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तारीख़: परवेज़ मुशर्रफ़ ने पूर्व-प्रधानमंत्री को सपरिवार पाकिस्तान से क्यों निकाल दिया था?

दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है ‘तारीख़’. इसमें हम सुनाते हैं इतिहास की इंटरनेशनल कहानियां. जो न सिर्फ़ दिलचस्प होती हैं, बल्कि हमारी दुनियावी समझ को समृद्ध भी करती हैं.

आज 9 दिसंबर है. आज का क़िस्सा एक क्षमादान से जुड़ा है. जब एक मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर ने एक पूर्व प्रधानमंत्री को पहले सशर्त माफ़ किया. उसके तुरंत बाद देशनिकाला दे दिया. गुनाह था, एक सिविलियन प्लेन को हाईजैक करने और 199 पैसेंजर्स की हत्या का प्रयास. एक प्रधानमंत्री पर ये आरोप क्यों और कैसे लगे थे? जानते हैं विस्तार से.

ये कहानी पाकिस्तानी पॉलिटिक्स की है. साल था 1990 का. नवाज़ शरीफ़ भारी बहुमत से जीतकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. वो तीन साल ही इस पद पर रह पाए. राष्ट्रपति ग़ुलाम इशाक ख़ान से उनकी बनी नहीं. राष्ट्रपति ने नए चुनाव से ठीक पहले नेशनल असेंबली भंग कर दी. नवाज़ शरीफ़ को इस्तीफ़ा देना पड़ा.

शरीफ़ दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, 1997 के साल में. इस बार उनके हाथ एक कुंज़ी लगी. उन्हें पता चला कि अगर पाकिस्तान में सरकार चलानी है, तो आर्मी से रिश्ते बनाकर रखना होगा. शरीफ़ ने वही किया. उन्होंने परवेज़ मुशर्रफ़ पर दांव खेला. ये वही ग़लती थी, जो पाकिस्तान के इतिहास में बार-बार दोहराई जाती रही है.

कैसे?

पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति थे इस्कंदर मिर्ज़ा. उन्होंने आर्मी चीफ़ अयूब ख़ान से दोस्ती गांठी. पॉलिटिकल उठापटक को संभालने में मदद मांगी. बदले में अयूब ख़ान ने इस्कंदर मिर्ज़ा का तख़्त पलट दिया. इस्कंदर मिर्ज़ा अपने जीवन के अंतिम सालों में लंदन में रहे. वहां एक छोटा सा होटल चलाकर अपना गुज़ारा करते थे.

ज़िया उल-हक़ ने भुट्टो को फांसी पर चढ़ाकर उदाहरण पेश किया था. लेकिन शरीफ़ उससे सबक नहीं ले पाए.
ज़िया उल-हक़ ने भुट्टो को फांसी पर चढ़ाकर उदाहरण पेश किया था. लेकिन शरीफ़ उससे सबक नहीं ले पाए.

आगे चलकर इस लिस्ट में नाम जुड़ा ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का. भुट्टो, याह्या ख़ान के बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने थे. उन्होंने पाकिस्तान का संविधान बनवाया था. 1973 में वो देश के प्रधानमंत्री बने. भुट्टो ने जनरल ज़िया उल-हक़ पर भरोसा किया था. ज़िया, भुट्टो के सामने सिर झुकाए खड़े रहते. उनके सामने सिगरेट तक नहीं पीते थे. भुट्टो को लगा कि इससे वफ़ादार सेवक कहां ही मिलेगा.

फिर एक दिन ज़िया उल-हक़ ने उनके पैरों तले की ज़मीन खिसका दी. फिर वो दिन आया, जब भुट्टो का बनाया संविधान भंग कर दिया गया. पाकिस्तान में मार्शल लॉ लागू हुआ. राष्ट्रपति की कुर्सी पर ज़िया उल-हक़ बैठे नज़र आ रहे थे. और, भुट्टो कहां थे? वो फांसी के फंदे पर झूल रहे थे.

शरीफ़

नवाज़ शरीफ़ ने इतिहास पढ़ा ज़रूर था, लेकिन उससे सबक नहीं ले पाए. अपने दूसरे टर्म में उन्होंने वही ग़लती दुहराई. अक्टूबर, 1998 में उन्होंने सीनियॉरिटी के नियम को धता बताकर परवेज़ मुशर्रफ़ को आर्मी चीफ़ बना दिया. साथ में चेयरमैन ऑफ़ जॉइंट चीफ़्स का पद भी दिया. ये पाकिस्तानी सेना के सबसे बड़े अफ़सर का पद होता है.

परवेज़ मुशर्रफ़ पर भरोसा दिखाकर नवाज़ शरीफ़ ने अपने पैरों को कुल्हाड़ी पर रगड़ा था.
नवाज़ शरीफ़ आर्मी के भरोसे राजनीति साधने का ख़्वाब देखने वाले पहले नेता नहीं थे. पाकिस्तान में ऐसे ख़्वाब टूटते रहे थे. शरीफ़ ने ज़बरदस्ती इस लिस्ट में अपना नाम घुसा दिया था.

मुशर्रफ़ कुछ हफ्‍तों तक शरीफ़ के प्रभाव में रहे. उसके बाद वो अपने असली रंग में आ चुके थे. मुशर्रफ़ ने सेना के भीतर गुटबाजी शुरू कर दी थी. नवाज़ शरीफ़ को इसकी भनक तक नहीं लगी. मई, 1999 में भारत के साथ करगिल की लड़ाई शुरू हो गई. नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी लंबे समय के बाद मिली थी.

