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जीएसटी को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच झगड़े की असली वजह समझिए

हम सभी किसी न किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के निवासी हैं. और अगर आपकी राज्य सरकार कई महीनों से कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दे रही है, या फिर बिजली-पानी के बिल बढ़ा दे रही है, या सड़क-नाली ठीक नहीं करवा रही, तो जाहिर है आप अपनी राज्य सरकार को दोष देंगे. लेकिन आपकी राज्य सरकार केंद्र की मोदी सरकार को दोष दे रही है. कह रही है कि केंद्र सरकार पैसे नहीं दे रही, तो हम तनख्वाह कैसे दें. फिर बात आती है जीएसटी को लेकर झगड़े की.

जीएसटी यानी ‘वन नेशन, वन टैक्स’ वाली वो व्यवस्था, जिसे पीएम मोदी कॉपरेटिव फेडरलिज्म का उदाहरण बताते हैं. लेकिन अब इसी को लेकर कई राज्य केंद्र से झगड़ रहे हैं. आप इस खबर को अर्थव्यस्था के पन्ने की खबर समझकर मत छोड़िए. इस पूरे झगड़े को समझिए, ताकि आपको ये मालूम रहे कि आपके घर में बिजली का बिल बढ़ा हुआ आ रहा है, तो उसके लिए जिम्मेदार किसे ठहराएंगे.

मामले को कहानी से समझिए

एक छोटी-सी कहानी से समझिए. एक घर में बुजुर्ग मुखिया होता है और उसके पांच बेटे होते हैं. कोई कम, तो कोई ज्यादा, सभी बेटे कमाते थे और अपने हिसाब से खर्च करते थे. लेकिन पिता ने कहा कि मैं मुखिया हूं, तो आप जो भी कमाएंगे, वो मुझे देंगे और फिर मैं आपको आपकी कमाई और जरूरत के हिसाब से पैसा दे दूंगा. बेटों ने मान लिया. लेकिन इस व्यवस्था में सब कुछ सही तरह से चला नहीं. कुछ दिन बाद मुखिया ने बेटों के खर्चे में कटौती कर दी, खर्च टाइम पर देना भी बंद कर दिया. अब बेटों को खर्च कम मिलने लगा, जरूरतें पूरी करने में दिक्कतें आने लगी. बच्चों की पढ़ाई, नए सामान. सब प्लान अटक गए, तो फिर शुरू हुआ परिवार में झगड़ा.

जीएसटी काउंसिल की बैठक

अब इस कहानी में परिवार को देश मान लें, अगर मुखिया की जगह केंद्र सरकार रख दें और बेटों को राज्य नाम दे दें, तो जीएसटी को लेकर इनका झगड़ा भी लगभग वैसा ही है. कई राज्य सरकारें कह रही हैं कि हमें तो केंद्र सरकार से पैसा नहीं दे रही, हम कहां से खर्चा चलाएं. पंजाब ने कहा कि चार महीने की जीएसटी कमाई बकाया होने का मतलब है कि राज्य अपने दो महीनों के बिल और सैलरी नहीं चुका सकता. केरल ने संघीय ढांचे के उल्लंघन की बात कही. इस मुद्दे पर बुधवार को सोनिया गांधी की भी गैर-बीजेपी सरकारों के सात मुख्यमंत्रियों के बीच बात भी हुई थी. इस झगड़े के बीच गुरुवार को जीएसटी काउंसिल की बैठक हुई. जीएसटी काउंसिल मतलब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक.

27 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जीएसटी काउंसिल की बैछक हुई. (फोटो-पीटीआई)
27 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जीएसटी काउंसिल की बैछक हुई. (फोटो-पीटीआई)

बैठक के बाद वित्त मंत्रालय ने कहा,

कोविड की वजह से जीएसटी कलेक्शन कम हुआ है. वित्त वर्ष 2021 में जीएसटी कलेक्शन में 2.35 लाख करोड़ रुपए की कमी रह सकती है. राज्यों को कंपनसेशन के दो विकल्प दिए गए हैं. केंद्र उधार लेकर भुगतान करे या राज्य खुद आरबीआई से उधार लें. इन दोनों विकल्पों पर विचार के लिए राज्यों ने एक हफ्ते का वक्त मांगा है. कंपनसेशन की यह व्यवस्था वित्त वर्ष 2021 के लिए रहेगी.

