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100 दिनों में मोदी 2.0 ने सेना के लिए क्या किया?

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मोदी सरकार को एक कार्यकाल पर रोकने के लिए विपक्ष की रट थी – रफाल. और नारा था – चौकीदार चोर है. लेकिन चुनाव के साल 2019 में महीना आया फरवरी का. इसने तब की (और आने वाले कई सालों की) चुनावी राजनीति के लिहाज़ से दो बड़े उर्वर मुद्दे दिए – पुलवामा और बालाकोट. भारत के रक्षकों पर आतंकवादियों का हमला और फिर पाकिस्तान की संप्रभु ज़मीन से अपना कारोबार चला रहे आतंकवादियों पर वायुसेना की बमबारी. रफाल का मुद्दा रफाल हवा हो गया. बात आ गई देश की रखवाली करने वाली सेना पर. चुनाव आयोग कहते कहते थक गया कि सेना का ज़िक्र चुनाव प्रचार में न हो. लेकिन क्या पक्ष, क्या विपक्ष, दोनों विंग कमांडर अभिनंदन के पोस्टर लगाने से बाज़ नहीं आए. इस सब में बाज़ी मारी भारतीय जनता पार्टी (चलिए एनडीए भी लिख देते हैं) ने. सरकार ने 100 दिन पूरे कर लिए हैं. और इतना वक्त काफी है पीछे रुककर ये देखने के लिए कि जिस सेना की कार्रवाई के लिए मोदी 1.0 ने वाहवाही लूटी, उसके लिए मोदी 2.0 ने अब तक क्या-क्या किया. बड़े कदमों का ज़िक्र पहले करेंगे.

1. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ

15 अगस्त, 2019 को लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी बोले कि हमारी तीनों सेनाओं के बीच समन्वय है, लेकिन आज जैसे दुनिया बदल रही है, युद्ध के तरीके बदल रहे हैं. इसलिए सरकार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद बनाएगी. ताकी तीनों सेनाओं को शीर्ष स्तर पर एक प्रभावी नेतृत्व मिले. मोदी ने इस ऐलान से भारत के सबसे सुस्त चाल विभाग – रक्षा मंत्रालय को एकदम से धप्पा कर दिया. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद तीनों सेना प्रमुखों से ऊपर होगा और सैनिक मामलों में प्रधानमंत्री को सलाह देगा.

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CDS का अभी महज़ ऐलान हुआ है और महीन जानकारियां सामने आना बाकी हैं. लेकिन ठीक तरीके से हुआ, तो ये आज़ाद भारत में सबसे महत्वपूर्ण सैनिक सुधार हो सकता है. इसीलिए इसपर थोड़ी तसल्ली में बात कर लेते हैं.

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का आइडिया आया कहां से?
आज़ाद भारत की सेनाओं का इतिहास अंग्रेज़ों के ज़माने में शुरू होता है. अंग्रेज़ भारत के तटों पर नौसेना के भरोसे उतरे थे. लेकिन देश के विशाल भूभाग पर काबू करने के लिए ज़रूरत पड़ी सेना की. माने आर्मी. बंगाल आर्मी, मद्रास आर्मी और बॉम्बे आर्मी नाम से सेनाएं बनीं. 1903 में इन्हें मिलाकर बना दी गई इंडियन आर्मी. आज़ादी के बाद बनी इंडियन आर्मी से अलग करने के लिए इस फौज को अब ब्रिटिश इंडियन आर्मी कहा जाता है. तो ये बड़ी होती फौज इतनी बड़ी हो गई कि इसके चीफ को ताकत के मामले में सिर्फ वाइसरॉय के बाद माना जाने लगा. पद का नाम था – कमांडर इन चीफ – इंडिया. इनका घर होता था दिल्ली का फ्लैगस्टाफ ऑफिस. और इनका हुक्म चलता था उन दसियों लाख फौजियों पर, जो भारत, बर्मा, सीलोन, इराक, ईरान, सिंगापुर और अफ्रीका तक में तैनात होते थे. ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सहारे और इंग्लैंड ने पहले और दूसरे – दोनों महायुद्ध लड़े और जीते.

