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इरफ़ान: उपलब्धियों से निर्लिप्त एक इंसान, जो एक अधूरी बड़ी ख्वाहिश लेकर मरा

अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंज़िलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ”आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज़ उतर जाएं.”

मेरी समझ में नहीं आया, ”ना ना, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.”

जवाब मिला, ”अगले किसी भी स्टॉप पर आपको उतरना होगा. आपका गन्तव्य आ गया.”

इरफ़ान ने ये बात वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को लिखी एक चिट्ठी में कही थी, जब उन्हें अपनी उस कमबख्त बीमारी का पता चला था, जिसे कैंसर कहते हैं. 29 अप्रैल को इरफ़ान आख़िरकार ट्रेन से उतर गए. उनका स्टेशन आ गया. जीवन की ट्रेन और मृत्यु का स्टेशन. ये बोझिल है लेकिन ऐसा ही है. मृत्यु को लेकर तमाम क्लीशे और दार्शनिक बातें कही गई हैं लेकिन अफसोस कि सब बेहद क्रूर तरीके से सच हैं. मृत्यु के बारे में फिल्म ‘बायसकिल थीव्स’ का एक डायलॉग मुझे पसंद है,

”हर चीज़ सुलझाई जा सकती है. मृत्यु को छोड़कर.”

ऊपर जिस चिट्ठी का ज़िक्र है उसमें इरफ़ान एक जगह कहते हैं, ”मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.”

आगे वो कहते हैं,

”पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी’ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास…इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूरी तरह सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया. वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.”

इरफ़ान दर्द की गिरफ्त में थे. उन्हें आज़ादी का एहसास हुआ. और वो आज़ाद हो गए. बकौल संजय मिश्रा, इरफ़ान अस्पताल की तमाम खिड़कियों में किसी एक से निकल गए. चुपचाप.

इरफ़ान ने 1988 में सलाम बॉम्बे में एक बेहद छोटे से रोल से अपने करियर की शुरुआत की थी. इससे पहले उन्होंने कई टीवी सीरियल्स किए, जिनमें चाणक्य, भारत एक खोज, चंद्रकांता, सारा जहां हमारा शामिल हैं. फोटो: India Today
इरफ़ान ने 1988 में सलाम बॉम्बे में एक बेहद छोटे से रोल से अपने करियर की शुरुआत की थी. इससे पहले उन्होंने कई टीवी सीरियल्स किए, जिनमें चाणक्य, भारत एक खोज, चंद्रकांता, सारा जहां हमारा शामिल हैं. फोटो: India Today

‘आदतन तो सोचेंगे, होता यूं तो क्या होता मगर जाने दें…’

जिन अजय ब्रह्मात्मज को इरफ़ान ने चिट्ठी लिखी, उनसे ‘दी लल्लनटॉप’ ने बात की. इरफ़ान ने चिट्ठी के अलावा भी उनके साथ बहुत कुछ साझा किया. तमाम किस्से, बतकही और निजी विचार. अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान को तब से देखा है, जब वो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से ‘बंबई’ गए थे. उनकी फ़िल्मों पर बातें होती हैं, होती रहेंगी लेकिन अजय ब्रह्मात्मज ने हमें उस इरफ़ान से मिलाया, जिसके दिमाग में तूफान चलता था. वो उनकी राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि और जीवन-दर्शन के करीब ले गए. बच्चों के लिए चिंतित एक बाप, उपलब्धियों से निर्लिप्त इंसान, एक व्यक्ति जिसे बनाने में उसकी पत्नी का बड़ा रोल रहा, एक अधूरी लेकिन बड़ी ख्वाहिश लिए दुनिया से चला जाने वाला इंसान. ये वो बातें हैं, जिन्हें ‘पर्सनल’ की कैटेगरी में रखा जाता है.

