़्यादा ख़ुशी है कि नस्लवादी टिप्पणी करने वाली लड़की को तुरंत सबक सिखाया गया
मेयर की पोस्ट पर आए इस कमेंट में भी यही लिखा है कि उसे कंडक्टर पर गर्व है और ट्रेन लेट तो हुई लेकिन इस बात की ज़्यादा ख़ुशी है कि नस्लवादी टिप्पणी करने वाली लड़की को तुरंत सबक सिखाया गया

# और एक माफ़ी

ये सब कुछ होने के बाद एक माफ़ी मांगी गई. माफ़ियों के साथ अक्सर ऐसा होता है कि जिसे मांगनी चाहिए वो नहीं मांगता. हमारी सोसाइटी की बसों, ट्रेनों में किसी अनाम गांव क़स्बे से आए परिवार से हमें माफ़ी मांगनी चाहिए. क्योंकि हमने उनका कभी स्वागत नहीं किया. कभी ये नहीं जताया कि हम उनके इस शहर में आने से ख़ुश हैं. बस से उतरने वालों के रास्ते में आने वाली अपनी अनाज की बोरी के लिए वो ग्रामीण हमसे माफ़ी मांगता रहता है. लेकिन भुनभुनाते लोग तब पर भी उसे माफ़ नहीं करते.

न्यूज़ीलैंड में हुए इस वाकये के लिए ट्रेन कंडक्टर ने माफ़ी मांगी. अपने यात्रियों से. कंडक्टर का कहना था कि उसकी वजह से यात्रियों को घर पहुंचने में हुई देरी इसके लिए वो शर्मिंदा है. ट्रेन में अपनी बीवी से फोन पर बात करने के लिए वो भारतीय भी शायद शर्मिंदा होगा. लेकिन सवाल यही है कि क्या जिसे शर्मिंदा होना चाहिए वो शर्मिंदा हुआ? जिसे माफ़ी मांगनी चाहिए उसने माफ़ी मांगी? ये सवाल कभी-कभी ही सही लेकिन हमारे दिमाग़ों में गूंजना चाहिए.


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