आज़ादी के बाद क्या बदला इसमें?
आज़ाद भारत अपने लिए शक्ति का एक ही केंद्र चाहता था – जनता और जनता का चुना प्रधानमंत्री. इसलिए ज़रूरी था कि दुनिया फतह करने वाली फौज भी उसके हुक्म से बाहर न रहे. तो सैनिक अफसरशाही को सामान्य प्रशासन वाली अफसरशाही के तहत लाया गया. कुछ कदम उठाए गए –
>> कमांडर इन चीफ का पद सेरेमोनियल (रस्मी) बना दिया गया. एक तरह से मानद.
>> राष्ट्रपति को कमांडर इन चीफ बना दिया गया. राष्ट्रपति, जो प्रधानमंत्री की सलाह से ही काम करते हैं.
>> पद का नाम कमांडर इन चीफ, इंडिया से बदलकर कमांडर इन चीफ इंडियन आर्मी कर दिया गया. संविधान लागू होने के पांचवें साल आया द कमांडर्स इन चीफ (चेंज इन डेज़िग्नेशन) एक्ट, 1955. इसमें पद का नाम फिर बदलकर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कर दिया गया. यही काम नौसेना और वायुसेना के अध्यक्षों के साथ हुआ.
>> सेना अध्यक्षों के पद को कैबिनेट सेक्रेटरी के रैंक से और नीचे किया गया. सेक्रेटरी साहब सीनियर थे ही, और सीनियर हो गए.
>> ये तय हुआ कि सेना कभी भी स्थिति में सरकार के काम में दखल नहीं देगी. सरकार भी सेना के मामलों से दूर रहेगी.
नाम और सीनियॉरिटी वाली बात का असर प्रशासनिक स्तर पर भी हुआ और प्रतीक के स्तर पर भी. जहां से महादेश की सीमाओं से भी बाहर तैनात फौज को हुक्म जाते थे, उस फ्लैगस्टाफ ऑफिस में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रहने लगे. बाद में इसी का नाम तीन मूर्ति भवन हुआ.

ये इंतज़ाम बदलने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
इतने सालों में सेना ने हमेशा अपनी ड्यूटी पूरी की. 1962 को छोड़कर हम कोई जंग नहीं हारे. लेकिन कारगिल के वक्त पाकिस्तान ने साबित किया कि वो भारतीय की फौज को कम से कम एक बार चकमा देने की तैयारी तो रखता है. देश में बड़े इंटेलिजेंस फेलियर की बात हुई. कि लड़ाई जीतने का जश्न जायज़ है लेकिन ऐसा इंतज़ाम क्यों नहीं है कि लड़ाई हो ही न. और अगर हो जाए तो भारत उससे निपट सके. दबी ज़बान में कारगिल की लड़ाई के वक्त सेना और वायुसेना के बीच तालमेल की कमी की बातें हुईं. इसी सब का विचार करने के लिए के सुब्रहमण्यम की अध्यक्षता में बनी कारगिल रिव्यू कमेटी. फरवरी 2000 में संसद में पेश हुई रिपोर्ट में कमेटी ने साफ लिखा – देश की सेनाओं में तालमेल के लिए एक व्यक्ति तीनों सेना प्रमुखों से ऊपर भी होना चाहिए. लेकिन सरकार ने अमल नहीं किया. कारगिल रिव्यू कमेटी के बाद दो और कमेटियां बनीं. 2012 में बनी नरेश चंद्र कमेटी. इसे कारगिर रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट पर हुए अमल पर टिप्पणी करनी थी. इसने कहा कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जैसा ताकतवर पद फिलहाल न भी बनाना चाहें तो चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी को स्थाई अध्यक्ष ही दे दीजिए. 2016 में लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेतकर कमेटी भी बनी. इसके 99 सुझावों में से एक ये भी था कि भारत सरकार और सेनाओं के बीच तालमेल के लिए एक सिंगल पॉइन्ट एडवाइज़र हो – चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ. लेकिन 15 अगस्त, 2019 तक किसी बड़े नेता ने राजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाने का साहस नहीं किया.

