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मालेगांव मस्ज़िद विस्फोट की जांच में NIA और ATS आपस में ही क्यों भिड़ गए?

आज 8 सितंबर है और आज की तारीख़ का संबंध है, एक ऐसे सीरियल ब्लास्ट से जिसकी गुत्थी 15 साल बाद तक उलझी की उलझी है. मालेगांव का वो ब्लास्ट, जिसकी तहक़ीक़ात कोरियन मूवी ‘मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर’ की स्क्रिप्ट की तरह नेल बाइटिंग तो रही लेकिन उसी मूवी की तरह, किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची. एटलीस्ट इस शो के शूट किए जाने तक.

मालेगांव. महाराष्ट्र के नाशिक ज़िले का गांव, जो 2006 के पहले तक महाराष्ट्र के टेक्सटाइल हब के रूप में विख्यात था. ये गांव या कहें क़स्बा, पहले से ही सांप्रदायिक तनाव का केंद्र रहता आया है. अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर किए आक्रमण का भी 2001 में यहां पर बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था. प्रदर्शनों के दौरान 12 मुस्लिम भी मारे गए थे.

तो बात है 8 सितंबर, 2006 की. वो जुम्मे का दिन था, साथ ही शब-ए-बारात भी थी. मान्यता है कि शब-ए-बारात को इबादत करके इंसान हर गुनाह से बरी हो सकता है. इसलिए दुनिया भर की हर मस्ज़िद की तरह मालेगांव की मस्ज़िद में भी और दिनों से कहीं ज़्यादा भीड़ थी. क़रीब सवा एक बजे थे. नमाज़ ख़त्म हो चुकी थी. तभी मस्ज़िद के पास की एक क़ब्रगाह में दो विस्फोट हुए. बाद में कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि दो नहीं, कुल तीन बम फटे थे. विस्फोट में 37 लोग मारे गए. 200 के ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हो गए. ज़ाहिर था कि मरने वालों में अधिकतर मुस्लिम थे. पुलिस की जांच से पता चला कि इन विस्फोटों में RDX, अमोनियम नाइट्रेट और फ़्यूल-ऑयल का इस्तेमाल किया गया. सेम वही मिश्रण, जो 11 जुलाई, 2006 के मुंबई ट्रेन बम विस्फोटों में किया गया था.

शब-ए-बारात का दिन और जुम्मे का वार. ठीक नमाज़ के बाद का वक्त. बहुत बड़ा हादसा.
शब-ए-बारात का दिन और जुम्मे का वार. ठीक नमाज़ के बाद का वक्त. बहुत बड़ा हादसा.

# आगे की टाइमलाइन

विस्फोटों के बाद 10 सितंबर को दो संदिग्धों के स्केच जारी किए गए. 28 नवंबर 2006 को मुंबई पुलिस के DGP पीएस पसरीचा ने कहा-

हमने मालेगांव विस्फोट मामले को सफलतापूर्वक सुलझा लिया है. हालांकि आठ अन्य संदिग्धों की तलाश जारी है.

आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने 2006 के बीतते-बीतते 9 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. नूरुल हुदा, रईस अहमद, सलमान फारसी, फरोघ मगदुमी, शेख मोहम्मद अली, आसिफ खान, मोहम्मद जाहिद, अबरार अहमद और शब्बीर मसीउल्लाह बत्तीवाला. इन नौ लोगों के संबंध कथित रूप से स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) और हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (HUJI) से बताए गए. पुलिस के मुताबिक, इनमें से तीन आरोपियों ने साजिश में अपनी संलिप्तता की बात स्वीकार कर ली. लेकिन बाद में तीन में से दो आरोपी मजिस्ट्रेट के सामने यह कहते हुए इक़बालिया बयान से मुकर गए कि उन्होंने दबाव में आकर कन्फ़ेशन दिया था.

2007 में CBI ने भी ATS की जांच पर मुहर लगा दी. लेकिन फिर मामले में नया मोड़ 2010 में आया, जब स्वामी असीमानंद ने 2006 और 2008 के मालेगांव और 2007 के समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोटों में हाथ होने की बात कबूल की. हालांकि ATS ने शुरुआत में ही हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी समूहों की संलिप्तता से इनकार कर दिया था. इसके लिए तब उसने अजीब से तर्क रखे थे, जैसे-

RDX का इस्तेमाल सिर्फ़ इस्लामी संगठन ही करते आए हैं.

