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मोदी सरकार OBC आरक्षण से जुड़े संशोधन बिल को नहीं लाती तो क्या होता?

127वें संविधान संशोधन बिल को लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी मंजूरी मिल गई है. इस बिल के तहत राज्यों को फिर से ये अधिकार मिलता है कि वे अपने यहां की ओबीसी सूची में बदलाव कर सकते हैं. संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. उनसे मंज़ूरी मिलते ही ये क़ानून में तब्दील हो जाएगा.

सभी दलों का समर्थन

संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र में ये इकलौता बिल है, जिसका विपक्ष ने विरोध नहीं किया. कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई, सीपीआई(एम), सपा, एनसीपी, डीएमके, अन्नाद्रमुक, बीजेडी, आम आदमी पार्टी और अन्य सभी दलों ने इस बिल के समर्थन में बहस के दौरान अपनी बात रखी. हालांकि, इन सभी दलों के नेताओं ने एक स्वर में आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को बढ़ाने के लिए भी अपनी आवाज़ उठाई. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आरक्षण पर 50 प्रतिशत लगी सीमा को हटाए बग़ैर इस बिल का कोई उपयोग नहीं होगा.

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बिल पर राज्य सभा में बोलते आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह और राजद सांसद प्रो. मनोज झा. फ़ोटो-पीटीआई

क्यों लाना पड़ा संशोधन बिल?

बात कुछ महीने पहले से शुरू होती है. 5 मई 2021. इस दिन सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला आना था. महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर. 2018 में देवेंद्र फडणवीस सरकार मराठाओं को OBC कोटे में आरक्षण देने का बिल लेकर आई थी. इस कानून के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की गई थी. हाई कोर्ट ने मराठा आरक्षण कानून की संवैधानिक वैधता को सही माना था. हालांकि आरक्षण 16 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी कर दिया था.

इसके बाद इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. वहां 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. चूंकि ये फैसला राज्यों में आरक्षण के कई और मामलों के लिए भी नज़ीर साबित हो सकता था, इसलिए सबकी नज़र थी कि अब सुप्रीम कोर्ट मराठा आरक्षण कानून पर क्या फैसला देता है.

5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया. इसमें उसने शिक्षा और नौकरी में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार दे दिया. कोर्ट ने इसकी कई वजहें बताईं. इनमें एक वजह ये थी कि कोई भी राज्य अपनी तरफ से आरक्षण की सूची में किसी जाति का नाम नहीं जोड़ सकता. कोर्ट ने कहा था कि चाहे पिछड़े वर्ग का आरक्षण केंद्र को देना हो या राज्य को, इस पर फैसला राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग को ही करना है. और पिछड़ी जातियों की लिस्ट सिर्फ राष्ट्रपति ही नोटिफाई कर सकते हैं. इसके साथ ही कोर्ट ने संविधान संशोधन 102 को सही माना. कोर्ट ने कहा कि ये संविधान के बुनियादी ढांचे के विरुद्ध नहीं है.

अब देश में ऐसा होता आया है कि कई जातियों को राज्य की नौकरियों में OBC आरक्षण का लाभ मिलता रहा है, लेकिन केंद्र की नौकरियों में वो जातियां OBC में नहीं आती हैं. कहने का मतलब OBC जातियों को लेकर एक लिस्ट राज्य की होती है और केंद्र की अपनी लिस्ट होती है. इसमें मुमकिन है कि कई जातियां जो राज्य की OBC सूची में हों, वो केंद्र की सूची में ना हों.

राज्यों को अपनी OBC सूची तैयार करने का हक रहा है. और ये हक संविधान से मिलता है. अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) ने राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची की पहचान करने और घोषित करने की शक्ति दी है. लेकिन फिर ऐसा क्या हो गया कि मराठा आरक्षण से जुड़े अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य अपने तरफ से किसी जाति को OBC में नहीं जोड़ सकते. यहां बात आती है संविधान संशोधन 102 की.

2018 में मोदी सरकार संविधान में एक संशोधन लेकर आई थी. संशोधन नंबर 102. इस संशोधन के ज़रिए अनुच्छेद 338बी और 342ए संविधान में जोड़े गए. अनुच्छेद 338B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की संरचना, कर्तव्यों और शक्तियों के बारे में है. और अनुच्छेद 342A राष्ट्रपति को विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को स्पेसिफाई करने का अधिकार प्रदान करता है. इसके लिए संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श किया जा सकता है.

तो संविधान में इन बदलावों के साथ राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग एक संवैधानिक संस्था बन गई. 102वें संविधान संशोधन के बाद से नियम ये हो गया कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रपति ही नई OBC जातियों की सूची नोटिफाई करेंगे. इससे हुआ ये कि राज्य सरकारों के हाथ बंध गए. पहले जो राज्य सरकारें पिछड़े या अति पिछड़े वर्ग में अपने हिसाब से जातियों को जोड़ लेती थीं, अब उस पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन 102 के आधार पर रोक लगा दी. मराठा आरक्षण के मामले में भी ये देखा गया.

Modi
पीएम नरेंद्र मोदी. फोटो- आजतक

केंद्र सरकार फिर सुप्रीम कोर्ट गई

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में रिव्यू पिटीशन डाली. मोदी सरकार ने कोर्ट से कहा कि वो संविधान संशोधन 102 की व्याख्या फिर से करे, क्योंकि वो राज्यों को OBC लिस्ट बनाने से रोकने के लिए ये संविधान संशोधन नहीं लाई थी. रिव्यू पिटीशन पर अभी कोर्ट का फैसला नहीं आया है.

इस बीच संविधान में फिर संशोधन की मांग हो रही थी. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत कई बीजेपी नेता भी केंद्र से दरख्वास्त कर रहे थे कि संविधान में संशोधन किया जाए और राज्यों को OBC जातियां तय करने का हक मिले. गैर-बीजेपी शासित राज्यों से भी ऐसी मांग रही है. इसलिए केंद्र सरकार एक बार फिर से संविधान में संशोधन के लिए बिल लेकर आई.

इसके ज़रिए संविधान के अनुच्छेद 342A के क्लॉज 1 और 2 में संशोधन किया गया. और एक नया क्लॉज 3 जोड़ा गया. 342 A (3) से राज्यों को अपनी OBC सूची तैयार करने का अधिकार मिल गया. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 366 में क्लॉज 26C और अनुच्छेद 338 में नई क्लॉज B(9) जोड़ी गई. इनके ज़रिए राज्यों को राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के पास जाए बिना ओबीसी सूची को सीधे नोटिफाई करने का अधिकार मिल गया.

अगर सरकार ये संशोधन बिल लेकर नहीं आती और OBC जातियों की सिर्फ केंद्र वाली लिस्ट रहती, तो राज्यों की ओबीसी सूची खत्म कर दी जाती. इससे एक बड़ा तबका आरक्षण से वंचित रह जाता. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, अगर OBC की राज्य सूची खत्म कर दी जाए तो 671 जातियों का आरक्षण बंद हो जाएगा, जो कुल OBC आबादी का लगभग 5वां हिस्सा है. हालांकि, ऐसा नहीं हुआ और अब कयास लगाया जा रहा है कि अगले साल होने वाले यूपी चुनाव में बीजेपी को इसका फ़ायदा मिल सकता है.


वीडियो- संसद में पास ट्रिब्यूनल रिफ़ॉर्म्स बिल के क़ानून में तब्दील होने से क्या बदलाव होंगे?

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