अब तक सरकारें CDS का पद बनाने से क्यों बच रही थीं?
सेना देश में सबसे ताकतवर संस्थान है. तो सरकारें उन्हें अपने मातहत ही रखना चाहती हैं. सरकारों को डर रहा कि CDS कहीं बहुत ज़्यादा ताकतवर न हो जाए. खासकर जब भारत में लगातार गठबंधन सरकारें बन रही थीं.

मोदी सरकार जो CDS बनाएगी, वो क्या करेगा?
पूरी जानकारी तो आने वाले वक्त में सामने आएगी. लेकिन ये कोई ‘फोर स्टार जनरल’ (सेना के सामान्य ढांचे में सर्वोच्च पद) होगा. नौसेना से हुआ तो एडमिरल, और वायुसेना से हुआ तो एयर चीफ मार्शल. ये अफसर तीनों सेना प्रमुखों में ‘फर्स्ट अमंग ईक्वल्स’ माना जाएगा. ठीक वैसे जैसे कैबिनेट में प्रधानमंत्री होते हैं. बराबर, लेकिन सबसे पहले. तो सेना के तीनों अंगों को CDS के हुक्म मानने होंगे. ये सैनिक मामलों में प्रधानमंत्री को एक्सपर्ट राय भी देगा. ये संभावना भी जताई जा रही है कि सेना-नौसेना और वायुसेना एक दूसरे की क्षमताओं और संसाधनों का इस्तेमाल कर सकें, इसकी व्यवस्था की जाएगी. इसे कहा जा रहा है ‘वर्टिकल इंटीग्रेशन’. इससे रक्षा पर खर्च को कम किया जा सकेगा. सबसे बड़ा बदलाव हो सकती हैं सर्विस थिएटर कमांड्स.

ट्राइ सर्विस थियेटर कमांड क्या होती हैं?
फिलहाल आर्मी-नेवी-और एयरफोर्स की अपनी अपनी कमांड हैं. मिसाल के लिए उधमपुर स्थित सेना की उत्तरी कमांड. या नई दिल्ली स्थित वायुसेना की पश्चिमी एयर कमांड और कोच्चि स्थित नौसेना की दक्षिणी कमांड. तो बालाकोट जैसी कार्रवाई के लिए नई दिल्ली और उधमपुर दोनों मुख्यालयों को साथ लेना पड़ता है. थिएटर कमांड में किसी एक इलाके में रक्षा ज़रूरतों के हिसाब से सेनाओं को ज़िम्मेदारी दी जाएगी. जैसे लद्दाख. यहां सेना की माउंटेन स्ट्राइक कोर को वायुसेना के उस अंग के साथ काम में लिया जाएगा जो ज़्यादा ऊंचाई और पहाड़ों के बीच पतली हवा में भी उड़ने में सक्षम हो. जहां पानी मिले, वहां नौसेना के कमांडो. तो एक इलाके में तीनों सेनाओं से जुड़े संसाधन और एक्सपर्ट साथ में प्लानिंग, ट्रेनिंग और ड्यूटी करेंगे. इससे इमरजेंसी के वक्त बेहतरीन नतीजा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी. फिलहाल भारत में एक ट्राई सर्विस कमांड है – अंडमान एंड निकोबार कमांड.

अंडमान और निकोबार कमांड में तीनों सेनाओं के अंग साथ काम करते हैं. निर्मला सीतारमण ने रक्षा मंत्री रहते हुए कमांड का दौरा किया था. तब तीनों सेनाओं के फौजियों ने भारत की सेनाओं का संयुक्त चिह्न बनाया था. (तस्वीरः एएनआई)
अंडमान और निकोबार कमांड में तीनों सेनाओं के अंग साथ काम करते हैं. निर्मला सीतारमण ने रक्षा मंत्री रहते हुए कमांड का दौरा किया था. तब तीनों सेनाओं के फौजियों ने भारत की सेनाओं का संयुक्त चिह्न बनाया था. (तस्वीरः एएनआई)

तीनों सेनाओं में आधुनिकिकरण की मांग लंबे समय से है, जिसपर आने वाले दिनों में बहुत बड़े फैसले होंगे. CDS की राय इन सभी फैसलों में बहुत अहम हो जाएगी. देश के लिए नई नेशनल डिफेंस पॉलिसी भी आएगी, उसमें भी CDS का दखल होगा.

