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आज के दिन क्रिकेट के 2 सबसे बड़े फै़न्स पैदा हुए थे

हर्षा भोगले. IIM अहमदाबाद से ग्रेजुएट तेज़ दिमाग क्रिकेट फैन. वो जिसे नंबरों, स्टैट्स से प्यार था. प्रेज़ेन्टेशन देना और बातें कहते जाना जिसे तोहफ़े में मिला हुआ था. एकेडेमिक बैकग्राउंड लेकिन दिल में बसा था क्रिकेट. 1990 में P&G की नौकरी छोड़ दी. पटरी बदल ली. उन्हें अपना ट्रैक मालूम था. उनका ट्रैक बाईस गज का था. हरी घास से घिरा हुआ.

मैनेजमेंट की नौकरी को टाटा कहते हुए क्रिकेट को अपना लिया. ये दुनिया का एक ऐसा वाकया था जो खुद के होने का इंतज़ार कर रहा था. भगवान अगर कहीं है तो खुद इसके होने के इंतज़ार में होंगे. और जिस दिन हर्षा ने क्रिकेट को अपना सब कुछ बनाने की ठानी, उस दिन ज़रूर ही भगवान ने खुद को हाई-फाइव दिया होगा.

19 जुलाई की तारीख और दो क्रिकेट फैन्स का जन्मदिन. 1961 में हैदराबाद में जन्मे हर्षा भोगले. और ठीक 30 साल बाद उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में पैदा हुआ मैं यानी केतन मिश्रा. 19 जुलाई. हम दोनों के बीच 30 सालों का अंतर. हर्षा भोगले ने 1990 में अपनी नौकरी छोड़ी और अगले ही साल मैं आ गया. क्रिकेट को फॉलो करने. उस खेल को जीने. हर्षा की आवाज़ में. उनकी कलम से निचुड़ी स्याही से. उनके की-स्ट्रोक्स से. या ये भी हो सकता है कि हर्षा ने अपनी आवाज़, अपने कलम की स्याही और अपने की-स्ट्रोक्स से मुझे क्रिकेट फॉलो करवाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी. सोचा है, कभी उनसे मिलूंगा तो असलियत मालूम चलेगी.

हर्षा कहते हैं कि जब उन्होंने नौकरी छोड़ी तो उन्हें बहुत बड़ी उम्मीदें नहीं थीं. साथ ही उन्हें कभी भी पैसे से प्यार नहीं था.


हर्षा के हिसाब से “उम्मीदों को ज़्यादा बड़ा न करना ही आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा चैलेन्ज होता है. अगर आपने खुद से बड़ी उम्मीदें बांधी हुई हैं तो इसका मतलब साफ़ है कि आप अपने काम के रिज़ल्ट पर ध्यान दे रहे हैं. और इस क्रम में आप खुद पर प्रेशर डालते ही जाते हैं.”


हर्षा अपनी यूनिवर्सिटी के लिए खेला करते थे. वहां उनकी शुरुआत हुई लेग ब्रेक गेंदें फेंकने से. और फिर धीरे-धीरे वो उस बैट्समैन में तब्दील हो गए जो गेंद भी फेंक लेता था.


साल बीतते जाने के बाद हर्षा आज भी उसी पैशन के साथ उस गेम पर ज्ञान देते हुए मिल जाते हैं. बीमारियां अक्सर छूने से फैलती हैं. पैशन की ये बीमारी हर्षा को सुनने से फैलती है.


वो बीमारी जिसके ताप में मैं तपता रहा हूं. सालों साल. मैच-दर-मैच. सीरीज़-दर-सीरीज़.

आईपीएल 2010. इशांत शर्मा गेंद फेंकने को दौड़ पड़े थे. सचिन तेंदुलकर को. लम्बी फेंकी हुई गेंद, सचिन ने उस दिन दुनिया के तमाम क्रिकेट खेलने की चाह लिए बैठे लोगों को सिखाया कि स्ट्रेट ड्राइव क्या होती है. बल्ला कितना सीधा हो सकता है, इशांत ने खुद उस दिन ही जाना था. कमेंट्री बॉक्स में हर्षा भोगले मौजूद थे. माइक उन्हीं के हाथ में था. बोले, “Welcome to text book. Turn to page 32.” और ये काफ़ी था. इससे ज़्यादा और कुछ नहीं चाहिए था उस शॉट के बारे में कुछ भी कहने के लिए. सच कहूं तो सचिन की वो स्ट्रेट ड्राइव भोगले के उस कमेन्ट के बिना सूनी सी लगती. सचिन तेंदुलकर अगर बैटिंग के स्टार हैं तो सही मायनों में हर्षा भोगले उनकी बैटिंग के साथ जुड़े हुए ग्लैमर हैं.

सचिन तेंदुलकर. एक नाम जिसे हर्षा और मैं हमेशा क्रिकेट की दुनिया में सबसे ऊपर रखते हैं. मैं हमेशा सोचता था कि कैसे सचिन तेंदुलकर ने सब कुछ छोड़कर एक बल्ले को अपना औजार बना लिया. खुद मजदूर सा जुट गया. खुद को काढ़ने में. हर्षा ने एक इंटरव्यू में सचिन के बारे में ये ही कहा था,“सचिन तेंदुलकर सिर्फ अच्छे प्लेयर ही नहीं, वो महान हैं. क्यूंकि वो आज भी उस खेल के प्यार में डूबे हुए हैं. साथ ही किसी भी और चीज़ को अपने गेम पर हावी होने नहीं देते.” हर्षा ने एक आर्टिकल में लगभग दुलार दिखाते हुए सचिन के लिए लिखा था, “The master of the game thinks he is the servant of the game.”

कमेंटटर, एमसी, राइटर, मुंबई इंडियन्स के एडवाइज़र, क्विजमास्टर और जर्नलिस्ट हर्षा भोगले. एडवर्टाइजिंग का बैकग्राउंड होते हुए जर्नलिस्ट होना, क्रिकेट ब्रॉडकास्टिंग में एक नॉन-क्रिकेटर होना, कमेंट्रेटर से कॉर्पोरेट स्पीकर होना, और साथ ही डकवर्थ लुइस का लॉजिक समझ जाना सच मायनों में हर्षा भोगले के बस की ही बात है. एक आदमी के इतने डाइमेंशन कि आप हर कोने में उसे पायें. ये हर्षा भोगले ही कर सकते हैं. वो कर रहे हैं. करते जा रहे हैं.

खुद के बारे में वो ऐसे बात करते हैं मानो वो खुद चारों ओर फैलाए असर के बारे में कुछ नहीं जानते. वो शायद अभी तक ये महसूस नहीं कर पाए हैं कि क्रिकेट फैन्स के वेन डायग्राम का गोला और भोगले के फैन्स का गोला लगभग एक दूसरे के ऊपर बैठे हुए मिलते हैं. उनके ही शब्दों में, “मुझे सुनना आपका काम नहीं है. बल्कि ये मेरी खुशनसीबी है कि आप मुझे सुन रहे हैं.” हर्षा से कहीं पूछा गया था कि वो क्या है जो वो बन जाना चाहते हैं. उनका जवाब था “मैं इंडिया का सबसे अच्छा क्रिकेट राइटर बनना चाहता हूं.”

मैं हर्षा भोगले बनना चाहता हूं.


  वीडियो देखें : वर्ल्ड कप 2019: फाइनल में इंग्लैंड के जीतने और न्यूजीलैंड के हारने की पूरी कहानी

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