अजय ब्रह्मात्मज बताते हैं,

मेरे लिए ये व्यक्तिगत नुकसान है. मैं जेएनयू से पासआउट होने के बाद चीन चला गया था. चीन से जब बॉम्बे लौटा तो इरफ़ान से मुलाकात हुई. वो डीएन नगर में एक कमरे में रहा करते थे. इसी में रसोई थी. कॉमन बाथरूम था. वहां से मैंने उनको देखा है. मैं ‘चाणक्य’ सीरियल से जुड़ा हुआ था. चाणक्य उनका दूसरा सीरियल था. ‘भारत एक खोज’ के बाद. तब सेट पर मुलाकात होती थी. उनसे संपर्क हमेशा रहा मेरा. उनके रहते हुए उनकी आलोचना भी करता था. 

वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, जिन्होंने इरफ़ान के जीवन से जुड़े कई किस्से साझा किए. फोटो: फेसबुक
वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, जिन्होंने इरफ़ान के जीवन से जुड़े कई किस्से साझा किए. फोटो: फेसबुक

‘इरफ़ान ने ही फिल्म पत्रकारिता से जोड़ा’

# उनकी जो बात मैं याद करता हूं और ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्म पत्रकारिता से उन्होंने ही मुझे जोड़ा. मैं पॉलिटिकल रिपोर्टिंग करता था. बीजेपी आज की ही तरह मज़बूत थी. तब मेरे लेख एक संपादक ने छापने से मना कर दिया. ज़ाहिर सी बात है काम की दिक्कत हुई. तब इरफ़ान ने मुझसे कहा कि मैं फिल्म पत्रकारिता करूं. मैं थोड़ा असहज था. फिर इरफ़ान ने कहा कि आइए अच्छे लोग हैं. तब उन्होंने ही मेरा पहला इंटरव्यू तय किया था.

डिंपल कपाड़िया के साथ फिल्म की- दृष्टि

वो कहते हैं,

हमेशा नहीं लेकिन जब भी मुलाकात होती थी फिल्मों के बारे में, इन जनरल समाज के बारे में, साहित्य के बारे में बातें करते थे. मैं भी जाता था. वो भी आया करते थे. तब उतने मशहूर नहीं थे. अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद वो निर्लिप्त रहते थे, उपलब्धियों से. किस्मत वगैरह और संयोग पर विश्वास नहीं करते थे.

उनकी एक फिल्म के बारे में कम लोगों को पता है. वो डिंपल कपाड़िया और शेखर कपूर के साथ गोविंद निहलानी की फिल्म ‘दृष्टि’ कर चुके थे. ‘एक डॉक्टर की मौत’ फिल्म अभी आई थी. तपन सिन्हा की फिल्में कर रहे थे लेकिन इससे संतुष्ट नहीं थे.

'दृष्टि' 1990 में आई थी. इसमें डिंपल कपाड़िया और शेखर कपूर प्रमुख भूमिकाओं में थे और गोविंद निहलानी ने इसे डायरेक्ट किया था. फोटो: विकीमीडिया
‘दृष्टि’ 1990 में आई थी. इसमें डिंपल कपाड़िया और शेखर कपूर प्रमुख भूमिकाओं में थे और गोविंद निहलानी ने इसे डायरेक्ट किया था. फोटो: विकीमीडिया

जब महेश भट्ट ने उनसे खराब ऐक्टिंग करने को कहा

अजय इरफ़ान के बारे में कुछ रोचक बातें बताते हैं. वो कहते हैं,

उन्होंने अपनी शर्तों में अपनी शैली में अपनी जगह बनाई. उन्होंने किसी की नकल नहीं की. जब वो महेश भट्ट की फिल्म ‘गुनाह’ कर रहे थे, तब हमारी मुलाकात हुई थी. तब महेश भट्ट ने उनसे कहा कि यहां खराब ऐक्टिंग करनी है क्योंकि वो चालू शॉट में भी बहुत मेहनत कर रहे थे.

