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कश्मीरी पंडितों के घाटी छोड़ने के 30 सालः क्या था 72 दिन का 'गुल-ए-कर्फ्यू'?

भारत 1980 में कश्मीर समस्या को अच्छे तरीके से हल कर सकता था. वह सबसे मुफीद दौर होना चाहिए था, लेकिन जैसा कि पत्रकार बलराजपुरी कहते हैं- कश्मीर समस्या को दोबारा जिन्दा करने के लिए असाधारण प्रतिभा की जरूरत थी. कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए वहां लोकतांत्रिक स्पेस का सृजन करने की जगह उन्हीं नीतियों को और कड़ाई से लागू किया गया, जिन्होंने वहां यह भाव बनाया कि कश्मीरी जनमत का दिल्ली की नजर में कोई सम्मान नहीं.

– किताब ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ में अशोक कुमार पांडेय

कश्मीर घाटी से पंडितों के विस्थापन को 30 साल हो गए. 19 जनवरी, 1990 की तारीख थी. घाटी में हालात ऐसे हो गए थे कि 60 हजार से ज्यादा पंडितों को कश्मीर छोड़कर जाना पड़ा था. उस वक्त आखिर कैसा माहौल बन गया था, जो उन्हें अपना घर छोड़कर जाना पड़ा? हालात क्यों बने? ये सब शुरू कब हुआ? जानते हैं..

Kashmiri Pandit Chain
तस्वीर अमेरिका के सीटल की है. कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के 30 साल पूरे होने पर 20 जनवरी को यहां के कश्मीरी पंडितों ने ह्यूमन चेन बनाकर अपनी बात रखी. (फोटो- ANI)

1984 में गुल शाह का नाम सामने आया
1983 की बात है. जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार थी और फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे. वहीं दिल्ली में इंदिरा गांधी की सरकार थी. अब्दुल्ला की सरकार गिरवाने के लिए जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बीके नेहरू पर दिल्ली से लगातार दबाव बनाया जा रहा था. बीके नेहरू मदद न कर सके, तो अप्रैल-1984 में उन्हें अचानक गुजरात का राज्यपाल बनाया गया और जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया. दिल्ली की सरकार से गुल शाह नाम के नेता को समर्थन हासिल था. उन्हें ही सीएम बनाने की कोशिश भी थी.

कश्मीर में 72 दिन का कर्फ्यू
बीके नेहरू के हटते ही गुल शाह की अगुवाई में 13 विधायक फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ शिकायत लेकर जगमोहन के पास पहुंचे. इनमें खेमलता वखलू भी शामिल थीं. वही खेमलता, जिन्होंने कभी बीके नेहरू से कहा था कि अगर गुल शाह सत्ता में आ गए, तो हिंदुओं का जीवन और उनकी संपत्ति असुरक्षित हो जाएगी. अब वो गुल शाह के साथ थीं. यही राजनीति है.

आखिरकार अब्दुल्ला सरकार गिरी. गुल शाह मुख्यमंत्री बने. जनता इस फैसले के विरोध में थी और यहीं शुरू हुआ ‘गुल-ए-कर्फ्यू’. शाह के मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरुआती 90 में से 72 दिन कर्फ्यू लगा रहा. इस वक्त को ही जनता ने ‘गुल-ए-कर्फ्यू’ का नाम दिया. यहीं से 1990 की जमीन भी तैयार होने लगी.

इंदिरा गांधी की हत्या, अनंतनाग हिंसा और राष्ट्रपति शासन
अक्टूबर-1984 में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. समीकरण फिर बदले. राजीव गांधी जबरदस्त बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने. फारूक अब्दुल्ला ने अपने बचपन के दोस्त राजीव से मेल-जोल बढ़ाया. सत्ता में वापसी के रास्ते भी तलाशने लगे. 1985 के खत्म होते-होते ये लगभग तय हो गया था कि गुल शाह के हाथ में अब बस कुछ ही दिन सत्ता बची है. लेकिन गुल शाह की विदाई से पहले ही आजादी के बाद कश्मीर के आधुनिक इतिहास में हिंदुओं के खिलाफ सबसे बड़ी सांप्रदायिक हिंसा हुई. 1986 की अनंतनाग हिंसा. आखिरकार इसी साल शाह सरकार बर्खास्त हो गई. लेकिन तब तक घाटी के हालात खराब हो चुके थे. इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा.

