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21 साल पहले भी कांग्रेस के तीन नेताओं ने एक 'बवाली' चिट्ठी लिखी थी

1977 में मनमोहन देसाई की एक फिल्म आई थी- अमर अकबर एंथनी. फिल्म की कहानी के तीनों प्रमुख किरदार यानी अमर, अकबर और एंथोनी एक ही मां-बाप के बेटे हैं. बचपन में बिछड़ जाते हैं और तीनों को अलग-अलग धर्म को मानने वाले लोग गोद ले लेते हैं. तीनों बड़े होते हैं और संयोगवश मिल भी जाते हैं. अमर खन्ना यानी विनोद खन्ना को एक हिंदू परिवार ने गोद लिया था, जबकि अकबर इलाहाबादी यानी ऋषि कपूर को एक मुस्लिम परिवार ने एडॉप्ट किया था. तीसरे यानी एंथनी गोंजाल्विस का किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया था, जिसे एक क्रिश्चियन फैमिली द्वारा गोद लिया गया था.

लेकिन आज हम जिस ‘अमर अकबर एंथनी’ की बात करने जा रहे हैं, वह इस फिल्म के किरदार नहीं हैं, बल्कि ये तीनों सियासत के मंजे हुए खिलाड़ी हैं, जिनमें एक तो अब स्मृतिशेष हैं. सियासत के इन ‘अमर अकबर एंथनी’ की कहानी को समझने के लिए हम आपको 21 साल पीछे लिए चलते हैं.

तारीख थी 15 मई, 1999. उस दिन पूरे देश की नजरें इंग्लैंड में खेले जा रहे क्रिकेट विश्व कप में भारत के पहले मैच की तरफ थी. यह मैच साउथ अफ्रीका के खिलाफ ब्रिस्टल में खेला जा रहा था. दोपहर होते-होते पूरा देश टीवी और रेडियो से चिपक चुका था. नेताओं में भी उस मैच को लेकर बहुत उत्सुकता थी. इसी उत्सुकता भरे माहौल में दोपहर के लगभग एक बजे दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय यानी 24 अकबर रोड में कांग्रेस के दो नेताओं (20 दिन पहले भंग की जा चुकी लोकसभा में विपक्ष के नेता शरद पवार और राज्यसभा सांसद प्रणब मुखर्जी) की मुलाकात हुई. शरद पवार तब तक क्रिकेट प्रशासन से जुड़े नहीं थे, लेकिन फिर भी एक आम भारतीय की तरह क्रिकेट में खूब दिलचस्पी लेते थे. प्रणब मुखर्जी की भी क्रिकेट में बहुत दिलचस्पी रही है.Untitled Design (20)

उस दिन जब दोनों नेता 24 अकबर रोड के पोर्टिको में मिले और उस दिन होने वाले क्रिकेट मैच पर चर्चा की, तब किसी को भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि तीन घंटे बाद जब भारत की पारी के 50 ओवर पूरे होने को होंगे, तकरीबन उसी वक्त शरद पवार कांग्रेस कार्यसमिति के दो अन्य सदस्यों (पीए संगमा और तारिक अनवर) के साथ मिलकर एक ऐसा लेटर बम फोड़ देंगे, जिससे पूरे देश की नज़र उस दिन हो रहे क्रिकेट मैच के परिणाम से तरह हट जाएगी.

हमने इन तीनों की तुलना इसलिए मनमोहन देसाई की फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ से की, क्योंकि इस फिल्म के तीनों किरदारों की तरह चिट्ठी लिखने वाले तीनों किरदार भी अलग-अलग धर्म को मानने वाले हैं. शरद पवार हिंदू हैं, जबकि तारिक अनवर मुसलमान. स्वर्गीय पीए संगमा ईसाई थे.

आखिर ऐसा क्या किया था शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने, जिससे पूरे देश की नजरें उन पर गड़ गई थी?

दरअसल, उस दिन कांग्रेस के ‘अमर अकबर एंथनी’ यानी भंग लोकसभा में विपक्ष के नेता शरद पवार, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा और तारिक अनवर ने मिलकर पांच पन्ने की एक चिट्ठी लिखी. इस लेटर के पौने पांच पन्ने में तो बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पिछले 14 महीनों के कार्यकाल और उनके काम करने के तरीके की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी, लेकिन आखिरी के एक पैराग्राफ में एक ऐसी बात लिख दी गई, जिससे कांग्रेस पार्टी के अंदर बवाला मचना तय था.

क्या लिखा था उस आखिरी पैराग्राफ़ में?

उस आखिरी पैराग्राफ़ में इन तीनों नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा दिया था और इसे पार्टी के विस्तार के लिए एक बड़ी बाधा माना था.