वित्त मंत्री ने कोविड को ‘एक्ट ऑफ गॉड’ बताया.

झगड़े की कहानी क्या है?

अब आपको इस झगड़े की पूरी कहानी समझाते हैं. जुलाई 2017 से ‘वन नेशन, वन टैक्स’ वाली अवधारणा पर जीएसटी लागू किया गया था. इसका पूरा नाम है गुड्स एंड सर्विस टैक्स. हिंदी में कहते हैं वस्तु और सेवा कर. पहले एक्साइज ड्यूटी, वैट जैसे 17 टैक्स अलग-अलग टैक्स राज्य और केंद्र सरकार लगाती थी, तो उनकी जगह सिर्फ एक जीएसटी कर दिया गया. मोदी सरकार ने इसके बाद खुद की खूब पीठ थपथपाई. तो इस जीएसटी में राज्यों के लिए क्या है, जो पहले अपने टैक्स से कमाई करते थे. इसके लिए जीएसटी को तीन तरह से बांटा गया – IGST, SGST और CGST

कितने तरह की जीएसटी है?

IGST यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी. जब सामान एक राज्य में बनकर दूसरे राज्य में बिकता है, यानी अंतर्राज्यीय कारोबार होता है, तो IGST लगता है और ये टैक्स केंद्र के पास आता है. लेकिन अगर एक राज्य में चीज़ बनी और उसी राज्य में बिक गई, तो इसमें SGST यानी स्टेट जीएसटी और CGST यानी सेंट्रल जीएसटी लगेगा. अगर कुल जीएसटी 18 फीसदी है, तो 9 फीसदी SGST और 9 फीसदी CGST लगता है. SGST राज्यों के पास जाता है और सीजीएसटी केंद्र के पास आता है.

कोरोना के समय जीएसटी कलेक्शन एक दम से घट गया है.
कोरोना के समय जीएसटी कलेक्शन एक दम से घट गया है.

अब इस वर्गीकरण के हिसाब से राज्यों का जीएसटी में हिस्सा तो तय कर दिया गया. लेकिन राज्यों को एक चिंता और थी. जीएसटी डेस्टिनेशन टैक्स है. यानी सेवा या वस्तु जहां बिकेगी, वहां टैक्स लगेगा. कहां उत्पादन हो रहा है, इससे फर्क नहीं पड़ता. तो जो बड़े मैन्युफैक्चरिंग राज्य थे, उन्होंने ऑब्जेक्शन किया कि ऐसे तो हमें आय में घाटा हो जाएगा. तो इन चिंताओं को दूर करने के लिए केंद्र ने एक व्यवस्था दी. जीएसटी कम्पनसेशन या मुआवजा. ये व्यवस्था पांच साल के लिए थी.

तो क्या है जीएसटी कम्पनसेशन?

अगर राज्यों के कर में गिरावट होती है, तो उसका भुगतान केंद्र सरकार करेगी. और इसे 14 फीसदी की दर से हर साल बढ़ाया जाएगा. इस कम्पनसेशनल का पैसा कहां से आएगा, इसके लिए उस वक्त के वित्त मंत्रालय ने जीएसटी कम्पनसेशन सेस की व्यवस्था की थी और एक अलग से कम्पनसेशन फंड बनाया गया था.

अर्थव्यवस्था की चांदी हो जाएगी, ये मानकर जीएसटी लायी गयी थी.
अर्थव्यवस्था की चांदी हो जाएगी, ये मानकर जीएसटी लायी गयी थी.

तो फिर अब दिक्कत कहां आ रही है? दिक्कत आ रही है इस जीएसटी कम्पनसेशन में रुकावट से. केंद्र सरकार ने 2017-18 में 41,146 करोड़ रुपये राज्यों को दिए. 2018-19 में भी 69 हजार 275 रुपये राज्यों को कम्पनसेशन फंड के तौर पर दिए. लेकिन 2019-20 आते-आते ये व्यवस्था बिगड़ने लगी. पिछले साल के अक्टूबर महीने से ही केंद्र ने ये राशि राज्यों को देने में देरी करना शुरू कर दी. और इतनी देरी कि इस साल मार्च का पैसा जुलाई के आखिर में जाकर रिलीज किया है. 2019-20 का कुल जीएसटी कम्पनसेशन केंद्र सरकार ने 1 लाख 65 हजार करोड़ रुपये दिया है.

