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पंजाब का दलित वजीफा घोटाला क्या है, जिसे लेकर अमरिंदर सिंह सरकार पर सवाल उठ रहे हैं?

पंजाब (Punjab) में कांग्रेस की अंदरूनी सियासी उठापटक ने लोगों का ध्यान खींच ही रखा था कि अब एक और मामले ने ज़ोर पकड़ लिया है. मामला दलित (Dalit) छात्रों के वजीफे में कथित रूप से हुए 55 करोड़ रुपये के घोटाले से जुड़ा है, जिसकी जांच अब CBI कर रही है. पिछले साल समाज कल्याण एवं न्याय विभाग के अडिशनल चीफ़ सेक्रेटेरी कृपा शंकर सरोज ने इस घोटाले की एक रिपोर्ट पंजाब के मुख्य सचिव को सौंपी थी, जिसके बाद काफी हंगामा हुआ था. बाद में नवंबर 2020 में पंजाब सरकार ने एक अधिसूचना जारी की थी. इसमें CBI को राज्य के किसी मामले की जांच के सिलसिले में दी गई आम सहमति वापस ले ली गई थी. लेकिन अब CBI ने विभाग की शिकायत के आधार पर घोटाले की जांच शुरू कर दी है. हालांकि पंजाब सरकार से उसे संबंधित फाइलें नहीं मिल रहीं. इसे लेकर जांच एजेंसी और पंजाब सरकार के बीच खींचतान शुरू हो गई है. आइए आपको बताते हैं कि पूरा मामला क्या है.

कैसे हुआ घोटाले का पर्दाफ़ाश?

24 अगस्त 2020 को समाज कल्याण एवं न्याय विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव कृपा शंकर सरोज ने एक जांच रिपोर्ट पंजाब के मुख्य सचिव विनी महाजन को सौंपी. इस रिपोर्ट में पंजाब के समाज कल्याण मंत्री साधु सिंघ धर्मसोत का नाम लिए बिना, दलित छात्रों की स्कॉलर्शिप में 63.9 करोड़ रुपए का घोटाले होने का आरोप लगाया गया था. ये राशि निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले दलित छात्रों की फ़ीस के लिए दी गई थी. 54 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया था कि पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत, केंद्र सरकार ने फरवरी-मार्च 2019 के बीच पंजाब को 303 करोड़ रुपये भेजे थे. लेकिन सामाजिक न्याय निदेशालय ने खजाने से 248 करोड़ रुपये ही निकाले. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि विभाग ने मनमाने ढंग से इस राशि का वितरण किया. ये भी बताया गया कि 39 करोड़ रुपये के आवंटन का रिकॉर्ड गायब था. ये भी कहा गया कि 30 करोड़ रुपये ऐसे संस्थाओं को दिए गए थे, जो वास्तव में थे ही नहीं.

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पिछले साल घोटाले को लेकर पंजाब में कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए थे. (फाइल- पीटीआई)

इसके अलावा रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया था कि कुछ संस्थानों को 16.91 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया गया था. वित्त विभाग की ऑडिट टीमों ने इन संस्थानों से पहले ही 8 करोड़ रुपये की राशि वसूलने की सिफारिश की थी. कहा गया कि अगर ऑडिट टीम के निष्कर्ष के आधार पर ये पूरी राशि वसूली जाती तो कुल 25 करोड़ रुपए रिकवर हो सकते थे.

कृपा शंकर सरोज ने अपनी रिपोर्ट में ये भी आरोप लगाया था कि दलित छात्रों के लिए लंबित रखरखाव भत्ते के भुगतान के बजाय उप निदेशक ने इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा कॉलेजों को दे दिया. ये वही कॉलेज थे जिनसे वसूली की सिफारिश राज्य के वित्त विभाग ने एक विशेष ऑडिट के बाद की थी. उन्होंने आगे ये भी दावा किया कि छात्रवृत्ति शाखा के सभी वरिष्ठ सहायक और अधीक्षक इस घोटाले में मिले हुए थे.

घोटाले की जानकारी सामने आने के बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने राज्य के मुख्य सचिव विनी महाजन को जांच करने का आदेश दिया. मुख्य सचिव ने प्रिन्सिपल सेक्रेटेरी फ़ाइनैन्स के नेतृत्व में एक तीन सदस्यों की कमेटी बनाई. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्य सचिव को सौंपी. इसमें सभी को क्लीन चिट दे दी गई.