इरफ़ान के निधन के बाद महेश भट्ट ने ट्विटर पर इरफ़ान के साथ फोटो शेयर करते हुए भावुक संदेश लिखा. फोटो: ट्विटर
इरफ़ान के निधन के बाद महेश भट्ट ने ट्विटर पर इरफ़ान के साथ फोटो शेयर करते हुए भावुक संदेश लिखा. फोटो: ट्विटर

‘अंग्रेज़ी फिल्म से पहले डिक्शन का कोर्स करते थे’

अजय बताते हैं.

इरफ़ान फिल्मों के चुनाव और भाषा पर बहुत ज़ोर देते थे. विदेशी फिल्में जब करते थे तो अंग्रेज़ी टोन पकड़ने के लिए दो-दो तीन-तीन महीने का खाली डिक्शन कोर्स करते थे. विदेशों में जाकर ताकि उस लहज़े को पकड़ पाएं. भले ही दो डायलॉग बोलने हों. राजस्थान की एक छोटी सी जगह से आया लड़का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम ही नहीं कर रहा था, अपनी पहचान बना चुका था.

इरफ़ान लाइफ ऑफ पाई, द अमेज़िंग स्पाइडर मैन, जुरासिक वर्ल्ड, इन्फर्नो जैसी हॉलीवुड फिल्मों में दिख चुके हैं. फोटो; इन्फर्नो में इरफ़ान
इरफ़ान लाइफ ऑफ पाई, द अमेज़िंग स्पाइडर मैन, जुरासिक वर्ल्ड, इन्फर्नो जैसी हॉलीवुड फिल्मों में दिख चुके हैं. फोटो; इन्फर्नो में इरफ़ान

इरफ़ान की एक ख़्वाहिश जो अधूरी रह गई

इरफ़ान की एक बड़ी ख्वाहिश थी. इसके बारे में अजय कहते हैं,

एक ख्वाहिश जो उनकी रह गई, वो निर्देशन करना चाहते थे. 1995-96 के समय से ही उनके मन में ये था. मेरे पास एक वीडियो कैमरा हुआ करता था. मेरा कैमरा लेकर सेट पर पहुंचते थे और खुद ही चलाकर फ्रेम बनाते थे. शूट करके दिखाते थे. 

2003 में आई फिल्म हासिल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र पॉलिटिक्स पर आधारित थी. ये फिल्म समय के साथ काफी पसंद की गई. इसमें इरफान ने रणविजय सिंह का किरदार निभाया था. फोटो: यूट्यूब
2003 में आई फिल्म हासिल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र पॉलिटिक्स पर आधारित थी. ये फिल्म समय के साथ काफी पसंद की गई. इसमें इरफान ने रणविजय सिंह का किरदार निभाया था. फोटो: यूट्यूब

पुरानी तस्वीर देखकर बोले इरफान- आज ऐसे ही कमरे में खुश हूं

अजय ब्रह्मात्मज ने इरफ़ान की कई तस्वीरें ट्विटर पर शेयर की हैं, जो उन्होंने खींची थीं. इनमें से एक तस्वीर के बारे में अजय बताते हैं,

ये लंदन की बात है, जब वो हॉस्पिटल में थे. तस्वीर देखकर इरफ़ान ने मुझसे कहा कि मैं ऐसे ही एक दस बाई दस के कमरे में हूं और बहुत खुश हूं. सामान्य तरह से रहता हूं. झोले में कुछ किताबें हैं. एक समय तक मुझे लगता था कि मुझे ज़्यादा से ज़्यादा स्पेस मिल सके. अब लगता है कि सब फ़िज़ूल था. इसकी कोई ज़रूरत नहीं. 

