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5000 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतारने के मामले में 93 साल के व्यक्ति को अब सज़ा हुई है

93 साल का एक व्यक्ति. पांच हजार से ज्यादा हत्याओं का दोषी. अब दो साल की जेल हुई है. ऐसा क्या किया था इस आदमी ने? इस उम्र में उसे सज़ा किसने सुनाई है? जानने के लिए चलना पड़ेगा थोड़ा पीछे.

76 साल पुराना अपराध

साल 1944. जर्मनी में नाज़ी मशीनरी पूरे फ़ोर्स में थी. यहूदी लोग कंसंट्रेशन कैंप में भेजे जा रहे थे. ऐसा ही एक कैंप था पोलैंड के स्टटहॉफ में. यहां पर ब्रूनो डे नाम का गार्ड पोस्टेड था. एक पूरा टावर उसके जिम्मे था. यूरो न्यूज में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़

जब तक ये कैंप चला, तब तक इस कैंप में कुल 60,000 से ज्यादा यहूदी लोगों को मार डाला गया. कुछ को पेट्रोल या फेनोल का इंजेक्शन देकर, कुछ लोगों को सीधे गोली मारकर, और कइयों को भूखा रखकर. कई लोगों को सर्दियों में बिना कपड़ों के बाहर मरने के लिए छोड़ दिया गया. बाकी को गैस चेंबर में ले जाकर मार दिया गया.

एक गार्ड के तौर पर ब्रूनो डे की ड्यूटी थी कैंप के पास मजदूरी में लगे कैदियों पर नज़र रखना. उसने ये स्वीकार किया कि उसे कैंप के गैस चेम्बर से आती चीखें सुनाई देती थीं. लाशों को जलाने के लिए ले जाते हुए भी देखा उसने. लेकिन उसने ये भी कहा कि उसने कभी अपना हथियार नहीं चलाया. एक बार एक यहूदियों के समूह को मरे हुए घोड़े का मांस अंदर ले जाने की भी इजाज़त दी.

ब्रूनो के ऊपर आरोप लगे कि उसने सब कुछ देखते हुए भी ये अत्याचार होने दिया. इस तरह वो भी कई हत्याओं का ज़िम्मेदार है. जितने समय के लिए ब्रूनो वहां पोस्टेड था, उसमें 5,230 मौतों का दोषी उसे ठहराया गया. लेकिन जब ये पूरी घटना हुई थी, तब उसकी उम्र 17 साल थी. इसलिए उस पर जुवेनाइल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई थी. ब्रूनो को दो साल की जेल की सज़ा सुनाई गई. लेकिन ये सस्पेंडेड सेंटेंस है. यानि जज ने उनकी सज़ा बाद के समय के लिए टाल दी है. जज को ये अधिकार होता है कि वो किसी सज़ा को अमल में लाने में देर करवा सकते हैं. ऐसे में दोषी की सज़ा तब तक शुरू नहीं होती जब तक एक ख़ास समय के भीतर वो कोई और अपराध न कर दे. एक तरह से इसे प्रोबेशन कहा जा सकता है.

Germany Nazi Trial
सुनवाई के दौरान व्हीलचेयर पर बैठे ब्रूनो डे ने अपना चेहरा एक फ़ाइल के पीछे छुपा लिया था. (तस्वीर: AP)

नाज़ी जर्मनी के दौरान हुए अत्याचारों की सुनवाई के लिए कई जांचें अब भी चल रही हैं. कुछ समय पहले भी एक 95 साल के गार्ड को सजा सुनाई गई थी. वो भी स्टटहॉफ में ही पोस्टेड था. इन गार्ड्स पर पहले जो जांचें चल रही थीं, उनमें इन्हें दोषी साबित करना बेहद मुश्किल था. क्योंकि कोर्ट सुबूत मांगते हुए कहते कि किसी ख़ास हत्या में उनकी भागीदारी का एविडेंस दिया जाना चाहिए. जोकि बेहद मुश्किल था. लेकिन यूरोन्यूज की ही रिपोर्ट के मुताबिक़ 2011 में इसमें बदलाव आया. जॉन डेमजान्जुक नाम के एक कामगार पर आरोप लगे थे हत्याओं के. वो पोलैंड के सोबिबोर कैंप में गार्ड था. तब पोलैंड पर जर्मनी का कब्ज़ा चल रहा था. डेमजान्जुक के मामले में वकीलों ने जिरह की, और कोर्ट को ये मानना पड़ा कि एक ऐसे कैंप की रखवाली करना जहां सिर्फ हत्या ही होती थी, दोषी साबित होने के लिए काफी है. इसके बाद ये मामला उदाहरण बन गया.

अपने क्लोजिंग स्टेटमेंट में ब्रूनो ने उन सभी लोगों से माफ़ी मांगी जिन्होंने अत्याचार झेले. और कहा कि जो कुछ भी नाज़ी जर्मनी में हुआ, वो दुबारा नहीं होना चाहिए.

क्या हुआ था नाज़ी जर्मनी में?

1933 में जब एडोल्फ हिटलर जर्मनी का चांसलर बना, तब उसने पूरे देश में जगह जगह कंसंट्रेशन कैंप बनवाने शुरू किए. धीरे-धीरे यहूदी लोगों द्वारा चलाए जा रहे बिजनेसेज को बॉयकॉट लिया गया. उसके बाद ऑस्ट्रिया, पोलैंड पर कब्ज़ा जमा लेने के बाद यहूदियों को समाज से पूरी तरह काटने के तरीके अपनाए गए. इसके लिए हिटलर ने Schutzstaffel (SS) नाम के पैरामिलिट्री आर्गेनाईजेशन का इस्तेमाल किया ताकि वो यहूदियों का सफाया कर सके. 1945 तक लगभग साठ लाख यहूदी मारे गए. इसे होलोकॉस्ट कहा जाता है. यहूदियों के साथ-साथ नाज़ी जर्मनी ने पोलिश लोगों, रोमा नागरिकों, सोवियत संघ के नागरिकों और युद्ध बंदियों, और इनके साथ ही गे (समलैंगिक) लोगों को भी मौत  के घाट उतारा. ये सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक द्वितीय विश्व युद्ध खत्म नहीं हो गया. 1933 से लेकर 1945 तक के इस समय को होलोकॉस्ट एरा कहा जाता है.


वीडियो: क्या थे न्यूरेमबर्ग लॉज़ जो हिटलर की नाज़ी पार्टी ने जर्मनी में यहूदियों के लिए बनाए थे? 

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