मारे गए लोगों में ज़्यादातर मुस्लिम थे.
मारे गए लोगों में ज़्यादातर मुस्लिम थे.

ATS के इस बयान पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि-

हिंदुत्ववादी गुटों की भागीदारी को ‘रूल आउट या रूल इन’ करना अनुचित है. मुझे लगता है कि एक निष्पक्ष जांच होनी चाहिए जो सच्चाई को सामने लाए.

ख़ैर. स्वामी असीमानंद के बयान के बाद जांच की कमान अप्रैल 2011 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई. उस वक्त तक ATS द्वारा गिरफ़्तार 9 लोग जेल में थे. NIA के पास केस आने के बाद इन नौ लोगों ने नवंबर 2011 में जमानत की अर्ज़ी डाल दी, और इन्हें बेल मिल भी गई. उधर NIA ने मई 2013 में चार अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया. ये चार लोग थे- मनोहर नवारिया, राजेंद्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा. इनके खिलाफ 23 मई, 2013 को आरोप पत्र दायर किया गया. धन सिंह के तार समझौता एक्सप्रेस और 2008 में हुए एक और मालेगांव विस्फोटों से भी जुड़े बताए गए.

यूं NIA ने ATS और CBI की जाँच को ख़ारिज कर दिया और हिंदुत्ववादी अतिवादियों को घटना का ज़िम्मेदार बताया. NIA ने अपने आरोप पत्र में कहा-

ATS और CBI की पिछली जांच एक ‘फ़ेक बम’ पर केंद्रित थी. 13 सितंबर, 2006 को मोहम्मदिया मस्जिद की सीढ़ी पर एक नकली बम मिला था, जो फटा नहीं था. बम का पता लगाने वाले अधिकारियों ने इसे निष्क्रिय कर दिया था. मालेगांव पुलिस ने नकली बम मामले में नूर-उल-हुड्डा और रईस अली को गिरफ्तार किया था. बाद में मालेगांव विस्फोट मामले में उन पर मामला दर्ज कर दिया गया था.

विस्फोटों में RDX, अमोनियम नाइट्रेट और फ़्यूल-ऑयल का इस्तेमाल किया गया था.
मालेगांव विस्फोटों में  RDX, अमोनियम नाइट्रेट और फ़्यूल-ऑयल का इस्तेमाल किया गया था.

बाद में NIA ने एक गवाह के हवाले से घटना का ब्यौरा भी दिया. जो कुछ यूं था-

हमले का निर्णय दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी मॉड्यूल के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा लिया गया था. इसमें RSS के पूर्व प्रचारक सुनील जोशी भी शामिल थे, जिनकी बाद में कथित तौर पर उनके ही साथियों द्वारा हत्या कर दी गई थी. कालसांगरा और शर्मा को घटना को अमल में लाने का काम सौंपा गया था. इन दोनों ने चौधरी, धन सिंह और मनोहर सिंह को बम प्लांट करने के लिए बोला. इस टीम ने पहले मालेगांव की रेकी की. धमाकों के दिन शर्मा टीम को मालेगांव ले गए. वहां कलसांगरा ने उन्हें RDX और मुसलमानों की तरह भेष बदलने के लिए कपड़े भी दिए. कलसांगरा, धन सिंह, मनोहर सिंह और चौधरी बड़ा क़ब्रिस्तान के हमीदिया मस्जिद के पास साइकिल पर बम रखने के लिए गए. शर्मा फिर बाकी तीनों को इंदौर वापस ले गए.