करगिल में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी. यहां से शरीफ़ और मुशर्रफ़ में रिश्ते बिगड़ने शुरू हुए. 12 अक्टूबर, 1999 को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के चीफ़ जनरल ज़ियाउद्दीन बट्ट प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे. बट्ट ने बताया कि मुशर्रफ़ तख़्तापलट की प्लानिंग कर रहे हैं. इसलिए मुशर्रफ़ को हटाना ज़रूरी हो चुका है. शरीफ़ ने मुशर्रफ़ को पद से हटाने का ऐलान कर दिया. उनकी जगह पर ज़ियाउद्दीन बट्ट को ज़िम्मेदारी सौंपी गई.

सात मिनट का फ़्यूल

परवेज़ मुशर्रफ़ उस रोज कोलंबो में थे. जैसे ही उन्हें इसकी जानकारी मिली, वो तुरंत कोलंबो एयरपोर्ट पहुंचे. वहां से पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) का एक विमान कराची उड़ने के लिए तैयार था. उधर मुशर्रफ़ फ्लाइट में बैठे, इधर सेना में उनके वफ़ादारों ने आर्मी को रावलपिंडी में इकट्ठा होने के लिए कह दिया. वो सरकारी ऑफ़िसों को अपने कब्ज़े में लेने लगे. नवाज़ शरीफ़ के समर्थकों को हाउस अरेस्ट किया जाने लगा.

मुशर्रफ़ समर्थक सैनिकों ने हरी झंडी मिलते ही कार्रवाई शुरू कर दी थी.
मुशर्रफ़ समर्थक सैनिकों ने हरी झंडी मिलते ही कार्रवाई शुरू कर दी थी.

ज़ियाउद्दीन बट्ट को इसका आभास हो चुका था. कोई भी अफ़सर उनके आदेश को मानने के लिए तैयार नहीं था. ऐसे में ज़रूरी था कि मुशर्रफ़ को पाकिस्तान लौटने से रोका जाए. नवाज़ शरीफ़ ने ख़ुद फ़ोन कर आदेश दिया कि मुशर्रफ़ का प्लेन किसी भी हालत में पाकिस्तान में नहीं उतरना चाहिए.

जब कराची एयरपोर्ट पर PIA के विमान ने लैंडिंग की इज़ाज़त मांगी, एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल ने साफ़ मना कर दिया. तब मुशर्रफ़ ने ख़ुद उनसे बात की थी. और, शरीफ़ के ऑर्डर को नकारने के लिए कहा. तब तक मुशर्रफ़ के वफादार भी एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे.

मुशर्रफ़ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर’ में लिखा,

जब मेरा विमान एयरपोर्ट पर उतरा, उस वक़्त सिर्फ़ सात मिनट का फ़्यूल बचा था. अगर आर्मी ने एयरपोर्ट पर कब्ज़ा नहीं किया होता, मेरा प्लेन हवा में ही क्रैश कर जाता.

‘भूतपूर्व प्रधानमंत्री’

मुशर्रफ़ एयरपोर्ट से बाहर निकले. रात घिर चुकी थी. उस समय तक रेडियो और टीवी स्टेशनों पर मुशर्रफ़ समर्थकों का कब्ज़ा हो चुका था. एक टुकड़ी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के घर पर कब्ज़ा कर चुकी थी. पाकिस्तान में एक बार फिर से तख़्तापलट हो चुका था. नवाज़ शरीफ़ कुछ ही समय में ‘भूतपूर्व’ हो चुके थे. 17 घंटे के भीतर पासा पलट चुका था.

इसके बाद नवाज़ शरीफ़ पर मुकदमा चला. उनके ऊपर प्लेन की हाईजैकिंग, पॉवर का ग़लत फायदा उठाने, 199 यात्रियों को मारने की कोशिश, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के गंभीर चार्जेज लगाए गए. पूरी कार्रवाई बस एक छलावा थी. तय था कि शरीफ़ को मौत की सज़ा मिलेगी.

शरीफ़ रिहा होकर निर्वासित हो गए.
शरीफ़ रिहा होकर निर्वासित हो गए.

ऐसे में सऊदी अरब से मदद का हाथ आया. मुशर्रफ़ पर दबाव पड़ा. मिलिटरी कोर्ट ने शरीफ़ को आजीवन जेल की सज़ा सुनाई. बाद में सऊदी अरब के कहने पर मुशर्रफ़, नवाज़ शरीफ़ को जेल से छोड़ने के लिए राज़ी हो गए.

अब कूच करो!

9 दिसंबर, 2000 को नवाज़ शरीफ़ को क्षमादान मिला. इसके बदले शर्त ये रखी गई कि वो दस साल तक निर्वासन में रहेंगे. और, अगले 21 सालों तक पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेंगे. इसके अलावा उनकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा सरकार ने ज़ब्त कर लिया. शरीफ़ को पांच लाख डॉलर का ज़ुर्माना भी भरना पड़ा.

11 दिसंबर को एक स्पेशल एयरक्राफ़्ट में बिठाकर उन्हें सपरिवार सऊदी अरब भेज दिया गया. शरीफ़ 2007 तक सऊदी अरब में रहे. मुशर्रफ़ ने ढील दी तो चुनाव लड़ने वापस लौटे.

नवाज़ शरीफ़ 2013 में तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. इस बार सब ठीक चल रहा था, तब उनका नाम पनामा पेपर्स में आया. जुलाई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उनको पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया. अगले साल कोर्ट ने उनको दस साल क़ैद की सज़ा सुनाई. शरीफ़ तब लंदन में थे. अभी भी वहीं हैं.


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