फारूक की वापसी तक हालात बिगड़ चुके थे
नवंबर, 1986 में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़कर फारूक दोबारा मुख्यमंत्री बने. लेकिन गुल शाह के मुख्यमंत्री रहने के दौरान हुई अनंतनाग हिंसा ने राज्य में माहौल बिगाड़ दिया था. यही वो समय था, जब पाकिस्तान ने कश्मीरी लड़कों को चोरी-छिपे ट्रेनिंग देने का काम भी शुरू कर दिया था.

टपलू और नीलकांत की हत्या, हिंदुओं का विस्थापन
1989 में कश्मीर में पहली बार राजनीतिक कारणों के चलते किसी की हत्या की गई. अगस्त में नेशनल कॉन्फ्रेंस के मोहम्मद यूसुफ हलवाई को गोली मार दी गई. नतीजा ये रहा कि अगले ही महीने बीजेपी नेता टीकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई. ये ऐसी घटना थी, जिसने कश्मीर के पंडितों में डर बसा दिया. हालात इतने बिगड़ गए कि अगले ही साल 1990 में फारूक अब्दुल्ला का भी इस्तीफा हो गया. पंडितों के खिलाफ हिंसा शुरू हुई और आखिरकार विस्थापन. 60 हजार से ज्यादा कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर गए.

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर लिखी गई किताब ‘आर मून हैज़ ब्लड क्लॉट्स’ के लेखक राहुल पंडिता बताते हैं :

कश्मीर में पंडितों की मौत का ऑफिशियल आंकड़ा करीब 700 का है. लेकिन मैं कहूंगा कि आंकड़ा करीब 10 हजार है. वजह- जब विस्थापित लोगों को रिफ्यूजी कैंपों में रखा गया, तो तमाम लोगों की मौत अलग-अलग बीमारियों, सांप-बिच्छू वगैरह के काटने से हुई. इस पर कोई बात करने वाला ही नहीं है. ये विस्थापित पंडित पहले टेंट में रहते थे, फिर उन्हें एक गुंबदनुमा इमारत में रखा गया, फिर कच्ची ईंटों के मकान में और अभी कुछ साल पहले उन्हें जम्मू शहर से करीब 10-12 किमी की दूरी पर एक-एक कमरों के जर्जर मकान दिए गए हैं.

घर, बसी-बसाई गृहस्थी, पढ़ाई-लिखाई, रोजगार सब छोड़कर भागने को मजबूर हुए कश्मीरी पंडित को वापस बसाने की अब तक तीन बड़ी कोशिशें हो चुकी हैं- 1998, 2003 और 2012 में. सब असफल. अभी भी हजारों पंडित 8 बाई 8 के रिफ्यूजी टेंट में रह रहे हैं. कश्मीर की सेहत भी नासाज़ है.

कश्मीरी पंडितों और कश्मीर के रिश्ते की खूबसूरती पर ही अल्लामा इकबाल ने लिखा था..

एन ब्राह्मन ज़ादगान-ए-ज़िन्दादिल
लालेह-ए-अहमर रूये शान खाजिल
तज़्ब बीन-ओ-पुख्ता कार-ओ-सख़्त कोश
अज़-निगाह-ए-शान फ
एन ब्राह्मन ज़ादगान-ए-ज़िन्दादिल
लालेह-ए-अहमर रूये शान खाजिल
तज़्ब बीन-ओ-पुख्ता कार-ओ-सख़्त कोश
अज़-निगाह-ए-शान फरंग अन्दार खारोश
अस्ल-ए-शान अज़ ख़ाक-ए-दामनगीर मस्त
मतला-ए-ऐन अख्तरान कश्मीर मस्त

मतलब- ज़िन्दादिल ब्राह्मणों के ये वारिस, जिनके चमकते हुए गाल लाल ट्यूलिप को भी शर्मिन्दा कर दें. मेहनती, परिपक्व और उत्कंठा से भरी आंखों वाले, जिनकी एक नज़र ही यूरोप के रहने वालों को बेचैन कर देती है. वे हमारी विद्रोही धरती की ही पैदाइश हैं. इन सितारों का आसमान हमारा कश्मीर ही है.


 

पुस्तक मेला: अशोक कुमार पाण्डेय ने बताया कश्मीर पर उस वक्त कैसी कवरेज हुई थी?

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