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2 चाइल्ड पॉलिसी पर असम और UP में चल क्या रहा है? विरोध करने वाले क्या कह रहे हैं?

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में कहा कि राज्य की सरकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों को मिलेगा, जिनके दो बच्चे होंगे. टू चाइल्ड पॉलिसी के लिए सोचने वाला असम अकेला राज्य नहीं है. यूपी में भी इस पॉलिसी का मसौदा तैयार किया जा रहा है. इस पूरे मामले को लेकर विपक्षी दल, बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं, क्योंकि दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है. टू चाइल्ड पॉलिसी को लेकर क्या कुछ चल रहा है, जानते हैं.

हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहा था?

आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार, 19 जून को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा था कि राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने वालों के लिए धीरे-धीरे टू-चाइल्ड पॉलिसी लागू की जाएगी. उन्होंने कहा था,

”कर्ज माफी हो या कोई अन्य सरकारी स्कीम, हम धीरे-धीरे इन योजनाओं के लिए जनसंख्या नीति लागू करेंगे. जनसंख्या मानदंड चाय बागानों, SC\ST समुदायों पर लागू नहीं होंगे, लेकिन भविष्य में सरकार से लाभ प्राप्त करने वाले अन्य सभी पर लागू होंगे, क्योंकि असम में जनसंख्या नीति पहले ही शुरू हो चुकी है.”

असम में जनसंख्या नियंत्रण की बात क्यों?

ऐसा पहली बार नहीं है कि हिमंत बिस्व सरमा ने ये बात की हो. कुछ दिन पहले भी उन्होंने मुस्लिम समुदाय से आबादी कंट्रोल करने को कहा था. उन्होंने कहा था कि जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए अल्पसंख्यक समुदाय का सहयोग जरूरी है. इस बयान के बाद भी विरोधियों ने उन्हें घेरा था, लेकिन हिमंत काफी पहले से जनसंख्या नियंत्रण की बात कहते रहे हैं.

Himanta Modi
हिमंत बिस्व सरमा  और पीएम मोदी (फाइल फोटो- PTI)

15 अगस्त 2019 के अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘जनसंख्या विस्फोट’ पर चिंता जताई थी. उसी वक्त असम सरकार ने 2017 में पारित ‘जनसंख्या और महिला सशक्तिकरण नीति’ को लागू करने की घोषणा कर दी थी. इसमें कहा गया था कि जनवरी 2021 से ऐसे लोग जिनके पास दो से अधिक बच्चे हैं, सरकारी नौकरी के पात्र नहीं होंगे.

रिपोर्ट्स के मुताबिक असम में औसत पारिवारिक आकार 5.5 का है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है. 2011 की जनगणना के मुताबिक असम में जनसंख्या घनत्व 398 है, जबकि 2001 में यह 340 था. असम में बेरोजगारी दर भी 61 है जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है.

जनसंख्या नियंत्रण पर क्या आपत्तियां हैं?

Advocating reproductive choices यानी ARC एक 115 संस्थाओं का संगठन है. इस संगठन का कहना है कि असम में टोटल फर्टिलिटी रेट 1.9 है जो राष्ट्रीय औसत 2.2 से कम है. National Family Health Survey का डेटा कहता है कि राज्य की 77 प्रतिशत विवाहित महिलाएं और 15 से 49 साल के 63 प्रतिशत पुरुष अब और बच्चे नहीं चाहते. या तो उन्होंने नसबंदी करा ली है या फिर उनके पार्टनर ने ऐसा किया है. संगठन के मुताबिक चीन ने भी ऐसा कुछ करना चाहा था जो सफल नहीं रहा.

Population
फाइल फोटो-PTI.

ऐसा माना जाता है कि ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ की बातें सांप्रदायिकता के आधार पर की जाती हैं. मुस्लिम आबादी को निशाने पर लेने के लिए अक्सर ऐसा कहा जाता है. लेकिन AIDUF के नेता रफीकुल इस्लाम कहते हैं कि असम में जहां मुस्लिम आबादी अधिक है वहां भी आबादी बढ़ने की दर ज्यादा नहीं है. AIDUF विधायक अमीनुल इस्लाम, असम के सीएम के बयान को राजनीतिक मानते हैं. वे कहते हैं कि पहले से ही दो बच्चों से अधिक वालों को राज्य में कई तरह के चुनाव लड़ने की मनाही है. अब इस बात को बिना वजह किया जा रहा है.

यूपी में क्या मसौदा तैयार किया जा रहा है?

यूपी के विधि आयोग ने भी कानून का मसौदा बनाने की शुरुआत कर दी है, जिसमें 2 से अधिक बच्चे वालों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ सीमित कर देने का प्रावधान हो सकता है. विधि आयोग के अध्यक्ष हैं रिटायर्ड जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल. उनका कहना है कि अगले दो महीनों में मसौदा तैयार कर लिया जाएगा.