‘नेताओं को गालियां देते थे, सत्ता से दूर रहे’

अजय बताते हैं कि उन्होंने कैंसर हॉस्पिटल से दस मिनट का एक ऑडियो मेसेज भेजा था, वो मैंने आज तक किसी से शेयर नहीं किया. उन्होंने अपनी पीड़ा ज़ाहिर की थी. उन्होंने चिट्ठी भी लिखी थी. उन्हें भौतिक निरर्थकता का एहसास बहुत तेजी से हो गया था. गाड़ियां ज़रूर खरीदते रहे लेकिन उनमें उनकी पर्सनल रुचि नहीं थी. समाज को लेकर नाखुश रहते थे.

अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं कि इरफ़ान सार्वजनिक रूप से भले न कहते रहे हों लेकिन उनकी राजनीतिक-सामाजिक और वैश्विक दृष्टि ग़ज़ब की थी. वो कहते हैं,

नेताओं के नाम वो व्यक्तिगत बातचीत में लेते थे. उन्हें गालियां देते थे. लेकिन वो ऐसी पोजिशन में थे कि कुछ भी बोलना विवादास्पद हो जाता है. सार्वजनिक तौर पर भले कुछ न कहते रहे हों लेकिन उनके विचारों से नहीं लगता था कि उन्होंने दक्षिणपंथ का किसी भी वजह से सपोर्ट किया हो.

सरकारी पद, उपाधियों और सत्ता से दूर ही रहे. कभी नेताओं से उनकी दोस्ती नहीं हुई. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लोकप्रिय लोगों के बारे में भी उनकी धारणाएं थीं. सार्वजनिक तौर पर भले ही ना कहते रहे हों.

वक्त की नज़ाकत को वो समझते थे. व्यावहारिक दृष्टि से ही नहीं वैचारिक दृष्टि से भी. दुनिया किस तरफ जा रही है, इसके साथ उनका संघर्ष चलता रहता था.  

2012 में आई फिल्म 'पान सिंह तोमर' के लिए इरफ़ान को बेस्ट ऐक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. इस फिल्म का एक डायलॉग चर्चित लेकिन विवादित भी हुआ था- बीहड़ में तो बाग़ी होते हैं. डकैत तो पार्लियामेंट में होते हैं. फोटो: India Today
2012 में आई फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए इरफ़ान को बेस्ट ऐक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. इस फिल्म का एक डायलॉग चर्चित लेकिन विवादित भी हुआ था- बीहड़ में तो बाग़ी होते हैं. डकैत तो पार्लियामेंट में होते हैं. फोटो: India Today

‘बच्चों की परवरिश को लेकर चिंतित रहते थे’

इरफ़ान के अंदर एक चिंतित और सजग पिता था. अजय बताते हैं,

बच्चों की परवरिश को लेकर वो बहुत परेशान थे कि मेरे बच्चे इस जाहिल समाज में क्या सीख पाएंगे और क्या कर पाएंगे. इनके पास ‘अभाव का अनुभव’ नहीं है और अभाव का अनुभव नहीं होता है तो आप समाज के प्रति बहुत ग़लत रुख अपना लेते हैं. दूसरों के पास न होने का जो फील होता है, सहानुभूति नहीं समानुभूति. वो कहते थे कि ये अनुभव मेरे बच्चों को नहीं हो पाएगा. वो चाहते थे कि बच्चे हमेशा ज़मीन पर रहें. उन्होंने बच्चों को कभी आगे नहीं किया. 

परिवार के साथ इरफ़ान. उनकी मां सईदा बेग़म (दाएं) का पिछले दिनों जयपुर में निधन हो गया. फोटो: India Today
परिवार के साथ इरफ़ान. उनकी मां सईदा बेग़म (दाएं) का पिछले दिनों जयपुर में निधन हो गया. फोटो: India Today

‘इरफ़ान को जिसने गढ़ा वो हैं उनकी पत्नी सुतपा’

अजय इरफ़ान के व्यक्तित्व निर्माण के पीछे उनकी पत्नी को बड़ी वजह बताते हैं. उन्होंने कहा,