उस दिन एक तरफ तो विश्व कप में साउथ अफ्रीका बनाम भारत का मैच चल रहा था. इसी दिन गोवा विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के टिकट पर चर्चा करने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई थी. लेकिन क्रिकेट मैच पर नजरें होने की वजह से सभी जल्दी में थे. तकरीबन चार बजे कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक शुरू हुई. इस बैठक की अध्यक्षता करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने सरकारी आवास 10 जनपथ से निकलकर कांग्रेस मुख्यालय यानी 24 अकबर रोड पहुंचीं. दोनों बंगले (10 जनपथ और 24 अकबर रोड) बिल्कुल आसपास हैं और इसी वजह से गांधी परिवार के लोग पैदल ही कांग्रेस मुख्यालय आ जाया करते हैं. उस बैठक में किसी को पता नहीं था कि कांग्रेस कार्यसमिति के तीन सदस्य बाहर में मीडिया के नाम एक चिट्ठी लीक कर अंदर आए हैं.

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और चिट्ठी जारी होने की टाइमिंग लगभग एक ही थी. कार्यसमिति की बैठक शुरू हुई और इस बैठक के शुरू होते ही पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा ने सोनिया गांधी की ओर इशारा करते हुए जो कहा, उसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की होगी. आखिर क्या कहा था संगमा ने?

“Madam, if you have two passports and two nationalities, how can we defend you when we don’t know you?”

(यदि आपके पास दो देशों का पासपोर्ट और दो देशों की नागरिकता है, तो हमलोग कैसे आपको लोगों के बीच डिफेंड करें, जब हम आपको जानते ही नहीं हैं?)

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                    पीए संगमा लोकसभा अध्यक्ष और मेघालय के मुख्यमंत्री रह चुके हैं                                              

जब संगमा ने ये सब कहा, तब कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य चुपचाप बैठे रहे. सिर्फ राजेश पायलट ने अपनी जुबान खोली, लेकिन उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं कहा, जिससे सोनिया गांधी को कोई फौरी राहत मिल सके. राजेश पायलट ने कहा-

“पार्टी के नेतृत्व के सवाल को लोकसभा चुनाव तक के लिए टाल दिया जाना चाहिए. अभी इस पर बात करना मुनासिब नहीं होगा.”

इसके बाद सोनिया गांधी नाराज होकर बैठक से उठकर चली गईं और खुद को 10 जनपथ में बंद कर लिया. कांग्रेस पार्टी का कामकाज छोड़ दिया और किसी से भी मिलने-जुलने से इनकार कर दिया. सोनिया गांधी के उठकर चले जाने के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक भी रोक दी गई और सभी नेता बाहर निकलने लगे. लेकिन असल सरप्राइज़ तो यहीं था. बाहर निकलते ही कांग्रेस नेताओं ने देखा कि मीडिया का बड़ा हुजूम 24 अकबर रोड को घेरे हुए है और बाहर निकल रहे कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों को रोककर शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर की चिट्ठी के बारे में सवाल कर रहा है. इससे ये नेता और चौंके. तत्काल सबको कुछ समझ में नहीं आया कि ये हो क्या रहा है. अभी कुछ मिनट पहले ही पीए संगमा ने बैठक में विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर सबको असहज किया था और फिर यह लेटर बम अलग से.

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सोनिया गांधी को फिर से पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया है                                                                      

इसके बाद पूरे देश की सियासत में हंगामा मच गया. ऐसा हंगामा कि लोग भारत बनाम साउथ अफ्रीका का मैच भूल गए. साथ ही इस मैच के उस बहुचर्चित वाकये की तरफ भी शायद ही किसी का ध्यान गया हो, जिसमें पहले फील्डिंग कर रही साउथ अफ्रीकी क्रिकेट टीम के कप्तान हैंसी क्रोनिए एक माइक्रोफोन के ज़रिए अपने कोच बाब वूल्मर से जुड़े हुए थे. अब सबकी नजरें कांग्रेस के अंदरूनी संकट पर लग गई थीं ऐसा स्वाभाविक भी था, क्योंकि लोकसभा 20 दिन पहले ही भंग (वाजपेयी सरकार के एक वोट से विश्वास मत हारने के कारण) हो चुकी थी और नए चुनाव की तैयारी चल रही थी. ऐसे हालात में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस एक बड़े अंदरूनी संकट में फंस चुकी थी. अब चिट्ठी वाली कहानी पर लौटते हैं.

इस लेटर के सार्वजनिक होते ही देशभर में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने इसे लिखने वाले तीनों नेताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. तीनों के पुतले फूंके जाने लगे और उन्हें ‘गद्दार’ तक कहा गया. कांग्रेस के तमाम मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली में जुट गए और ऐलान कर दिया कि ‘जब तक सोनिया गांधी अध्यक्ष पद पर नहीं लौटेंगी, तब तक ये सभी लोग अपनी-अपनी राजधानियों में नहीं लौटेंगे और अपना कामकाज नहीं संभालेंगे.

