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उपनिषद् का वो ज्ञान, जिसे हासिल करने में राहुल गांधी को भी टाइम लगेगा

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राहुल गांधी आज-कल गीता और उपनिषद् पढ़ रहे हैं ताकि संघ परिवार पर हिंदुत्व के मैदान में दार्शनिक घेरा डाला जा सके. हम यहां आपको उपनिषद् की वो पांच मजेदार बातें बता रहे हैं, जिसे जानने में राहुल गांधी को अभी टाइम लगेगा.

क्या होते हैं उपनिषद्
उपनिषद् का अर्थ है पास में बैठना. जब कागज नहीं बना था और प्रिंटिंग की भी शुरुआत नहीं हुई थी, उस समय भी लोग पढ़ते थे. इसे वाचिक परंपरा कहा जाता है. माने गुरु जो ज्ञान अपने पास बैठा कर देता था, उसे वैसे ही याद कर लेना होता था. अगले दिन इसे जुबानी सुनाना पड़ता था. तो उपनिषद् का अर्थ हुआ गुरु के समीप बैठ कर लिया गया ज्ञान.

upnishads

 

बाइबल से बहुत पुराने हैं

उपनिषद् कब लिखे गए, इसके बारे में काफी बहस हुई है. लोकमान्य तिलक के हिसाब से ये 3000 से 200 बीसी में रचे गए. जर्मन स्कॉलर मैक्स मूलर के हिसाब से ये 1000 से 800 बीसी के बीच रचे गए. डॉ. राधाकृष्णन का कहना था कि 800 से 600 बीसी के बीच इन्हें रचा गया. बहरहाल कई भाषा वैज्ञानिक इन्हें 1000 बीसी से ज्यादा पुराना नहीं मानते.

प्रस्थानत्रयी का हिस्सा

प्राचीन काल में अगर किसी आचार्य को किसी नए मत का प्रतिपादन करना होता था तो उसके लिए उसे एक शर्त अनिवार्य तौर पर पूरी करनी होती थी. ये शर्त थी प्रस्थानत्रयी का भाष्य करना. प्रस्थानत्रयी माने भगवत गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र. अद्वैतवाद के प्रवर्तक शंकर हो या फिर विशिष्टाद्वैतवाद के प्रवर्तक रामानुज, सबने इस शर्त को पूरा किया था.

कैसे बने उपनिषद्
उपनिषद् को वेदांत भी कहा जाता है. वेदांत माने वेदों का अंत. दरअसल वेदों के अध्ययन के दौरान उपनिषद् का नंबर सबसे अंत में आता है. सबसे पहले संहिता पढ़ाई जाती है, उसके बाद ब्राह्मण आते हैं. इसके बाद आरण्यक और सबसे अंत में उपनिषद्.

इनको किसने लिखा, ये आज भी पहेली है. ये एक किस्म की विचार परंपरा है जिसमें कई लोगों का वैचारिक परिश्रम शामिल है. दरअसल हमें उपनिषद् को भारतीय दर्शन परंपरा का प्रस्थान बिंदु मानना चाहिए. वेद के पहले दो भाग संहिता और ब्राह्मण देवताओं की पूजा और यज्ञ की विधियों तक सीमित हैं.

आदि शंकर
आदि शंकर

 

जब इंसान की पूजा से थोड़ा और आगे बढ़ता है, तो वो जीवन और उसके कारण के बारे में और गंभीरता से सोचता है. मसलन इस संसार की उत्पत्ति कैसे हुई या फिर जीवन क्या है. इन वैचारिक मंथनों का निचोड़ ही उपनिषद् को गढ़ता है. वैदिक काल में जब कर्मकांड बहुत हावी हो गए तो एक समानान्तर विचार परंपरा खड़ी हुई, जो कि इसके खिलाफ थी. मसलन छांदोग्य उपनिषद् में देवता को खुश करने के नाम पर बलि देने वाले लोगों की तुलना कुत्तों के झुंड से की गई है.

कितने तरह के उपनिषद्

उपनिषदों की कुल संख्या 200 बताई जाती है. शंकराचार्य के समय 108 उपनिषद् का जिक्र मिलता है. इनमें से 13 उपनिषद् मुख्य माने गए हैं. शंकराचार्य ने इनमें से 10 का भाष्य लिखा था. ये थे ईश, ऐतरेय, कठ, केन, छांदोग्य, प्रश्न, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, मांडूक्य और मुंडक.
108 उपनिषदों को कई तरह से बांटा गया है. इसमें सबसे प्रचलित वर्गीकरण वेदों से जोड़ कर किया गया है. ऋग्वेदीय उपनिषदों की संख्या 10 बताई जाती है. यजुर्वेद से जुड़े हुए उपनिषद् दो भागों में बांटा गया है. पहला है शुक्ल यजुर्वेदीय जसके तहत 19 और कृष्ण यजुर्वेदीय के तहत 32 उपनिषद् रखे गए हैं. सामवेद से जुड़े 16 उपनिषद् हैं और अथर्ववेद से जुड़े कुल 31 उपनिषद् हैं. इसमें से कुछ गद्य हैं और कुछ पद्य हैं.
ये वाक्य उपनिषद् से आए हैं

“असतो मा सदगमय. तमसो मा ज्योतिर्गमय. मृत्योर्मामृतम् गमय.”

-वृहदारण्यक उपनिषद्

“अहम् ब्रह्मास्मि”

-वृहदारण्यक उपनिषद्

“अतिथि देवो भव”

-तैत्तिरीय उपनिषद्

“ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्.”

-वृहदारण्यक उपनिषद्

“सत्यमेव जयते”

-मांडूक्य उपनिषद्


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