2. नए हथियार

रक्षा खरीद लंबा समय लेती हैं (इसीलिए हमने रक्षा मंत्रालय को ऊपर सुस्त चाल लिखा था). रफाल, अपाचे और एस – 400 मिसाइल की खरीद के लिए मोदी 2.0 से पहले से काम चल रहा है. लेकिन बालाकोट में वायुसेना की कार्रवाई के बाद हालत बिगड़ने का डर था. तो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने सेना और वायुसेना के लिए ताबड़तोड़ खरीददारी की है. इस सरकार के कार्यकाल के पहले 50 दिनों में रक्षा मंत्रालय ने सेना और वायुसेना के लिए तकरीबन 8500 करोड़ के हथियार खरीदे हैं. इनमें स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल, R-77 और R-73 एयर टू एयर मिसाइल शामिल हैं. सरकार ने तीनों सेनाओं को पाकिस्तान से सटी सीमाओं की रक्षा के लिए ज़रूरी साज़ो-सामान तुरंत खरीदने के लिए अधिकृत भी किया है.

3. नई परमाणु नीति (पेंडिंग)

पेंडिंग इसलिए कि इस कदम की तरफ इशारा बस हुआ है. 16 अगस्त, 2019 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बरसी थी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पोखरण में थे. माने वो जगह, जहां 11 मई, 1998 को भारत ने तीन परमाणु परीक्षण किए थे. दौरे के बाद उन्होंने सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत की मौजूदगी में मीडिया से ये कहा,

”ये बात सच है कि जहां तक हमारी न्यूक्लियर पॉलिसी का सवाल है, उसमें नो फर्स्ट यूज़ की आज तक हमारी पॉलिसी यही है. अब भविष्य में क्या होगा, ये सब परिस्थितियों पर निर्भर करता है.”

राजनाथ के बयान ने याद दिला दी एक और रक्षा मंत्री की बात. वो भी मोदी के. मनोहर पर्रीकर. नवंबर 2016 में बोले कि मुझे समझ नहीं आता कि लोग ये क्यों कहते हैं हम नो फर्स्ट यूज़ देश हैं. मैं नहीं कहता कि परमाणु बम चलाओ, लेकिन इसकी संभावना क्यों खारिज की जाए. भारत एक नो फर्स्ट यूज़ देश है. बजाय इसके हमें कहना चाहिए कि हम एक ज़िम्मेदार देश हैं, न्यूक्लियर बम के इस्तेमाल में भी ज़िम्मेदारी से ही करेंगे. पर्रिकर और राजनाथ की बात का मर्म समझने के लिए जानिए कि भारत पहले नो फर्स्ट यूज़ देश था. माने हमारे पास न्यूक्लियर बम है, लेकिन पहले नहीं चलाएंगे. फिर बात हुई ‘नो फर्स्ट यूज़ अगेंस्ट अ नॉन न्यूक्लियर स्टेट’. तकनीकी रूप से इसका मतलब हुआ कि जिसके पास परमाणु बम हो, उसके खिलाफ हमारा परमाणु बम पहले चल सकता है (पाकिस्तान, चीन). तो राजनाथ दूसरे रक्षामंत्री हैं जो ‘नो फर्स्ट यूज़’ से परे की बात कर रहे हैं. पर्रीकर के बयान से रक्षा मंत्रालय ने खुद को दूर कर लिया था. राजनाथ के बाद भी मंत्रालय ने ये नहीं कहा कि नीति बदल देंगे. लेकिन जिस तरह से कहा गया है कि सब परिस्थितियों पर निर्भर करता है, माना जा रहा है कि मोदी सरकार परमाणु नीति पर पूर्ववर्ती सरकारों से हटकर फैसले भी ले सकती है.


वीडियोः मोदी सरकार के 100 दिनों का रिपोर्ट कार्ड

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