दि लल्लनटॉप ने कृपा शंकर सरोज से इस मामले पर बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने इस बारे में कोई भी टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया. केवल इतना कहा,

“कुछ ही दिनों में मेरे तबादले को एक साल हो जाएगा. सारे दस्तावेज सरकारी विभाग के पास हैं. मेरे पास कुछ भी नहीं है. मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता है.”

8 करोड़ का हिसाब नहीं

21 सितंबर 2020 को मुख्य सचिव विनी महाजन ने इस कथित घोटाले को लेकर 18 पन्नों की एक और रिपोर्ट मुख्यमंत्री अमरिंदर को सौंपी थी. लेकिन इस रिपोर्ट में भी मुख्य आरोपियों को क्लीन चिट दी गई. रिपोर्ट के आधार पर कृपा शंकर सरोज का तबादला कर दिया गया. हालांकि 8 करोड़ रुपए के आवंटन पर शक जताया गया.

इसके बाद भी ये मामला थमा नहीं. विपक्ष ने इसे ज़ोरशोर से उठाया. मीडिया में विपक्षी दलों द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने मामले को संज्ञान में लिया. इंडिया टुडे के सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक़, केंद्रीय मंत्रालय ने जब पंजाब सरकार से मामले से जुड़े दस्तावेज मांगे, तो पंजाब सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया. इसके कई महीनों बाद जुलाई 2021 में केंद्रीय मंत्रालय ने मामले की शिकायत CBI से की.

लेकिन CBI की राह भी आसान नहीं लगती. उसे पंजाब में कोई भी जांच करनी है तो इसके लिए राज्य सरकार से अलग से आदेश लेना होगा. क्योंकि पिछले साल 8 नवंबर की अधिसूचना में CBI को दी आम सहमति पंजाब सरकार ने वापस ले ली थी. वहीं अब इंडिया टुडे के आधिकारिक सूत्रों से पता चला है कि पंजाब सरकार ने CBI की दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग ठुकरा दी है.

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अक्टूबर 2020 में पटियाला में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान की एक तस्वीर. (फाइल- पीटीआई)

विपक्ष की सरकार को घेरने की कोशिश

इस बीच कैप्टन सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की बयानबाजी शुरू हो गई है. आम आदमी पार्टी, अकाली दल और बीजेपी तीनों ही पार्टियां सरकार को घेरने को लेकर एकजुट हैं. बीजेपी ने मामले से जुड़े आवश्यक दस्तावेजों को साझा करने से इन्कार करने के लिए कांग्रेस सरकार को फटकार लगाई है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता विनीत जोशी ने इंडिया टुडे से कहा,

“जब विभागीय जांच ने कैबिनेट मंत्री और अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी है तो राज्य के अधिकारी सीबीआई के साथ दस्तावेजों को साझा करने से क्यों हिचकिचा रहे हैं? कुछ तो गड़बड़ है जिसे राज्य सरकार छिपाना चाहती है.”

AAP ने पंजाब सरकार पर कथित घोटाले में शामिल ‘भ्रष्ट’ अधिकारियों को बचाने का भी आरोप लगाया. हालांकि उसने अकाली दल और बीजेपी को भी घेरा. पार्टी के नेता हरपाल सिंह चीमा ने इंडिया टुडे से कहा, “न केवल कांग्रेस सरकार बल्कि पिछली बीजेपी-अकाली दल सरकार ने भी दलित समुदाय के लिए आवंटित पैसों का दुरुपयोग किया था. 1200 करोड़ रुपये का घोटाला तब सामने आया जब बीजेपी-अकाली दल की सरकार सत्ता में थी. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने विधानसभा से वादा किया था कि वे दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे और दलित समुदाय के छात्रों को स्कॉलर्शिप का भुगतान किया जाएगा. लेकिन छात्रवृत्ति नहीं दी गई है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं की गई है.”


वीडियो-कांग्रेस के 10 विधायकों का ये बयान बता रहा है कि अभी पंजाब में घमासान थमा नहीं है

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