उनके सारे व्यक्तित्व के निर्माण में, उपलब्धि के पीछे जो औरत दृढ़ तरीके से खड़ी थीं, वो हैं उनकी पत्नी सुतपा सिकदर. शुरू से, एनएसडी के दिनों से उस लड़की ने अकेले इरफ़ान को गढ़ा है. इरफ़ान के पास विश्व-दृष्टि थी लेकिन जो एक समझदार व्यक्तित्व होता है, ये सुतपा ने दिया. बीमारी के बाद भी वो भागती रहीं. जबकि उनके दोनों बच्चे जवानी की दहलीज पर हैं और उन्हें सबसे ज़्यादा अपने पिता के संरक्षण और गाइडेंस की ज़रूरत है. अब उन्हें भी इरफ़ान जैसा संघर्ष करना होगा क्योंकि उनके पास कोई ऐसा हाथ नहीं है, जो उनकी उंगली पकड़कर रास्ता दिखा सके.

‘मोतीलाल के अलावा किसी को अभिनेता नहीं मानते थे’

अजय ब्रह्मात्मज बताते हैं कि इरफ़ान थोड़े रिज़र्व मिजाज़ के शख्स थे. वो कहते हैं,

इरफ़ान अभिनेता के तौर पर एक विशिष्ट शैली के अभिनेता रहे हैं. इसमें उन्होंने रंगमंच और भारतीय अभिनय शैली-पाश्चात्य अभिनय शैली दोनों का मिक्चर ख़ुद के लिए उन्होंने तैयार किया था. मोतीलाल के अलावा वो किसी को अभिनेता नहीं मानते थे. समकालीनों में जिनसे उनकी वैचारिक तौर पर निभती थी, उनके साथ हेल-मेल रखते थे. 

मोतीलाल पचास और साठ के दशक के चर्चित अभिनेता था. उन्हें फिल्म देवदास और पारख के लिए बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर का अवॉर्ड मिला था. फोटो: सिनेस्तान
मोतीलाल पचास और साठ के दशक के चर्चित अभिनेता था. उन्हें फिल्म देवदास और पारख के लिए बेस्ट सपोर्टिंग ऐक्टर का अवॉर्ड मिला था. फोटो: सिनेस्तान

‘जब फिल्मफेयर वालों से उलझे’

अजय कहते हैं,

व्यावसायिक दृष्टि से बहुत सारे लोगों के साथ काम किया. जिनसे दोस्ती नहीं रही उनके साथ भी. उनका सामाजिक दायरा बहुत बड़ा नहीं था. पार्टियों में नहीं जाते थे. गॉसिपिंग नहीं करते थे. कोई तारीफ़ करता था तो डर जाते थे. उन्होंने कई लड़ाईयां भी लड़ीं. ‘फिल्मफेयर’ से इस बात के लिए लड़ गए कि कवर पर मेरी फोटो क्यों नहीं छापी जबकि आपने मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवॉर्ड दिया है.

2017 में आई इरफ़ान की फिल्म हिंदी मीडियम के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट ऐक्टर अवॉर्ड मिला. ये उनके करियर की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी. फोटो: India Today
2017 में आई इरफ़ान की फिल्म हिंदी मीडियम के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट ऐक्टर अवॉर्ड मिला. ये उनके करियर की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी. फोटो: India Today

‘कई वाहियात फिल्में भी कीं लेकिन…’

अजय बताते हैं कि इरफ़ान के करियर में सब अच्छा ही अच्छा नहीं था. वो कहते हैं,

इरफ़ान सार्थक फिल्में करते थे लेकिन उन्होंने बहुत सी वाहियात फिल्में भी की हैं. ख़राब फिल्में, कमर्शियल सक्सेस के लिए. लेकिन कलाकार की पहचान क्या होती है? अगर आपको उनकी कुछ फिल्में चुननी हों तो इरफ़ान की उम्र में, सिर्फ 53 साल की उम्र में उन्होंने जितना हासिल किया, उससे आप दर्जनों फिल्मों का रेट्रोस्पेक्टिव कर सकते हैं. जबकि आप तमाम लोकप्रिय अभिनेताओं की फिल्में चुनने जाएं तो आपके पास दिखाने के लिए फिल्में नहीं होंगी, भले वो आज करोड़ों कमा रही होंगी.