‘दि प्रिंट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ये मानते हैं कि मसौदा तैयार किया जा रहा है, लेकिन वह कहते हैं कि जब तक ड्राफ्ट तैयार नहीं हो जाता वह कुछ नहीं कहना चाहेंगे. वहीं एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (इन्फॉर्मेशन) नवनीत सहगल कहते हैं कि जब बिल तैयार हो जाएगा तब इसे संबंधित विभाग को भेजा जाएगा और फिर सरकार इस पर फैसला करेगी.

प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में विपक्षी पार्टियों का मानना है कि ये एक चुनावी स्टंट है. वहीं बीजेपी से जुड़े लोग जनसंख्या नियंत्रण कानून को पुरानी मांग बताते हैं.

कांग्रेस ने भी दिया था-‘हम दो हमारे दो’ का नारा

असम कांग्रेस के विधायक देवव्रत सैकिया का कहना है कि कांग्रेस ने भी ‘हम दो हमारे दो’ स्लोगन दिया था. लोगों से इस नीति को अपनाने का आग्रह किया था. यह कोई नई बात नहीं है. साल 1976 में कांग्रेस ने हम दो हमारे दो का नारा दिया था, लेकिन यह कोई बाध्यकारी पॉलिसी नहीं थी. ये जागरूकता के लिए था, ताकि जनता बढ़ती आबादी की गंभीरता को समझे और खुद ही इसे फॉलो करे.

यूपी कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी कहते हैं,

“जनसंख्या एक राष्ट्रीय समस्या है. अगर बीजेपी इस पर गंभीर है तो एक राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाए. यूपी में जिस तरह से इसको प्रचारित किया जा रहा है वह केवल चुनावी बात ही है. देखिए, 1975-76 में कांग्रेस ने इसको लेकर काम किया था. अब भी हमारा मानना है कि जनसंख्या पर बात होनी चाहिए, सार्थक बहस होनी चाहिए, लेकिन राजनीति नहीं होनी चाहिए. ये हिंदू-मुस्लिम नहीं होना चाहिए.”

कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी कहते हैं कि बीजेपी ये समझ चुकी है कि जनता नाराज है और इसलिए मुख्य मुद्दों से लोगों को भटकाने की कोशिशें की जा रही है. 2022 के चुनावों में सरकार को उन सवालों को जवाब देना होगा जो 2017 में किए थे और अभी तक केवल वादे ही बने हुए हैं.

वहीं समाजवादी पार्टी के नेता अनुराग भदौरिया कहते हैं,

“बीजेपी को पता है कि साढ़े चार साल उसने कोई काम नहीं किया. यूपी की स्थिति किसी से छुपी नहीं है. बेरोजगारी के मुद्दे पर, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर सरकार नाकाम रही है. अब जब चुनाव नजदीक आ रहा है, तब सरकार जनसंख्या पर कानून की बात कर रही है, लेकिन जनता सब जानती है.”

ऐसी पॉलिसी लाने से बीजेपी का क्या फायदा होगा?

राजस्थान पत्रिका के न्यूज़ एडिटर रहे विनोद पाठक कहते हैं,

“कांग्रेस ने नारा दिया जरूर था, लेकिन शायद लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. आखिरी बार हुई जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी करीब 130 करोड़ थी. अभी शायद 140 हो या उससे भी ज्यादा. ऐसे में टू-चाइल्ड पॉलिसी वक्त की जरूरत है. इस पर राजनीति तो होगी ही, क्योंकि इसको बीजेपी द्वारा एक तबके पर हमला माना जाएगा.”

वहीं अमर उजाला के संपादक रहे कुमार भवेश चंद्र कहते हैं,

“मेरी समझ से सरकार इस तरह का कोई कानून नहीं लाना चाहेगी. ये जागरुकता के लिए हो सकता है, लेकिन बाध्यकारी नहीं. चर्चाओं से बीजेपी को निश्चित रूप से चुनावी फायदा होगा और वो इसका लाभ उठाना भी चाहेगी. वहीं विपक्षी इसको मुस्लिम विरोधी बताकर वोट बटोरना चाहेगा. कोई कानून बनने में लंबा वक्त लगता है, तमाम प्रक्रियाएं होती हैं. आनन फानन में कोई कानून नहीं बनाया जाता.”

जुलाई 2019 में राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा निजी विधेयक के रूप में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को संसद में पेश कर चुके हैं. बीजेपी सांसद गिरिराज सिंह भी ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ की मांग कर चुके हैं.  समय-समय पर बीजेपी के नेता इस तरह की मांग उठाते रहे हैं.


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