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उसने नहीं वेद प्रकाश शर्मा ने कहा था...

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वेद प्रकाश शर्मा नहीं रहे. कल रात उनका इंतकाल हो गया. वह एक बरस से बीमार चल रहे थे. जासूसी उपन्यास की बनावट में सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले वेद प्रकाश शर्मा बहुत गहरे मायनों में अपनी जनता के बनाए लेखक थे. साल 1993 में आए उनके उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ ने साहित्य की दुनिया में एक ऐसा कोहराम मचाया, जिसका असर आज तलक खत्म नहीं हुआ. उन्होंने फिल्मों के लिए भी लेखन किया. आज से करीब दो बरस पहले इन पंक्तियों के लेखक ने एक साहित्यिक पत्रिका के लिए उनसे कुछ बातें की थीं. इस घड़ी में उन्हें याद करते हुए, यहां पेश हैं वे बातें :

‘वर्दी वाला गुंडा’ लिखने का ख्याल आपको कब, कैसे और क्यों आया?

‘वर्दी वाला गुंडा’ सामाजिक विषय पर लिखा गया एक जासूसी उपन्यास है. हमारे समाज में बहुसंख्यक जनता पुलिस से परेशान रहती है. एक आम आदमी पुलिसिया चक्रव्यूह में फंसकर कैसे त्रस्त होता है, अपने इस उपन्यास में मैंने यही बताने की कोशिश की. एक रोज शाम को जब मैं टहलकदमी कर रहा था, तब मैंने देखा कि पुलिस चौकी पर जमघट लगा है और एक पुलिसवाला जो शायद नशे में था, बगैर अपने आस-पास की परवाह किए लापरवाही से अपना डंडा हिला रहा है. यह दृश्य देखकर ही इस उपन्यास का शीर्षक मेरे दिमाग में आया.

आप कहना चाह रहे हैं कि इस कथ्य के विषय से पहले इसका शीर्षक आपके पास आया?

हां, बिलकुल ऐसा ही है. बाद मे मैंने इस शीर्षक के आस-पास इस विषय को विकसित किया. मैंने समाज में जो देखा, महसूस किया, टी.वी. और अखबारों से जो कुछ मुझ तक पहुंचा उस आधार पर मैंने इस उपन्यास को लिखा.

राजीव गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि से भी इस उपन्यास को जोड़ कर देखा गया?

पुलिस की हरकतें और उसका जनता के प्रति जो व्यवहार रहता है, उसकी अधिकांश बातें मैं इस उपन्यास में ला सका. राजीव गांधी के मर्डर की पृष्ठभूमि रखने से ऐसा करने में मुझे कुछ मदद मिली.

‘वर्दी वाला गुंडा’ को मिला पाठकीय रिस्पॉन्स इतिहास में दर्ज है, लेकिन फिर भी आप कुछ और बताइए?

पाठकों का प्यार इसे उम्मीदों से बढ़कर मिला. पहले ही दिन इसकी 15 लाख प्रतियां बिकीं. यह अंग्रेजी और हिंदी दोनों में ही एक कीर्तिमान है.

हिंदी के जो मुख्यधारा के साहित्यकार हैं, उनकी इस पर क्या प्रतिक्रिया रही?

इसे हिंदी के कई बड़े साहित्यकारों ने पढ़ा और पसंद किया. अमृतलाल नागर जैसे लेखकों के पत्र मेरे पास आए. इस पर गोष्ठियां भी हुईं.

आप गंभीर साहित्य पढ़ते हैं?

मुझे हिंदी के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं आती. गंभीर साहित्य से आपका क्या आशय है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं.

उदाहरण के लिए वे लेखक जिन्हें साहित्य अकादेमी और भारतीय ज्ञानपीठ जैसे सम्मान मिलते हैं?

मैंने केवल प्रेमचंद को पढ़ा है. साहित्य अकादेमी और भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित किसी लेखक को मैंने नहीं पढ़ा. इस अर्थ में गंभीर साहित्य से जुड़ने की मुझे कभी कोई इच्छा नहीं हुई. मुझे इस पर तरस आता है. मैं पाठकों तक पहुंचना चाहता हूं— सिर्फ लाइब्रेरियों और दोस्तों तक नहीं.

आप कविता पढ़ते हैं?

हां, पढ़ता हूं. हरिओम पंवार पसंद हैं.

मुक्तिबोध को नहीं पढ़ा आपने?

नहीं.

आज से 25 साल पहले लुगदी/लोकप्रिय साहित्य में जासूसी और सामाजिक दोनों तरह के उपन्यासों का चलन था, आज केवल जासूसी का ही है. ऐसे में इनका क्या फ्यूचर देखते हैं आप?

आज से 40 साल पहले जब मैं इस फील्ड में आया, तब यहां जासूसी और सामाजिक का बंटवारा था. गुलशन नंदा, रानू, प्रेम वाजपेयी, राजहंस, राजवंश और मनोज के उपन्यास सामाजिकता और रूमानियत से भरे हुए थे. ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज, इब्ने सफी, अकरम इलाहाबादी जासूसी उपन्यासकार थे. सामाजिक उपन्यास बिकते ज्यादा थे, पढ़े कम जाते थे.

जासूसी उपन्यास बिकते कम थे, पढ़े ज्यादा जाते थे. इसकी वजह थी कि सामाजिक उपन्यासों की ज्यादातर पाठक महिलाएं थीं, जबकि जासूसी उपन्यास पढ़ने वालो में छात्र-छात्राएं, टीन-एजर, रिटायर्ड वर्ग शामिल था. लेकिन आज से 25 बरस पहले यह विभाजन खत्म हुआ और मेरे जैसे उपन्यासकारों ने सामाजिकता में जासूसी का पुट देते हुए अपने उपन्यास लिखे. इससे बिक्री बहुत बढ़ गई. ‘विधवा का पति’, ‘दुल्हन मांगे दहेज’, ‘बहू मांगे इंसाफ’, ‘हत्या एक सुहागिन की’, ‘दहेज में रिवॉल्वर जैसे उपन्यास इसी तरह के थे.

आज के दौर में सिनेमा, इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया ने पढ़ने-लिखने को बहुत हद तक बदला और प्रभावित किया है. इस पर क्या कहेंगे?

पढ़ने के मजे को कभी खत्म नहीं किया जा सकता. किताबों की हत्या कोई नहीं कर सकता.

घोस्ट राइटिंग के बारे में कुछ बताइए, क्या आप भी इस कुचक्र में फंसे?

संघर्ष और विवशता के कारण मुझे भी घोस्ट राइटिंग करनी पड़ी. मैंने 24 उपन्यास दूसरे नामों से लिखे. वह दौर ही कुछ ऐसा था. लेकिन यह बहुत सुखद है कि आज घोस्ट राइटिंग बिल्कुल भी नहीं है.

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