इरफ़ान की कुछ अच्छी फिल्मों में द लंचबॉक्स, पीकू, द नेमसेक, लाइफ इन अ...मेट्रो, मक़बूल का नाम लिया जा सकता है. फोटो: India Today
इरफ़ान की कुछ अच्छी फिल्मों में द लंचबॉक्स, पीकू, द नेमसेक, लाइफ इन अ…मेट्रो, मक़बूल का नाम लिया जा सकता है. फोटो: India Today

जब ‘लाइफ ऑफ पाई’ पर उन्होंने कायदे से सुना दिया

कमर्शियल फिल्मों वाली डिबेट को लेकर इरफ़ान ने एक सवाल पर चुप करा दिया था. अजय कहते हैं,

मुझे याद है एक बार उनसे किसी ने कहा कि तमाम पॉपुलर स्टार्स की फिल्में सौ करोड़, दौ सौ करोड़ कमाती हैं तो आपको बुरा नहीं लगता? इरफ़ान ने कहा कि तुम लोग थोड़ा रिसर्च किया करो. तुम्हें पता है कि ‘लाइफ ऑफ पाई’ ने कितने करोड़ का बिजनेस किया है?

अजय कहते हैं कि ये सचमुच हैरानी की बात थी क्योंकि भारत के पत्रकार बिल्कुल नहीं जानते थे ‘लाइफ ऑफ पाई’ के बिजनेस के मायने. उस समय उस फिल्म ने हज़ारों करोड़ का बिजनेस किया था. इस तरह की बातें थीं लेकिन बहुत ज़्यादा विचलित भी नहीं होते थे कि उनकी फिल्में चलें ना चलें. लेकिन ‘मदारी’ उनके दिल के करीब थी. मदारी की सक्सेस को लेकर वो बहुत परेशान थे कि हो जाएगी. लेकिन नहीं हो पाई. इसमें वो अपनी असमर्थता ज़ाहिर कर रहे थे, दर्शकों की नहीं.

2012 की एडवेंचर ड्रामा फिल्म लाइफ ऑफ पाई में इरफ़ान ने एडल्ट पाई का रोल किया था. फिल्म ने अलग-अलग कैटेगरी में चार ऑस्कर जीते थे. फोटो: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब
2012 की एडवेंचर ड्रामा फिल्म लाइफ ऑफ पाई में इरफ़ान ने एडल्ट पाई का रोल किया था. फिल्म ने अलग-अलग कैटेगरी में चार ऑस्कर जीते थे. फोटो: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब

बाद के दिनों में इरफ़ान

अजय बाद के दिनों को याद करते हुए बताते हैं,

जब इरफ़ान बीमार थे तो मैं उनको अच्छे मूड में लाने की कोशिश करता था. उनकी किसी घटिया सी फिल्म जो उन्होंने की होगी, उसकी फोटो भेज देता था कि ये भी दिन थे. लेकिन वो नाराज़ कभी नहीं हुए कि क्या ये सब याद दिलाते हो. मजे वो भी लेते थे. फोन पर बातें होती रही हैं. मिलने मैं नहीं गया. मेरा दिल नहीं कहता था कि सिर्फ ये दिखाने के लिए मैं जाऊं कि देखो मैं आया हूं.

मैं इंतज़ार में था कि जल्द ही स्वस्थ हो जाएं वो फिर हम मिलेंगे लेकिन वो दिन नहीं आया.


वीडियो: इरफ़ान का वो इंटरव्यू जिसमें पत्नी, बच्चे और उनके बचपन का प्यारा किस्सा मौजूद है 

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