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इन ख़ूबसूरत नग़्मों को सुनना ऐसा है जैसे बरसों तक इकट्ठा की गई कहन और मिलने पर छा गई चुप्पी!

जैसे, लहू में पोटाश की दौड़. जैसे, राख की आंधी उठे और बारिश हो जाए. जैसे, गीली मिट्टी की लोई पर पड़ती थपकियां. जैसे, टूटन का ठहर जाना. जैसे, हवाओं में इश्क़ की घुलन. जैसे, ‘मैं’ और ‘तुम’ का विलीन हो जाना. जैसे, बरसों तक इकट्ठा की गई कहन और मिलने पर छा गई गुम्मी. जैसे, उपमाओं का निखार. जैसे, देह से परे की दुनिया से साक्षात्कार.

सच कहूं तो ये सब लफ़्फ़ाज़ियां हैं. रूह पर चमकदार आभूषण लादने की नाकाम कोशिश. उपमाएं हाथ जोड़ लेती हैं. ये संगीत है. सीमाओं से परे का संंगीत. जहांं शब्द मोती हैंं. साधक से मिलकर मालाएंं बनती है. जिसका कोई तोड़ नहीं. इंसान की बनाई लक़ीरों को चिढ़ाती हुईं. एक फ़क़ीरी है. जिसके पीछे चलते चले जाने का मन करता है. अनहद. अथाह. असीमित. उसमें खो जाने का अपना आनंंद है. उसे बस ख़ुद से महसूस किया जा सकता है.

ज़माने भर की नाउम्मीदियों के बीच एक सिरा उम्मीद का बचा हुआ है. इसे बचा लेना चाहिए. ताकि, इस दुनिया की सरलता और सहजता कायम रहे. एक छोटी-सी लिस्ट दे रहा हूं. ये एक हिस्सा भर है. टटोलेंगे तो कितने ही सिरे निकलेंगे. जो आपका हाथ पकड़कर रास्ता सुझाएंगे. उसके आगे की दुनिया आपके हवाले.

1. चाहत में क्या दुनिया-दारी, इश्क़ में कैसी मजबूरी – गुलबहार बानो

मोहसिन भोपाली. पार्टीशन से पहले वाले हिंदुस्तान में पैदा हुए. जब देश के दो टुकड़े हुए, पाकिस्तान चले गए. शायरी की दुनिया में अपना निज़ाम कायम किया. उनकी रियासत का एक गांव भा गया. इश्क़ की सिलवटों को खारिज करने वाला. मासूमियत से.

किचन की स्लैब पर छुरी चला रहा हाथ अचानक से ठहर गया था. वो निश्छल प्रेम था. समझाइश भी और शिकायत भी. बेबसी भी है और ज़माने को चुनौती भी. ये रंग दिल पर तारी हो गया.

इस ग़ज़ल का एक शेर है,

मैं ने दिल की बात रखी और तुमने दुनिया वालों की

मेरी अर्ज़ भी मजबूरी थी उन का हुक्म भी मजबूरी.

गुलबहार बानो की आवाज़ में तिलिस्मी सुख है. बस सुनते चले जाने का दिल करता है. दिल की बात मान लीजिए.

आवाज़ – गुलबहार बानो

शायर – मोहसिन भोपाली

कहां सुन सकते हैं – यूट्यूब.

2. देख ले शकल मेरी, किसका आईना हूं मैं – मौलवी हैदर हसन अख़्तर

क़व्वाली से मेरा पहला राब्ता बनारस में हुआ. बीएचयू के दिनों में. एक रात गंंगा किनारे लेटे हुए पहली बार नुसरत सुनाई दिए थे. बड़ा शहर था. पहली बार यूट्यब एक्सप्रेस ट्रेन की माफ़िक चल रहा था. नुसरत बरगद की तरह थे. उनकी छाया में बैठकर कितनी ही बेरहम रातें सुस्ताई गई हैं.

शहर बदला. इस सफ़र ने बहुत कुछ दिया है. लोगों की नेमतें मिली हैं. दिलचस्प मेलों का हिस्सा रहा हूंं. एक महफ़िल में मौलवी हैदर हसन अख़्तर से दिल लग गया. हैदर हसन साहब पिछले साल ही चल बसे. फ़ैसलाबाद की पैदाइश. उनके बारे में बहुत कम मालूम चल सका. सीमाओं का होना कचोटता है. 

उनकी आवाज़ में सुना पहला कलाम इटावा के बेदम शाह वारसी का है. प्रेम में होने और खोने का मतलब क्या होता है. एक हिस्सा देखिए.

सौ बार तेरा दामन मेरे हाथ में आया

जब आंख खुली तो देखा कि अपना ही गिरेबां था

पता लगाए कोई मेरे पते का पता

मेरे पते का पता है क्या लापता हूं मैं.

मौलवी साहब की आवाज़ कलेजे को बेधती है. ऐसा लगता है हमारी गुहार बयां की जा रही है. बरसों तक जो अंदर भरा रह गया, वो छलक रहा है.

