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वाजपेयी जी. आपका सवाल दो हिस्सों में है. जवाब भी वैसे ही दूंगा. पर उससे पहले एक अरज. मैं बाबा बनना चाहता था. बना नहीं हूं. यहां तो एक दोस्त की हैसियत से हूं. जिसे बतोलेबाजी में मजा आता है. तो आप बाबा कह बाजा न बजाएं. वो क्या है न. हो नहीं पाएगा. अब जवाब आपका. हम बुंदेलखंड के जिला जालौन के रहने वाले हैं. बचपन से बड़े बुजुर्गों को देखा. जब भी खेत में जाते या मोटरसाइकल पर सवार होते. साफी बांध लेते. हमारे यहां गमछे को साफी कहते हैं. और बड़े हुए. कुछ योग आयुर्वेद पर ज्ञान सुना. तो पता चला कि सिर हमेशा ढककर रखना चाहिए. ऊर्जा बेजा खर्च नहीं होती. शायद यही वजह है कि संन्यासी हो या सरदार, सबको दस्तार बांधने को कहा गया. पर हमारी एक और वजह है. गमछा बांधने से कान ढंका रहता है. सांय सांय की आवाज नहीं आती. और एकाग्रता बढ़ती है. कोई भी काम करना हो. जैसे आपके ये सवाल का जवाब देना. कुर्सी पर मारो पालथी. गमछा करो टाइट. और शुरू फिर बातों की फाइट. दूसरा सवाल. चुगदपने से भरपूर. मैं लड़कियों से झुककर बातें क्यों करता हूं. बतकही की बात होती तो कह देते. उनके सम्मान में झुका रहता हूं. पर उससे आपके चमनपने को और चूने का मौका मिलेगा. तो सीधी बात. मैं झुककर बात नहीं करता. आंख में आंख डालकर बात करता हूं. वैसे ही, जैसे दो इंसानों को बात करनी चाहिए. पूरे यकीन के साथ. पूरी बराबरी के साथ. नीयत में खराबियां लाए बिना. बाकी आप समझदार हैं. तो उम्मीद है कि आगे से सवाल भी वजनी होंगे. कल्याण हो.
आशुतोष चचा edited question ago
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