दूसरी तरफ़ ATS की 2006 की स्टोरी एडिशन ये था कि-

विस्फोट सांप्रदायिक दंगे भड़काने के लिए मुस्लिम युवकों द्वारा किए गए. बमों के लिए RDX पाकिस्तान से आया था. एक पाकिस्तानी नागरिक मुज़म्मिल ने उन्हें मालेगांव में इकट्ठा किया था. आरोपी नूर-उल-हुदा, रईस अली और अबरार अहमद द्वारा एक-एक बम लगाया गया था. यवतमाल के एक इमाम जाहिद मजीद ने भी बम लगाया था और उसी दिन लौट गया था. एक बैटरी की दुकान का मालिक शब्बीर मासिउल्लाह भी इस साजिश का हिस्सा था.

लेकिन ATS की इस थ्योरी में दो दिक्क्तें थीं. पहली, विस्फोट के समय शब्बीर मासिउल्लाह एक अन्य मामले में मुंबई क्राइम ब्रांच की हिरासत में था. दूसरी, लगभग ढाई सौ यवतमाल निवासियों ने यह कहते हुए हलफनामा दायर किया कि मजीद उस समय कस्बे में ही था. और यवतमाल से मालेगांव के बीच दूरी क़रीब 11 घंटे या साढ़े चार सौ किलोमीटर की है.

जांच में दो बिलकुल अलग-अलग बातें क्यूं निकल कर आ रही थीं?
जांच में दो बिल्कुल अलग-अलग बातें क्यूं निकलकर आई थीं?

इसके बाद NIA ने ATS द्वारा आरोपी ठहराए गए 9 लोगों को क्लीन चिट देकर बरी करने के लिए अर्जी भी दे डाली. वहीं ATS अपने द्वारा गिरफ़्तार 9 आरोपियों को बरी करने का विरोध करने लगी.

हालांकि बाद में NIA ने कहा कि 9 आरोपी बरी नहीं हो सकते क्योंकि CBI और ATS ने उन पर आरोप लगाया है. फिर NIA ने ये भी कहा कि वह इन 9 आरोपियों को बरी करने का समर्थन या विरोध नहीं करती.

अंततः 25 अप्रैल 2016 को महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) अदालत ने इन 9 आरोपियों को बरी कर दिया. NIA ने तब कोर्ट में कहा कि उसके पास इन 9 आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं हैं.

आरोपियों के दो ‘सेट’ के चलते 14 दिसंबर, 2017 को मुंबई हाई कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान कहा भी था कि-

NIA के निष्कर्ष CBI और ATS जैसी सक्षम जांच एजेंसियों से इतने अलग कैसे हो सकते हैं? जब ATS और CBI ने नौ लोगों को आरोपित किया, तो NIA इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची कि दोनों जांच गलत थीं? और फिर आरोपियों के एक नए ही ‘सेट’ का नाम लेने लगी?

कोरियन मूवी, 'मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर' का एक सीन.
कोरियन मूवी, ‘मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर’ का एक सीन.

जुम्मे के दिन हुए इस ब्लास्ट का लेटेस्ट अपडेट भी जुम्मे के दिन का ही है. तारीख़ 14 जून, 2019. इस दिन मुंबई हाई कोर्ट ने ‘NIA वाले सेट’ को ज़मानत दे दी. ‘NIA वाले सेट’ मतलब जिन चार लोगों को NIA ने गिरफ़्तार किया था. न्यायाधीशों ने कहा-

याचिकाएं स्वीकार की जाती हैं. आवेदकों को 50,000 रुपये के नक़द मुचलके पर रिहा किया जाएगा. आवेदकों को हर सुनवाई के दौरान विशेष अदालत में उपस्थित होना होगा. आवेदक या आरोपी इस दौरान न तो सबूतों से छेड़छाड़ करेंगे और न ही गवाहों से संपर्क करेंगे.

इससे पहले स्पेशल कोर्ट ने इन चारों की ज़मानत की अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी थी. अब आपके समझ में आ गया होगा कि क्यूं हमने शुरू में ही इस केस की तुलना ‘मेमोरीज़ ऑफ़ मर्डर’ मूवी से की थी. अच्छी मूवी है. नहीं देखी है तो तो पहली फ़ुरसत में देख डालिए. अभी के लिए विदा. कल मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ.


पिछला तारीख़ देखें: दिल्ली हाई कोर्ट के सामने हुए उस बम विस्फोट की कहानी जिसमें 17 लोग मारे गए थे-

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