कलाम – बेदम शाह वारसी

आवाज़ – मौलवी हैदर हसन अख़्तर

कहां सुन सकते हैं – यूट्यूब.

3. सुर्ख़ आंंखों में काजल के डोरे – उस्ताद अमीर अली ख़ां, रफ़ीक़ हुसैन, बरक़त अली

जून महीने की बात है. ऑफ़िस का काम चल रहा था. बैकग्राउंड में उस्ताद अमीर अली ख़ां अलाप ले रहे थे. तभी एक स्टोरी फ़्लैश हुई. उस्ताद अमीर ख़ांं नहीं रहे. झटका सा लगा. कुछ महीने पहले ही उनको सुनना शुरू किया था. तब सोचा था, ये शख़्स अगर इस पार आया, तो इससे ज़रूर मिलूंंगा. फ़ोटो खिंचवाने से परहेज़ करता हूं. इसलिए सादी टी-शर्ट पर उनसे लिखवाऊंगा. सोचा हुआ कहां सच हो पाता है! ये भी नहीं हुआ.

ये कलाम किसका है, इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. कहते हैं कि श्रुत परंपरा से हमारी पीढ़ी को मिला है. मतलब, सुनते-सुनाते दर्ज होता गया. कलाम में है क्या? उस इंंसान की तारीफ़ का भरपूर सामान है, जिसपर न्यौछावर हो जाने का ख़्वाब है.

तुझसे शाखों ने सीखा लचकना

तुझसे कलियों ने सीखा चटकना

ये भी मुमकिन है तूने गुलों को

मुस्कुराना सिखाया हुआ है

सुर्ख़ आंखों में काजल के डोरे

रुख़ पे आंचल सजाया हुआ है.

कलाम – श्रुत परंंपरा

आवाज़ – उस्ताद अमीर अली ख़ां, रफ़ीक़ हुसैन, बरक़त अली

कहां सुन सकते हैं – यूट्यूब.

4. आज दिन चढ्या तेरे रंग वरगा – महेंद्र कपूर

शिव कुमार बटालवी पंजाब थे. उसी मिट्टी की तरह मस्त. उनका लिखा (जितना समझ में आया) नशा पैदा करता है. रूहानी जादू में जकड़ लेता है. बीबीसी के साथ इंटरव्यू वाली क्लिप. और ‘की पुछदे ओ हाल फकीरां दा’ का पाठ. अद्भुत हैं. कसक रह जाती है. उनका न होना बेतरह खलता है.

उनके लिखे की तलब लगी. ढूंढा तो महेंद्र कपूर की आवाज़ में एक और रत्न मिला. लहलहाते लफ़्ज़ों को जैसे मुकाम मिल गया हो. क्या खूब लिखा और गाया गया है!

अज्ज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा

तेरे चुम्मण पिछली संग वरगा

है किरणा दे विच नशा जिहा

किसे चिम्मे सप्प दे दंग वरगा

कवि – शिव कुमार बटालवी

आवाज़ – महेंद्र कपूर

कहां सुन सकते हैं – यूट्यूब.

5. हिरना समझ बूझ बन चरना – कुमार गंधर्व

कबीर से मुलाक़ात की डोर बचपन तक ले जाती है. गांंव में कबीर मठ था. सुबह-सुबह उनके दोहे लाउडस्पीकर पर बजते थे. ये रोज़ाना होता था. वो दोहे इसी तरह कंंठस्थ हुए. गांंव के साथ-साथ कबीर भी पीछे छूट गए. उन लाउडस्पीकरों का बजना बदस्तूर जारी है.

कबीर से दूसरा मिलन एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए हुआ. आनंंद पटवर्धन की ‘राम के नाम’. अंंग्रेज़ी में In the name of God. इसका अंंत कबीर के एक भजन से होता है.

साधो, देखो जग बौराना

सांंची कहो तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना

हिन्दू कहत, राम हमारा, मुसलमान रहमाना

आपस में दोऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना.

कई दिनों तक लूप में सुना. लगातार. बार-बार. ऐसी ही खुमारी थी, जब एक दिन ऑफ़िस से लौटते समय कुमार गंधर्व सुनने को मिले. ऐसा लगा, मानो कबीर सामने बैठकर अपना कहा बांंच रहें हों. हिरन हमारा मन है.

हिरना समझ बूझ बन चरना

एक बन चरना, दूजे बन चरना

तीजे बन पग नहिं धरना

तीजे बन में पांच पारधी

उनके नजर नहिं पड़ना.

भजन – कबीर

आवाज़ – कुमार गंधर्व

कहां सुन सकते हैं – यूट्यूब.

ये लिस्ट तिनका भर है. इससे आगे की दुनिया भी है. कहने-सुनने के लिए इस ईमेल आईडी पर संंपर्क कर सकते हैं – abhishek.thelallantop@gmail.com


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