झगड़े की वजह क्या है? 

बात सिर्फ देरी की नही है. असली झगड़ा पूरा कम्पनसेशन फंड देने का है. हमने बताया था ना कि राज्यों की कमाई में जितना घाटा होगा, उसकी भरपाई केंद्र सरकार जीएसटी कम्पनसेशन से करेगी. तो अब कोरोना और लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था ठप हो गई. सरकारी आकंड़ों के मुताबिक, अप्रैल से जून तक पहली तिमाही में जीएसटी से कमाई में 41 फीसदी की गिरावट आई. इसका मतलब ये है कि राज्यों की कमाई भी गिरी है. तो राज्य कह रहे हैं कि बात तो ये हुई थी कि जो घाटा हमारी आमदनी में होगा, वो केंद्र सरकार देगी. और इस हिसाब से अगर राज्यों का घाटा केंद्र सरकार देती है, तो मोटा-मोटा अनुमान ये है कि तीन लाख करोड़ रुपये देने पड़ेंगे. 2019-20 में हर महीने के हिसाब से केंद्र ने राज्यों को 13 हजार 775 करोड़ रुपये दिए हैं, लेकिन इस वित्त वर्ष में हर महीने 26 हजार करोड़ रुपये देने हैं.

मोदी सरकार ये पैसा दे क्यों नहीं रही?

पैसा है कहां देने के लिए. ये बात कह रही है मोदी सरकार. मोदी सरकार ने कहा कि करार के मुताबिक जीएसटी कम्पनसेशन सेस से जो पैसा इकट्ठा होता है, उसी से कम्पनसेशन दिया जाता है. अब उतना फंड जमा ही नहीं हुआ, तो हम कहां से दें. लेकिन राज्य इस बात से सहमत नहीं है. वो राज्य भी, जहां बीजेपी या एनडीए की सरकार है. मसलन बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा कि जीएसटी कम्पनसेशन तो केंद्र को देना ही चाहिए. अगर पैसा नहीं है, तो कहीं से उधार ले लें. लेकिन केंद्र सराकर की दलील है कि उधार हम क्यों लें, आप ही ले लो. क्यों उधारी खाते से ही किसी देश की अर्थव्यवस्था की हालत का अंदाजा लगता है, इसलिए केंद्र सरकार इससे बच रही है.

दूसरी दलील ये है कि हम अपनी कमाई का 42 फीसदी तो राज्यों पर खर्च करते ही हैं, अलग से उधार क्यों लें. खबरें हैं कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की राय इस पर मांगी थी और उन्होंने भी कहा कि राज्यों को पैसा तो देना ही पड़ेगा. तो किसमें कौन कितना सही है, इस पर हमने कुछ जानकारों की राय भी ली.

मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक में पीएम मोदी.
मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक में पीएम मोदी.

अर्थशास्त्री यामिनी अग्रवाल का कहना है,

केंद्र सरकार का रुख है कि ओवरऑल फिस्कल डेफिसिट को मेंटेन किया जाए. उनको मेंटेन करते हुए जो भी टैक्स कलेक्शन हैं, उनमें कम्पनसेशन दिया जाए. ये भी देखा जाए कि जब उन्होंने जीएसटी को लागू करते हुए कम्पनसेशन का वादा किया था, तब कहा था कि राज्यों का जो भी कम्पनसेशन लॉस होगा, उसके अंदर वो कम्पनसेशन उन्हें देंगे. उन्होंने ये नहीं कहा था कि अगर कोई एक्स्ट्रा ऑडिनरी इवेंट होता है और उसकी वजह से रेवन्यू लॉस होता है, तो कंपनसेट करेंगे.

हम एक परिवार की तरह फेडरलिज्म के सिस्टम में बंधे हैं. इंडिया- यूनियन ऑफ स्टेट्स. अगर किसी राज्य में किसी कर्मचारी को वक्त पर वेतन नहीं मिल रहा, तो चिंता केंद्र सरकार की भी है. कोरोना की वजह से दुनिया के हर देश में अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है. हमारे देश की हालत भी ज्यादा खराब हुई है. लेकिन ऐसे हालात में भी उम्मीद है कि राज्य और केंद्र मिलकर अपना झगड़ा सुलझाएंगे, ताकि जनता को कम से कम नुकसान उठाना पड़े.


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