चार-पांच दिनों तक यह राजनीतिक ड्रामा चलता रहा और सोनिया गांधी 10 जनपथ में बैठी रहीं. वे कांग्रेस का नेतृत्व संभालने से इनकार करती रहीं. सोनिया गांधी की नाराजगी इस बात से भी थी कि जब पीए संगमा ने कार्यसमिति की बैठक में उनके विदेशी मूल के मुद्दे को उठाया और उन पर व्यक्तिगत हमला किया, तब कार्यसमिति के किसी भी सदस्य ने तत्काल उनके बचाव में कुछ नहीं कहा. लेकिन फिर एक दिन आया 20 मई, 1999. उस दिन दोपहर कांग्रेस कार्यसमिति के वरिष्ठ सदस्य प्रणब मुखर्जी ने अगले दो घंटे के भीतर कार्यसमिति के सभी सदस्यों को 24 अकबर रोड पहुंचने को कहा. लेटर लिखने वाले तीनों नेताओं को छोड़कर लगभग सभी सदस्य मुखर्जी के बुलावे पर 24 अकबर रोड पहुंच गए और तब प्रणब दा ने अपनी अध्यक्षता में कार्यसमिति की बैठक शुरू कर दी.

बैठक के शुरू में ही प्रणब दा ने एक प्रस्ताव रखा-

“कांग्रेस कार्यसमिति पार्टी का अनुशासन भंग करने वाले तीनों नेताओं- शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर  को तत्काल प्रभाव से छह वर्षों के लिए कांग्रेस से निष्कासित करने का प्रस्ताव करती है. इस निष्कासन को कार्यसमिति द्वारा मंजूरी मिलने के समय से प्रभावी माना जाए.”

प्रणब दा के इस प्रस्ताव पर कांग्रेस कार्यसमिति के सभी उपस्थित सदस्यों ने मुहर लगा दी और उसी वक्त इन तीनों नेताओं को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया. इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने तत्काल एक संकल्प पारित किया और उसमें सोनिया गांधी के नेतृत्व में पूर्ण आस्था प्रकट की गई. तब जाकर सोनिया गांधी 10 जनपथ से बाहर निकलीं और 24 अकबर रोड पहुंचकर बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अपनी जिम्मेदारी को फिर से स्वीकार किया.

इसके कुछ ही दिनों बाद तीनों निष्कासित नेताओं (पवार, संगमा और तारिक) ने मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का गठन किया, लेकिन पांच महीने बाद ही महाराष्ट्र में कांग्रेस के ही साथ मिलकर सरकार बना ली थी. उस सरकार में कांग्रेस के विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के छगन भुजबल को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया था. 2004 से 2014 की अवधि में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार का हिस्सा थी. आज भी ये दोनों पार्टियां शिवसेना के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार चला रही हैं.

फरवरी, 2018 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे को दिए इन्टरव्यू में शरद पवार ने कहा था,

“अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई थी. उसके बाद जब मैं अपने घर में था, तब मुझे मीडिया के माध्यम से पता चला कि सोनिया गांधी सरकार बनाने का दावा पेश करने राष्ट्रपति भवन चली गई हैं. मुझे यह सब देख काफी धक्का लगा, क्योंकि तब कांग्रेस के अंदर मनमोहन सिंह और मैं (क्रमशः राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता) प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार थे. इस घटना के बाद मैंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर लिया था.”

ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद में शरद पवार ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी, लेकिन आज तक उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो पाई है. पिछले वर्ष महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के दौरान निराश शरद पवार ने अपने पोते रोहित पवार को पॉलिटिक्स में लांच करते वक्त यहां तक कह दिया था कि प्रधानमंत्री बनने के उनके सपने को भविष्य में रोहित जरूर पूरा करेंगे.

लेकिन वास्तविकता यही है कि दिसंबर में 80 साल के होने जा रहे शरद पवार 2024 के लोकसभा चुनाव तक अपनी उम्मीद छोड़ने को तैयार नहीं दिखते.

हमें यह 21 साल पुराना वाकया आज आपको बताने की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि दो दिन पहले ही कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं (जिनमें गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद और कपिल सिब्बल भी शामिल हैं और इन सबकी गिनती नेहरू-गांधी परिवार के वफ़ादार लोगों में होती रही है) ने एक बार फिर एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें कांग्रेस संगठन में जान फूंकने के लिए ऊपर से नीचे तक, आमूल-चूल परिवर्तन की वकालत की गई है. इस चिट्ठी के कारण कांग्रेस में एक बार फिर भूचाल आ गया है.

21 साल पहले की चिट्ठी और अब की चिट्ठी में फर्क सिर्फ इतना ही है कि उस वक्त की चिट्ठी के कारण कांग्रेस का आम कार्यकर्ता इसे लिखने वाले तीनों नेताओं (शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर) के खिलाफ सड़क पर उतर गया था, जबकि आज की लेटर पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में चुप्पी है और कोई भी इसे पार्टी विरोधी गतिविधि मानने को तैयार नहीं है.


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